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Jaipur Air Pollution Affects Brain Nerves, Reduces Life Span

Jaipur Air Pollution Affects Brain Nerves, Reduces Life Span

राजस्थान में बढ़ता प्रदूषण 8 करोड़ से ज्यादा प्रदेशवासियों की औसत उम्र घटा रहा है। राजधानी जयपुर में तो साल में 20 दिन ही शुद्ध हवा नसीब हो रही है। जहरीली हवा में मौजूद बारीक कण सिर्फ फेफड़े ही नहीं दिमाग की नसों तक पहुंच रहे हैं। किडनी तक डैमेज होने

.

नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) की ताजा रिपोर्ट में यह चौंकानी वाली जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि जयपुर का हर नागरिक अपनी औसत उम्र के 3 साल 10 महीने और 24 दिन सिर्फ जहरीली हवा के कारण कम कर रहा है।

मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए यह खास रिपोर्ट….

खराब क्वालिटी की हवा से राजस्थानियों की औसत उम्र 3 साल कम सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। प्रदेश के लिए वर्ष 2021 से 2025 के बीच प्रदूषण स्तर (AQI- एयर क्वालिटी इंडेक्स) के आंकड़े जुटाए गए।

फिर प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की मात्रा के आधार पर आंकलन किया गया कि ये उम्र पर कितना असर डालते हैं। रिपोर्ट में सामने आया कि जहरीली हवा में इतने खतरनाक कण मौजूद हैं, जो सांस से हमारे शरीर में जा रहे हैं। इससे प्रदेश के हर व्यक्ति की उम्र औसतन 3 साल 3 महीने और 18 दिन घट रही है।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट में राजस्थान का भिवाड़ी प्रदूषण के मामले में देश का 7वां सबसे प्रदूषित शहर रहा था।

जयपुर में रहने वालों की उम्र पर सबसे ज्यादा असर प्रदेश की अनुमानित आबादी 8 करोड़ है। सबसे ज्यादा आबादी राजधानी जयपुर में रहती है। जयपुर में रहने वाले लोग औसत से भी 7 महीने ज्यादा उम्र खो रहे हैं। अगर आप जयपुर में रह रहे हैं, तो लगभग 1,424 दिन प्रदूषण की भेंट चढ़ रहे हैं।

साढ़े चार साल में 450 दिन रही जहरीली हवा इस संकट की गहराई को समझने के लिए पिछले साढ़े चार साल के डेटा पर नजर डालना जरूरी है। 1 जनवरी 2021 से 31 मार्च 2025 के बीच कुल 1,550 दिनों में से करीब 450 दिन वायु गुणवत्ता (AQI) ‘खराब’ (Poor) से ‘बहुत खराब’ (Very Poor) श्रेणी में दर्ज की गई। इसका मतलब यह है कि जयपुर का हर तीसरा दिन प्रदूषण के उस खतरनाक स्तर पर होता है, जिसके संपर्क में लंबे समय तक रहने पर सांस और हार्ट संबंधी रोग हो सकते हैं।

इसके विपरीत, पूरे साढ़े चार साल (1550 दिन) में केवल 81 दिन ही ऐसे थे, जब लोगों को ‘अच्छी’ (Good) हवा नसीब हो सकी। यानी जयपुर वालों को साल में औसत रूप से 20 दिन भी पूरी तरह शुद्ध हवा नसीब नहीं हो रही है।

सिर्फ फेफड़े नहीं, दिमाग और आंखों पर भी हमला यह रिपोर्ट बताती है कि जहरीली हवा आपके शरीर के हर हिस्से को छलनी कर रही है। हवा में मौजूद बारीक कण खून के जरिए दिमाग तक पहुंच रहे हैं। इससे ‘ब्रेन फॉग’, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी हो रही है। लंबे समय में यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों का रिस्क बढ़ा रही है। प्रदूषित हवा के कारण बच्चों में एनीमिया (खून की कमी) और जन्म के समय कम वजन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यह हवा किडनी की कार्य क्षमता को बिगाड़ रही है और डायबिटीज का खतरा बढ़ा रही है।

राजस्थान में प्रदूषण से ऐसे घट रही जिंदगी फैक्ट्रियों से निकलते धुएं, उड़ती धूल और प्रदूषित हवा में सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। इनके अलग-अलग साइज होते हैं। जैसे- PM 2.5, ये सिर के बाल से 30 गुना छोटे होते हैं। WHO के तय मानकों के अनुसार, हवा में PM 2.5 पार्टिकल की संख्या 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या इससे कम ही होनी चाहिए। अगर PM 2.5 की संख्या इससे ज्यादा है तो सांस के जरिए ये सूक्ष्ण कण फेफड़ों में प्रवेश करते हैं। इससे गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

