Wednesday, 10 Jun 2026 | 01:35 PM

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ट्रम्प ने भारत में बाइक चलाने का AI-वीडियो शेयर किया:शेर की सवारी करते, चांद पर झंडा भी लगाया

ट्रम्प ने भारत में बाइक चलाने का AI-वीडियो शेयर किया:शेर की सवारी करते, चांद पर झंडा भी लगाया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर AI-जनरेटेड वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह भारत की सड़कों पर बाइक चलाते नजर आ रहे हैं। इस एक मिनट के AI वीडियो में ट्रम्प अलग-अलग अंदाज में दिखते है। वीडियो में उन्हें रेगिस्तान में ऊंट की सवारी करते, पैराग्लाइडिंग करते और एक शेर पर बैठे दिखाया गया है। एक सीन में वह स्पेससूट पहनकर चांद पर अमेरिकी झंडा लगाते भी नजर आते हैं। वीडियो में उनका चेहरा पिज्जा, बस, होर्डिंग, नॉर्दर्न लाइट्स और माउंट रशमोर पर भी दिखाया गया। वीडियो के बैकग्राउंड में खुद की तारीफ वाला गाना चल रहा है। इसमें लगातार ‘सब डोनाल्ड ट्रम्प को पसंद करते है’ और ‘धन्यवाद प्रेसिडेंट ट्रम्प’ जैसे लिरिक्स सुने जा सकते हैं। वीडियो में भारत से लेकर चीन तक का जिक्र वीडियो के गाने में दावा किया गया कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग ट्रम्प को पसंद करते हैं। गाने की लाइन में कहा गया कि मेक्सिको, मिडिल ईस्ट, चीन और भारत में सब ट्रम्प को पसंद करते है। हालांकि यह वीडियो सिर्फ एक मिनट का था, लेकिन इसके बोल में ‘ट्रम्प’ शब्द का इस्तेमाल पूरे 45 बार और ‘डोनाल्ड’ नाम का 29 बार किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ‘एवरीबडी लव्स डोनाल्ड ट्रम्प’ गाना ट्रुथ सोशल पर ‘ac132’ नाम के यूजर ने बनाया था। वीडियो के आखिर में गाने का क्रेडिट एंथनी कॉन्स्टैंटिनो को दिया गया है। वह न्यूयॉर्क से ट्रम्प समर्थित रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं। वीडियो शेयर होने के बाद कॉन्स्टैंटिनो ने कहा कि उन्हें गर्व है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने उनके गाने को शेयर किया। यह वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ यूजर्स ने इसे मजाकिया बताया, जबकि कई लोगों ने इसे ट्रम्प की खुद की तारीफ करने वाला प्रचार वीडियो कहा। एक यूजर कहा कि ट्रम्प इस वीडियो में कॉमिक बुक कैरेक्टर जैसे लग रहे हैं। ट्रम्प पहले भी शेयर कर चुके हैं AI तस्वीरें यह पहला मौका नहीं है जब ट्रम्प ने AI-जनरेटेड कंटेंट शेयर किया हो। कुछ दिन पहले उन्होंने खुद को जेम्स बॉन्ड के अंदाज में ‘ट्रम्प 007’ कैप्शन के साथ दिखाया था। इससे पहले वह खुद को ‘ग्रेटेस्ट अट्रैक्शन’ बताते हुए भी तस्वीर शेयर कर चुके हैं। पिछले महीने ट्रम्प ने एक AI-जनरेटेड फोटो पोस्ट की थी, जिसमें उन्होंने खुद को जीसस के रूप में दिखाया गया था। उस पोस्ट को लेकर काफी विवाद हुआ था। बाद में पोस्ट हटा ली गई, लेकिन ट्रम्प ने माफी नहीं मांगी। उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि उन्हें लगा था कि तस्वीर में वह डॉक्टर की तरह दिख रहे हैं। ट्रम्प पहले भी कई बार कह चुके हैं कि वह पारंपरिक मीडिया से ज्यादा सोशल मीडिया को अपनी बात रखने का अहम जरिया मानते हैं। इसी वजह से ट्रुथ सोशल पर उनकी लगभग हर पोस्ट कुछ ही देर में राजनीतिक और सोशल मीडिया बहस का हिस्सा बन जाती है। ईरान युद्ध से जुड़ी AI तस्वीरें भी शेयर कीं ईरान युद्ध की शुरूआत से ही ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर सैन्य ताकत से जुड़ी कई AI-जनरेटेड तस्वीरें भी पोस्ट कीं है। इनमें ईरान की नौसेना को तबाह हालत में दिखाया गया था। एक तस्वीर में समुद्र में बड़ी संख्या में युद्धपोत डूबते नजर आए, जबकि दूसरी तस्वीरों में अमेरिकी सैन्य ताकत को बेहद आक्रामक अंदाज में दिखाया गया था। इन तस्वीरों के जरिए ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान की सेना कमजोर पड़ चुकी है और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक इलाके में अमेरिका बढ़त बना रहा है। हालांकि इन तस्वीरों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं थी और इन्हें AI से तैयार किया गया विजुअल कंटेंट माना गया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और डर पैदा करने वाला कंटेंट बताया, जबकि ट्रम्प समर्थकों ने इसे उनकी मजबूत नेतृत्व वाली छवि से जोड़कर देखा। एक्सपर्ट्स बोले- डिजिटल पर्सनैलिटी कल्ट बनाने की कोशिश ट्रम्प पिछले कुछ समय से AI का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक ब्रांडिंग के बड़े हथियार के तौर पर कर रहे हैं। राजनीतिक एक्सपर्ट्स इसे “डिजिटल पर्सनैलिटी कल्ट” बनाने की कोशिश मानते हैं, जिसमें नेता को असाधारण और सर्वशक्तिमान दिखाया जाता है। यानी सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए किसी व्यक्ति (जैसे- इन्फ्लुएंसर, नेता या सेलिब्रिटी) को एक निर्दोष, अलौकिक या ईश्वर जैसी छवि में पेश किया जाता है, और प्रशंसक बिना किसी तर्क के उन्हें फोलो करते हैं। ट्रम्प का यह मॉडल पारंपरिक राजनीतिक प्रचार से अलग है क्योंकि इसमें मीम कल्चर, वायरल वीडियो और AI विजुअल्स का मिश्रण दिखाई देता है। इसका मकसद सिर्फ समर्थकों को उत्साहित करना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा में बने रहना भी होता है। आलोचकों का कहना है कि AI कंटेंट के जरिए वास्तविकता और कल्पना की सीमा धुंधली हो रही है, जिससे गलत नैरेटिव और भ्रम फैलने का खतरा बढ़ता है।

