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ONGC Calls UP-Bihar Oil Discovery ‘News Hype’, Says India’s Real Energy Mission Is in Andaman

ONGC Calls UP-Bihar Oil Discovery ‘News Hype’, Says India’s Real Energy Mission Is in Andaman

तेल की बढ़ती कीमतों के बीच देश में बेसिन पर तेल व गैस की खोज के लिए खुदाई चल रही है।

देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के समस्तीपुर में तेल और प्राकृतिक गैस मिलने की चर्चा तेज है। स्थानीय स्तर पर इसे बड़ी ऊर्जा खोज बताया जा रहा है।

.

लेकिन देहरादून स्थित ONGC मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में इस पूरे दावे को तकनीकी तौर पर केवल “न्यूज हाइप” बताया। अधिकारी के मुताबिक, गंगा बेसिन में अब तक ऐसा कोई रिजल्ट नहीं मिला है, जिसे बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट की श्रेणी में रखा जा सके।

उनका कहना है कि असली कहानी देश के पूर्वी छोर यानी अंडमान-निकोबार के गहरे समुद्र में लिखी जा रही है, जहां भारत सरकार की सीधी निगरानी में अरबों रुपए का हाई-रिस्क एक्सप्लोरेशन मिशन चल रहा है।

गंगा बेसिन में क्या मिला, ONGC इसे बड़ा क्यों नहीं मान रहा

अधिकारी के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर 40 हजार क्यूबिक मीटर गैस फ्लो को बड़ी खोज बताया जा रहा है, जबकि ONGC का कुल रोजाना उत्पादन ही करीब 6 से 6.5 करोड़ क्यूबिक मीटर है। उसके सामने यह खोज बेहद छोटी है।

उन्होंने कहा कि मीडिया में 3000 या 3500 मीटर की ड्रिलिंग को बहुत बड़ा दिखाया जा रहा है, जबकि ONGC गुजरात, राजामुंद्री और 30 साल पहले कश्मीर में भी 6000 मीटर तक ड्रिलिंग कर चुकी है। देश में हाइड्रोकार्बन खोज के लिए ONGC ने बेसिन को तीन कैटेगरी में बांटा हुआ है। जिसमें अभी गंगा बेसिन को तीसरी श्रेणी में रखा गया है।

अधिकारी के मुताबिक, जब तक ‘डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स’ किसी खोज को प्रमाणित नहीं करता, तब तक छोटे गैस पॉकेट मिलने का कोई बड़ा कमर्शियल महत्व नहीं माना जाता।

अंडमान में भारत का सबसे बड़ा तेल-गैस मिशन

अधिकारी के मुताबिक, दुनिया में हाल के वर्षों में जितने बड़े तेल और गैस भंडार मिले हैं, उनमें ज्यादातर गहरे समुद्र में मिले हैं। भारत भी अब अंडमान-निकोबार क्षेत्र में उसी मॉडल पर बड़ा मिशन चला रहा है।

यहां एक कुआं खोदने की लागत ₹1100 से ₹1200 करोड़ तक पहुंच रही है। ड्रिलिंग रिग का प्रतिदिन किराया ही करीब ₹5 करोड़ है।

समुद्र में पहले 500 से 1000 मीटर तक केवल पानी की गहराई होती है। इसके बाद समुद्र तल के नीचे करीब 7000 फीट तक पाइपलाइन ले जाकर ड्रिलिंग करनी पड़ती है। मौसम खराब होने पर खतरा और खर्च दोनों कई गुना बढ़ जाते हैं।

यह इलाका भारतीय मुख्य भूमि से इतना दूर है कि हेलीकॉप्टर भी सीधे वहां तक नहीं पहुंच सकते। ONGC ने इसके लिए चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था की है। लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा सहायता के लिए इंडियन नेवी और एयरफोर्स की मदद भी ली जा रही है।

