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थोक महंगाई 12 महीने में सबसे ज्यादा:फरवरी में ये 2.13% पर पहुंची, खाने-पीने की चीजें और रोजाना जरूरत का सामान महंगा हुआ

थोक महंगाई 12 महीने में सबसे ज्यादा:फरवरी में ये 2.13% पर पहुंची, खाने-पीने की चीजें और रोजाना जरूरत का सामान महंगा हुआ

फरवरी में थोक महंगाई (WPI) बढ़कर 2.13% पर पहुंच गई है। ये महंगाई का 12 महीने का हाई लेवल है। फरवरी 2025 में ये 2.38% पर पहुंच गई थी। इससे पहले जनवरी 2026 में थोक महंगाई 1.81% पर थी। वहीं दिसंबर में थोक महंगाई 0.83% पर थी। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने आज यानी 16 मार्च को थोक महंगाई के आंकड़े जारी किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग लंबी चली तो कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। इससे पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, जिससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और फल-सब्जी समेत हर जरूरी सामान की कीमतें बढ़ जाएंगी। रोजाना जरूरत के सामान, खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं होलसेल महंगाई के 4 हिस्से प्राइमरी आर्टिकल, जिसका वेटेज 22.62% है। फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज सबसे ज्यादा 64.23% है। प्राइमरी आर्टिकल के भी चार हिस्से हैं। फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21% पहुंची फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21% पहुंच गई है। इससे पहले जनवरी में यह 2.74% थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग चल रही है। होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का आम आदमी पर असर थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है। महंगाई कैसे मापी जाती है? भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। महंगाई मापने के लिए अलग-अलग आइटम्स को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75%, प्राइमरी आर्टिकल जैसे फूड 22.62% और फ्यूल एंड पावर 13.15% होती है। वहीं, रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86%, हाउसिंग की 10.07% और फ्यूल सहित अन्य आइटम्स की भी भागीदारी होती है।

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थोक महंगाई 12 महीने में सबसे ज्यादा:फरवरी में ये 2.13% पर पहुंची, खाने-पीने की चीजें और रोजाना जरूरत का सामान महंगा हुआ

फरवरी में थोक महंगाई (WPI) बढ़कर 2.13% पर पहुंच गई है। ये महंगाई का 12 महीने का हाई लेवल है। फरवरी 2025 में ये 2.38% पर पहुंच गई थी। इससे पहले जनवरी 2026 में थोक महंगाई 1.81% पर थी। वहीं दिसंबर में थोक महंगाई 0.83% पर थी। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने आज यानी 16 मार्च को थोक महंगाई के आंकड़े जारी किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग लंबी चली तो कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। इससे पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, जिससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और फल-सब्जी समेत हर जरूरी सामान की कीमतें बढ़ जाएंगी। रोजाना जरूरत के सामान, खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं होलसेल महंगाई के 4 हिस्से प्राइमरी आर्टिकल, जिसका वेटेज 22.62% है। फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज सबसे ज्यादा 64.23% है। प्राइमरी आर्टिकल के भी चार हिस्से हैं। फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21% पहुंची फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21% पहुंच गई है। इससे पहले जनवरी में यह 2.74% थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग चल रही है। होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का आम आदमी पर असर थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है। महंगाई कैसे मापी जाती है? भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। महंगाई मापने के लिए अलग-अलग आइटम्स को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75%, प्राइमरी आर्टिकल जैसे फूड 22.62% और फ्यूल एंड पावर 13.15% होती है। वहीं, रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86%, हाउसिंग की 10.07% और फ्यूल सहित अन्य आइटम्स की भी भागीदारी होती है।

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