इसी तरह सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाले धुएं, खेतों में जलाए गए कचरे में PM 10 साइज के सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। हवा में इनकी स्टैंडर्ड मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या इससे कम होनी चाहिए। अगर इससे ज्यादा है तो सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से जारी रिपोर्ट में डरावने आंकड़े बताए थे।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से जारी रिपोर्ट में डरावने आंकड़े बताए थे।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (Energy Policy Institute) ने 2025 में PM 2.5 स्तर को आधार बनाकर डेप्थ स्टडी की थी। इसके आधार पर राजस्थान और राजधानी जयपुर का Air Quality Life Index (AQLI) जारी किया था। लाइफ इंडेक्स के जरिए बताया गया कि हवा में पाए गए सूक्ष्म कण उम्र को कितना कम कर सकते हैं। प्रदेश में औसत उम्र लगभग 68.5 वर्ष है।

बजट का 67% पैसा सड़कों पर पानी छिड़कने में उड़ाया हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत बजट जारी होता है। हैरानी की बात यह है कि राजस्थान के शहरों ने प्रदूषण कम करने के नाम पर मिले कुल बजट का 60 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा केवल सड़कों की धूल उड़ने से रोकने, पानी छिड़काव करने में खर्च कर दिया। विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि प्रदूषण सबसे ज्यादा ‘इंडस्ट्रियल एमिशन’ (औद्योगिक धुआं) से होता है। लेकिन उसे नियंत्रित करने के लिए पूरे बजट का मात्र 0.8% हिस्सा ही खर्च किया गया।

खेतों में जलने वाली पराली भी वायु प्रदूषण बढ़ाती है। एक्सपट्‌र्स के अनुसार, धुएं में PM10 पार्टिकल होते हैं।

खेतों में जलने वाली पराली भी वायु प्रदूषण बढ़ाती है। एक्सपट्‌र्स के अनुसार, धुएं में PM10 पार्टिकल होते हैं।

जयपुर का बजट पूरा खर्च फिर भी राहत नहीं जयपुर की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए ₹344.7 करोड़ खर्च किए गए। इसके बावजूद PM10 (धूल के कणों) का स्तर अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। जहां 2017-18 में बेस वैल्यू लगभग 170 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी, वहीं 2021-22 में इसमें गिरावट देखी गई। लेकिन हाल के वर्षों में यह फिर से बढ़कर 140 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के आसपास पहुंच गया है। यह स्तर सरकार द्वारा निर्धारित 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के सुरक्षित मानक से दो गुने से भी अधिक है। इसी तरह उदयपुर में 2024-25 में प्रदूषण 120 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया।

पानी छिड़काव के उपाय नाकाफी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की डायरेक्टर सुनीता नारायण बताती हैं- सिस्टम केवल ‘सतह’ पर काम कर रहा है। सड़कों पर झाड़ू लगाने या पानी छिड़कने से कुछ घंटों के लिए धूल तो दब जाती है, लेकिन हवा में घुला जहरीला धुआं वहीं रहता है। जब तक उद्योगों से निकलने वाले जहर और पुराने वाहनों के धुएं पर ठोस काम नहीं होगा, तब तक जयपुर और राजस्थान के लोगों की उम्र ऐसे ही कम होती रहेगी।

बच्चे-बुजुर्ग हो रहे ज्यादा प्रभावित- एक्सपर्ट जयपुर के अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ. एम.के. गुप्ता बताते हैं- वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा की समस्याओं वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके कारण सांस लेने में दिक्कत, ब्रेन फॉग, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या से जूझ रहे मरीज ज्यादा आते हैं।

डॉ. गुप्ता का कहना है कि प्रदूषित हवा का असर बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक दिख रहा है। बच्चों में एनीमिया, फेफड़ों का कमजोर विकास और कम वजन जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं, जबकि वयस्कों में किडनी से जुड़ी परेशानी, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ता देखा जा रहा है।

कैसे करें बचाव? डॉक्टर गुप्ता के अनुसार, जिन क्षेत्रों में प्रदूषण अधिक है, वहां रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करना चाहिए, पौष्टिक भोजन लेना चाहिए ताकि शरीर की इम्यूनिटी मजबूत बनी रहे। साथ ही बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि प्रदूषण का असर इन पर अधिक तेजी से होता है।

