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Paresh Rawal Birthday Interesting Facts; Hera Pheri Baburao | Comedy Movies

Paresh Rawal Birthday Interesting Facts; Hera Pheri Baburao | Comedy Movies

5 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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परेश रावल का बचपन से ही थिएटर की तरफ झुकाव था।

परेश रावल का नाम सुनते ही लोगों को बाबूराव की कॉमिक टाइमिंग याद आती है, लेकिन उनका करियर सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं रहा। एक दौर में उनके खतरनाक विलेन किरदारों से लोग असल जिंदगी में भी डरने लगे थे। फ्लाइट में लोग उनके पास बैठने से कतराते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे।

इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने कॉमेडी की तरफ रुख किया और बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू जैसे किरदारों से कल्ट स्टार बन गए। हाल ही में उन्होंने स्वीकार किया कि गुस्से में एक बार उन्होंने एक शख्स का सिर पत्थर से फोड़ दिया था, जिसका उन्हें आज पछतावा है। थिएटर, फिल्मों और राजनीति में वह हमेशा अपने बेबाक अंदाज के लिए चर्चा में रहे।

आज परेश रावल 71वां जन्मदिन मना रहे हैं। जानते हैं उनके करियर और जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

सिर्फ कॉमेडियन नहीं, हर किरदार के मास्टर हैं

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपने किरदारों को हमेशा के लिए लोगों की यादों में बसा देते हैं। परेश रावल उन्हीं अभिनेताओं में शामिल हैं। कॉमेडी, विलेन, गंभीर किरदार, सामाजिक फिल्में और ऐतिहासिक भूमिकाओं में उन्होंने खुद को साबित किया।

बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू, कानजी मेहता और टिक्कू जैसे किरदार आज भी लोगों की जुबान पर हैं। परेश रावल हर किरदार के लिए अलग तैयारी करते थे और उसी हिसाब से बॉडी लैंग्वेज, आवाज और एक्सप्रेशन बदल लेते थे।

प्रिंसिपल के केबिन में नकली पिता का थप्पड़

परेश रावल का अभिनय सफर थिएटर से शुरू हुआ। कॉलेज के दिनों में उन्हें नाटकों का शौक लग गया था। वह अक्सर क्लास छोड़कर थिएटर रिहर्सल और कैंटीन में समय बिताते थे। अटेंडेंस कम होने पर प्रिंसिपल ने उन्हें माता-पिता को बुलाने के लिए कहा।

तब वह अपने इलाके के एक उम्रदराज दोस्त को नकली पिता बनाकर कॉलेज ले गए। शिकायत सुनते ही उस दोस्त ने एक्टिंग करते हुए उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया। प्रिंसिपल घबरा गए और बोले, “मारो मत, लड़का बहुत अच्छा है, कॉलेज के लिए ट्रॉफी जीतता है।”

गुस्से में एक शख्स को पीट दिया

थिएटर के दिनों में परेश रावल अपने गुस्से के लिए भी जाने जाते थे। राज शमनी के पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि एक नाटक के दौरान दर्शकों में बैठा एक व्यक्ति लगातार अभद्र टिप्पणियां कर रहा था। गुस्से में वह स्टेज से नीचे उतर गए और उस व्यक्ति को पीट दिया।

थिएटर में हंगामा मच गया और शो रोकना पड़ा। थिएटर मालिक इतने नाराज हुए कि उन्होंने भविष्य में वहां परफॉर्म करने की अनुमति देने से मना कर दिया था।

इसी इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि एक बार गुस्से में उन्होंने किसी व्यक्ति के सिर पर पत्थर मार दिया था। बाद में उन्हें पछतावा हुआ और उन्होंने उस व्यक्ति से सुलह भी की।

विलेन की इमेज से डरने लगे थे लोग

90 के दशक में परेश रावल ने ‘राम लखन’, ‘कब्जा’ और ‘मोहरा’ जैसी फिल्मों में इतने खतरनाक विलेन रोल किए कि लोग असल जिंदगी में भी उनसे डरने लगे थे। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन, भारी आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस की वजह से दर्शक उन्हें डरावना मानने लगे थे।

