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Is Earth’s Heartbeat Affecting Human Brain? What is Schumann Resonance | धरती की धड़कन तेज होने से इंसान परेशान, क्या आपके कान में भी बज रही है रहस्यमय घंटी? क्या आपका दिमाग भी हो रहा है हैक? क्या है शुमान रेजोनेंस

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नई दिल्ली: धरती के भीतर से निकलने वाली गूंज अब इंसानी दिमाग के लिए पहेली बनती जा रही है. हाल ही में स्पेस वेदर वॉचडॉग ने पृथ्वी की ‘धड़कन’ में एक अजीब हलचल महसूस की है. इसे शुमान रेजोनेंस कहा जाता है, जो आमतौर पर एक स्थिर लय में रहती है. लेकिन फरवरी के महीने में इसमें आए अचानक उछाल ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. माना जा रहा है कि यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बदलाव लोगों के दिमाग और शरीर को प्रभावित कर रहा है. कई लोग बिना किसी बीमारी के भी कानों में अजीब सी घंटी बजने और सिर भारी होने का अनुभव कर रहे हैं. नासा के मुताबिक, यह फ्रीक्वेंसी धरती की सतह और आयनमंडल के बीच पैदा होती है. जब इसमें उतार-चढ़ाव आता है, तो इसका सीधा संबंध हमारे नर्वस सिस्टम से जुड़ जाता है.

क्या होती है शुमान रेजोनेंस और यह क्यों बढ़ रही है?

शुमान रेजोनेंस को आप धरती का नेचुरल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर मान सकते हैं. यह पूरी दुनिया में होने वाली बिजली की कड़क (Lightning Strikes) से पैदा होती है और बनी रहती है. आमतौर पर इसकी फ्रीक्वेंसी 7.83 हर्ट्ज होती है, जिसे धरती की ‘दिल की धड़कन’ भी कहा जाता है.
हाल ही में मीटीओ-एजेंट (MeteoAgent) नामक स्पेस ट्रैकिंग ऐप ने इस पल्स में भारी उछाल दर्ज किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिक्ष से आने वाली सौर ज्वालाओं यानी सोलर फ्लेयर ने धरती के इस रिदम को डिस्टर्ब कर दिया है.

जब सूरज से निकलने वाली ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराती है, तो यह फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है. इस महीने करीब चार दिन ऐसे रहे जब यह स्केल 5.0 के पार चला गया, जो संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है.

आपके दिमाग और नींद पर इसका क्या असर होता है?

  1. इंसानी दिमाग भी बिजली की लहरों यानी ब्रेन वेव्स पर काम करता है. जब हम रिलैक्स होते हैं या सोने की कोशिश करते हैं, तो हमारा दिमाग ‘थीटा’ वेव्स पैदा करता है. इन वेव्स की फ्रीक्वेंसी 4 से 8 हर्ट्ज के बीच होती है, जो लगभग शुमान रेजोनेंस के बराबर है.
  2. जब धरती की यह फ्रीक्वेंसी अचानक तेज होती है, तो यह हमारे दिमाग के नेचुरल संतुलन को बिगाड़ देती है. इससे लोगों का सर्कैडियन रिदम यानी सोने-जागने का चक्र प्रभावित होता है.
  3. लोग अचानक रात में जाग जाते हैं या उन्हें गहरी नींद नहीं आती. इसके अलावा, ब्रेन फॉग यानी सोचने-समझने में दिक्कत और बेवजह का चिड़चिड़ापन भी इसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डिस्टर्बेंस का नतीजा हो सकता है.

कानों में बजने वाली घंटी का रहस्य क्या है?

आजकल बहुत से लोग ‘टिनिटस’ या कानों में लगातार गूंजने वाली आवाज की शिकायत कर रहे हैं. इसे ‘द हम’ (The Hum) भी कहा जाता है. जब शुमान रेजोनेंस की फ्रीक्वेंसी सामान्य से ऊपर जाती है, तो हमारे कान के भीतरी हिस्से और नसों पर दबाव महसूस होता है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी बड़े ट्रांसफार्मर के पास खड़े होने पर महसूस होता है. जो लोग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सेंसिटिविटी के शिकार हैं, उन्हें चक्कर आना और माइग्रेन जैसा दर्द महसूस हो सकता है. हालांकि विज्ञान अभी इस पर और रिसर्च कर रहा है, लेकिन जापान में हुई एक रिसर्च बताती है कि लो-फ्रीक्वेंसी बदलाव ब्लड प्रेशर को भी प्रभावित कर सकते हैं.

क्या वाकई यह सेहत के लिए खतरनाक है?

वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर अभी एक राय नहीं है. जहां कुछ विशेषज्ञ इसे सीधे तौर पर सेहत से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं कुछ का मानना है कि यह केवल एक इत्तेफाक हो सकता है.

