मराठी वेब सीरीज ‘अगं आई अहो आई’ में रेणुका शहाणे ऐसी मां का किरदार निभा रही हैं, जो रिश्तों को जोड़ने में विश्वास रखती है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने बताया कि ‘अगं आई’ और ‘अहो आई’ का मतलब क्या है, सास-बहू के रिश्तों को लेकर धारणाएं कैसे बदल सकती हैं, परिवार क्यों टूट रहे हैं और बेटी की शादी के बाद मां किन भावनाओं से गुजरती है। सवाल: सबसे पहले हमारे हिंदी पाठकों को बताइए कि ‘अगं आई अहो आई’ का मतलब क्या है? जवाब: ‘अगं आई’ का मतलब अपनी मां है। मराठी में मां को प्यार से ‘आई’ कहते हैं। शादी के बाद लड़की ससुराल जाती है तो सम्मान से सास को ‘अहो आई’ कहा जाता है। सीरीज की खूबसूरती यही है कि नई दुल्हन की यात्रा अपनी मां ‘अगं आई’ से शुरू होकर सास को भी उसी अपनत्व से ‘अहो आई’ बनाने तक पहुंचती है। सवाल: यानी सास और बहू का रिश्ता भी मां-बेटी जैसा हो सकता है? जवाब: बिल्कुल। हमारी सीरीज दिखाती है कि सास सिर्फ नियम बनाने वाली नहीं, दोस्त भी बन सकती है। वह बहू को इतना अपनापन देती है कि कई बार मां से भी ज्यादा दुलार करती नजर आती है। वहीं लड़की की मां को डर रहता है कि कहीं बेटी उससे दूर न हो जाए। रिश्तों की यही भावनाएं कहानी को खास बनाती हैं। सवाल: इस कहानी की ऐसी कौन-सी बात थी जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? जवाब: दो बातें। पहली, यह हमारे घरों जैसी कहानी है। लगता है जैसे किसी ने कैमरा घर के अंदर लगा दिया हो। दूसरी, हम अक्सर नई पीढ़ी की लड़कियों के बारे में पहले से राय बना लेते हैं कि उनके संस्कार कमजोर होंगे या वे परंपराओं को नहीं मानेंगी। लेकिन कहानी दिखाती है कि रिश्ते सिर्फ बहू की जिम्मेदारी नहीं होते। जब लड़की नए परिवार में आती है तो उसे अपनाने की जिम्मेदारी ससुराल वालों की भी होती है। सास उसे समझ और स्वीकार कर ले तो रिश्ते अपने आप मधुर हो जाते हैं। सवाल: अक्सर लोग पहले से ही बहू के बारे में राय बना लेते हैं, आप क्या सोचती हैं? जवाब: यही सबसे बड़ी गलती है। अगर शुरुआत ही इस सोच से होगी कि लड़की कैसी होगी, उसके संस्कार कैसे होंगे या उसके मायके को नीचा दिखाया जाएगा, तो रिश्ता कभी अच्छा नहीं बन सकता। इसका असर बेटे और पति पर पड़ता है। सबसे ज्यादा वही बीच में पिसते हैं। सवाल: अगर बहू को बेटी और दोस्त की तरह स्वीकार कर लिया जाए तो शायद आधी समस्याएं खत्म हो जाएं? जवाब: बिल्कुल। दो महिलाओं के बीच दोस्ती बन जाए तो पूरा घर मजबूत हो जाता है। हमारी सीरीज सिर्फ सास-बहू का रिश्ता नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच सम्मान और अपनापन भी दिखाती है। जब लड़की की मां देखती है कि बेटी को ससुराल में प्यार मिल रहा है, तो उसके मन में भी उस परिवार के लिए सम्मान अपने आप आ जाता है। सवाल: टीवी और फिल्मों में अक्सर सास-बहू के रिश्ते लड़ाई-झगड़े वाले ही दिखाए जाते हैं। आपकी सीरीज इससे अलग नजर आती है? जवाब: हां, हम हमेशा सुनते आए हैं कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है। लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं है। बहू परिवार की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने वाली है। अगर इस रिश्ते को प्यार और सम्मान से निभाया जाए तो पूरा परिवार खुश रहता है। सवाल: क्या इस किरदार में आपको अपनी मां या खुद की झलक दिखाई दी? जवाब: मेरी मां और मैं इस किरदार जितनी सख्त नहीं हैं। मेरी मां बहुत अनुशासित थीं, लेकिन उनका तरीका अलग था। इस किरदार में मुझे थोड़ा स्ट्रिक्ट दिखना था, इसलिए यह नया अनुभव था। लेकिन एक भावना से मैं पूरी तरह जुड़ गई। हर मां चाहती है कि उसकी बेटी को संस्कारों की वजह से कभी कुछ सुनना न पड़े। खासकर जब बेटी इकलौती हो और शादी के बाद घर खाली हो जाए, तब मां के भीतर का खालीपन बहुत गहरा होता है। सवाल: आज भी बेटियों को शादी से पहले अलग तरह की सीख दी जाती है, आप क्या मानती हैं? जवाब: पहले बेटियों और बेटों में फर्क किया जाता था। अब हालात काफी बदले हैं, लेकिन आज भी मां बेटी से कहती है, “ये सीख लो, वो सीख लो, नहीं तो आगे सुनना पड़ेगा।” यह सोच अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सवाल: आज परिवार तेजी से टूट रहे हैं। आपको इसका सबसे बड़ा कारण क्या लगता है? जवाब: अगर हम रोज झगड़े और कलह वाली चीजें देखते रहेंगे तो उसका असर जरूर पड़ेगा। लेकिन फैसला हमारे हाथ में है कि हमें कैसा परिवार चाहिए। हर घर में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सुलझाने का तरीका सकारात्मक होना चाहिए। हर छोटी बात बढ़ाने का असर सिर्फ पति-पत्नी पर नहीं, पूरे परिवार और खासकर बच्चों पर पड़ता है। सवाल: और,बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं। आपका क्या कहना है? जवाब: बिल्कुल। अगर बच्चे रोज मां-बाप को लड़ते देखेंगे तो वही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाएगा। इसलिए रिश्तों को संभालना सिर्फ दो लोगों की नहीं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। सवाल: शूटिंग के दौरान कोई ऐसा भावुक सीन आया जिसने आपको अंदर तक छू लिया? जवाब: हां। एक सीन करते समय मुझे अपनी मां की याद आ गई। मेरी शादी के बाद उन्होंने भी शायद यही महसूस किया होगा कि बेटी अब उनके साथ नहीं रहती। मां-बेटी का रिश्ता कितना भी मजबूत हो, शादी के बाद एक खालीपन जरूर आ जाता है। फोन पर बातें होती रहती हैं, लेकिन साथ रहने जैसा नहीं होता। उस सीन ने मुझे सचमुच भावुक कर दिया। सवाल: आप बेटी भी हैं और मां भी। आपके मुताबिक एक अच्छी मां कैसी होती है? जवाब: मेरे लिए मेरी मां आदर्श हैं। उन्होंने कभी नंबरों का दबाव नहीं बनाया। हमेशा कहा कि पूरी ईमानदारी से मेहनत करो। नतीजा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन कोशिश जरूर हमारे हाथ में होती है। मैं भी अपने बच्चों को यही सिखाना चाहती हूं कि पूरी मेहनत करो और परिणाम की चिंता में मत जीओ। मेरी मां ने मुझे जितना प्यार और संस्कार दिए, वही मैं भी अपने बच्चों को देना चाहती हूं।















































