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मूवी रिव्यू- 'भाई तेरा स्टार है':कहानी में दम नहीं, कॉमेडी में हंसी नहीं, राघव जुयाल की पहली सोलो लीड ने किया सिरदर्द

मूवी रिव्यू- 'भाई तेरा स्टार है':कहानी में दम नहीं, कॉमेडी में हंसी नहीं, राघव जुयाल की पहली सोलो लीड ने किया सिरदर्द

कॉमेडी फिल्म की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है दर्शकों को हंसाना। फिल्म ‘भाई तेरा स्टार है’ इसी सबसे जरूरी काम में बुरी तरह नाकाम रहती है। फिल्म शुरुआत से आखिर तक यह भरोसा दिलाती रहती है कि अब कुछ मजेदार होने वाला है, लेकिन हर अगले सीन के साथ निराशा ही हाथ लगती है। शोर है, भागदौड़ है, गलतफहमियां हैं, लेकिन हंसी कहीं दिखाई नहीं देती। राघव जुयाल की पहली सोलो लीड फिल्म से जिस धमाके की उम्मीद थी, वह शुरुआत में ही हवा हो जाती है। फिल्म की कहानी
कहानी लंदन में रहने वाले स्ट्रगलिंग एक्टर अजय सिंह (राघव जुयाल) की है। क्रिकेट की एक शर्त हारने के बाद उस पर क्लब मालिक फैटी (संजय कपूर) का दस हजार पाउंड का कर्ज चढ़ जाता है। पैसे लौटाने के लिए उसके पास सिर्फ एक रात है। लेकिन सच बोलने की बजाय अजय एक के बाद एक झूठ बोलता चला जाता है। उसकी गर्लफ्रेंड रोशनी (निहारिका एन एम), बहन नताशा (पार्वती ओमनाकुट्टन) और रोशनी का भाई सिड (विवान भटेना) भी इस झूठ के जाल में फंसते चले जाते हैं। कहानी का आइडिया सुनने में दिलचस्प लगता है। एक रात, ढेर सारी गलतफहमियां और भागदौड़ वाली कॉमेडी। लेकिन स्क्रीन पर सब कुछ इतना बिखरा हुआ है कि कुछ देर बाद यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कहानी आखिर जाना कहां चाहती है। कई दृश्य सिर्फ समय भरने के लिए जोड़े गए लगते हैं और क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म पूरी तरह थका देती है। फिल्म में एक्टिंग
राघव जुयाल ने किल जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से प्रभावित किया था, लेकिन यहां वह पूरी तरह लड़खड़ा जाते हैं। यह उनकी पहली सोलो लीड फिल्म है, लेकिन पूरी फिल्म में वह लीड हीरो से ज्यादा किसी साइड किरदार जैसे महसूस होते हैं। उनके चेहरे के हावभाव जरूरत से ज्यादा बनावटी लगते हैं और कई जगह ओवरएक्टिंग कॉमेडी को पूरी तरह खत्म कर देती है। कॉमिक टाइमिंग भी बार बार चूकती है, जिससे उनका किरदार दर्शकों से जुड़ ही नहीं पाता। संजय कपूर अपने अनुभव से कुछ दृश्यों को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनके हाथ भी बांध देती है। विवान भटेना अपने सीमित स्क्रीन टाइम में असर छोड़ते हैं और कई जगह राघव से ज्यादा सहज नजर आते हैं। पार्वती ओमनाकुट्टन फिल्म की सबसे संतुलित परफॉर्मेंस देती हैं। निहारिका एन एम ईमानदार कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन उन्हें भी ज्यादा मौका नहीं देता। चंदन राय सान्याल और निकी वालिया जैसे उम्दा कलाकारों की प्रतिभा का फिल्म में बेहद खराब इस्तेमाल किया गया है। फिल्म में डायरेक्शन
निर्देशक विवेक बी अग्रवाल की सबसे बड़ी गलती यह है कि उन्होंने शोर को कॉमेडी समझ लिया। पूरी फिल्म में किरदार लगातार भागते हैं, चिल्लाते हैं और एक दूसरे के पीछे दौड़ते रहते हैं, लेकिन कोई भी सिचुएशन ऐसी नहीं बनती जिस पर खुलकर हंसी आए।