3 प्वॉइंट्स में जानिए अंडमान में अब तक क्या मिला

  • केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक, अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से 9.20 नॉटिकल मील यानी करीब 17 किलोमीटर दूर “श्री विजयपुरम-2” कुएं में प्राकृतिक गैस मिली है।
  • यह खोज 295 मीटर गहरे समुद्र में और 2650 मीटर की टारगेट गहराई पर की गई। शुरुआती परीक्षण में 2212 से 2250 मीटर के बीच गैस फ्लेयरिंग के साथ प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई।
  • गैस के नमूनों को जहाज के जरिए काकीनाडा लाया गया, जहां जांच में इसमें 87% मीथेन पाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को “नेशनल डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन” की घोषणा की थी, जिसे ‘समुद्र मंथन’ नाम दिया गया है।

भारत इतना बड़ा जोखिम क्यों उठा रहा

भारत इस समय अपनी जरूरत का 90% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। प्राकृतिक गैस का इंपोर्ट भी करीब 60% तक पहुंच चुका है। इसी वजह से देश घरेलू खोज पर बड़ा दांव लगा रहा है।

हालांकि तेल और गैस की खोज को इंडस्ट्री में “बिग गैंबलिंग” कहा जाता है, क्योंकि हजारों करोड़ खर्च होने के बाद भी रिजल्ट की गारंटी नहीं होती। अधिकारी के मुताबिक, ₹10,000 करोड़ तक डूबने के डर से कई बड़ी निजी कंपनियां नए ब्लॉक्स की बिडिंग से पीछे हट चुकी हैं। अब बड़े स्तर पर खोज का दारोमदार ONGC पर ही है।

अधिकारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिकी कंपनी एक्सॉन मोबिल ने दक्षिण अमेरिकी देश गयाना के समुद्री क्षेत्र में 58 बार असफल होने के बाद बड़ा तेल भंडार खोजा था। उस खोज ने छोटे से देश की पूरी अर्थव्यवस्था बदल दी।

भारत भी अंडमान क्षेत्र में इसी उम्मीद के साथ बड़ा निवेश कर रहा है, क्योंकि भौगोलिक रूप से यह इलाका इंडोनेशिया के बड़े तेल और गैस भंडारों के करीब माना जाता है।

विदेशों में ONGC की चुनौती भी कम नहीं

अधिकारी के मुताबिक ONGC विदेश लिमिटेड दुनिया के करीब 17 देशों में तेल और गैस ब्लॉक संभाल रही है, लेकिन युद्ध, प्रतिबंध और कूटनीतिक हालात के कारण भारत को इन निवेशों का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।

साल 2021 में ONGC ने ईरान में दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड्स में से एक की खोज की थी, लेकिन कूटनीतिक परिस्थितियों के कारण भारत को वहां डेवलपमेंट राइट्स नहीं मिले।

रूस के तेल ब्लॉक्स में भारत की बड़ी हिस्सेदारी है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वहां से सीधे तेल लाना आसान नहीं होता। कंपनी वहां होने वाले मुनाफे को स्थानीय मार्केट में एडजस्ट करती है।

वहीं सूडान, सीरिया और इराक जैसे देशों में युद्ध और आंतरिक अस्थिरता के कारण ONGC के कई प्रोजेक्ट प्रभावित हैं। मोजाम्बिक में करीब 2 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹16 हजार करोड़ का निवेश भी अस्थिर इलाके में फंसा हुआ है।

बॉम्बे हाई अब भी भारत की सबसे बड़ी ताकत

ONGC का देश में कुल घरेलू उत्पादन करीब 3.5 लाख बैरल प्रतिदिन है। इसमें अकेले बॉम्बे हाई और उसके आसपास के नीलम और बसीन सैटेलाइट फील्ड्स से 2.22 लाख बैरल उत्पादन होता है।

जमीन पर उत्पादन के मामले में गुजरात के अहमदाबाद और महेसाणा ब्लॉक बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के ‘हट्टा फील्ड’ से भी कुछ मात्रा में गैस उत्पादन हो रहा है, लेकिन उसका स्तर अभी सीमित है।

सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम क्यों नहीं करती

जब अधिकारी से पूछा गया कि सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम क्यों नहीं करती, तो उन्होंने कहा कि तेल और गैस की खोज बेहद जोखिम वाला काम है। कई बार हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी कोई रिजल्ट नहीं मिलता।