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ट्रम्प ने भारत में बाइक चलाने का AI-वीडियो शेयर किया:शेर की सवारी करते, चांद पर झंडा भी लगाया

ट्रम्प ने भारत में बाइक चलाने का AI-वीडियो शेयर किया:शेर की सवारी करते, चांद पर झंडा भी लगाया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर AI-जनरेटेड वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह भारत की सड़कों पर बाइक चलाते नजर आ रहे हैं। इस एक मिनट के AI वीडियो में ट्रम्प अलग-अलग अंदाज में दिखते है। वीडियो में उन्हें रेगिस्तान में ऊंट की सवारी करते, पैराग्लाइडिंग करते और एक शेर पर बैठे दिखाया गया है। एक सीन में वह स्पेससूट पहनकर चांद पर अमेरिकी झंडा लगाते भी नजर आते हैं। वीडियो में उनका चेहरा पिज्जा, बस, होर्डिंग, नॉर्दर्न लाइट्स और माउंट रशमोर पर भी दिखाया गया। वीडियो के बैकग्राउंड में खुद की तारीफ वाला गाना चल रहा है। इसमें लगातार ‘सब डोनाल्ड ट्रम्प को पसंद करते है’ और ‘धन्यवाद प्रेसिडेंट ट्रम्प’ जैसे लिरिक्स सुने जा सकते हैं। वीडियो में भारत से लेकर चीन तक का जिक्र वीडियो के गाने में दावा किया गया कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग ट्रम्प को पसंद करते हैं। गाने की लाइन में कहा गया कि मेक्सिको, मिडिल ईस्ट, चीन और भारत में सब ट्रम्प को पसंद करते है। हालांकि यह वीडियो सिर्फ एक मिनट का था, लेकिन इसके बोल में ‘ट्रम्प’ शब्द का इस्तेमाल पूरे 45 बार और ‘डोनाल्ड’ नाम का 29 बार किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ‘एवरीबडी लव्स डोनाल्ड ट्रम्प’ गाना ट्रुथ सोशल पर ‘ac132’ नाम के यूजर ने बनाया था। वीडियो के आखिर में गाने का क्रेडिट एंथनी कॉन्स्टैंटिनो को दिया गया है। वह न्यूयॉर्क से ट्रम्प समर्थित रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं। वीडियो शेयर होने के बाद कॉन्स्टैंटिनो ने कहा कि उन्हें गर्व है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने उनके गाने को शेयर किया। यह वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ यूजर्स ने इसे मजाकिया बताया, जबकि कई लोगों ने इसे ट्रम्प की खुद की तारीफ करने वाला प्रचार वीडियो कहा। एक यूजर कहा कि ट्रम्प इस वीडियो में कॉमिक बुक कैरेक्टर जैसे लग रहे हैं। ट्रम्प पहले भी शेयर कर चुके हैं AI तस्वीरें यह पहला मौका नहीं है जब ट्रम्प ने AI-जनरेटेड कंटेंट शेयर किया हो। कुछ दिन पहले उन्होंने खुद को जेम्स बॉन्ड के अंदाज में ‘ट्रम्प 007’ कैप्शन के साथ दिखाया था। इससे पहले वह खुद को ‘ग्रेटेस्ट अट्रैक्शन’ बताते हुए भी तस्वीर शेयर कर चुके हैं। पिछले महीने ट्रम्प ने एक AI-जनरेटेड फोटो पोस्ट की थी, जिसमें उन्होंने खुद को जीसस के रूप में दिखाया गया था। उस पोस्ट को लेकर काफी विवाद हुआ था। बाद में पोस्ट हटा ली गई, लेकिन ट्रम्प ने माफी नहीं मांगी। उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि उन्हें लगा था कि तस्वीर में वह डॉक्टर की तरह दिख रहे हैं। ट्रम्प पहले भी कई बार कह चुके हैं कि वह पारंपरिक मीडिया से ज्यादा सोशल मीडिया को अपनी बात रखने का अहम जरिया मानते हैं। इसी वजह से ट्रुथ सोशल पर उनकी लगभग हर पोस्ट कुछ ही देर में राजनीतिक और सोशल मीडिया बहस का हिस्सा बन जाती है। ईरान युद्ध से जुड़ी AI तस्वीरें भी शेयर कीं ईरान युद्ध की शुरूआत से ही ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर सैन्य ताकत से जुड़ी कई AI-जनरेटेड तस्वीरें भी पोस्ट कीं है। इनमें ईरान की नौसेना को तबाह हालत में दिखाया गया था। एक तस्वीर में समुद्र में बड़ी संख्या में युद्धपोत डूबते नजर आए, जबकि दूसरी तस्वीरों में अमेरिकी सैन्य ताकत को बेहद आक्रामक अंदाज में दिखाया गया था। इन तस्वीरों के जरिए ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान की सेना कमजोर पड़ चुकी है और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक इलाके में अमेरिका बढ़त बना रहा है। हालांकि इन तस्वीरों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं थी और इन्हें AI से तैयार किया गया विजुअल कंटेंट माना गया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और डर पैदा करने वाला कंटेंट बताया, जबकि ट्रम्प समर्थकों ने इसे उनकी मजबूत नेतृत्व वाली छवि से जोड़कर देखा। एक्सपर्ट्स बोले- डिजिटल पर्सनैलिटी कल्ट बनाने की कोशिश ट्रम्प पिछले कुछ समय से AI का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक ब्रांडिंग के बड़े हथियार के तौर पर कर रहे हैं। राजनीतिक एक्सपर्ट्स इसे “डिजिटल पर्सनैलिटी कल्ट” बनाने की कोशिश मानते हैं, जिसमें नेता को असाधारण और सर्वशक्तिमान दिखाया जाता है। यानी सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए किसी व्यक्ति (जैसे- इन्फ्लुएंसर, नेता या सेलिब्रिटी) को एक निर्दोष, अलौकिक या ईश्वर जैसी छवि में पेश किया जाता है, और प्रशंसक बिना किसी तर्क के उन्हें फोलो करते हैं। ट्रम्प का यह मॉडल पारंपरिक राजनीतिक प्रचार से अलग है क्योंकि इसमें मीम कल्चर, वायरल वीडियो और AI विजुअल्स का मिश्रण दिखाई देता है। इसका मकसद सिर्फ समर्थकों को उत्साहित करना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा में बने रहना भी होता है। आलोचकों का कहना है कि AI कंटेंट के जरिए वास्तविकता और कल्पना की सीमा धुंधली हो रही है, जिससे गलत नैरेटिव और भ्रम फैलने का खतरा बढ़ता है।

