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Gandhari Movie Review | Taapsee Pannu Ishwak Singh Performance Analysis

Gandhari Movie Review | Taapsee Pannu Ishwak Singh Performance Analysis

17 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

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फिल्म गांधारी, ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है।

कास्ट- तापसी पन्नू, इश्वाक सिंह, मीता वशिष्ठ, छाया कदम, चंदन रॉय, प्रशांत नारायण

डायरेक्टर- देवाशीष मखीजा

ड्यूरेशन- 1 घंटा 56 मिनट

रेटिंग- 1.5/5

एक मां की बेटी गायब हो जाए, तो उसका दर्द कितना बड़ा होगा, यह समझने के लिए किसी भारी-भरकम डायलॉग की जरूरत नहीं होती। बस उस मां का चेहरा काफी है। ‘गांधारी’ के पास यही सबसे मजबूत हथियार था, एक मां, उसकी खोई हुई बेटी और उसे वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने का जुनून।

लेकिन फिल्म ने इस सीधे और दमदार आइडिया को इतना घुमाया, इतना सजाया और इतने ट्विस्ट डाल दिए कि आखिर में मां की कहानी कम और स्क्रीनप्ले की कसरत ज्यादा नजर आने लगती है।

तापसी पन्नू पूरी ताकत से बानी का किरदार निभाती हैं। वह दौड़ती हैं, लड़ती हैं, मार खाती हैं और फिर उठकर लड़ती हैं। फिल्म उनसे हर तरह का इमोशन निकलवाना चाहती है। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि जिस कहानी के लिए वह इतना सब कर रही हैं, वही कहानी बार-बार उनके पैरों में आकर गिर जाती है।

कैसी है फिल्म की कहानी?

बानी (तापसी पन्नू) और गोकुल (इश्वाक सिंह) अपनी बेटी के साथ सफर पर हैं। सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन अचानक बेटी गायब हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है एक मां की तलाश।

जॉयपुरा नाम के छोटे शहर में पहुंचने के बाद बानी को एहसास होता है कि मामला सिर्फ एक बच्ची के गायब होने का नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क है और शहर में कई चेहरे ऐसे हैं, जिन पर भरोसा करना मुश्किल है।

बानी की आंखों की रोशनी भी चली जाती है। लेकिन यहीं से फिल्म का सबसे दिलचस्प आइडिया सामने आता है, वह अपनी हालत को छिपाकर खुद को अंधा दिखाने लगती है, ताकि उन लोगों तक पहुंच सके जो उसकी बेटी के गायब होने के पीछे हैं।

कहानी में बाल तस्करी, पुलिस, स्थानीय लोगों की मिलीभगत, धार्मिक प्रतीक और कई रहस्यमय किरदार जुड़ते जाते हैं।

मीता वशिष्ठ, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, चंदन रॉय और प्रशांत नारायण जैसे कलाकार कहानी में मौजूद हैं, लेकिन इतने सारे किरदारों के बीच असली कहानी कई बार पीछे छूट जाती है।

फिल्म लगातार आपको चौंकाने की कोशिश करती है। समस्या यह है कि कुछ देर बाद ट्विस्ट चौंकाने के बजाय थकाने लगते हैं।

कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग?

तापसी पन्नू ने बानी के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। एक्शन सीक्वेंस में उनकी मेहनत साफ दिखाई देती है। वह किरदार की शारीरिक और भावनात्मक मुश्किलों से पूरी तरह गुजरती नजर आती हैं।

लेकिन अभिनय तभी असर करता है, जब कहानी उसे सहारा दे। यहां कई जगह तापसी जितना ज्यादा भाव देने की कोशिश करती हैं, फिल्म उतनी ही बनावटी लगने लगती है।

इश्वाक सिंह ठीक हैं, लेकिन उनके किरदार को ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिला। जतिन सरना, मीता वशिष्ठ, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी और चंदन रॉय जैसे अच्छे कलाकार भी स्क्रीनप्ले की कमजोरी के आगे ज्यादा असर नहीं छोड़ पाते।

प्रशांत नारायण को स्क्रीन पर बहुत कम वक्त मिलता है, लेकिन उनकी मौजूदगी बाकी कलाकारों के मुकाबले ज्यादा प्रभावशाली लगती है।

कैसा है फिल्म का डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले?