फ्लाइट और पब्लिक प्लेस में लोग उनके पास बैठने से डरते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे। इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने बाद में कॉमेडी किरदारों की तरफ रुख किया।

फिल्म ‘सर’ में परेश रावल ने अंडरवर्ल्ड डॉन वेलजीभाई पाटेकर का किरदार निभाया। यह उनके शुरुआती करियर के सबसे दमदार नेगेटिव रोल्स में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

दिलवाले में परेश रावल ने मामा ठाकुर का किरदार निभाया था। इस रोल में उनका क्रूर और बेरहम अंदाज दर्शकों को काफी डरावना लगा। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत बने।

रोल की तैयारी के लिए असली किन्नर से मिले

फिल्म ‘तमन्ना’ में परेश रावल ने एक किन्नर का किरदार निभाया, जिसे उनके करियर के सबसे संवेदनशील रोल्स में गिना जाता है। इस रोल की तैयारी के लिए वह असली किन्नरों से मिले थे। उन्होंने उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का तरीका और भावनाओं को करीब से समझा। बाद में उन्होंने कहा था कि यह किरदार उन्हें अंदर तक हिला गया था।

सरदार वल्लभभाई पटेल का किरदार निभाना सबसे मुश्किल था

फिल्म सरदार में उन्होंने भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका निभाई। इस रोल के लिए उन्होंने सरदार पटेल के भाषण, चाल-ढाल और बॉडी लैंग्वेज पर गहराई से काम किया।

उन्होंने कई इंटरव्यू में कहा था कि ऐतिहासिक किरदार निभाना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि लोग उस शख्सियत को पहले से जानते हैं और छोटी गलती पकड़ लेते हैं।

‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल।

‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल।

मीम कल्चर का हिस्सा बने, तो कभी किरदार गले का फंदा बन गया

1994 में आई फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल ने सीधे-सादे रामगोपाल बाजाज और चालाक विलेन तेजा का डबल रोल निभाया। “तेजा मैं हूं, मार्क इधर है” जैसे डायलॉग बाद में मीम कल्चर का हिस्सा बन गए।

हेरा फेरी का बाबूराव परेश रावल के करियर का सबसे आइकॉनिक किरदार माना जाता है। मोटा चश्मा, धोती-कुर्ता, टूटी हिंदी और शानदार कॉमिक टाइमिंग ने इस किरदार को कल्ट बना दिया। बाबूराव को आम आदमी जैसा दिखाने के लिए परेश रावल ने चार्ली चैपलिन और आर.के. लक्ष्मण के कॉमन मैन से प्रेरणा ली थी।

फिल्म का मशहूर सीन, जिसमें बाबूराव पेइंग गेस्ट को सलाह देता है कि “टॉयलेट का दरवाजा टूटा है, अंदर जाओ तो गाना गाया करो”, असल में परेश रावल का ऑन-द-स्पॉट इम्प्रोवाइजेशन था।

हालांकि इस किरदार की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि बाद में परेश रावल ने कहा था कि बाबूराव उनके लिए “गले का फंदा” बन गया, क्योंकि लोग उन्हें उसी तरह के रोल्स में देखने लगे थे।

डॉ. घुंघरू से मस्तान भाई तक, परेश रावल के आइकॉनिक रोल

हंगामा में परेश रावल ने एक अमीर, शक्की और भ्रमित बिजनेसमैन का किरदार निभाया। गलतफहमियों और शक से पैदा हुई कॉमेडी दर्शकों को खूब पसंद आई। उनकी एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी आज भी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

आवारा पागल दीवाना में उनका गैंगस्टर-कॉमेडी अवतार खूब पसंद किया गया। मस्तान भाई के किरदार में उन्होंने गैंगस्टर स्टाइल और कॉमिक टाइमिंग का बेहतरीन मिश्रण दिखाया। वहीं, वेलकम में डॉ. घुंघरू के किरदार में उन्होंने डरे हुए लेकिन लालची डॉक्टर की भूमिका निभाई। उनकी कॉमिक टाइमिंग फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी।