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ईरान का आरोप- अमेरिका ने सीजफायर तोड़ा:कहा- उसकी वजह से इलाके की सुरक्षा खतरे में, अब जो हालात बनेंगे उसके लिए US जिम्मेदार

ईरान का आरोप- अमेरिका ने सीजफायर तोड़ा:कहा- उसकी वजह से इलाके की सुरक्षा खतरे में, अब जो हालात बनेंगे उसके लिए US जिम्मेदार

ईरान के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को अमेरिका पर सीजफायर तोड़ने का आरोप लगाया है। मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका तनाव कम करने के बजाय अपनी सैन्य कार्रवाई से पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि अमेरिका ने सीरिक क्षेत्र और केश्म द्वीप पर ईरान के तटीय रडार और निगरानी केंद्रों पर हमला किया, जो सीजफायर का साफ उल्लंघन है। ईरान ने कहा कि इन हमलों के बाद जो भी हालात पैदा होंगे और उसके जो भी नतीजे होंगे, उनकी पूरी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी।

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ईरान का आरोप- अमेरिका ने सीजफायर तोड़ा:कहा- उसकी वजह से इलाके की सुरक्षा खतरे में, अब जो हालात बनेंगे, उसके लिए US जिम्मेदार

ईरान का आरोप- अमेरिका ने सीजफायर तोड़ा:कहा- उसकी वजह से इलाके की सुरक्षा खतरे में, अब जो हालात बनेंगे, उसके लिए US जिम्मेदार

ईरान के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को अमेरिका पर सीजफायर तोड़ने का आरोप लगाया। ईरानी फॉरेन मिनिस्ट्री का कहना है कि अमेरिका तनाव कम करने के बजाय अपनी सैन्य कार्रवाई से पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि अमेरिका ने सीरिक क्षेत्र और केश्म द्वीप पर ईरान के तटीय रडार और निगरानी केंद्रों पर हमला किया, जो सीजफायर का साफ उल्लंघन है। ईरान ने कहा कि इन हमलों के बाद जो भी हालात पैदा होंगे और उसके जो भी नतीजे होंगे, उनकी पूरी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. लेबनान में मौतों का आंकड़ा 3,593 पहुंचा: 2 मार्च से जारी इजराइली हमलों में अब तक 3,593 लोगों की मौत और 10,990 लोग घायल हुए हैं। पिछले 24 घंटे में 35 लोगों की जान गई और 120 घायल हुए। 2. दक्षिणी लेबनान में इजराइली हमले तेज, 10 लोगों की मौत: शनिवार को इजराइली हमलों में लेबनानी सेना के एक ब्रिगेडियर जनरल समेत 10 लोगों की मौत हुई। हमलों के बाद कई इलाकों में लोगों को घर खाली करने के आदेश दिए गए। 3. अमेरिका ने 4 ईरानी ड्रोन मार गिराने का दावा किया: अमेरिका ने होर्मुज की ओर बढ़ रहे 4 ईरानी ड्रोन मार गिराने और केश्म आइलैंड की रडार साइट्स पर हमला करने का दावा किया। जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन की ओर 7 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिन्हें इंटरसेप्ट करने का दावा किया गया। 4. ईरान बोला- सीजफायर अमेरिका ने तोड़ा: तेहरान ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने सीरिक और केश्म द्वीप पर तटीय रडार ठिकानों पर हमला कर युद्धविराम का उल्लंघन किया। ईरान ने कहा कि इसके बाद पैदा होने वाले हालात की जिम्मेदारी अमेरिका की होगी। 5. ईरान-अमेरिका डील 24 अरब डॉलर पर अटकी: CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित शांति समझौता ईरान की 24 अरब डॉलर (करीब ₹2.29 लाख करोड़) की फ्रीज संपत्ति जारी होने पर टिका है। ईरान चाहता है कि समझौते के साथ ही 12 अरब डॉलर जारी किए जाएं, जबकि अमेरिका इस पर अभी सहमत नहीं है। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

