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Adidas’ ‘Trionda’ ball charges for two and a half hours before a match; collects data 500 times per second

Adidas' 'Trionda' ball charges for two and a half hours before a match; collects data 500 times per second
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न्यूयॉर्क11 मिनट पहले

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इस गेंद के अंदर एक हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक चिप लगी है, इसलिए इसे पावर की जरूरत होती है। मैच के बीच में बैटरी खत्म न हो, इसके लिए एक कर्मचारी लगातार सभी गेंदों की बैटरी पर नजर रखता है।

फीफा वर्ल्ड कप 2026 में इस बार मैदान पर खिलाड़ियों के साथ-साथ एक खास ‘स्मार्ट’ बॉल का भी जलवा है। फीफा और एडिडास ने मिलकर इस टूर्नामेंट के लिए ‘ट्रायोंडा’ नाम की ‘कनेक्टेड बॉल’ पेश की है।

यह कोई साधारण फुटबॉल नहीं है, बल्कि तकनीक का एक ऐसा शानदार नमूना है जो वीडियो असिस्टेंट रेफरी (VAR) को पलक झपकते ही एकदम सटीक डेटा देती है। हालांकि, इसकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि आपको अपने मोबाइल फोन की तरह इस बॉल को भी बकायदा चार्ज करना पड़ता है!

इस स्मार्ट गेंद का सबसे बड़ा फायदा ऑफसाइड के फैसलों में हो रहा है। अक्सर ऑफसाइड के फैसलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि खिलाड़ी का पैर गेंद से ठीक किस मिलीसेकंड में टकराया (किक पॉइंट), यह पता लगाना मुश्किल होता है। दरअसल, मैदान पर लगे कैमरे वीडियो को एक सेकंड में 50 फ्रेम (50 fps) की स्पीड से रिकॉर्ड करते हैं। इतने कम फ्रेम में सटीक किक पॉइंट खोजना वीडियो रेफरी के लिए काफी समय लेने वाला काम था।

इस समस्या को दूर करने के लिए ट्रायोंडा बॉल के अंदर एक छोटा सा इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट सेंसर लगाया गया है। यह एडवांस सेंसर एक सेकंड में 500 बार (500Hz) गेंद की स्पीड, दिशा और 3D मूवमेंट का बारीक डेटा कैप्चर करता है। यह डेटा सीधे वीडियो ऑपरेशन रूम में जाता है। इससे रेफरी को तुरंत पता चल जाता है कि गेंद को कब और किसने छुआ। यह तकनीक ऑफसाइड के अलावा विवादित ‘हैंडबॉल’ के मुश्किल फैसलों में भी बेहद मददगार साबित हो रही है।

उदाहरण के लिए, स्वीडन और ट्यूनीशिया के मैच में एक गोल को शुरुआत में ऑफसाइड मानकर खारिज कर दिया गया था। लेकिन गेंद से मिले तुरंत डेटा से पता चला कि स्वीडन के एक और खिलाड़ी का गेंद पर बहुत हल्का सा टच लगा था, जिसने स्कोरर को ऑनसाइड कर दिया। नतीजतन, रेफरी ने गोल को सही करार दे दिया। कतर वर्ल्ड कप 2022 की गेंद भी कोई ऐसा सटीक डेटा नहीं दे सकती थी।

इस कनेक्टेड बॉल तकनीक को मैदान पर उतारने से पहले 2020 से 2022 के बीच कई कड़े टेस्ट किए गए। फीफा की इनोवेशन टीम हर टूर्नामेंट से पहले इसकी बारीकी से जांच करती है। कतर वर्ल्ड कप 2022 की तुलना में इस बार की तकनीक और भी उन्नत है। पिछली बार चिप गेंद के बिल्कुल बीच में थी, लेकिन नई ट्रायोंडा बॉल में इसे साइड पैनल में फिट किया गया है।

एडिडास ने लैब में 300 से ज्यादा टेस्ट किए ताकि चिप के साइड में होने के बावजूद गेंद का वजन, बैलेंस, रोटेशन और हवा में तैरने की क्षमता (एयरोडायनामिक्स) बिल्कुल सटीक रहे। खिलाड़ियों को प्रैक्टिस और मैच की गेंदों में कन्फ्यूजन न हो, इसलिए ट्रेनिंग वाली गेंदों (बिना चिप वाली) और मैच वाली गेंदों (चिप वाली) में हवा भरने वाले वाल्व का रंग अलग-अलग रखा गया है। कुल मिलाकर, तकनीक से लैस यह स्मार्ट बॉल खेल को और भी निष्पक्ष और पारदर्शी बना रही है।

एक चार्ज में छह घंटे चलती है यह फुटबॉल, मैदान से बाहर स्लीप मोड पर

इस गेंद के अंदर एक हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक चिप लगी है, इसलिए इसे पावर की जरूरत होती है। मैच के बीच में बैटरी खत्म न हो, इसके लिए एक कर्मचारी लगातार सभी गेंदों की बैटरी पर नजर रखता है। हर मैच के लिए करीब एक दर्जन गेंदों को वायरलेस डॉकिंग स्टेशन में पहले से चार्ज करके रखा जाता है। बिल्कुल खाली बैटरी वाली गेंद को फुल चार्ज होने में करीब ढाई घंटे लगते हैं। एक बार चार्ज होने पर गेंद 6 घंटे तक चलती है। पावर बचाने के लिए जब गेंद मैदान से बाहर साइडलाइन पर होती है, तो यह अपने आप ‘हाइबरनेशन’ (स्लीप) मोड में चली जाती है।