स्क्रीनप्ले जरूरत से ज्यादा उलझा हुआ है। नए किरदार आते रहते हैं, लेकिन कहानी को मजबूत करने के बजाय उसे और बिखेर देते हैं। कई पंचलाइन बिना असर छोड़े निकल जाती हैं। गलतफहमियों पर टिकी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी राइटिंग होती है, लेकिन यहां वही सबसे कमजोर कड़ी साबित होती है। क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म पूरी तरह अपनी पकड़ खो देती है। फिल्म का तकनीकी पक्ष
लंदन की लोकेशन अच्छी लगती है और सिनेमैटोग्राफी भी ठीक ठाक है। एडिटिंग अगर थोड़ी और कसी हुई होती तो फिल्म का असर कुछ बेहतर हो सकता था। लेकिन कमजोर कहानी और ढीले स्क्रीनप्ले के सामने तकनीकी पक्ष भी बेबस नजर आता है। फिल्म में म्यूजिक
अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की कुछ गिनी चुनी अच्छी बातों में शामिल है। हालांकि गाने कहानी की रफ्तार को रोकते हैं। सबसे अजीब फैसला आखिर में लगातार गाने रखने का है, जिससे फिल्म खत्म होने के बाद भी खत्म होती हुई महसूस नहीं होती। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट
‘भाई तेरा स्टार है’ एक ऐसी कॉमेडी है, जिसमें सबसे ज्यादा कमी हंसी की है। कमजोर कहानी, बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले, फीका निर्देशन और राघव जुयाल की निराशाजनक लीड परफॉर्मेंस मिलकर इस फिल्म को बेहद थका देने वाला अनुभव बना देते हैं। जिस फिल्म से राघव को बतौर सोलो हीरो नई पहचान मिलनी थी, वही फिल्म उनके करियर के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। अगर अच्छी कॉमेडी देखने की उम्मीद लेकर थिएटर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपकी उम्मीद और आपका धैर्य दोनों तोड़ देगी।

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कॉमेडी फिल्म की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है दर्शकों को हंसाना। फिल्म ‘भाई तेरा स्टार है’ इसी सबसे जरूरी काम में बुरी तरह नाकाम रहती है। फिल्म शुरुआत से आखिर तक यह भरोसा दिलाती रहती है कि अब कुछ मजेदार होने वाला है, लेकिन हर अगले सीन के साथ निराशा ही हाथ लगती है। शोर है, भागदौड़ है, गलतफहमियां हैं, लेकिन हंसी कहीं दिखाई नहीं देती। राघव जुयाल की पहली सोलो लीड फिल्म से जिस धमाके की उम्मीद थी, वह शुरुआत में ही हवा हो जाती है। फिल्म की कहानी
कहानी लंदन में रहने वाले स्ट्रगलिंग एक्टर अजय सिंह (राघव जुयाल) की है। क्रिकेट की एक शर्त हारने के बाद उस पर क्लब मालिक फैटी (संजय कपूर) का दस हजार पाउंड का कर्ज चढ़ जाता है। पैसे लौटाने के लिए उसके पास सिर्फ एक रात है। लेकिन सच बोलने की बजाय अजय एक के बाद एक झूठ बोलता चला जाता है। उसकी गर्लफ्रेंड रोशनी (निहारिका एन एम), बहन नताशा (पार्वती ओमनाकुट्टन) और रोशनी का भाई सिड (विवान भटेना) भी इस झूठ के जाल में फंसते चले जाते हैं। कहानी का आइडिया सुनने में दिलचस्प लगता है। एक रात, ढेर सारी गलतफहमियां और भागदौड़ वाली कॉमेडी। लेकिन स्क्रीन पर सब कुछ इतना बिखरा हुआ है कि कुछ देर बाद यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कहानी आखिर जाना कहां चाहती है। कई दृश्य सिर्फ समय भरने के लिए जोड़े गए लगते हैं और क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म पूरी तरह थका देती है। फिल्म में एक्टिंग