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वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के ओहियो में स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग, कई लोगों को लगी गोली; हमलावरों की तलाश जारी

वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के ओहियो में स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग, कई लोगों को लगी गोली; हमलावरों की तलाश जारी

अमेरिका के ओहियो राज्य के टोलेडो शहर में शनिवार को एक स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग हुई। घटना में कई लोग घायल हो गए। घायलों को आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि संदिग्धों की तलाश जारी है। टोलेडो पुलिस के अनुसार, शाम करीब 5:30 बजे ओल्ड वेस्ट एंड फेस्टिवल के पास गोली चलने की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचने पर पुलिस को कई लोग गोली लगने से घायल मिले। हालांकि अधिकारियों ने अभी यह नहीं बताया है कि कुल कितने लोग घायल हुए हैं और उनकी हालत कैसी है। पुलिस ने घटना के कारणों या संदिग्धों के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी है। घटना का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें लगातार फायरिंग की आवाज सुनाई दी। मौके पर अफरा-तफरी मच गई। लोग चीखते हुए इधर-उधर भागते दिखे। एक प्रत्यक्षदर्शी केविन बेरी ने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ पास के आर्बोरेटम में लाइव म्यूजिक सुन रहे थे, तभी अचानक कई गोलियों की आवाज सुनाई दी। कई लोग लोग जमीन पर लेट गए। कुछ भागे। बेरी के अनुसार, उन्होंने पांच घायलों को देखा, जिन्हें गोली लगी थी। एक हथियार भी पड़ा था, जिसे किसी ने फेंक दिया था।

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वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के ओहियो में स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग, कई लोगों को लगी गोली; हमलावरों की तलाश जारी

वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के ओहियो में स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग, कई लोगों को लगी गोली; हमलावरों की तलाश जारी

अमेरिका के ओहियो राज्य के टोलेडो शहर में शनिवार को एक स्ट्रीट फेस्टिवल के दौरान फायरिंग हुई। घटना में कई लोग घायल हो गए। घायलों को आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि संदिग्धों की तलाश जारी है। टोलेडो पुलिस के अनुसार, शाम करीब 5:30 बजे ओल्ड वेस्ट एंड फेस्टिवल के पास गोली चलने की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचने पर पुलिस को कई लोग गोली लगने से घायल मिले। हालांकि अधिकारियों ने अभी यह नहीं बताया है कि कुल कितने लोग घायल हुए हैं और उनकी हालत कैसी है। पुलिस ने घटना के कारणों या संदिग्धों के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी है। घटना का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें लगातार फायरिंग की आवाज सुनाई दी। मौके पर अफरा-तफरी मच गई। लोग चीखते हुए इधर-उधर भागते दिखे। एक प्रत्यक्षदर्शी केविन बेरी ने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ पास के आर्बोरेटम में लाइव म्यूजिक सुन रहे थे, तभी अचानक कई गोलियों की आवाज सुनाई दी। कई लोग लोग जमीन पर लेट गए। कुछ भागे। बेरी के अनुसार, उन्होंने पांच घायलों को देखा, जिन्हें गोली लगी थी। एक हथियार भी पड़ा था, जिसे किसी ने फेंक दिया था।