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इस गेंद के अंदर एक हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक चिप लगी है, इसलिए इसे पावर की जरूरत होती है। मैच के बीच में बैटरी खत्म न हो, इसके लिए एक कर्मचारी लगातार सभी गेंदों की बैटरी पर नजर रखता है।

फीफा वर्ल्ड कप 2026 में इस बार मैदान पर खिलाड़ियों के साथ-साथ एक खास ‘स्मार्ट’ बॉल का भी जलवा है। फीफा और एडिडास ने मिलकर इस टूर्नामेंट के लिए ‘ट्रायोंडा’ नाम की ‘कनेक्टेड बॉल’ पेश की है।

यह कोई साधारण फुटबॉल नहीं है, बल्कि तकनीक का एक ऐसा शानदार नमूना है जो वीडियो असिस्टेंट रेफरी (VAR) को पलक झपकते ही एकदम सटीक डेटा देती है। हालांकि, इसकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि आपको अपने मोबाइल फोन की तरह इस बॉल को भी बकायदा चार्ज करना पड़ता है!

इस स्मार्ट गेंद का सबसे बड़ा फायदा ऑफसाइड के फैसलों में हो रहा है। अक्सर ऑफसाइड के फैसलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि खिलाड़ी का पैर गेंद से ठीक किस मिलीसेकंड में टकराया (किक पॉइंट), यह पता लगाना मुश्किल होता है। दरअसल, मैदान पर लगे कैमरे वीडियो को एक सेकंड में 50 फ्रेम (50 fps) की स्पीड से रिकॉर्ड करते हैं। इतने कम फ्रेम में सटीक किक पॉइंट खोजना वीडियो रेफरी के लिए काफी समय लेने वाला काम था।

इस समस्या को दूर करने के लिए ट्रायोंडा बॉल के अंदर एक छोटा सा इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट सेंसर लगाया गया है। यह एडवांस सेंसर एक सेकंड में 500 बार (500Hz) गेंद की स्पीड, दिशा और 3D मूवमेंट का बारीक डेटा कैप्चर करता है। यह डेटा सीधे वीडियो ऑपरेशन रूम में जाता है। इससे रेफरी को तुरंत पता चल जाता है कि गेंद को कब और किसने छुआ। यह तकनीक ऑफसाइड के अलावा विवादित ‘हैंडबॉल’ के मुश्किल फैसलों में भी बेहद मददगार साबित हो रही है।

उदाहरण के लिए, स्वीडन और ट्यूनीशिया के मैच में एक गोल को शुरुआत में ऑफसाइड मानकर खारिज कर दिया गया था। लेकिन गेंद से मिले तुरंत डेटा से पता चला कि स्वीडन के एक और खिलाड़ी का गेंद पर बहुत हल्का सा टच लगा था, जिसने स्कोरर को ऑनसाइड कर दिया। नतीजतन, रेफरी ने गोल को सही करार दे दिया। कतर वर्ल्ड कप 2022 की गेंद भी कोई ऐसा सटीक डेटा नहीं दे सकती थी।

इस कनेक्टेड बॉल तकनीक को मैदान पर उतारने से पहले 2020 से 2022 के बीच कई कड़े टेस्ट किए गए। फीफा की इनोवेशन टीम हर टूर्नामेंट से पहले इसकी बारीकी से जांच करती है। कतर वर्ल्ड कप 2022 की तुलना में इस बार की तकनीक और भी उन्नत है। पिछली बार चिप गेंद के बिल्कुल बीच में थी, लेकिन नई ट्रायोंडा बॉल में इसे साइड पैनल में फिट किया गया है।

एडिडास ने लैब में 300 से ज्यादा टेस्ट किए ताकि चिप के साइड में होने के बावजूद गेंद का वजन, बैलेंस, रोटेशन और हवा में तैरने की क्षमता (एयरोडायनामिक्स) बिल्कुल सटीक रहे। खिलाड़ियों को प्रैक्टिस और मैच की गेंदों में कन्फ्यूजन न हो, इसलिए ट्रेनिंग वाली गेंदों (बिना चिप वाली) और मैच वाली गेंदों (चिप वाली) में हवा भरने वाले वाल्व का रंग अलग-अलग रखा गया है। कुल मिलाकर, तकनीक से लैस यह स्मार्ट बॉल खेल को और भी निष्पक्ष और पारदर्शी बना रही है।

एक चार्ज में छह घंटे चलती है यह फुटबॉल, मैदान से बाहर स्लीप मोड पर

इस गेंद के अंदर एक हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक चिप लगी है, इसलिए इसे पावर की जरूरत होती है। मैच के बीच में बैटरी खत्म न हो, इसके लिए एक कर्मचारी लगातार सभी गेंदों की बैटरी पर नजर रखता है। हर मैच के लिए करीब एक दर्जन गेंदों को वायरलेस डॉकिंग स्टेशन में पहले से चार्ज करके रखा जाता है। बिल्कुल खाली बैटरी वाली गेंद को फुल चार्ज होने में करीब ढाई घंटे लगते हैं। एक बार चार्ज होने पर गेंद 6 घंटे तक चलती है। पावर बचाने के लिए जब गेंद मैदान से बाहर साइडलाइन पर होती है, तो यह अपने आप ‘हाइबरनेशन’ (स्लीप) मोड में चली जाती है।

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