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Young Age Fatty Liver Reasons; Non Alcoholic Prevention Tips

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4 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा

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क्या आपका पूरा शरीर तो दुबला–पतला है, लेकिन पेट पर चर्बी चढ़ रही है? गर्दन की मोटाई बढ़ रही है और हर वक्त थकान महसूस होती है? इसे हल्के में मत लीजिए। शरीर में हो रहे ये सारे बदलाव फैटी लिवर का संकेत हो सकते हैं।

अब आप ये तर्क दे सकते हैं कि फैटी लिवर तो शराब पीने के कारण होता है और मैं एल्कोहल को हाथ भी नहीं लगाता। तो इसका सीधा जवाब ये है कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने के कारण नहीं होता। जंक फूड खाने, कोल्ड ड्रिंक पीने और एक जगह पर बैठे रहने जैसी रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी–छोटी बुरी आदतें भी इस बीमारी को जन्म दे सकती हैं।

‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ यूरोप’ में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में करीब 2 करोड़ लोग नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर से ग्रस्त हैं, लेकिन 75% लोगों को इसका पता ही नहीं कि वे जोखिम में हैं।

फैटी लिवर डिजीज अब युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है। ‘जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी’ के अनुसार, दुनिया की करीब 38% आबादी फैटी लिवर से प्रभावित है, जिनमें लगभग 25% लोग शराब नहीं पीते। हेल्थ स्टडीज के मुताबिक, शहरी भारत के 30–40% लोग किसी-न-किसी स्तर की फैटी लिवर समस्या से जूझ रहे हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर डॉ. रॉबर्ट लस्टिग अपनी किताब ‘फैट चांस’ में लिखते हैं कि फैटी लिवर 50 साल पहले लगभग मौजूद ही नहीं थी। लेकिन आज यह बहुत आम हो चुकी है।

इसलिए आज फिजिकल हेल्थ में नॉन एल्कोहलिक लिवर डिजीज की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • नॉन एल्कोहलिक लिवर डिजीज के लक्षण क्या होते हैं?
  • इससे बचने के उपाय क्या हैं?

एक्सपर्ट- डॉ. संजय गोजा, डायरेक्टर, लिवर ट्रांसप्लांट एंड HPB सर्जरी (हेप्टो-पैन्क्रियाटो-बिलियरी), नारायणा हॉस्पिटल, गुरुग्राम

सवाल- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज क्या है?

जवाब- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) ऐसी कंडीशन है, जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है। इसमें व्यक्ति शराब नहीं पीता, फिर भी लिवर में फैट जमा हो जाता है। यह दुनिया की सबसे कॉमन क्रॉनिक लिवर डिजीज है। यह समस्या अक्सर मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से जुड़ी होती है, जैसे-

  • पेट के आसपास चर्बी होना
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस
  • टाइप-2 डायबिटीज
  • हाई ब्लड प्रेशर
  • हाई कोलेस्ट्रॉल

सवाल- एल्कोहलिक फैटी लिवर और नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर में क्या अंतर है?

जवाब- एल्कोहलिक और नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर दोनों में लिवर सेल्स में फैट जमा होता है, लेकिन दोनों की वजह अलग-अलग होती हैं।

एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज

यह समस्या शराब ज्यादा पीने से होती है। शराब लिवर के मेटाबॉलिज्म को नुकसान पहुंचाती है, जिससे शरीर फैट नहीं पचा पाता या बहुत धीरे पचाता है। यह फैट लिवर में जमा होने लगता है।

नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज

इसमें व्यक्ति शराब नहीं पीता, फिर भी लिवर में फैट जमा हो जाता है। इसकी मुख्य वजहें इस प्रकार हैं–

  • मोटापा
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस
  • टाइप-2 डायबिटीज
  • हाई ट्राइग्लिसराइड्स
  • लो फिजिकल एक्टिविटी

अगर दोनों में से किसी भी कंडीशन को समय पर कंट्रोल न किया जाए, तो लिवर में इंफ्लेमेशन, फाइब्रोसिस और आगे चलकर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।

सवाल- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के लक्षण क्या होते हैं?

जवाब- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज को ‘साइलेंट डिजीज’ भी कहते हैं। दरअसल, इसके लक्षण अक्सर शुरुआती दौर में नजर नहीं आते। लेकिन जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, शरीर कुछ संकेत देने लगता है, जिन्हें नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है। इसे नीचे दिए ग्राफिक में देखिए-

नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के लक्षण गंभीर होने पर ‘सिरोसिस’ का रिस्क हो सकता है। ऐसी कंडीशन में ये लक्षण दिख सकते हैं-

  • शरीर अतिरिक्त पानी जमा करने लगता है।
  • इंटरनल ब्लीडिंग हो सकती है।
  • मसल्स कमजोर हो सकती हैं।
  • कंफ्यूजन या याददाश्त में गड़बड़ी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

सवाल- युवाओं में नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर का जोखिम क्यों बढ़ रहा है?