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दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। इस बीच अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता बढ़ गई है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारी जुटाने के लिए जासूसी की कोशिश कर रहा है। NBC न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है। अमेरिका और इजराइल जैसे बेहद करीबी सहयोगियों के बीच ऐसा होना बेहद असाधारण माना जाता है। हालांकि इजराइल ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इजराइली दूतावास का कहना है कि वह अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी नहीं करता और उसकी खुफिया एजेंसियां सहयोगियों नहीं, बल्कि दुश्मनों पर नजर रखती हैं। फोन-कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते अधिकारी काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाने का सबसे ज्यादा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या इजराइली अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क में रहते हैं। हालांकि अमेरिका और इजराइल के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का सहयोग फिलहाल जारी रहेगा। एक अमेरिकी अधिकारी ने NBC को बताया कि अमेरिका पहले से ही अपने सीनियर अधिकारियों की इजराइल यात्रा के दौरान खास सावधानी बरतता है। अमेरिकी अधिकारी इस दौरान अपने फोन-लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसकी जगह वे अस्थायी मोबाइल फोन और अलग कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। कई बार वे होटल के कमरों या ऐसी जगहों पर संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से भी बचते हैं, जहां निगरानी का खतरा हो सकता है।इसकी वजह यह है कि इजराइली खुफिया एजेंसियां जानकारी जुटाने के मामले में काफी आक्रामक मानी जाती हैं। हालांकि अधिकारियों ने यह भी कहा कि ऐसा कोई एक बड़ा घटनाक्रम नहीं था जिसकी वजह से खतरे का स्तर अचानक बढ़ाया गया हो। इसके बजाय कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर यह फैसला लिया गया। ट्रम्प ने फोन पर नेतन्याहू को गाली दी थी यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ईरान को लेकर ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। अप्रैल में युद्धविराम के बाद ट्रम्प ईरान के साथ एक बड़े समझौते की कोशिश कर रहे हैं, जबकि नेतन्याहू का मानना है कि ईरान किसी समझौते का पालन नहीं करेगा। इस बीच लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियानों को लेकर भी अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर तीखी बातचीत भी हुई थी। बाद में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे थे। इससे यह अटकलें और तेज हो गईं कि दोनों नेताओं के बीच मध्य पूर्व की रणनीति को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अमेरिका-इजराइल के रिश्तों में पहले भी कड़वाहट दिखी भले ही अमेरिका और इजराइल बहुत पक्के दोस्त माने जाते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच खुफिया स्तर पर अविश्वास और जासूसी का पुराना इतिहास रहा है। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां पहले भी कई बार इजराइल की जासूसी गतिविधियों को लेकर अलर्ट का स्तर बढ़ा चुकी हैं और दोनों के बीच बड़े विवाद हुए हैं। 1. जोनाथन पोलार्ड केस (1985) जोनाथन पोलार्ड अमेरिका की नौसेना खुफिया एजेंसी में काम करता था। 1985 में उस पर आरोप लगा कि उसने अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए। पोलार्ड का कहना था कि वह इजराइल की मदद करना चाहता था, लेकिन अमेरिका ने इसे जासूसी माना। जांच के दौरान वह इजराइल के दूतावास में शरण लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया। 1987 में अमेरिकी अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इस मामले से अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में तनाव आ गया। करीब 30 साल जेल में रहने के बाद 2015 में पोलार्ड को पैरोल पर रिहा किया गया। 2020 में वह इजराइल चला गया, जहां उसका स्वागत एक राष्ट्रीय नायक की तरह किया गया। यह मामला आज भी अमेरिका में उन सबसे बड़े जासूसी मामलों में गिना जाता है, जिनमें किसी अमेरिकी नागरिक ने किसी सहयोगी देश के लिए जासूसी की थी। यह पहली बार था जब अमेरिका ने इजराइल को लेकर अपनी काउंटर-इंटेलिजेंस चौकसी को उच्चतम स्तर पर कर दिया था। 2. बेन-अमी कादिश केस (2008) बेन-अमी कादिश अमेरिकी सेना के लिए काम कर चुके एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। 2008 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने 1980 के दशक में अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए थे। अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, इन दस्तावेजों में मिसाइल रक्षा प्रणाली, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी शामिल थी। आरोप था कि कादिश ने यह जानकारी एक इजराइली संपर्क को सौंपी थी। कादिश ने बाद में एक आरोप स्वीकार किया और 2009 में उन्हें सजा सुनाई गई। हालांकि उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें जेल नहीं भेजा गया, बल्कि जुर्माना और निगरानी जैसी सजा दी गई। 3. स्टिंगरे जासूसी विवाद (2019) 2019 में अमेरिकी मीडिया में एक रिपोर्ट आई, जिसमें दावा किया गया कि व्हाइट हाउस और वाशिंगटन के कुछ संवेदनशील इलाकों के आसपास संदिग्ध ‘स्टिंगरे’ डिवाइस पाए गए थे। ये नकली मोबाइल टावर की तरह काम करके आसपास के मोबाइल फोनों से जानकारी जुटा रहे थे। जांच एजेंसियों को शक था कि इन उपकरणों के पीछे इजराइल हो सकता है और इनका मकसद राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके करीबी अधिकारियों की गतिविधियों और बातचीत पर नजर रखना था। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि इजराइल दोषी साबित हो गया है। दूसरी ओर, इजराइल ने आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि वह अमेरिका में जासूसी नहीं करता।