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Jaipur Air Pollution Affects Brain Nerves, Reduces Life Span

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राजस्थान में बढ़ता प्रदूषण 8 करोड़ से ज्यादा प्रदेशवासियों की औसत उम्र घटा रहा है। राजधानी जयपुर में तो साल में 20 दिन ही शुद्ध हवा नसीब हो रही है। जहरीली हवा में मौजूद बारीक कण सिर्फ फेफड़े ही नहीं दिमाग की नसों तक पहुंच रहे हैं। किडनी तक डैमेज होने

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नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) की ताजा रिपोर्ट में यह चौंकानी वाली जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि जयपुर का हर नागरिक अपनी औसत उम्र के 3 साल 10 महीने और 24 दिन सिर्फ जहरीली हवा के कारण कम कर रहा है।

मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए यह खास रिपोर्ट….

खराब क्वालिटी की हवा से राजस्थानियों की औसत उम्र 3 साल कम सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। प्रदेश के लिए वर्ष 2021 से 2025 के बीच प्रदूषण स्तर (AQI- एयर क्वालिटी इंडेक्स) के आंकड़े जुटाए गए।

फिर प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की मात्रा के आधार पर आंकलन किया गया कि ये उम्र पर कितना असर डालते हैं। रिपोर्ट में सामने आया कि जहरीली हवा में इतने खतरनाक कण मौजूद हैं, जो सांस से हमारे शरीर में जा रहे हैं। इससे प्रदेश के हर व्यक्ति की उम्र औसतन 3 साल 3 महीने और 18 दिन घट रही है।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट में राजस्थान का भिवाड़ी प्रदूषण के मामले में देश का 7वां सबसे प्रदूषित शहर रहा था।

जयपुर में रहने वालों की उम्र पर सबसे ज्यादा असर प्रदेश की अनुमानित आबादी 8 करोड़ है। सबसे ज्यादा आबादी राजधानी जयपुर में रहती है। जयपुर में रहने वाले लोग औसत से भी 7 महीने ज्यादा उम्र खो रहे हैं। अगर आप जयपुर में रह रहे हैं, तो लगभग 1,424 दिन प्रदूषण की भेंट चढ़ रहे हैं।

साढ़े चार साल में 450 दिन रही जहरीली हवा इस संकट की गहराई को समझने के लिए पिछले साढ़े चार साल के डेटा पर नजर डालना जरूरी है। 1 जनवरी 2021 से 31 मार्च 2025 के बीच कुल 1,550 दिनों में से करीब 450 दिन वायु गुणवत्ता (AQI) ‘खराब’ (Poor) से ‘बहुत खराब’ (Very Poor) श्रेणी में दर्ज की गई। इसका मतलब यह है कि जयपुर का हर तीसरा दिन प्रदूषण के उस खतरनाक स्तर पर होता है, जिसके संपर्क में लंबे समय तक रहने पर सांस और हार्ट संबंधी रोग हो सकते हैं।

इसके विपरीत, पूरे साढ़े चार साल (1550 दिन) में केवल 81 दिन ही ऐसे थे, जब लोगों को ‘अच्छी’ (Good) हवा नसीब हो सकी। यानी जयपुर वालों को साल में औसत रूप से 20 दिन भी पूरी तरह शुद्ध हवा नसीब नहीं हो रही है।

सिर्फ फेफड़े नहीं, दिमाग और आंखों पर भी हमला यह रिपोर्ट बताती है कि जहरीली हवा आपके शरीर के हर हिस्से को छलनी कर रही है। हवा में मौजूद बारीक कण खून के जरिए दिमाग तक पहुंच रहे हैं। इससे ‘ब्रेन फॉग’, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी हो रही है। लंबे समय में यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों का रिस्क बढ़ा रही है। प्रदूषित हवा के कारण बच्चों में एनीमिया (खून की कमी) और जन्म के समय कम वजन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यह हवा किडनी की कार्य क्षमता को बिगाड़ रही है और डायबिटीज का खतरा बढ़ा रही है।

राजस्थान में प्रदूषण से ऐसे घट रही जिंदगी फैक्ट्रियों से निकलते धुएं, उड़ती धूल और प्रदूषित हवा में सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। इनके अलग-अलग साइज होते हैं। जैसे- PM 2.5, ये सिर के बाल से 30 गुना छोटे होते हैं। WHO के तय मानकों के अनुसार, हवा में PM 2.5 पार्टिकल की संख्या 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या इससे कम ही होनी चाहिए। अगर PM 2.5 की संख्या इससे ज्यादा है तो सांस के जरिए ये सूक्ष्ण कण फेफड़ों में प्रवेश करते हैं। इससे गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

