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EPF Contribution Rule Change: ₹1,800 Limit Set

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नई दिल्ली7 मिनट पहले

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अगर आप एक वेतनभोगी कर्मचारी हैं, तो ये खबर आपके लिए है। अभी तक ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) के करीब 8 करोड़ कर्मचारियों को अपनी बेसिक सैलरी का 12% अंशदान करना पड़ता था और कंपनी के लिए भी इतना ही योगदान करना अनिवार्य था। मगर, केंद्र ने 29 जून को नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 को अधिसूचित कर दिया।

इसने पुरानी ईपीएफ योजना, 1952 की जगह ले ली है। इसके तहत, अनिवार्य कर्मचारी योगदान को स्पष्ट रूप से 15 हजार रुपए की वैधानिक वेतन सीमा से जोड़ दिया गया है। यानी अब कंपनियों के लिए सिर्फ 15 हजार रुपए का 12% यानी 1,800 रुपए ही ईपीएफ अंशदान लेना जरूरी है। 1,800 रुपए से अधिक का योगदान तभी जारी रह सकता है, जब कर्मचारी स्वेच्छा से ऐसा करना चाहे।

अगर आप अपने रिटायरमेंट फंड के लिए ज्यादा बचत करना चाहते हैं, तो ईपीएफ में 1,800 रुपए से ज्यादा का अंशदान जारी रख सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनियों के लिए इस अतिरिक्त स्वैच्छिक योगदान के बराबर योगदान देना अनिवार्य नहीं है, जब तक कि वे किसी रोजगार अनुबंध या कंपनी की नीति के तहत ऐसा करने के लिए सहमत न हों।

मतलब ये कि ईपीएफ में कर्मचारी का योगदान कुछ भी हो, लेकिन कंपनियां अपनी ओर से ईपीएफ में केवल 1,800 रुपए देने के लिए ही कानूनी रूप से बाध्य होंगी। इसके अलावा, पीएफ निकासी, पेंशन या बीमा का दावा 20 दिन के भीतर निपटाना होगा। बिना किसी ठोस वजह के देरी होने पर कमिश्नर पर कार्रवाई होगी और 12% सालाना दंडात्मक ब्याज देना होगा, जो अधिकारी की सैलरी से कटेगा।

फायदा ये कि इन-हैंड सैलरी बढ़ सकती है, पर नुकसान ये कि ‘बचत’ घट जाएगी

1. कर्मचारियों पर सीधा क्या असर पड़ेगा? क्या ज्यादा कटने वाला पैसा अब सैलरी में मिलेगा?

अभी ज्यादातर कंपनियां बेसिक सैलरी का 12% पीएफ में काटती थीं। मान लीजिए बेसिक सैलरी 30,000 रुपए है, तो अभी 3,600 रुपए कटते थे। नए नियम के बाद इसमें से सिर्फ 1,800 रुपए कटना जरूरी है। बाकी 1,800 रुपए अब ‘मर्जी’ की बात है यानी अगर कर्मचारी और कंपनी दोनों राजी हों तो यह रकम पीएफ की बजाय हाथ में मिलने वाली सैलरी में जोड़ी जा सकती है। पर यह अपने आप नहीं होगा, इसके लिए कंपनी की नीति और आपसी सहमति जरूरी है।

2. क्या कंपनियां 12% वाला योगदान देना बंद कर देंगी? क्या वो पैसा अब सैलरी में जुड़ जाएगा?

कंपनी पर भी अब सिर्फ 1,800 रुपए देने की कानूनी बाध्यता है। इससे ज्यादा देना कंपनी और कर्मचारी की मर्जी पर है, कोई कानून उसे मजबूर नहीं करता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी कंपनियां तुरंत ज्यादा योगदान देना बंद कर देंगी। कई कंपनियां कर्मचारियों को बांधे रखने के लिए पुरानी व्यवस्था जारी भी रख सकती हैं। फैसला हर कंपनी अपने हिसाब से लेगी।

3. सरकार को इस बदलाव से क्या फायदा होगा?

सरकार का मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि पुराने और उलझे हुए पीएफ कानून (जो 1952 से चला आ रहा था) को नए श्रम कानूनों के हिसाब से साफ-सुथरा बनाना है। इससे नियम स्पष्ट होंगे, कागजी काम कम होगा और पीएफ से जुड़े विवाद घटने की उम्मीद है।

4. इससे कंपनियों को फायदा होगा या नुकसान?