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दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। इस बीच अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता बढ़ गई है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारी जुटाने के लिए जासूसी की कोशिश कर रहा है। NBC न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है। अमेरिका और इजराइल जैसे बेहद करीबी सहयोगियों के बीच ऐसा होना बेहद असाधारण माना जाता है। हालांकि इजराइल ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इजराइली दूतावास का कहना है कि वह अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी नहीं करता और उसकी खुफिया एजेंसियां सहयोगियों नहीं, बल्कि दुश्मनों पर नजर रखती हैं। फोन-कम्प्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते अधिकारी काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाने का सबसे ज्यादा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या इजराइली अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क में रहते हैं। हालांकि अमेरिका और इजराइल के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का सहयोग फिलहाल जारी रहेगा। एक अमेरिकी अधिकारी ने NBC को बताया कि अमेरिका पहले से ही अपने सीनियर अधिकारियों की इजराइल यात्रा के दौरान खास सावधानी बरतता है। अमेरिकी अधिकारी इस दौरान अपने फोन-लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसकी जगह वे अस्थायी मोबाइल फोन और अलग कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। कई बार वे होटल के कमरों या ऐसी जगहों पर संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से भी बचते हैं, जहां निगरानी का खतरा हो सकता है।इसकी वजह यह है कि इजराइली खुफिया एजेंसियां जानकारी जुटाने के मामले में काफी आक्रामक मानी जाती हैं। हालांकि अधिकारियों ने यह भी कहा कि ऐसा कोई एक बड़ा घटनाक्रम नहीं था जिसकी वजह से खतरे का स्तर अचानक बढ़ाया गया हो। इसके बजाय कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर यह फैसला लिया गया। ट्रम्प ने फोन पर नेतन्याहू को गाली दी थी यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ईरान को लेकर ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। अप्रैल में युद्धविराम के बाद ट्रम्प ईरान के साथ एक बड़े समझौते की कोशिश कर रहे हैं, जबकि नेतन्याहू का मानना है कि ईरान किसी समझौते का पालन नहीं करेगा। इस बीच लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियानों को लेकर भी अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर तीखी बातचीत भी हुई थी। बाद में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे थे। इससे यह अटकलें और तेज हो गईं कि दोनों नेताओं के बीच मध्य पूर्व की रणनीति को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अमेरिका-इजराइल के रिश्तों में पहले भी कड़वाहट दिखी भले ही अमेरिका और इजराइल बहुत पक्के दोस्त माने जाते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच खुफिया स्तर पर अविश्वास और जासूसी का पुराना इतिहास रहा है। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां पहले भी कई बार इजराइल की जासूसी गतिविधियों को लेकर अलर्ट का स्तर बढ़ा चुकी हैं और दोनों के बीच बड़े विवाद हुए हैं। 1. जोनाथन पोलार्ड केस (1985) जोनाथन पोलार्ड अमेरिका की नौसेना खुफिया एजेंसी में काम करता था। 1985 में उस पर आरोप लगा कि उसने अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए। पोलार्ड का कहना था कि वह इजराइल की मदद करना चाहता था, लेकिन अमेरिका ने इसे जासूसी माना। जांच के दौरान वह इजराइल के दूतावास में शरण लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया। 1987 में अमेरिकी अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इस मामले से अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में तनाव आ गया। करीब 30 साल जेल में रहने के बाद 2015 में पोलार्ड को पैरोल पर रिहा किया गया। 2020 में वह इजराइल चला गया, जहां उसका स्वागत एक राष्ट्रीय नायक की तरह किया गया। यह मामला आज भी अमेरिका में उन सबसे बड़े जासूसी मामलों में गिना जाता है, जिनमें किसी अमेरिकी नागरिक ने किसी सहयोगी देश के लिए जासूसी की थी। यह पहली बार था जब अमेरिका ने इजराइल को लेकर अपनी काउंटर-इंटेलिजेंस चौकसी को उच्चतम स्तर पर कर दिया था। 2. बेन-अमी कादिश केस (2008) बेन-अमी कादिश अमेरिकी सेना के लिए काम कर चुके एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। 2008 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने 1980 के दशक में अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए थे। अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, इन दस्तावेजों में मिसाइल रक्षा प्रणाली, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी शामिल थी। आरोप था कि कादिश ने यह जानकारी एक इजराइली संपर्क को सौंपी थी। कादिश ने बाद में एक आरोप स्वीकार किया और 2009 में उन्हें सजा सुनाई गई। हालांकि उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें जेल नहीं भेजा गया, बल्कि जुर्माना और निगरानी जैसी सजा दी गई। 3. स्टिंगरे जासूसी विवाद (2019) 2019 में अमेरिकी मीडिया में एक रिपोर्ट आई, जिसमें दावा किया गया कि व्हाइट हाउस और वाशिंगटन के कुछ संवेदनशील इलाकों के आसपास संदिग्ध ‘स्टिंगरे’ डिवाइस पाए गए थे। ये नकली मोबाइल टावर की तरह काम करके आसपास के मोबाइल फोनों से जानकारी जुटा रहे थे। जांच एजेंसियों को शक था कि इन उपकरणों के पीछे इजराइल हो सकता है और इनका मकसद राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके करीबी अधिकारियों की गतिविधियों और बातचीत पर नजर रखना था। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि इजराइल दोषी साबित हो गया है। दूसरी ओर, इजराइल ने आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि वह अमेरिका में जासूसी नहीं करता।

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Jinping to meet Kim Jong in rare visit to North Korea