देवाशीष मखीजा की ‘जोरम’ जैसी फिल्म देखने के बाद ‘गांधारी’ से उम्मीद काफी ज्यादा थी। लेकिन यहां निर्देशक अपनी ही कहानी को संभाल नहीं पाए। फिल्म की शुरुआत एक गंभीर क्राइम थ्रिलर की तरह होती है। फिर यह मां की तलाश बनती है, फिर बदले की कहानी और कुछ देर बाद एक्शन फिल्म।

एक मां अपनी बेटी को बचाने के लिए लड़ रही है, इससे ज्यादा सीधी और इमोशनल कहानी क्या होगी? लेकिन फिल्म को शायद सरल रहना मंजूर नहीं था।

स्क्रीनप्ले हर कुछ मिनट में नया मोड़ लाता है। कुछ ट्विस्ट काम करते हैं, लेकिन ज्यादातर सिर्फ कहानी को और उलझाते हैं।

सबसे बड़ी परेशानी बानी का बदलाव है। शुरुआत में वह एक परेशान मां है, लेकिन बाद में फिल्म उसे लगभग सुपर-वुमन बना देती है। वह अकेले कई लोगों से भिड़ती है, मार खाती है और फिर उसी ताकत से वापस खड़ी हो जाती है। पर्दे पर यह देखने में जोश जरूर देता है, लेकिन कहानी के भीतर इसका सफर पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगता।

फिल्म में कई प्रतीक और रूपक भी हैं। ‘गांधारी’ का नाम खुद महाभारत की उस महिला से जुड़ा है, जिसने अपने नेत्रहीन पति के साथ रहने के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। फिल्म इस संदर्भ को अपनी कहानी से जोड़ने की कोशिश करती है, लेकिन कई जगह यह जुड़ाव स्वाभाविक कम और जबरदस्ती का ज्यादा लगता है।

एडिटिंग भी कहानी को बचाने के बजाय और परेशान करती है। समय में आगे-पीछे जाना, अचानक फ्लैशबैक और लगातार खुलते राज कहानी को तेज तो बनाते हैं, लेकिन इमोशन को सांस लेने की जगह नहीं देते।

और फिर आते हैं एक्शन सीन। कुछ सीक्वेंस अच्छे हैं, लेकिन फिल्म कई जगह यथार्थ से इतनी दूर निकल जाती है कि दर्शक किरदार के दर्द से जुड़ने के बजाय अगला स्टंट देखने लगता है।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक?

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तनाव को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। कुछ जगह माहौल बनता है, लेकिन कई बार संगीत खुद दृश्य से ज्यादा जोर से बोलने लगता है।

‘बिटिया’ जैसे भावनात्मक हिस्से कहानी के मूड के साथ चलते हैं, लेकिन संगीत फिल्म की सबसे बड़ी कमी को नहीं ढक पाता, कमजोर कहानी।

फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं?

‘गांधारी’ में आइडिया खराब नहीं है। बल्कि आइडिया काफी अच्छा है। एक मां अपनी बेटी को बचाने के लिए अपनी कमजोरी को हथियार बना ले, यह कहानी दर्शकों को बांध सकती थी।

लेकिन फिल्म ने इस कहानी को इतना घुमा दिया कि भावनाएं रास्ते में कहीं छूट गईं।

तापसी पन्नू ने मेहनत की, एक्शन किया और किरदार को पूरी ताकत दी। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट, असमान टोन और कई जगह बनावटी लगने वाला ड्रामा फिल्म को संभाल नहीं पाता।

‘गांधारी’ में मां का गुस्सा बहुत है, लेकिन कहानी में दम कम। तापसी लड़ती बहुत हैं, पर फिल्म खुद से ही हार जाती है।

………………………………………………

फिल्म गांधारी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए-

नेटफ्लिक्स पर कहानी चोरी का आरोप:राइटर बोले- चोरी कर बनाई गई तापसी पन्नू की फिल्म ‘गांधारी’; कंपनी को भेजा लीगल नोटिस

तापसी पन्नू स्टारर फिल्म ‘गांधारी’ के 3 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्क्रीनराइटर कल्याण बंदी ने नेटफ्लिक्स इंडिया और उसकी कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल पर कहानी चोरी का आरोप लगाया है।

कल्याण का दावा है कि उन्होंने साल 2019 में ‘गांधारी’ नाम की अपनी कहानी मोनिका शेरगिल को ईमेल की थी, जिसे तब रिजेक्ट कर दिया गया था। अब उसी टाइटल और कॉन्सेप्ट पर फिल्म बनाई जा रही है। कल्याण ने नेटफ्लिक्स को लीगल नोटिस भी भेजा है, लेकिन कंपनी ने 11 महीने से इसका कोई जवाब नहीं दिया है। पूरी खबर पढ़िए…