ज्यादातर कंपनियों के लिए यह फायदे की बात है। जो कंपनियां ज्यादा सैलरी वाले कर्मचारियों पर भी पूरे 12% के हिसाब से पीएफ काट रही थीं, अब वे चाहें तो 1,800 रु. तक सीमित रह सकती हैं। उन पर कानूनी बोझ कम होगा। सैलरी का ढांचा बनाने में ज्यादा आजादी मिलेगी। इसमें नुकसान जैसी कोई बात नहीं दिख रही है।

5. ईपीएफ में 1,800 रुपए के अंशदान से कर्मचारियों की भविष्य की बचत पर क्या असर पड़ेगा?

अगर कोई कर्मचारी सिर्फ 1,800 रुपए महीना ही पीएफ में डालेगा, तो रिटायरमेंट तक जमा होने वाली रकम पहले से बहुत कम होगी। पीएफ पर अच्छा ब्याज मिलता है (करीब 8.25%), और यह ब्याज जितनी बड़ी रकम पर लगे, उतना फायदा होता है। हां, जो कर्मचारी चाहें, वे पहले जितना ही पैसा जमा करना जारी रख सकते हैं। असली खतरा उन्हें है, जो जानकारी के अभाव में या ज्यादा इन-हैंड सैलरी के लालच में कम पीएफ अंशदान का विकल्प चुनेंगे। उन्हें रिटायरमेंट के समय बहुत कम राशि मिलेगी।

6. सैलरी स्ट्रक्चर में क्या बदलाव दिख सकते हैं?

खासकर उन कंपनियों में बदलाव दिख सकता है जो सैलरी का पूरा पैकेज (सीटीसी) तय करके देती हैं। हो सकता है कि कंपनी और कर्मचारी मिलकर तय करें कि ज्यादा पीएफ काटने की बजाय वह पैसा इन-हैंड मिलने वाली सैलरी या दूसरे भत्तों में जोड़ दिया जाए। इससे महीने की सैलरी थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन रिटायरमेंट के लिए जमा होने वाला पैसा कम हो सकता है। यह बदलाव सभी जगह एक साथ नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और अलग-अलग कंपनियों में अलग-अलग तरीके से होगा।

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इसने पुरानी ईपीएफ योजना, 1952 की जगह ले ली है। इसके तहत, अनिवार्य कर्मचारी योगदान को स्पष्ट रूप से 15 हजार रुपए की वैधानिक वेतन सीमा से जोड़ दिया गया है। यानी अब कंपनियों के लिए सिर्फ 15 हजार रुपए का 12% यानी 1,800 रुपए ही ईपीएफ अंशदान लेना जरूरी है। 1,800 रुपए से अधिक का योगदान तभी जारी रह सकता है, जब कर्मचारी स्वेच्छा से ऐसा करना चाहे।

अगर आप अपने रिटायरमेंट फंड के लिए ज्यादा बचत करना चाहते हैं, तो ईपीएफ में 1,800 रुपए से ज्यादा का अंशदान जारी रख सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनियों के लिए इस अतिरिक्त स्वैच्छिक योगदान के बराबर योगदान देना अनिवार्य नहीं है, जब तक कि वे किसी रोजगार अनुबंध या कंपनी की नीति के तहत ऐसा करने के लिए सहमत न हों।

मतलब ये कि ईपीएफ में कर्मचारी का योगदान कुछ भी हो, लेकिन कंपनियां अपनी ओर से ईपीएफ में केवल 1,800 रुपए देने के लिए ही कानूनी रूप से बाध्य होंगी। इसके अलावा, पीएफ निकासी, पेंशन या बीमा का दावा 20 दिन के भीतर निपटाना होगा। बिना किसी ठोस वजह के देरी होने पर कमिश्नर पर कार्रवाई होगी और 12% सालाना दंडात्मक ब्याज देना होगा, जो अधिकारी की सैलरी से कटेगा।

फायदा ये कि इन-हैंड सैलरी बढ़ सकती है, पर नुकसान ये कि ‘बचत’ घट जाएगी

1. कर्मचारियों पर सीधा क्या असर पड़ेगा? क्या ज्यादा कटने वाला पैसा अब सैलरी में मिलेगा?

