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आशा भोसले ने राजस्थानी फिल्मों में भी गाए थे गाने:शब्दों की ट्रेनिंग हुई, डायरेक्टर ने 25 हजार बोलकर 7 हजार दिए फिर भी कुछ नहीं बोलीं

आशा भोसले ने राजस्थानी फिल्मों में भी गाए थे गाने:शब्दों की ट्रेनिंग हुई, डायरेक्टर ने 25 हजार बोलकर 7 हजार दिए फिर भी कुछ नहीं बोलीं

सिंगर आशा भोसले का शुक्रवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने कई भाषाओं में गाने गए। इनमें से राजस्थानी भी एक है। उन्होंने अपने करियर में 14 राजस्थानी फिल्मों के 45 गाने गाए। 8 से ज्यादा राजस्थानी भजनों को भी अपनी आवाज दी। वहीं, 2019 में वे जयपुर में हुए एक कार्यक्रम में भी आई थीं। जहां उन्होंने गीतकार प्रसून जोशी के साथ अपने दिल की बात की थी। आशा भोसले को याद करते हुए राजस्थानी एक्टर-डायरेक्टर क्षितिज कुमार ने बताया- मेरी राजस्थानी फिल्म के लिए उन्होंने गाना गाया था। गाने से पहले मुंबई में राजस्थानी शब्दों को लेकर उनकी ट्रेनिंग हुई। इसके लिए मैंने उन्हें सिर्फ 7 हजार रुपए दिए थे, लेकिन उन्होंने बिना रोक टोक के वो ले लिए। जानिए कैसे राजस्थानी फिल्मों में शुरू हुआ आशा भोसले का सफर… राजस्थानी फिल्मों में आशा भोसले की गायकी का श्रेय संगीतकार पंडित शिवराम को जाता है। उन्होंने 1961 में फिल्म ‘बाबासा री लाडली’ में आशाजी से पहली बार राजस्थानी भाषा में पांच गीत गवाए। इनमें ‘ओ रंग रंगीलो आलीजो…’, ‘बोल पंछीड़ा रे…’, ‘सूती थी रंग म्हैल में…’ और महेंद्र कपूर के साथ सुपरहिट डुएट ‘हिवड़ै सूं दूर मत जा….’ गीत गाए। इसके बाद ‘नानीबाई को मायरो’ में भी आशाजी ने अपनी आवाज दी। इसमें “म्हारो छैलभंवर केसरियो बनड़ो…” और “म्हाने चूनड़ी ओढ़ाजा…” जैसे गीत लोकप्रिय हुए। कभी रीजनल के रूप मे नहीं देखा राजस्थानी फिल्म विशेषज्ञ एमडी सोनी ने बताया- उस दौर में आशाजी ने ‘धणी लुगाई’, ‘गणगौर’, ‘गोपीचंद भरथरी’ और ‘ढोला मरवण’ जैसी फिल्मों में भी अपनी गायकी से चार चांद लगाए। राजस्थानी सिनेमा के दूसरे दौर में संगीतकार नारायण दत्त ने फिल्म ‘म्हारी प्यारी चनणा’ (1983) के सभी आठ गीत आशाजी से गवाकर इतिहास रच दिया। इनमें ‘सावण आयो रे…’, ‘चांदड़लो चढ़ आयो गिगनार…’ और ‘झिरमिर झिरमिर रे…’ जैसे गीत श्रोताओं की जुबां पर कई साल तक रहे। आशा भोसले ने कभी राजस्थानी सिनेमा को रीजनल के रूप में नहीं देखा, वे हमेशा अच्छी कंपोजिशन के साथ जुड़ना चाहती थीं। 