इसी तरह सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाले धुएं, खेतों में जलाए गए कचरे में PM 10 साइज के सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। हवा में इनकी स्टैंडर्ड मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या इससे कम होनी चाहिए। अगर इससे ज्यादा है तो सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से जारी रिपोर्ट में डरावने आंकड़े बताए थे।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 25 फरवरी 2026 को ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2026’ नाम से जारी रिपोर्ट में डरावने आंकड़े बताए थे।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (Energy Policy Institute) ने 2025 में PM 2.5 स्तर को आधार बनाकर डेप्थ स्टडी की थी। इसके आधार पर राजस्थान और राजधानी जयपुर का Air Quality Life Index (AQLI) जारी किया था। लाइफ इंडेक्स के जरिए बताया गया कि हवा में पाए गए सूक्ष्म कण उम्र को कितना कम कर सकते हैं। प्रदेश में औसत उम्र लगभग 68.5 वर्ष है।

बजट का 67% पैसा सड़कों पर पानी छिड़कने में उड़ाया हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत बजट जारी होता है। हैरानी की बात यह है कि राजस्थान के शहरों ने प्रदूषण कम करने के नाम पर मिले कुल बजट का 60 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा केवल सड़कों की धूल उड़ने से रोकने, पानी छिड़काव करने में खर्च कर दिया। विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि प्रदूषण सबसे ज्यादा ‘इंडस्ट्रियल एमिशन’ (औद्योगिक धुआं) से होता है। लेकिन उसे नियंत्रित करने के लिए पूरे बजट का मात्र 0.8% हिस्सा ही खर्च किया गया।

खेतों में जलने वाली पराली भी वायु प्रदूषण बढ़ाती है। एक्सपट्‌र्स के अनुसार, धुएं में PM10 पार्टिकल होते हैं।

खेतों में जलने वाली पराली भी वायु प्रदूषण बढ़ाती है। एक्सपट्‌र्स के अनुसार, धुएं में PM10 पार्टिकल होते हैं।

जयपुर का बजट पूरा खर्च फिर भी राहत नहीं जयपुर की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए ₹344.7 करोड़ खर्च किए गए। इसके बावजूद PM10 (धूल के कणों) का स्तर अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। जहां 2017-18 में बेस वैल्यू लगभग 170 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी, वहीं 2021-22 में इसमें गिरावट देखी गई। लेकिन हाल के वर्षों में यह फिर से बढ़कर 140 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के आसपास पहुंच गया है। यह स्तर सरकार द्वारा निर्धारित 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के सुरक्षित मानक से दो गुने से भी अधिक है। इसी तरह उदयपुर में 2024-25 में प्रदूषण 120 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया।

पानी छिड़काव के उपाय नाकाफी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की डायरेक्टर सुनीता नारायण बताती हैं- सिस्टम केवल ‘सतह’ पर काम कर रहा है। सड़कों पर झाड़ू लगाने या पानी छिड़कने से कुछ घंटों के लिए धूल तो दब जाती है, लेकिन हवा में घुला जहरीला धुआं वहीं रहता है। जब तक उद्योगों से निकलने वाले जहर और पुराने वाहनों के धुएं पर ठोस काम नहीं होगा, तब तक जयपुर और राजस्थान के लोगों की उम्र ऐसे ही कम होती रहेगी।

बच्चे-बुजुर्ग हो रहे ज्यादा प्रभावित- एक्सपर्ट जयपुर के अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ. एम.के. गुप्ता बताते हैं- वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा की समस्याओं वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके कारण सांस लेने में दिक्कत, ब्रेन फॉग, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या से जूझ रहे मरीज ज्यादा आते हैं।

डॉ. गुप्ता का कहना है कि प्रदूषित हवा का असर बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक दिख रहा है। बच्चों में एनीमिया, फेफड़ों का कमजोर विकास और कम वजन जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं, जबकि वयस्कों में किडनी से जुड़ी परेशानी, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ता देखा जा रहा है।

कैसे करें बचाव? डॉक्टर गुप्ता के अनुसार, जिन क्षेत्रों में प्रदूषण अधिक है, वहां रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करना चाहिए, पौष्टिक भोजन लेना चाहिए ताकि शरीर की इम्यूनिटी मजबूत बनी रहे। साथ ही बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि प्रदूषण का असर इन पर अधिक तेजी से होता है।

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