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17 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

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कास्ट- तापसी पन्नू, इश्वाक सिंह, मीता वशिष्ठ, छाया कदम, चंदन रॉय, प्रशांत नारायण

डायरेक्टर- देवाशीष मखीजा

ड्यूरेशन- 1 घंटा 56 मिनट

रेटिंग- 1.5/5

एक मां की बेटी गायब हो जाए, तो उसका दर्द कितना बड़ा होगा, यह समझने के लिए किसी भारी-भरकम डायलॉग की जरूरत नहीं होती। बस उस मां का चेहरा काफी है। ‘गांधारी’ के पास यही सबसे मजबूत हथियार था, एक मां, उसकी खोई हुई बेटी और उसे वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने का जुनून।

लेकिन फिल्म ने इस सीधे और दमदार आइडिया को इतना घुमाया, इतना सजाया और इतने ट्विस्ट डाल दिए कि आखिर में मां की कहानी कम और स्क्रीनप्ले की कसरत ज्यादा नजर आने लगती है।

तापसी पन्नू पूरी ताकत से बानी का किरदार निभाती हैं। वह दौड़ती हैं, लड़ती हैं, मार खाती हैं और फिर उठकर लड़ती हैं। फिल्म उनसे हर तरह का इमोशन निकलवाना चाहती है। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि जिस कहानी के लिए वह इतना सब कर रही हैं, वही कहानी बार-बार उनके पैरों में आकर गिर जाती है।

कैसी है फिल्म की कहानी?

बानी (तापसी पन्नू) और गोकुल (इश्वाक सिंह) अपनी बेटी के साथ सफर पर हैं। सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन अचानक बेटी गायब हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है एक मां की तलाश।

जॉयपुरा नाम के छोटे शहर में पहुंचने के बाद बानी को एहसास होता है कि मामला सिर्फ एक बच्ची के गायब होने का नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क है और शहर में कई चेहरे ऐसे हैं, जिन पर भरोसा करना मुश्किल है।

बानी की आंखों की रोशनी भी चली जाती है। लेकिन यहीं से फिल्म का सबसे दिलचस्प आइडिया सामने आता है, वह अपनी हालत को छिपाकर खुद को अंधा दिखाने लगती है, ताकि उन लोगों तक पहुंच सके जो उसकी बेटी के गायब होने के पीछे हैं।

कहानी में बाल तस्करी, पुलिस, स्थानीय लोगों की मिलीभगत, धार्मिक प्रतीक और कई रहस्यमय किरदार जुड़ते जाते हैं।

मीता वशिष्ठ, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, चंदन रॉय और प्रशांत नारायण जैसे कलाकार कहानी में मौजूद हैं, लेकिन इतने सारे किरदारों के बीच असली कहानी कई बार पीछे छूट जाती है।

फिल्म लगातार आपको चौंकाने की कोशिश करती है। समस्या यह है कि कुछ देर बाद ट्विस्ट चौंकाने के बजाय थकाने लगते हैं।

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तापसी पन्नू ने बानी के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। एक्शन सीक्वेंस में उनकी मेहनत साफ दिखाई देती है। वह किरदार की शारीरिक और भावनात्मक मुश्किलों से पूरी तरह गुजरती नजर आती हैं।

लेकिन अभिनय तभी असर करता है, जब कहानी उसे सहारा दे। यहां कई जगह तापसी जितना ज्यादा भाव देने की कोशिश करती हैं, फिल्म उतनी ही बनावटी लगने लगती है।

इश्वाक सिंह ठीक हैं, लेकिन उनके किरदार को ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिला। जतिन सरना, मीता वशिष्ठ, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी और चंदन रॉय जैसे अच्छे कलाकार भी स्क्रीनप्ले की कमजोरी के आगे ज्यादा असर नहीं छोड़ पाते।

प्रशांत नारायण को स्क्रीन पर बहुत कम वक्त मिलता है, लेकिन उनकी मौजूदगी बाकी कलाकारों के मुकाबले ज्यादा प्रभावशाली लगती है।

कैसा है फिल्म का डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले?