जवाब- इसकी सबसे बड़ी वजह लाइफस्टाइल है। आज जीवन में मेहनत कम है और खानपान की आदतें खराब हैं। युवा बाहर का खाना या पैकेज्ड फूड ज्यादा खाते हैं, जिसमें अनहेल्दी फैट, शुगर और कैलोरीज बहुत ज्यादा मात्रा में होती हैं।

सवाल- कौन सी आदतें नॉन–एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के खतरे को बढ़ाती हैं?

जवाब- नॉन–एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज अचानक नहीं होती, बल्कि यह हमारी रोज की कुछ गलत आदतों का नतीजा होती है। खान-पान से लेकर लाइफस्टाइल तक की कुछ खराब आदतें धीरे-धीरे फैटी लिवर का खतरा बढ़ा देती हैं। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर कैसे डाइग्नोज होता है? इसके लिए कौन से टेस्ट किए जाते हैं?

जवाब- यह बीमारी कई बार रूटीन ब्लड टेस्ट या इमेजिंग जांच के दौरान सामने आती है। डॉक्टर बीमारी की पहचान के लिए कुछ खास टेस्ट करवाते हैं।

इमेजिंग टेस्ट: अल्ट्रासाउंड, CT स्कैन या MRI के जरिए लिवर में जमा फैट को देखा जा सकता है।

ब्लड टेस्ट: ब्लड टेस्ट से यह पता लगाया जाता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।

लिवर बायोप्सी: इस प्रक्रिया में डॉक्टर एक पतली सुई की मदद से लिवर से टिश्यू का छोटा सा सैंपल निकालते हैं, जिसे माइक्रोस्कोप से जांचा जाता है।

इन सभी जांचों की रिपोर्ट्स के आधार पर डॉक्टर फैटी लिवर की कंडीशन और उसकी गंभीरता का आंकलन करते हैं।

सवाल- क्या नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर को रिवर्स किया जा सकता है?

जवाब- हां, शुरुआती स्टेज में यह पूरी तरह रिवर्स हो सकता है। इसका सबसे प्रभावी इलाज लाइफस्टाइल में बदलाव है। वजन कम करके, हेल्दी डाइट लेकर और नियमित एक्सरसाइज करके लिवर से फैट कम किया जा सकता है।

सवाल- अपने लिवर को हेल्दी रखने के लिए क्या करें?

जवाब- लिवर हमारे शरीर का सबसे मेहनती अंग है, जो डिटॉक्स से लेकर मेटाबॉलिज्म तक कई अहम काम करता है। अगर रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़ी-सी सावधानी बरती जाए, तो लिवर को लंबे समय तक हेल्दी रखा जा सकता है और फैटी लिवर जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।

लिवर की सेहत को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर बीमारियों को न्यौता दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम आज ही सतर्क हों, क्योंकि लिवर अगर स्वस्थ है, तो पूरा शरीर स्वस्थ है।

………………………….

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4 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा

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क्या आपका पूरा शरीर तो दुबला–पतला है, लेकिन पेट पर चर्बी चढ़ रही है? गर्दन की मोटाई बढ़ रही है और हर वक्त थकान महसूस होती है? इसे हल्के में मत लीजिए। शरीर में हो रहे ये सारे बदलाव फैटी लिवर का संकेत हो सकते हैं।

अब आप ये तर्क दे सकते हैं कि फैटी लिवर तो शराब पीने के कारण होता है और मैं एल्कोहल को हाथ भी नहीं लगाता। तो इसका सीधा जवाब ये है कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने के कारण नहीं होता। जंक फूड खाने, कोल्ड ड्रिंक पीने और एक जगह पर बैठे रहने जैसी रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी–छोटी बुरी आदतें भी इस बीमारी को जन्म दे सकती हैं।

‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ यूरोप’ में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में करीब 2 करोड़ लोग नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर से ग्रस्त हैं, लेकिन 75% लोगों को इसका पता ही नहीं कि वे जोखिम में हैं।

फैटी लिवर डिजीज अब युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है। ‘जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी’ के अनुसार, दुनिया की करीब 38% आबादी फैटी लिवर से प्रभावित है, जिनमें लगभग 25% लोग शराब नहीं पीते। हेल्थ स्टडीज के मुताबिक, शहरी भारत के 30–40% लोग किसी-न-किसी स्तर की फैटी लिवर समस्या से जूझ रहे हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर डॉ. रॉबर्ट लस्टिग अपनी किताब ‘फैट चांस’ में लिखते हैं कि फैटी लिवर 50 साल पहले लगभग मौजूद ही नहीं थी। लेकिन आज यह बहुत आम हो चुकी है।

इसलिए आज फिजिकल हेल्थ में नॉन एल्कोहलिक लिवर डिजीज की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • नॉन एल्कोहलिक लिवर डिजीज के लक्षण क्या होते हैं?
  • इससे बचने के उपाय क्या हैं?