अधिकारी के मुताबिक, इसी भारी रिस्क और निवेश को संभालने के लिए सरकार को लगातार बड़ा रेवेन्यू चाहिए होता है। सरकार जानबूझकर तेल पर भारी टैक्स लगाती है, ताकि लोग सीमित खपत करें और इलेक्ट्रिक व्हीकल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ शिफ्ट हों।

उन्होंने कहा कि केवल वही खाड़ी देश सस्ता तेल दे सकते हैं, जहां आबादी बहुत कम और उत्पादन बेहद ज्यादा है। भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए यह मॉडल आसान नहीं है।

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देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के समस्तीपुर में तेल और प्राकृतिक गैस मिलने की चर्चा तेज है। स्थानीय स्तर पर इसे बड़ी ऊर्जा खोज बताया जा रहा है।

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लेकिन देहरादून स्थित ONGC मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में इस पूरे दावे को तकनीकी तौर पर केवल “न्यूज हाइप” बताया। अधिकारी के मुताबिक, गंगा बेसिन में अब तक ऐसा कोई रिजल्ट नहीं मिला है, जिसे बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट की श्रेणी में रखा जा सके।

उनका कहना है कि असली कहानी देश के पूर्वी छोर यानी अंडमान-निकोबार के गहरे समुद्र में लिखी जा रही है, जहां भारत सरकार की सीधी निगरानी में अरबों रुपए का हाई-रिस्क एक्सप्लोरेशन मिशन चल रहा है।

गंगा बेसिन में क्या मिला, ONGC इसे बड़ा क्यों नहीं मान रहा

अधिकारी के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर 40 हजार क्यूबिक मीटर गैस फ्लो को बड़ी खोज बताया जा रहा है, जबकि ONGC का कुल रोजाना उत्पादन ही करीब 6 से 6.5 करोड़ क्यूबिक मीटर है। उसके सामने यह खोज बेहद छोटी है।

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अधिकारी के मुताबिक, जब तक ‘डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स’ किसी खोज को प्रमाणित नहीं करता, तब तक छोटे गैस पॉकेट मिलने का कोई बड़ा कमर्शियल महत्व नहीं माना जाता।

अंडमान में भारत का सबसे बड़ा तेल-गैस मिशन

अधिकारी के मुताबिक, दुनिया में हाल के वर्षों में जितने बड़े तेल और गैस भंडार मिले हैं, उनमें ज्यादातर गहरे समुद्र में मिले हैं। भारत भी अब अंडमान-निकोबार क्षेत्र में उसी मॉडल पर बड़ा मिशन चला रहा है।

यहां एक कुआं खोदने की लागत ₹1100 से ₹1200 करोड़ तक पहुंच रही है। ड्रिलिंग रिग का प्रतिदिन किराया ही करीब ₹5 करोड़ है।

समुद्र में पहले 500 से 1000 मीटर तक केवल पानी की गहराई होती है। इसके बाद समुद्र तल के नीचे करीब 7000 फीट तक पाइपलाइन ले जाकर ड्रिलिंग करनी पड़ती है। मौसम खराब होने पर खतरा और खर्च दोनों कई गुना बढ़ जाते हैं।

यह इलाका भारतीय मुख्य भूमि से इतना दूर है कि हेलीकॉप्टर भी सीधे वहां तक नहीं पहुंच सकते। ONGC ने इसके लिए चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था की है। लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा सहायता के लिए इंडियन नेवी और एयरफोर्स की मदद भी ली जा रही है।

3 प्वॉइंट्स में जानिए अंडमान में अब तक क्या मिला

  • केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक, अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से 9.20 नॉटिकल मील यानी करीब 17 किलोमीटर दूर “श्री विजयपुरम-2” कुएं में प्राकृतिक गैस मिली है।
  • यह खोज 295 मीटर गहरे समुद्र में और 2650 मीटर की टारगेट गहराई पर की गई। शुरुआती परीक्षण में 2212 से 2250 मीटर के बीच गैस फ्लेयरिंग के साथ प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई।
  • गैस के नमूनों को जहाज के जरिए काकीनाडा लाया गया, जहां जांच में इसमें 87% मीथेन पाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को “नेशनल डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन” की घोषणा की थी, जिसे ‘समुद्र मंथन’ नाम दिया गया है।