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बीजिंग/प्योंगयांग7 मिनट पहले कॉपी लिंक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते उत्तर कोरिया के दौरे पर जाएंगे और वहां किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के सरकारी मीडिया के मुताबिक यह यात्रा 8 से 9 जून तक होगी। जिनपिंग ने इससे पहले 2019 में प्योंगयांग का दौरा किया था। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब कुछ हफ्ते पहले ही जिनपिंग ने बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की थी। ये दोनों देश उत्तर कोरिया की विदेश नीति में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। कभी उत्तर कोरिया पर चीन का दबदबा था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और उत्तर कोरिया की नजदीकी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यानी कि अब उत्तर कोरिया सिर्फ चीन के भरोसे नहीं है। चीन में विक्ट्री डे परेड के मौके पर पुतिन, शी जिनपिंग और किम जोंग उन एक साथ नजर आए। तस्वीर सितंबर 2025 की है। चीन की उत्तर कोरिया के साथ अनोखी संधि चीन, उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक साझेदार है। उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के कारण लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ऐसे में चीन उसके लिए सबसे अहम सहारा बना हुआ है। चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच रक्षा संधि भी है, जो चीन की किसी भी देश के साथ एकमात्र सैन्य संधि है। इस समझौते के तहत यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा उसकी मदद करेगा। इस साल इस संधि के 65 साल पूरे हो रहे हैं। किम जोंग के लिए शी जिनपिंग की यह यात्रा बहुत महत्व रखती है। कोविड महामारी, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और फिर यूक्रेन युद्ध में रूस का साथ देने के बाद उत्तर कोरिया खुद को पहले से ज्यादा मजबूत और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश कर रहा है। किम चाहते हैं कि दुनिया देखे कि उनका देश कठिन हालात झेलने के बावजूद टिके रहने में सफल रहा है। वहीं, शी जिनपिंग इस यात्रा के जरिए दुनिया को यह याद दिलाना चाहेंगे कि उत्तर कोरिया अभी भी काफी हद तक चीन पर निर्भर है और बीजिंग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से जिनपिंग परेशान हाल के वर्षों में किम जोंग और व्लादिमीर पुतिन के संबंध भी तेजी से मजबूत हुए हैं। रूस ने उत्तर कोरिया को आर्थिक और तकनीकी मदद दी है, जबकि उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध में रूस को सैनिकों और हथियारों की सहायता दी है। जिनपिंग, रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकी को लेकर पूरी तरह सहज नहीं हैं। वे चाहते हैं कि चीन का उत्तर कोरिया पर प्रभाव बना रहे। एशिया सोसाइटी के सीनियर फेलो जॉन डिल्यूरी के मुताबिक चीन निश्चित रूप से रूस और उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकी को लेकर चिंतित है और यह यात्रा शी की उसी चिंता का जवाब है। दूसरी तरफ किम जोंग उन भी अब चीन के जूनियर पार्टनर की तरह व्यवहार नहीं चाहते। रूस के साथ बढ़ती नजदीकी का इस्तेमाल वह चीन से ज्यादा आर्थिक रियायतें हासिल करने के लिए कर सकते हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन जून 2024 को उत्तर कोरिया पहुंचे थे। इस दौरान स्वागत समारोह में किम जोंग उन ने उनका अभिवादन किया। किम जोंग उन की स्थिति पहले से कहीं मजबूत कुछ साल पहले तक किम जोंग उन की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही थी। 2019 में ट्रम्प ने उनके साथ परमाणु वार्ताओं को समाप्त कर दिया था, जिससे प्रतिबंध हटने की उम्मीद खत्म हो गई। इसके बाद कोविड महामारी के दौरान उत्तर कोरिया ने अपनी सीमाएं बंद कर लीं। इससे चीन के साथ व्यापार लगभग ठप हो गया, जबकि चीन ही उत्तर कोरिया के लिए सामान और विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत था। लेकिन महामारी के बाद हालात बदल गए। किम ने यूक्रेन युद्ध में रूस की मुश्किलों का फायदा उठाया और मॉस्को के साथ संबंध मजबूत कर लिए। उन्होंने रूस को हथियार और सैनिक उपलब्ध कराए, जबकि बदले में रूस ने तेल, खाद्य सामग्री, हथियार तकनीक और अन्य सहायता के रूप में अरबों डॉलर की मदद दी। ऐसे में जिनपिंग शायद किम को यह याद दिलाने की कोशिश करेंगे कि चीन अभी भी उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है। इसी दिशा में मार्च में चीन ने बीजिंग और प्योंगयांग के बीच ट्रेन और विमान सेवाएं फिर से शुरू कर दीं। इसके बावजूद किम और ज्यादा चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद पर्यटन ऐसा क्षेत्र है जिस पर कड़े प्रतिबंध नहीं हैं। किम ने समुद्री तटों पर रिसॉर्ट और पहाड़ी इलाकों में हॉट स्प्रिंग परियोजनाओं में निवेश किया है ताकि ज्यादा से ज्यादा चीनी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। परमाणु मुद्दे पर बात हो सकती है जिनपिंग और किम जोंग की बैठक में अमेरिका-उत्तर कोरिया वार्ता को फिर शुरू करने के मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है। चीन लंबे समय से कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की बात करता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उसका रुख पहले की तुलना में काफी नरम दिखाई दिया है। पिछले महीने ट्रम्प और जिनपिंग की बैठक के बाद व्हाइट हाउस ने कहा था कि दोनों चाहते हैं कि उत्तर कोरिया के पास परमाणु हथियार न रहें और वह अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म करे। हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय से इस बारे में सवाल पूछा गया तो उसने सीधे तौर पर इससे इनकार कर दिया था। व्हाइट हाउस लौटने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि वह किम जोंग उन के साथ एक बैठक करना चाहते हैं। हालांकि किम अब तक अपने रुख पर कायम हैं। उन्होंने साफ कहा है कि वह ऐसी किसी बातचीत को स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें उनके परमाणु कार्यक्रम को बातचीत की मेज पर रखा जाए। किम लंबे समय से परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा की गारंटी मानते हैं। उनका मानना है कि यही कार्यक्रम उन्हें चीन और रूस पर अत्यधिक निर्भर होने से बचाता है और अमेरिका के संभावित हमले से सुरक्षा देता है। रूस ने उत्तर कोरिया के समर्थन में वीटो लगाया कई