वैज्ञानिकों ने इस हलचल को मापने के लिए 0 से 9 तक का पैमाना बनाया है. 0 का मतलब शांति है और 9 का मतलब एक बड़ा जियोमैग्नेटिक तूफान, जो पावर ग्रिड और सैटेलाइट को भी ठप कर सकता है. इस बार यह स्तर 5 तक पहुंचा है, जो काफी गंभीर माना जाता है.

भले ही इसके पुख्ता सबूत अभी जुटाए जा रहे हों, लेकिन हजारों लोगों की आपबीती इस ओर इशारा करती है कि ब्रह्मांड की यह हलचल हमारे शरीर के भीतर भी कुछ बदल रही है.

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नई दिल्ली: धरती के भीतर से निकलने वाली गूंज अब इंसानी दिमाग के लिए पहेली बनती जा रही है. हाल ही में स्पेस वेदर वॉचडॉग ने पृथ्वी की ‘धड़कन’ में एक अजीब हलचल महसूस की है. इसे शुमान रेजोनेंस कहा जाता है, जो आमतौर पर एक स्थिर लय में रहती है. लेकिन फरवरी के महीने में इसमें आए अचानक उछाल ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. माना जा रहा है कि यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बदलाव लोगों के दिमाग और शरीर को प्रभावित कर रहा है. कई लोग बिना किसी बीमारी के भी कानों में अजीब सी घंटी बजने और सिर भारी होने का अनुभव कर रहे हैं. नासा के मुताबिक, यह फ्रीक्वेंसी धरती की सतह और आयनमंडल के बीच पैदा होती है. जब इसमें उतार-चढ़ाव आता है, तो इसका सीधा संबंध हमारे नर्वस सिस्टम से जुड़ जाता है.

क्या होती है शुमान रेजोनेंस और यह क्यों बढ़ रही है?

शुमान रेजोनेंस को आप धरती का नेचुरल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर मान सकते हैं. यह पूरी दुनिया में होने वाली बिजली की कड़क (Lightning Strikes) से पैदा होती है और बनी रहती है. आमतौर पर इसकी फ्रीक्वेंसी 7.83 हर्ट्ज होती है, जिसे धरती की ‘दिल की धड़कन’ भी कहा जाता है.
हाल ही में मीटीओ-एजेंट (MeteoAgent) नामक स्पेस ट्रैकिंग ऐप ने इस पल्स में भारी उछाल दर्ज किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिक्ष से आने वाली सौर ज्वालाओं यानी सोलर फ्लेयर ने धरती के इस रिदम को डिस्टर्ब कर दिया है.

जब सूरज से निकलने वाली ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराती है, तो यह फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है. इस महीने करीब चार दिन ऐसे रहे जब यह स्केल 5.0 के पार चला गया, जो संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है.

आपके दिमाग और नींद पर इसका क्या असर होता है?

  1. इंसानी दिमाग भी बिजली की लहरों यानी ब्रेन वेव्स पर काम करता है. जब हम रिलैक्स होते हैं या सोने की कोशिश करते हैं, तो हमारा दिमाग ‘थीटा’ वेव्स पैदा करता है. इन वेव्स की फ्रीक्वेंसी 4 से 8 हर्ट्ज के बीच होती है, जो लगभग शुमान रेजोनेंस के बराबर है.
  2. जब धरती की यह फ्रीक्वेंसी अचानक तेज होती है, तो यह हमारे दिमाग के नेचुरल संतुलन को बिगाड़ देती है. इससे लोगों का सर्कैडियन रिदम यानी सोने-जागने का चक्र प्रभावित होता है.
  3. लोग अचानक रात में जाग जाते हैं या उन्हें गहरी नींद नहीं आती. इसके अलावा, ब्रेन फॉग यानी सोचने-समझने में दिक्कत और बेवजह का चिड़चिड़ापन भी इसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डिस्टर्बेंस का नतीजा हो सकता है.

कानों में बजने वाली घंटी का रहस्य क्या है?

आजकल बहुत से लोग ‘टिनिटस’ या कानों में लगातार गूंजने वाली आवाज की शिकायत कर रहे हैं. इसे ‘द हम’ (The Hum) भी कहा जाता है. जब शुमान रेजोनेंस की फ्रीक्वेंसी सामान्य से ऊपर जाती है, तो हमारे कान के भीतरी हिस्से और नसों पर दबाव महसूस होता है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी बड़े ट्रांसफार्मर के पास खड़े होने पर महसूस होता है. जो लोग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सेंसिटिविटी के शिकार हैं, उन्हें चक्कर आना और माइग्रेन जैसा दर्द महसूस हो सकता है. हालांकि विज्ञान अभी इस पर और रिसर्च कर रहा है, लेकिन जापान में हुई एक रिसर्च बताती है कि लो-फ्रीक्वेंसी बदलाव ब्लड प्रेशर को भी प्रभावित कर सकते हैं.

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