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20 साल से ट्रैक्टर चलाने वालों को बहरेपन का खतरा:55 ड्राइवरों पर रिसर्च के बाद सीआईएई भोपाल के वैज्ञानिकों का खुलासा

20 साल से ट्रैक्टर चलाने वालों को बहरेपन का खतरा:55 ड्राइवरों पर रिसर्च के बाद सीआईएई भोपाल के वैज्ञानिकों का खुलासा

खेतों में ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों की सुनने की शक्ति कमजोर हो रही है। एक ताजा रिसर्च में खुलासा हुआ है कि जो किसान 20 साल या उससे ज्यादा समय से ट्रैक्टर चला रहे हैं, उनमें से कई को सामान्य बातचीत करने में भी जोर लगाना पड़ता है। ऑफिस वर्कर के मुकाबले देखें तो दफ्तर में यह जोखिम 0.2% है, जबकि ट्रैक्टर चलाने वालो में यह बढ़कर 7.1% तक पहुंच जाता है। जो 35 गुना ज्यादा है। केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (सीआईएई), भोपाल के वैज्ञानिकों ने 55 ट्रैक्टर ड्राइवरों पर यह रिसर्च की है। जो 5 से 43 सालों से खेत जोत रहे हैं। सामने आया कि यह केवल कानों तक सीमित नहीं, बल्कि ड्राइवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा असर कर रहा है। ड्राइवरों में डिप्रेशन (अवसाद), एंग्जायटी (चिंता) और भारी तनाव जैसी मानसिक बीमारियां घर कर रही हैं। इस अध्ययन में सीआईएई के डॉ. अभिजीत खड़त्कर, सीआर मेहता, विजय कुमार और रतलाम मेडिकल कॉलेज कम्युनिटी मेडिसिन के लोकेंद्रसिंह कोट शामिल रहे। रिसर्च डेटा: कम हाइट वालों को दोगुना नुकसान 55 में से 45 ड्राइवरों के बाएं कान की क्षमता दाएं कान के मुकाबले कम थी। 15-20 ड्राइवर जिन्हें 20 साल से ज्यादा अनुभव है, उनकी स्थिति गंभीर, हर तीसरे ड्राइवर में चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव की शिकायत भी सामने आई है। ट्रैक्टर की डिजाइन : दाएं से ज्यादा बाएं कान को नुकसान
दायां कान: दायां कान कम प्रभावित मिला, बढ़ती उम्र, शोर का असर रहा।
बायां कान: कम लंबाई वाले ड्राइवर धुआं निकलने वाले पाइप के ज्यादा करीब होते हैं, जिससे बाएं कान पर ज्यादा असर होता है। यह जानना जरूरी है…
कानों की सुरक्षा: इयरप्लग या इयरमफ शोर को 20 से 30 डेसिबल तक कम करते हैं।
मशीन का रखरखाव: पुराने ट्रैक्टरों के साइलेंसर और मफलर समय पर बदलें।
काम का बंटवारा: लगातार घंटों तक अकेले ट्रैक्टर न चलाएं, बीच-बीच में आराम लें।
औजारों का शोर: ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल होने वाला ‘डिस्क हैरो’ ज्यादा शोर करता है।
नियमित जांच जरूर करवाएं।

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20 साल से ट्रैक्टर चलाने वालों को बहरेपन का खतरा:55 ड्राइवरों पर रिसर्च के बाद सीआईएई भोपाल के वैज्ञानिकों का खुलासा

खेतों में ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों की सुनने की शक्ति कमजोर हो रही है। एक ताजा रिसर्च में खुलासा हुआ है कि जो किसान 20 साल या उससे ज्यादा समय से ट्रैक्टर चला रहे हैं, उनमें से कई को सामान्य बातचीत करने में भी जोर लगाना पड़ता है। ऑफिस वर्कर के मुकाबले देखें तो दफ्तर में यह जोखिम 0.2% है, जबकि ट्रैक्टर चलाने वालो में यह बढ़कर 7.1% तक पहुंच जाता है। जो 35 गुना ज्यादा है। केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (सीआईएई), भोपाल के वैज्ञानिकों ने 55 ट्रैक्टर ड्राइवरों पर यह रिसर्च की है। जो 5 से 43 सालों से खेत जोत रहे हैं। सामने आया कि यह केवल कानों तक सीमित नहीं, बल्कि ड्राइवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा असर कर रहा है। ड्राइवरों में डिप्रेशन (अवसाद), एंग्जायटी (चिंता) और भारी तनाव जैसी मानसिक बीमारियां घर कर रही हैं। इस अध्ययन में सीआईएई के डॉ. अभिजीत खड़त्कर, सीआर मेहता, विजय कुमार और रतलाम मेडिकल कॉलेज कम्युनिटी मेडिसिन के लोकेंद्रसिंह कोट शामिल रहे। रिसर्च डेटा: कम हाइट वालों को दोगुना नुकसान 55 में से 45 ड्राइवरों के बाएं कान की क्षमता दाएं कान के मुकाबले कम थी। 15-20 ड्राइवर जिन्हें 20 साल से ज्यादा अनुभव है, उनकी स्थिति गंभीर, हर तीसरे ड्राइवर में चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव की शिकायत भी सामने आई है। ट्रैक्टर की डिजाइन : दाएं से ज्यादा बाएं कान को नुकसान
दायां कान: दायां कान कम प्रभावित मिला, बढ़ती उम्र, शोर का असर रहा।
बायां कान: कम लंबाई वाले ड्राइवर धुआं निकलने वाले पाइप के ज्यादा करीब होते हैं, जिससे बाएं कान पर ज्यादा असर होता है। यह जानना जरूरी है…
कानों की सुरक्षा: इयरप्लग या इयरमफ शोर को 20 से 30 डेसिबल तक कम करते हैं।
मशीन का रखरखाव: पुराने ट्रैक्टरों के साइलेंसर और मफलर समय पर बदलें।
काम का बंटवारा: लगातार घंटों तक अकेले ट्रैक्टर न चलाएं, बीच-बीच में आराम लें।
औजारों का शोर: ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल होने वाला ‘डिस्क हैरो’ ज्यादा शोर करता है।
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