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बीजिंग/प्योंगयांग27 मिनट पहले कॉपी लिंक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते उत्तर कोरिया के दौरे पर जाएंगे और वहां किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के सरकारी मीडिया के मुताबिक यह यात्रा 8 से 9 जून तक होगी। जिनपिंग ने इससे पहले 2019 में प्योंगयांग का दौरा किया था। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब कुछ हफ्ते पहले ही जिनपिंग ने बीजिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की थी। रूस और चीन दोनों ही उत्तर कोरिया की विदेश नीति में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। कुछ साल पहले तक उत्तर कोरिया पर चीन का दबदबा था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और उत्तर कोरिया की नजदीकी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यानी कि अब उत्तर कोरिया सिर्फ चीन के भरोसे नहीं है। चीन में विक्ट्री डे परेड के मौके पर पुतिन, शी जिनपिंग और किम जोंग उन एक साथ नजर आए। तस्वीर सितंबर 2025 की है। चीन की उत्तर कोरिया के साथ अनोखी संधि चीन, उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक साझेदार है। उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के कारण लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ऐसे में चीन उसके लिए सबसे अहम सहारा बना हुआ है। चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच रक्षा संधि भी है, जो चीन की किसी भी देश के साथ एकमात्र सैन्य संधि है। इस समझौते के तहत यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा उसकी मदद करेगा। इस साल इस संधि के 65 साल पूरे हो रहे हैं। किम जोंग के लिए शी जिनपिंग की यह यात्रा बहुत महत्व रखती है। कोविड महामारी, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और फिर यूक्रेन युद्ध में रूस का साथ देने के बाद उत्तर कोरिया खुद को पहले से ज्यादा मजबूत और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश कर रहा है। किम चाहते हैं कि दुनिया देखे कि उनका देश कठिन हालात झेलने के बावजूद टिके रहने में सफल रहा है। वहीं, शी जिनपिंग इस यात्रा के जरिए दुनिया को यह याद दिलाना चाहेंगे कि उत्तर कोरिया अभी भी काफी हद तक चीन पर निर्भर है और बीजिंग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से जिनपिंग परेशान हाल के वर्षों में किम जोंग और व्लादिमीर पुतिन के संबंध भी तेजी से मजबूत हुए हैं। रूस ने उत्तर कोरिया को आर्थिक और तकनीकी मदद दी है, जबकि उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध में रूस को सैनिकों और हथियारों की सहायता दी है। जिनपिंग, रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकी को लेकर पूरी तरह सहज नहीं हैं। वे चाहते हैं कि चीन का उत्तर कोरिया पर प्रभाव बना रहे। एशिया सोसाइटी के सीनियर फेलो जॉन डिल्यूरी के मुताबिक चीन निश्चित रूप से रूस और उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकी को लेकर चिंतित है और यह यात्रा शी की उसी चिंता का जवाब है। दूसरी तरफ किम जोंग उन भी अब चीन के जूनियर पार्टनर की तरह व्यवहार नहीं चाहते। रूस के साथ बढ़ती नजदीकी का इस्तेमाल वह चीन से ज्यादा आर्थिक रियायतें हासिल करने के लिए कर सकते हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन जून 2024 को उत्तर कोरिया पहुंचे थे। इस दौरान स्वागत समारोह में किम जोंग उन ने उनका अभिवादन किया। किम जोंग उन की स्थिति पहले से कहीं मजबूत कुछ साल पहले तक किम जोंग उन की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही थी। 2019 में ट्रम्प ने उनके साथ परमाणु वार्ताओं को समाप्त कर दिया था, जिससे प्रतिबंध हटने की उम्मीद खत्म हो गई। इसके बाद कोविड महामारी के दौरान उत्तर कोरिया ने अपनी सीमाएं बंद कर लीं। इससे चीन के साथ व्यापार लगभग ठप हो गया, जबकि चीन ही उत्तर कोरिया के लिए सामान और विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत था। लेकिन महामारी के बाद हालात बदल गए। किम ने यूक्रेन युद्ध में रूस की मुश्किलों का फायदा उठाया और मॉस्को के साथ संबंध मजबूत कर लिए। उन्होंने रूस को हथियार और सैनिक उपलब्ध कराए, जबकि बदले में रूस ने तेल, खाद्य सामग्री, हथियार तकनीक और अन्य सहायता के रूप में अरबों डॉलर की मदद दी। ऐसे में जिनपिंग शायद किम को यह याद दिलाने की कोशिश करेंगे कि चीन अभी भी उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है। इसी दिशा में मार्च में चीन ने बीजिंग और प्योंगयांग के बीच ट्रेन और विमान सेवाएं फिर से शुरू कर दीं। इसके बावजूद किम और ज्यादा चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद पर्यटन ऐसा क्षेत्र है जिस पर कड़े प्रतिबंध नहीं हैं। किम ने समुद्री तटों पर रिसॉर्ट और पहाड़ी इलाकों में हॉट स्प्रिंग परियोजनाओं में निवेश किया है ताकि ज्यादा से ज्यादा चीनी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। परमाणु मुद्दे पर बात हो सकती है जिनपिंग और किम जोंग की बैठक में अमेरिका-उत्तर कोरिया वार्ता को फिर शुरू करने के मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है। चीन लंबे समय से कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की बात करता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उसका रुख पहले की तुलना में काफी नरम दिखाई दिया है। पिछले महीने ट्रम्प और जिनपिंग की बैठक के बाद व्हाइट हाउस ने कहा था कि दोनों चाहते हैं कि उत्तर कोरिया के पास परमाणु हथियार न रहें और वह अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म करे। हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय से इस बारे में सवाल पूछा गया तो उसने सीधे तौर पर इससे इनकार कर दिया था। व्हाइट हाउस लौटने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि वह किम जोंग उन के साथ एक बैठक करना चाहते हैं। हालांकि किम अब तक अपने रुख पर कायम हैं। उन्होंने साफ कहा है कि वह ऐसी किसी बातचीत को स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें उनके परमाणु कार्यक्रम को बातचीत की मेज पर रखा जाए। किम लंबे समय से परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा की गारंटी मानते हैं। उनका मानना है कि यही कार्यक्रम उन्हें चीन और रूस पर अत्यधिक निर्भर होने से बचाता है और अमेरिका के संभावित हमले से सुरक्षा देता है। रूस ने उत्तर कोरिया के समर्थन में वीटो लगाया कई

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