राघव जुयाल ने किल जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से प्रभावित किया था, लेकिन यहां वह पूरी तरह लड़खड़ा जाते हैं। यह उनकी पहली सोलो लीड फिल्म है, लेकिन पूरी फिल्म में वह लीड हीरो से ज्यादा किसी साइड किरदार जैसे महसूस होते हैं। उनके चेहरे के हावभाव जरूरत से ज्यादा बनावटी लगते हैं और कई जगह ओवरएक्टिंग कॉमेडी को पूरी तरह खत्म कर देती है। कॉमिक टाइमिंग भी बार बार चूकती है, जिससे उनका किरदार दर्शकों से जुड़ ही नहीं पाता। संजय कपूर अपने अनुभव से कुछ दृश्यों को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनके हाथ भी बांध देती है। विवान भटेना अपने सीमित स्क्रीन टाइम में असर छोड़ते हैं और कई जगह राघव से ज्यादा सहज नजर आते हैं। पार्वती ओमनाकुट्टन फिल्म की सबसे संतुलित परफॉर्मेंस देती हैं। निहारिका एन एम ईमानदार कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन उन्हें भी ज्यादा मौका नहीं देता। चंदन राय सान्याल और निकी वालिया जैसे उम्दा कलाकारों की प्रतिभा का फिल्म में बेहद खराब इस्तेमाल किया गया है। फिल्म में डायरेक्शन
निर्देशक विवेक बी अग्रवाल की सबसे बड़ी गलती यह है कि उन्होंने शोर को कॉमेडी समझ लिया। पूरी फिल्म में किरदार लगातार भागते हैं, चिल्लाते हैं और एक दूसरे के पीछे दौड़ते रहते हैं, लेकिन कोई भी सिचुएशन ऐसी नहीं बनती जिस पर खुलकर हंसी आए।
स्क्रीनप्ले जरूरत से ज्यादा उलझा हुआ है। नए किरदार आते रहते हैं, लेकिन कहानी को मजबूत करने के बजाय उसे और बिखेर देते हैं। कई पंचलाइन बिना असर छोड़े निकल जाती हैं। गलतफहमियों पर टिकी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी राइटिंग होती है, लेकिन यहां वही सबसे कमजोर कड़ी साबित होती है। क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म पूरी तरह अपनी पकड़ खो देती है। फिल्म का तकनीकी पक्ष
लंदन की लोकेशन अच्छी लगती है और सिनेमैटोग्राफी भी ठीक ठाक है। एडिटिंग अगर थोड़ी और कसी हुई होती तो फिल्म का असर कुछ बेहतर हो सकता था। लेकिन कमजोर कहानी और ढीले स्क्रीनप्ले के सामने तकनीकी पक्ष भी बेबस नजर आता है। फिल्म में म्यूजिक
अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की कुछ गिनी चुनी अच्छी बातों में शामिल है। हालांकि गाने कहानी की रफ्तार को रोकते हैं। सबसे अजीब फैसला आखिर में लगातार गाने रखने का है, जिससे फिल्म खत्म होने के बाद भी खत्म होती हुई महसूस नहीं होती। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट
‘भाई तेरा स्टार है’ एक ऐसी कॉमेडी है, जिसमें सबसे ज्यादा कमी हंसी की है। कमजोर कहानी, बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले, फीका निर्देशन और राघव जुयाल की निराशाजनक लीड परफॉर्मेंस मिलकर इस फिल्म को बेहद थका देने वाला अनुभव बना देते हैं। जिस फिल्म से राघव को बतौर सोलो हीरो नई पहचान मिलनी थी, वही फिल्म उनके करियर के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। अगर अच्छी कॉमेडी देखने की उम्मीद लेकर थिएटर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपकी उम्मीद और आपका धैर्य दोनों तोड़ देगी।

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