देवाशीष मखीजा की ‘जोरम’ जैसी फिल्म देखने के बाद ‘गांधारी’ से उम्मीद काफी ज्यादा थी। लेकिन यहां निर्देशक अपनी ही कहानी को संभाल नहीं पाए। फिल्म की शुरुआत एक गंभीर क्राइम थ्रिलर की तरह होती है। फिर यह मां की तलाश बनती है, फिर बदले की कहानी और कुछ देर बाद एक्शन फिल्म।

एक मां अपनी बेटी को बचाने के लिए लड़ रही है, इससे ज्यादा सीधी और इमोशनल कहानी क्या होगी? लेकिन फिल्म को शायद सरल रहना मंजूर नहीं था।

स्क्रीनप्ले हर कुछ मिनट में नया मोड़ लाता है। कुछ ट्विस्ट काम करते हैं, लेकिन ज्यादातर सिर्फ कहानी को और उलझाते हैं।

सबसे बड़ी परेशानी बानी का बदलाव है। शुरुआत में वह एक परेशान मां है, लेकिन बाद में फिल्म उसे लगभग सुपर-वुमन बना देती है। वह अकेले कई लोगों से भिड़ती है, मार खाती है और फिर उसी ताकत से वापस खड़ी हो जाती है। पर्दे पर यह देखने में जोश जरूर देता है, लेकिन कहानी के भीतर इसका सफर पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगता।

फिल्म में कई प्रतीक और रूपक भी हैं। ‘गांधारी’ का नाम खुद महाभारत की उस महिला से जुड़ा है, जिसने अपने नेत्रहीन पति के साथ रहने के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। फिल्म इस संदर्भ को अपनी कहानी से जोड़ने की कोशिश करती है, लेकिन कई जगह यह जुड़ाव स्वाभाविक कम और जबरदस्ती का ज्यादा लगता है।

एडिटिंग भी कहानी को बचाने के बजाय और परेशान करती है। समय में आगे-पीछे जाना, अचानक फ्लैशबैक और लगातार खुलते राज कहानी को तेज तो बनाते हैं, लेकिन इमोशन को सांस लेने की जगह नहीं देते।

और फिर आते हैं एक्शन सीन। कुछ सीक्वेंस अच्छे हैं, लेकिन फिल्म कई जगह यथार्थ से इतनी दूर निकल जाती है कि दर्शक किरदार के दर्द से जुड़ने के बजाय अगला स्टंट देखने लगता है।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक?

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तनाव को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। कुछ जगह माहौल बनता है, लेकिन कई बार संगीत खुद दृश्य से ज्यादा जोर से बोलने लगता है।

‘बिटिया’ जैसे भावनात्मक हिस्से कहानी के मूड के साथ चलते हैं, लेकिन संगीत फिल्म की सबसे बड़ी कमी को नहीं ढक पाता, कमजोर कहानी।

फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं?

‘गांधारी’ में आइडिया खराब नहीं है। बल्कि आइडिया काफी अच्छा है। एक मां अपनी बेटी को बचाने के लिए अपनी कमजोरी को हथियार बना ले, यह कहानी दर्शकों को बांध सकती थी।

लेकिन फिल्म ने इस कहानी को इतना घुमा दिया कि भावनाएं रास्ते में कहीं छूट गईं।

तापसी पन्नू ने मेहनत की, एक्शन किया और किरदार को पूरी ताकत दी। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट, असमान टोन और कई जगह बनावटी लगने वाला ड्रामा फिल्म को संभाल नहीं पाता।

‘गांधारी’ में मां का गुस्सा बहुत है, लेकिन कहानी में दम कम। तापसी लड़ती बहुत हैं, पर फिल्म खुद से ही हार जाती है।

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तापसी पन्नू स्टारर फिल्म ‘गांधारी’ के 3 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्क्रीनराइटर कल्याण बंदी ने नेटफ्लिक्स इंडिया और उसकी कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल पर कहानी चोरी का आरोप लगाया है।

कल्याण का दावा है कि उन्होंने साल 2019 में ‘गांधारी’ नाम की अपनी कहानी मोनिका शेरगिल को ईमेल की थी, जिसे तब रिजेक्ट कर दिया गया था। अब उसी टाइटल और कॉन्सेप्ट पर फिल्म बनाई जा रही है। कल्याण ने नेटफ्लिक्स को लीगल नोटिस भी भेजा है, लेकिन कंपनी ने 11 महीने से इसका कोई जवाब नहीं दिया है। पूरी खबर पढ़िए…

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