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Delhi 31 Weeks Pregnancy Abortion Case; 15 Year Old Girl

Delhi 31 Weeks Pregnancy Abortion Case; 15 Year Old Girl
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नई दिल्ली2 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सात महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंट 15 साल की लड़की को मेडिकल टर्मिनेशन (अबॉर्शन) की इजाजत दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा-

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यह जन्म लेने वाले बच्चे का सवाल नहीं है। जरूरी यह है कि लड़की क्या चाहती है। अगर वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। भले ही बच्चे को जन्म के बाद गोद देने का ऑप्शन मौजूद हो।

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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि इस स्टेज पर अबॉर्शन करना मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। उन्होंने डिलीवरी के बाद बच्चा गोद देने का सुझाव दिया था। कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया।

लड़की एक नाबालिग लड़के के साथ आपसी सहमति से संबंध के बाद प्रेग्नेंट हुई थी। नाबालिग की मां ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (MPT Act) में तय समयसीमा से आगे जाकर बेटी के अबॉर्शन की इजाजत मांगी थी। लड़की ने भी कहा था कि वह प्रेग्नेंसी जारी नहीं रखना चाहती।

वकील ने बताया- प्रेग्नेंसी से तनाव में नाबालिग

याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने कहा गया कि इस प्रेग्नेंसी ने नाबालिग को गंभीर मानसिक तनाव दिया है और उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ा है। कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग में पहले से ही गंभीर मानसिक तनाव के संकेत दिख रहे हैं। वह आत्महत्या की कोशिश भी कर चुकी है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि बच्चे को सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के जरिए गोद दिलाने की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे लड़की और उसके परिवार की पहचान सुरक्षित रहे। उन्होंने नाबालिग को आर्थिक मदद की पेशकश भी की।

हालांकि जस्टिस नागरत्ना ने इस तर्क पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोर्ट महिलाओं को अबॉर्शन के बजाय उनके लिए आर्थिक मदद या गोद लेने जैसे विकल्पों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

कोर्ट बोला- महिला को प्रजनन संबंधी फैसले लेने की आजादी

कोर्ट ने कहा, ‘किसी महिला, खासकर नाबालिग, को इच्छा के खिलाफ प्रेग्नेंसी पूरा करने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए उसकी इच्छा का सम्मान करना जरूरी है।’

कोर्ट ने कहा कि प्रजनन संबंधी फैसले लेने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। इसलिए गोद देने का विकल्प किसी महिला को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं बन सकता।

SC ने कहा- कोर्ट वहीं करेगा जो महिला के हित में बेहतर होगा

कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतें अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने पर जोर देंगी, तो महिलाएं अवैध अबॉर्शन सेंटर्स का सहारा लेने या छिपकर गर्भपात कराने को मजबूर हो सकती हैं। इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बढ़ जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अदालतों को यह देखना चाहिए कि गर्भवती महिला के हित में क्या बेहतर है, खासकर तब जब गर्भ स्पष्ट रूप से अनचाहा हो। अंत में कोर्ट ने नाबालिग का AIIMS दिल्ली में सभी जरूरी मेडिकल सावधानियों के साथ अबॉर्शन कराने का निर्देश दिया।

अबॉर्शन से जुड़े केस में SC के 3 अहम फैसले

  1. 14 साल की नाबालिग रेप विक्टिम का केस: सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में महाराष्ट्र की 14 साल की रेप पीड़िता को 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन करने की इजाजत दे दी। कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग के मानसिक और शारीरिक आघात का सही आकलन नहीं किया। SC ने कहा कि नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
  2. 33 साल की 26 हफ्ते की प्रेग्नेंट महिला का केस: 2017 में SC ने कोलकाता की 33 साल की महिला को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि भ्रूण में गंभीर हृदय संबंधी जन्मजात समस्या है, और अगर बच्चा जन्म भी लेता है तो उसके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बहुत कम होगी।
  3. 10 साल की रेप विक्टिम की याचिका खारिज: 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की 10 साल की रेप पीड़ित की 32 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था किइससे मां और बच्चे, दोनों की जान को गंभीर खतरा है। अगस्त 2017 में बच्ची ने सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए बच्चे को जन्म दिया।

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सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें…

इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं: बेहतर ये कि वे घर पर ही इबादत करें, सबरीमाला केस में याचिकाकर्ता की दलील

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सात महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंट 15 साल की लड़की को मेडिकल टर्मिनेशन (अबॉर्शन) की इजाजत दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा-

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यह जन्म लेने वाले बच्चे का सवाल नहीं है। जरूरी यह है कि लड़की क्या चाहती है। अगर वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। भले ही बच्चे को जन्म के बाद गोद देने का ऑप्शन मौजूद हो।

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लड़की एक नाबालिग लड़के के साथ आपसी सहमति से संबंध के बाद प्रेग्नेंट हुई थी। नाबालिग की मां ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (MPT Act) में तय समयसीमा से आगे जाकर बेटी के अबॉर्शन की इजाजत मांगी थी। लड़की ने भी कहा था कि वह प्रेग्नेंसी जारी नहीं रखना चाहती।

वकील ने बताया- प्रेग्नेंसी से तनाव में नाबालिग

याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने कहा गया कि इस प्रेग्नेंसी ने नाबालिग को गंभीर मानसिक तनाव दिया है और उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ा है। कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग में पहले से ही गंभीर मानसिक तनाव के संकेत दिख रहे हैं। वह आत्महत्या की कोशिश भी कर चुकी है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि बच्चे को सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के जरिए गोद दिलाने की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे लड़की और उसके परिवार की पहचान सुरक्षित रहे। उन्होंने नाबालिग को आर्थिक मदद की पेशकश भी की।

हालांकि जस्टिस नागरत्ना ने इस तर्क पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोर्ट महिलाओं को अबॉर्शन के बजाय उनके लिए आर्थिक मदद या गोद लेने जैसे विकल्पों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

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कोर्ट ने कहा कि प्रजनन संबंधी फैसले लेने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। इसलिए गोद देने का विकल्प किसी महिला को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं बन सकता।

SC ने कहा- कोर्ट वहीं करेगा जो महिला के हित में बेहतर होगा

कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतें अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने पर जोर देंगी, तो महिलाएं अवैध अबॉर्शन सेंटर्स का सहारा लेने या छिपकर गर्भपात कराने को मजबूर हो सकती हैं। इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बढ़ जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अदालतों को यह देखना चाहिए कि गर्भवती महिला के हित में क्या बेहतर है, खासकर तब जब गर्भ स्पष्ट रूप से अनचाहा हो। अंत में कोर्ट ने नाबालिग का AIIMS दिल्ली में सभी जरूरी मेडिकल सावधानियों के साथ अबॉर्शन कराने का निर्देश दिया।

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  3. 10 साल की रेप विक्टिम की याचिका खारिज: 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की 10 साल की रेप पीड़ित की 32 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था किइससे मां और बच्चे, दोनों की जान को गंभीर खतरा है। अगस्त 2017 में बच्ची ने सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए बच्चे को जन्म दिया।

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