गंभीर और सामाजिक फिल्मों में असरदार अभिनय

‘ओमजी- ओह माय गॉड’ में परेश रावल ने नास्तिक दुकानदार कानजी लालजी मेहता का किरदार निभाया, जो धर्म के नाम पर चल रहे कारोबार को कोर्ट तक ले जाता है। इस रोल में उन्होंने थिएटर स्टाइल की एक्टिंग अपनाई। उनके संवादों में सादगी, व्यंग्य और गहराई नजर आई।

उन्होंने कहा था कि इस फिल्म के बाद उन्हें अलग तरह के रोल मिलने शुरू हुए और उनकी इमेज सिर्फ कॉमेडियन तक सीमित नहीं रही। हालांकि फिल्म को लेकर विवाद भी हुए। निर्देशक उमेश शुक्ला ने बताया था कि रिलीज के दौरान उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं।

‘टेबल नंबर 21’ के मोनोलॉग ने चौंकाया, ‘उरी’ में दिखा रणनीतिक अंदाज

फिल्म ‘टेबल नंबर 21’ में परेश रावल ने रहस्यमयी और खतरनाक व्यक्ति का किरदार निभाया। शांत चेहरे के पीछे छिपे गुस्से और दर्द को उन्होंने प्रभावशाली तरीके से दिखाया। फिल्म का उनका क्लाइमैक्स मोनोलॉग काफी चर्चित हुआ और सोशल Media पर इसे उनके सबसे अंडररेटेड रोल्स में गिना जाता है।

वहीं, उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से प्रेरित किरदार निभाया। फिल्म में उनका शांत लेकिन रणनीतिक अंदाज दर्शकों को पसंद आया।

फिल्मों से ज्यादा बयानों पर घिरे

परेश रावल अपनी दमदार एक्टिंग और यादगार किरदारों के साथ कई बार विवादित बयानों को लेकर भी सुर्खियों में रहे। राजनीति, धर्म, सामाजिक मुद्दों और चुनावी भाषणों में दिए गए उनके कई बयान सोशल मीडिया पर विवाद का कारण बने। कई मामलों में उन्हें आलोचनाओं, कानूनी शिकायतों और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा।

सबसे ज्यादा विवाद उनके 2022 के बंगालियों वाले बयान को लेकर हुआ था। सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया गया, राजनीतिक दलों ने विरोध किया और कोलकाता में शिकायत दर्ज हुई। कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसे उनके करियर का सबसे बड़ा सार्वजनिक विवाद बताया गया।

बंगालियों पर टिप्पणी: सबसे ज्यादा विवादित बयान

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान परेश रावल ने महंगाई, गैस सिलेंडर और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर बोलते हुए बंगालियों, रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को लेकर टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि “गैस सिलेंडर महंगे हैं, लेकिन पड़ोस में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रहेंगे तो क्या करेंगे? बंगाली आपके लिए मछली पकाएंगे?” इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

इस बयान के बाद बंगाली समुदाय और विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। CPI(M) नेता मोहम्मद सलीम ने कोलकाता में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उनका बयान सामाजिक सौहार्द बिगाड़ सकता है।

विवाद बढ़ने के बाद परेश रावल ने ट्विटर पर सफाई देते हुए कहा कि उनका इशारा “अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों” की तरफ था, न कि पूरे बंगाली समुदाय की तरफ। उन्होंने लिखा कि अगर किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह माफी मांगते हैं।

अरुंधति रॉय पर ट्वीट से मचा हंगामा

साल 2017 में लेखिका अरुंधति रॉय को लेकर किया गया उनका ट्वीट भी विवादों में रहा। कश्मीर में सेना द्वारा एक युवक को जीप से बांधने वाली घटना पर देशभर में बहस चल रही थी। इसी दौरान परेश रावल ने ट्वीट किया था कि “पत्थरबाज की जगह अरुंधति रॉय को जीप से बांधो।”

इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ। कई पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इसे हिंसा को बढ़ावा देने वाला बयान बताया। ट्विटर पर उनके खिलाफ कैंपेन चलने लगे। बाद में परेश रावल ने कहा कि उनका ट्वीट व्यंग्य था और उसे गलत तरीके से पेश किया गया।

धर्म और इतिहास से जुड़े बयानों पर विवाद

परेश रावल कई बार धर्म और इतिहास से जुड़े मुद्दों पर विवादों में रहे हैं। 2017 में ताजमहल को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के दौरान उन्होंने ट्वीट किया था कि “ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है” जैसी सोच रखने वालों को समझना चाहिए कि इतिहास को सिर्फ राजनीति से नहीं देखा जा सकता।

बाद में अपनी फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा कि वह “खोखले विवादों” के खिलाफ हैं और फिल्म का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ाना नहीं है।

फिल्म को लेकर कुछ जनहित याचिकाएं भी दायर हुई थीं। आरोप लगाया गया था कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को प्रभावित कर सकती है। इस पर परेश रावल ने सफाई दी कि फिल्म का मकसद इतिहास के एक पक्ष को दिखाना है, न कि सांप्रदायिक विवाद पैदा करना।

परेश रावल 2014 से 2019 तक सांसद रहे।

परेश रावल 2014 से 2019 तक सांसद रहे।

राजनीति में आने के बाद बढ़ी आलोचना

भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने और अहमदाबाद पूर्व सीट से सांसद बनने के बाद परेश रावल के बयानों पर ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने लगीं। उनके ट्वीट्स और सार्वजनिक टिप्पणियां अक्सर टीवी डिबेट और सोशल मीडिया बहस का हिस्सा बनीं।

समर्थकों ने उन्हें बेबाक और राष्ट्रवादी छवि वाला अभिनेता बताया, जबकि आलोचकों ने कहा कि वरिष्ठ अभिनेता और पूर्व सांसद होने के नाते उन्हें अधिक जिम्मेदारी से बयान देने चाहिए।

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और आलोचना

परेश रावल लंबे समय तक ट्विटर पर सक्रिय रहे। धर्म, राष्ट्रवाद, चुनाव और सामाजिक मुद्दों पर उनके ट्वीट्स अक्सर वायरल होते रहे। कई बार उनके समर्थन में ट्रेंड चले, तो कई बार उन्हें ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ा।

हालांकि कुछ मामलों में उन्होंने सफाई दी और माफी भी मांगी। खासकर बंगाली विवाद के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय का अपमान करना नहीं था।

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5 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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परेश रावल का बचपन से ही थिएटर की तरफ झुकाव था।

परेश रावल का नाम सुनते ही लोगों को बाबूराव की कॉमिक टाइमिंग याद आती है, लेकिन उनका करियर सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं रहा। एक दौर में उनके खतरनाक विलेन किरदारों से लोग असल जिंदगी में भी डरने लगे थे। फ्लाइट में लोग उनके पास बैठने से कतराते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे।

इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने कॉमेडी की तरफ रुख किया और बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू जैसे किरदारों से कल्ट स्टार बन गए। हाल ही में उन्होंने स्वीकार किया कि गुस्से में एक बार उन्होंने एक शख्स का सिर पत्थर से फोड़ दिया था, जिसका उन्हें आज पछतावा है। थिएटर, फिल्मों और राजनीति में वह हमेशा अपने बेबाक अंदाज के लिए चर्चा में रहे।

आज परेश रावल 71वां जन्मदिन मना रहे हैं। जानते हैं उनके करियर और जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

सिर्फ कॉमेडियन नहीं, हर किरदार के मास्टर हैं

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपने किरदारों को हमेशा के लिए लोगों की यादों में बसा देते हैं। परेश रावल उन्हीं अभिनेताओं में शामिल हैं। कॉमेडी, विलेन, गंभीर किरदार, सामाजिक फिल्में और ऐतिहासिक भूमिकाओं में उन्होंने खुद को साबित किया।

बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू, कानजी मेहता और टिक्कू जैसे किरदार आज भी लोगों की जुबान पर हैं। परेश रावल हर किरदार के लिए अलग तैयारी करते थे और उसी हिसाब से बॉडी लैंग्वेज, आवाज और एक्सप्रेशन बदल लेते थे।

प्रिंसिपल के केबिन में नकली पिता का थप्पड़

परेश रावल का अभिनय सफर थिएटर से शुरू हुआ। कॉलेज के दिनों में उन्हें नाटकों का शौक लग गया था। वह अक्सर क्लास छोड़कर थिएटर रिहर्सल और कैंटीन में समय बिताते थे। अटेंडेंस कम होने पर प्रिंसिपल ने उन्हें माता-पिता को बुलाने के लिए कहा।

तब वह अपने इलाके के एक उम्रदराज दोस्त को नकली पिता बनाकर कॉलेज ले गए। शिकायत सुनते ही उस दोस्त ने एक्टिंग करते हुए उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया। प्रिंसिपल घबरा गए और बोले, “मारो मत, लड़का बहुत अच्छा है, कॉलेज के लिए ट्रॉफी जीतता है।”

गुस्से में एक शख्स को पीट दिया

थिएटर के दिनों में परेश रावल अपने गुस्से के लिए भी जाने जाते थे। राज शमनी के पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि एक नाटक के दौरान दर्शकों में बैठा एक व्यक्ति लगातार अभद्र टिप्पणियां कर रहा था। गुस्से में वह स्टेज से नीचे उतर गए और उस व्यक्ति को पीट दिया।

थिएटर में हंगामा मच गया और शो रोकना पड़ा। थिएटर मालिक इतने नाराज हुए कि उन्होंने भविष्य में वहां परफॉर्म करने की अनुमति देने से मना कर दिया था।

इसी इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि एक बार गुस्से में उन्होंने किसी व्यक्ति के सिर पर पत्थर मार दिया था। बाद में उन्हें पछतावा हुआ और उन्होंने उस व्यक्ति से सुलह भी की।

विलेन की इमेज से डरने लगे थे लोग

90 के दशक में परेश रावल ने ‘राम लखन’, ‘कब्जा’ और ‘मोहरा’ जैसी फिल्मों में इतने खतरनाक विलेन रोल किए कि लोग असल जिंदगी में भी उनसे डरने लगे थे। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन, भारी आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस की वजह से दर्शक उन्हें डरावना मानने लगे थे।

फ्लाइट और पब्लिक प्लेस में लोग उनके पास बैठने से डरते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे। इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने बाद में कॉमेडी किरदारों की तरफ रुख किया।

फिल्म ‘सर’ में परेश रावल ने अंडरवर्ल्ड डॉन वेलजीभाई पाटेकर का किरदार निभाया। यह उनके शुरुआती करियर के सबसे दमदार नेगेटिव रोल्स में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

दिलवाले में परेश रावल ने मामा ठाकुर का किरदार निभाया था। इस रोल में उनका क्रूर और बेरहम अंदाज दर्शकों को काफी डरावना लगा। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत बने।

रोल की तैयारी के लिए असली किन्नर से मिले

फिल्म ‘तमन्ना’ में परेश रावल ने एक किन्नर का किरदार निभाया, जिसे उनके करियर के सबसे संवेदनशील रोल्स में गिना जाता है। इस रोल की तैयारी के लिए वह असली किन्नरों से मिले थे। उन्होंने उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का तरीका और भावनाओं को करीब से समझा। बाद में उन्होंने कहा था कि यह किरदार उन्हें अंदर तक हिला गया था।

सरदार वल्लभभाई पटेल का किरदार निभाना सबसे मुश्किल था

फिल्म सरदार में उन्होंने भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका निभाई। इस रोल के लिए उन्होंने सरदार पटेल के भाषण, चाल-ढाल और बॉडी लैंग्वेज पर गहराई से काम किया।