14 राजस्थानी फिल्मों में 45 गाने गाए इसके बाद ‘थारी म्हारी’, ‘घर में राज लुगायां को’, ‘चूनड़ी’, ‘बेटी हुई पराई रे’, ‘बीनणी होवै तो इसी’ और ‘राधू की लिछमी’ (1996) जैसी फिल्मों में भी उनकी आवाज ने राजस्थानी सिनेमा को समृद्ध किया। कुल मिलाकर 14 फिल्मों में करीब 45 गीतों को आशाजी ने अपनी आवाज दी। फिल्मों के अलावा आशाजी ने राजस्थानी भजनों में भी अपनी विशेष पहचान बनाई। वर्ष 1981 में जारी एलपी रिकॉर्ड ‘म्हारा थे ही धणी हो गोपाल’ को मास्टरपीस माना जाता है, जिसमें गीतकार भरत व्यास के लिखे भजनों को उन्होंने अपनी आवाज दी। गाने के लिए दिए थे सात हजार रुपए राजस्थानी एक्टर-डायरेक्टर क्षितिज कुमार ने बताया- 1996 में आई मेरी राजस्थानी फिल्म राधू की लक्ष्मी का गाना ‘रात ढलती जाए’ आशा जी ने गाया था। आरडी बर्मन साहब की डेथ हो गई थी, उसी समय में आशाजी से मिलने के लिए डेट ले रहा था। एक महीने बाद उनकी तरफ से समय दिया, जब वहां गया तो मैंने इस गाने के बारे में जानकारी दी। उन्होंने पूछा- क्या यह बच्चों का गाना है। मैंने मना कर दिया। हारमोनियम पर गाकर बताया तो वे गाने की कंपोजिशन से बेहद प्रभावित हुईं। इस गाने पर दो घंटे तक हमारी बातचीत चली। मुम्बई में ही इसे रिकॉर्ड किया गया। उन्होंने एक-एक शब्द की जानकारी ली। घर पर कई दिनों तक राजस्थानी शब्दों की ट्रेनिंग भी हुई। कंपोजिंग पसंद आ जाती तो वह किसी भी इंडस्ट्री को छोटा बड़ा नहीं समझती। रिेकॉडिंग के बाद मुझे कहा- तुम मुम्बई में नए हो, किसी प्रकार की कोई परेशानी हो तो सीधे बताना। अब मैं आपको एक रोचक बात बताता हूं। इस गाने के लिए हमारी 25 हजार पर बात हुई थी, लेकिन मैंने सात हजार रुपए ही दिए। उन्होंने बिना किसी रोक-टोक के वह ले लिए। गाने की दी सहमति, रिकॉर्ड नहीं करने का मलाल वीणा म्यूजिक के डायरेक्टर केसी मालू ने बताया- मैं गाना उनके साथ करना चाहता था। इसी सिलसिले में आशाजी से मिलने भी गया था। उन्होंने राजस्थानी गाने के लिए हामी भी भरी थी, लेकिन मैं ही गाना तैयार नहीं कर पाया। उन्होंने मुझे बताया कि जयपुर से महिपाल और भरत व्यास उनके मित्र थे। आशाजी ने ही मुझे बताया था कि राजस्थानी में आठ भजन उन्होंने गाए थे। मैं यह सुनकर हैरान था। ये भजन भरत व्यास ने लिखे थे। उन्होंने कहा कि आशाजी के हामी भरने के बाद भी मैं काम नहीं कर पाया। मैं उनके लिए गाना बनवा नहीं पाया। इसका आज तक अफसोस रहेगा। उन्होंने कई राजस्थानी फिल्मों में गाने गाए है। जब भी किसी ने गाने के लिए कहा, किसी को उन्होंने कभी मना नहीं किया। हमारी मैग्जीन स्वर सरिता लगातार पढ़ती थीं, उसी आधार पर मेरी मुलाकात हुई थी। ये भी पढ़ें… दोस्तों ने रुपए दिए, घर से भागकर मुंबई गए असरानी:जयपुर में काम किया, अजमेर में कहा था- सिंधी ने कभी भी भीख नहीं मांगी बॉलीवुड के हास्य अभिनेता असरानी का मुंबई में निधन हो गया। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और कला के प्रति गहरी लगन की मिसाल रहा है। उनका असली नाम गोवर्धन असरानी था। वे एक मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार से थे। उनके पिता भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से जयपुर आ बसे और यहां कालीन की दुकान खोली। (पूरी खबर पढ़ें)

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