भारत इतना बड़ा जोखिम क्यों उठा रहा

भारत इस समय अपनी जरूरत का 90% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। प्राकृतिक गैस का इंपोर्ट भी करीब 60% तक पहुंच चुका है। इसी वजह से देश घरेलू खोज पर बड़ा दांव लगा रहा है।

हालांकि तेल और गैस की खोज को इंडस्ट्री में “बिग गैंबलिंग” कहा जाता है, क्योंकि हजारों करोड़ खर्च होने के बाद भी रिजल्ट की गारंटी नहीं होती। अधिकारी के मुताबिक, ₹10,000 करोड़ तक डूबने के डर से कई बड़ी निजी कंपनियां नए ब्लॉक्स की बिडिंग से पीछे हट चुकी हैं। अब बड़े स्तर पर खोज का दारोमदार ONGC पर ही है।

अधिकारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिकी कंपनी एक्सॉन मोबिल ने दक्षिण अमेरिकी देश गयाना के समुद्री क्षेत्र में 58 बार असफल होने के बाद बड़ा तेल भंडार खोजा था। उस खोज ने छोटे से देश की पूरी अर्थव्यवस्था बदल दी।

भारत भी अंडमान क्षेत्र में इसी उम्मीद के साथ बड़ा निवेश कर रहा है, क्योंकि भौगोलिक रूप से यह इलाका इंडोनेशिया के बड़े तेल और गैस भंडारों के करीब माना जाता है।

विदेशों में ONGC की चुनौती भी कम नहीं

अधिकारी के मुताबिक ONGC विदेश लिमिटेड दुनिया के करीब 17 देशों में तेल और गैस ब्लॉक संभाल रही है, लेकिन युद्ध, प्रतिबंध और कूटनीतिक हालात के कारण भारत को इन निवेशों का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।

साल 2021 में ONGC ने ईरान में दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड्स में से एक की खोज की थी, लेकिन कूटनीतिक परिस्थितियों के कारण भारत को वहां डेवलपमेंट राइट्स नहीं मिले।

रूस के तेल ब्लॉक्स में भारत की बड़ी हिस्सेदारी है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वहां से सीधे तेल लाना आसान नहीं होता। कंपनी वहां होने वाले मुनाफे को स्थानीय मार्केट में एडजस्ट करती है।

वहीं सूडान, सीरिया और इराक जैसे देशों में युद्ध और आंतरिक अस्थिरता के कारण ONGC के कई प्रोजेक्ट प्रभावित हैं। मोजाम्बिक में करीब 2 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹16 हजार करोड़ का निवेश भी अस्थिर इलाके में फंसा हुआ है।

बॉम्बे हाई अब भी भारत की सबसे बड़ी ताकत

ONGC का देश में कुल घरेलू उत्पादन करीब 3.5 लाख बैरल प्रतिदिन है। इसमें अकेले बॉम्बे हाई और उसके आसपास के नीलम और बसीन सैटेलाइट फील्ड्स से 2.22 लाख बैरल उत्पादन होता है।

जमीन पर उत्पादन के मामले में गुजरात के अहमदाबाद और महेसाणा ब्लॉक बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के ‘हट्टा फील्ड’ से भी कुछ मात्रा में गैस उत्पादन हो रहा है, लेकिन उसका स्तर अभी सीमित है।

सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम क्यों नहीं करती

जब अधिकारी से पूछा गया कि सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम क्यों नहीं करती, तो उन्होंने कहा कि तेल और गैस की खोज बेहद जोखिम वाला काम है। कई बार हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी कोई रिजल्ट नहीं मिलता।

अधिकारी के मुताबिक, इसी भारी रिस्क और निवेश को संभालने के लिए सरकार को लगातार बड़ा रेवेन्यू चाहिए होता है। सरकार जानबूझकर तेल पर भारी टैक्स लगाती है, ताकि लोग सीमित खपत करें और इलेक्ट्रिक व्हीकल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ शिफ्ट हों।

उन्होंने कहा कि केवल वही खाड़ी देश सस्ता तेल दे सकते हैं, जहां आबादी बहुत कम और उत्पादन बेहद ज्यादा है। भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए यह मॉडल आसान नहीं है।

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