उन्होंने कई इंटरव्यू में कहा था कि ऐतिहासिक किरदार निभाना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि लोग उस शख्सियत को पहले से जानते हैं और छोटी गलती पकड़ लेते हैं।

‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल।

‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल।

मीम कल्चर का हिस्सा बने, तो कभी किरदार गले का फंदा बन गया

1994 में आई फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल ने सीधे-सादे रामगोपाल बाजाज और चालाक विलेन तेजा का डबल रोल निभाया। “तेजा मैं हूं, मार्क इधर है” जैसे डायलॉग बाद में मीम कल्चर का हिस्सा बन गए।

हेरा फेरी का बाबूराव परेश रावल के करियर का सबसे आइकॉनिक किरदार माना जाता है। मोटा चश्मा, धोती-कुर्ता, टूटी हिंदी और शानदार कॉमिक टाइमिंग ने इस किरदार को कल्ट बना दिया। बाबूराव को आम आदमी जैसा दिखाने के लिए परेश रावल ने चार्ली चैपलिन और आर.के. लक्ष्मण के कॉमन मैन से प्रेरणा ली थी।

फिल्म का मशहूर सीन, जिसमें बाबूराव पेइंग गेस्ट को सलाह देता है कि “टॉयलेट का दरवाजा टूटा है, अंदर जाओ तो गाना गाया करो”, असल में परेश रावल का ऑन-द-स्पॉट इम्प्रोवाइजेशन था।

हालांकि इस किरदार की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि बाद में परेश रावल ने कहा था कि बाबूराव उनके लिए “गले का फंदा” बन गया, क्योंकि लोग उन्हें उसी तरह के रोल्स में देखने लगे थे।

डॉ. घुंघरू से मस्तान भाई तक, परेश रावल के आइकॉनिक रोल

हंगामा में परेश रावल ने एक अमीर, शक्की और भ्रमित बिजनेसमैन का किरदार निभाया। गलतफहमियों और शक से पैदा हुई कॉमेडी दर्शकों को खूब पसंद आई। उनकी एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी आज भी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

आवारा पागल दीवाना में उनका गैंगस्टर-कॉमेडी अवतार खूब पसंद किया गया। मस्तान भाई के किरदार में उन्होंने गैंगस्टर स्टाइल और कॉमिक टाइमिंग का बेहतरीन मिश्रण दिखाया। वहीं, वेलकम में डॉ. घुंघरू के किरदार में उन्होंने डरे हुए लेकिन लालची डॉक्टर की भूमिका निभाई। उनकी कॉमिक टाइमिंग फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी।

गंभीर और सामाजिक फिल्मों में असरदार अभिनय

‘ओमजी- ओह माय गॉड’ में परेश रावल ने नास्तिक दुकानदार कानजी लालजी मेहता का किरदार निभाया, जो धर्म के नाम पर चल रहे कारोबार को कोर्ट तक ले जाता है। इस रोल में उन्होंने थिएटर स्टाइल की एक्टिंग अपनाई। उनके संवादों में सादगी, व्यंग्य और गहराई नजर आई।

उन्होंने कहा था कि इस फिल्म के बाद उन्हें अलग तरह के रोल मिलने शुरू हुए और उनकी इमेज सिर्फ कॉमेडियन तक सीमित नहीं रही। हालांकि फिल्म को लेकर विवाद भी हुए। निर्देशक उमेश शुक्ला ने बताया था कि रिलीज के दौरान उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं।

‘टेबल नंबर 21’ के मोनोलॉग ने चौंकाया, ‘उरी’ में दिखा रणनीतिक अंदाज

फिल्म ‘टेबल नंबर 21’ में परेश रावल ने रहस्यमयी और खतरनाक व्यक्ति का किरदार निभाया। शांत चेहरे के पीछे छिपे गुस्से और दर्द को उन्होंने प्रभावशाली तरीके से दिखाया। फिल्म का उनका क्लाइमैक्स मोनोलॉग काफी चर्चित हुआ और सोशल Media पर इसे उनके सबसे अंडररेटेड रोल्स में गिना जाता है।