अभी ज्यादातर कंपनियां बेसिक सैलरी का 12% पीएफ में काटती थीं। मान लीजिए बेसिक सैलरी 30,000 रुपए है, तो अभी 3,600 रुपए कटते थे। नए नियम के बाद इसमें से सिर्फ 1,800 रुपए कटना जरूरी है। बाकी 1,800 रुपए अब ‘मर्जी’ की बात है यानी अगर कर्मचारी और कंपनी दोनों राजी हों तो यह रकम पीएफ की बजाय हाथ में मिलने वाली सैलरी में जोड़ी जा सकती है। पर यह अपने आप नहीं होगा, इसके लिए कंपनी की नीति और आपसी सहमति जरूरी है।

2. क्या कंपनियां 12% वाला योगदान देना बंद कर देंगी? क्या वो पैसा अब सैलरी में जुड़ जाएगा?

कंपनी पर भी अब सिर्फ 1,800 रुपए देने की कानूनी बाध्यता है। इससे ज्यादा देना कंपनी और कर्मचारी की मर्जी पर है, कोई कानून उसे मजबूर नहीं करता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी कंपनियां तुरंत ज्यादा योगदान देना बंद कर देंगी। कई कंपनियां कर्मचारियों को बांधे रखने के लिए पुरानी व्यवस्था जारी भी रख सकती हैं। फैसला हर कंपनी अपने हिसाब से लेगी।

3. सरकार को इस बदलाव से क्या फायदा होगा?

सरकार का मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि पुराने और उलझे हुए पीएफ कानून (जो 1952 से चला आ रहा था) को नए श्रम कानूनों के हिसाब से साफ-सुथरा बनाना है। इससे नियम स्पष्ट होंगे, कागजी काम कम होगा और पीएफ से जुड़े विवाद घटने की उम्मीद है।

4. इससे कंपनियों को फायदा होगा या नुकसान?

ज्यादातर कंपनियों के लिए यह फायदे की बात है। जो कंपनियां ज्यादा सैलरी वाले कर्मचारियों पर भी पूरे 12% के हिसाब से पीएफ काट रही थीं, अब वे चाहें तो 1,800 रु. तक सीमित रह सकती हैं। उन पर कानूनी बोझ कम होगा। सैलरी का ढांचा बनाने में ज्यादा आजादी मिलेगी। इसमें नुकसान जैसी कोई बात नहीं दिख रही है।

5. ईपीएफ में 1,800 रुपए के अंशदान से कर्मचारियों की भविष्य की बचत पर क्या असर पड़ेगा?

अगर कोई कर्मचारी सिर्फ 1,800 रुपए महीना ही पीएफ में डालेगा, तो रिटायरमेंट तक जमा होने वाली रकम पहले से बहुत कम होगी। पीएफ पर अच्छा ब्याज मिलता है (करीब 8.25%), और यह ब्याज जितनी बड़ी रकम पर लगे, उतना फायदा होता है। हां, जो कर्मचारी चाहें, वे पहले जितना ही पैसा जमा करना जारी रख सकते हैं। असली खतरा उन्हें है, जो जानकारी के अभाव में या ज्यादा इन-हैंड सैलरी के लालच में कम पीएफ अंशदान का विकल्प चुनेंगे। उन्हें रिटायरमेंट के समय बहुत कम राशि मिलेगी।

6. सैलरी स्ट्रक्चर में क्या बदलाव दिख सकते हैं?

खासकर उन कंपनियों में बदलाव दिख सकता है जो सैलरी का पूरा पैकेज (सीटीसी) तय करके देती हैं। हो सकता है कि कंपनी और कर्मचारी मिलकर तय करें कि ज्यादा पीएफ काटने की बजाय वह पैसा इन-हैंड मिलने वाली सैलरी या दूसरे भत्तों में जोड़ दिया जाए। इससे महीने की सैलरी थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन रिटायरमेंट के लिए जमा होने वाला पैसा कम हो सकता है। यह बदलाव सभी जगह एक साथ नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और अलग-अलग कंपनियों में अलग-अलग तरीके से होगा।

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