एक्सपर्ट- डॉ. संजय गोजा, डायरेक्टर, लिवर ट्रांसप्लांट एंड HPB सर्जरी (हेप्टो-पैन्क्रियाटो-बिलियरी), नारायणा हॉस्पिटल, गुरुग्राम

सवाल- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज क्या है?

जवाब- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) ऐसी कंडीशन है, जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है। इसमें व्यक्ति शराब नहीं पीता, फिर भी लिवर में फैट जमा हो जाता है। यह दुनिया की सबसे कॉमन क्रॉनिक लिवर डिजीज है। यह समस्या अक्सर मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से जुड़ी होती है, जैसे-

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  • टाइप-2 डायबिटीज
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जवाब- एल्कोहलिक और नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर दोनों में लिवर सेल्स में फैट जमा होता है, लेकिन दोनों की वजह अलग-अलग होती हैं।

एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज

यह समस्या शराब ज्यादा पीने से होती है। शराब लिवर के मेटाबॉलिज्म को नुकसान पहुंचाती है, जिससे शरीर फैट नहीं पचा पाता या बहुत धीरे पचाता है। यह फैट लिवर में जमा होने लगता है।

नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज

इसमें व्यक्ति शराब नहीं पीता, फिर भी लिवर में फैट जमा हो जाता है। इसकी मुख्य वजहें इस प्रकार हैं–

  • मोटापा
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस
  • टाइप-2 डायबिटीज
  • हाई ट्राइग्लिसराइड्स
  • लो फिजिकल एक्टिविटी

अगर दोनों में से किसी भी कंडीशन को समय पर कंट्रोल न किया जाए, तो लिवर में इंफ्लेमेशन, फाइब्रोसिस और आगे चलकर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।

सवाल- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के लक्षण क्या होते हैं?

जवाब- नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज को ‘साइलेंट डिजीज’ भी कहते हैं। दरअसल, इसके लक्षण अक्सर शुरुआती दौर में नजर नहीं आते। लेकिन जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, शरीर कुछ संकेत देने लगता है, जिन्हें नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है। इसे नीचे दिए ग्राफिक में देखिए-

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  • इंटरनल ब्लीडिंग हो सकती है।
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जवाब- यह बीमारी कई बार रूटीन ब्लड टेस्ट या इमेजिंग जांच के दौरान सामने आती है। डॉक्टर बीमारी की पहचान के लिए कुछ खास टेस्ट करवाते हैं।

इमेजिंग टेस्ट: अल्ट्रासाउंड, CT स्कैन या MRI के जरिए लिवर में जमा फैट को देखा जा सकता है।

ब्लड टेस्ट: ब्लड टेस्ट से यह पता लगाया जाता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।

लिवर बायोप्सी: इस प्रक्रिया में डॉक्टर एक पतली सुई की मदद से लिवर से टिश्यू का छोटा सा सैंपल निकालते हैं, जिसे माइक्रोस्कोप से जांचा जाता है।

इन सभी जांचों की रिपोर्ट्स के आधार पर डॉक्टर फैटी लिवर की कंडीशन और उसकी गंभीरता का आंकलन करते हैं।

सवाल- क्या नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर को रिवर्स किया जा सकता है?

जवाब- हां, शुरुआती स्टेज में यह पूरी तरह रिवर्स हो सकता है। इसका सबसे प्रभावी इलाज लाइफस्टाइल में बदलाव है। वजन कम करके, हेल्दी डाइट लेकर और नियमित एक्सरसाइज करके लिवर से फैट कम किया जा सकता है।

सवाल- अपने लिवर को हेल्दी रखने के लिए क्या करें?

जवाब- लिवर हमारे शरीर का सबसे मेहनती अंग है, जो डिटॉक्स से लेकर मेटाबॉलिज्म तक कई अहम काम करता है। अगर रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़ी-सी सावधानी बरती जाए, तो लिवर को लंबे समय तक हेल्दी रखा जा सकता है और फैटी लिवर जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।

लिवर की सेहत को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर बीमारियों को न्यौता दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम आज ही सतर्क हों, क्योंकि लिवर अगर स्वस्थ है, तो पूरा शरीर स्वस्थ है।

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गॉल ब्लैडर शरीर का एक छोटा लेकिन बहुत जरूरी ऑर्गन है। ये पित्त को स्टोर करता है और पाचन में मदद करता है। लेकिन महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में होने वाले हॉर्मोनल बदलाव गॉल ब्लैडर के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें..

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