वहीं, उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से प्रेरित किरदार निभाया। फिल्म में उनका शांत लेकिन रणनीतिक अंदाज दर्शकों को पसंद आया।

फिल्मों से ज्यादा बयानों पर घिरे

परेश रावल अपनी दमदार एक्टिंग और यादगार किरदारों के साथ कई बार विवादित बयानों को लेकर भी सुर्खियों में रहे। राजनीति, धर्म, सामाजिक मुद्दों और चुनावी भाषणों में दिए गए उनके कई बयान सोशल मीडिया पर विवाद का कारण बने। कई मामलों में उन्हें आलोचनाओं, कानूनी शिकायतों और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा।

सबसे ज्यादा विवाद उनके 2022 के बंगालियों वाले बयान को लेकर हुआ था। सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया गया, राजनीतिक दलों ने विरोध किया और कोलकाता में शिकायत दर्ज हुई। कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसे उनके करियर का सबसे बड़ा सार्वजनिक विवाद बताया गया।

बंगालियों पर टिप्पणी: सबसे ज्यादा विवादित बयान

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान परेश रावल ने महंगाई, गैस सिलेंडर और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर बोलते हुए बंगालियों, रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को लेकर टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि “गैस सिलेंडर महंगे हैं, लेकिन पड़ोस में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रहेंगे तो क्या करेंगे? बंगाली आपके लिए मछली पकाएंगे?” इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

इस बयान के बाद बंगाली समुदाय और विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। CPI(M) नेता मोहम्मद सलीम ने कोलकाता में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उनका बयान सामाजिक सौहार्द बिगाड़ सकता है।

विवाद बढ़ने के बाद परेश रावल ने ट्विटर पर सफाई देते हुए कहा कि उनका इशारा “अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों” की तरफ था, न कि पूरे बंगाली समुदाय की तरफ। उन्होंने लिखा कि अगर किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह माफी मांगते हैं।

अरुंधति रॉय पर ट्वीट से मचा हंगामा

साल 2017 में लेखिका अरुंधति रॉय को लेकर किया गया उनका ट्वीट भी विवादों में रहा। कश्मीर में सेना द्वारा एक युवक को जीप से बांधने वाली घटना पर देशभर में बहस चल रही थी। इसी दौरान परेश रावल ने ट्वीट किया था कि “पत्थरबाज की जगह अरुंधति रॉय को जीप से बांधो।”

इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ। कई पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इसे हिंसा को बढ़ावा देने वाला बयान बताया। ट्विटर पर उनके खिलाफ कैंपेन चलने लगे। बाद में परेश रावल ने कहा कि उनका ट्वीट व्यंग्य था और उसे गलत तरीके से पेश किया गया।

धर्म और इतिहास से जुड़े बयानों पर विवाद

परेश रावल कई बार धर्म और इतिहास से जुड़े मुद्दों पर विवादों में रहे हैं। 2017 में ताजमहल को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के दौरान उन्होंने ट्वीट किया था कि “ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है” जैसी सोच रखने वालों को समझना चाहिए कि इतिहास को सिर्फ राजनीति से नहीं देखा जा सकता।

बाद में अपनी फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा कि वह “खोखले विवादों” के खिलाफ हैं और फिल्म का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ाना नहीं है।

फिल्म को लेकर कुछ जनहित याचिकाएं भी दायर हुई थीं। आरोप लगाया गया था कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को प्रभावित कर सकती है। इस पर परेश रावल ने सफाई दी कि फिल्म का मकसद इतिहास के एक पक्ष को दिखाना है, न कि सांप्रदायिक विवाद पैदा करना।

परेश रावल 2014 से 2019 तक सांसद रहे।

परेश रावल 2014 से 2019 तक सांसद रहे।

राजनीति में आने के बाद बढ़ी आलोचना

भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने और अहमदाबाद पूर्व सीट से सांसद बनने के बाद परेश रावल के बयानों पर ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने लगीं। उनके ट्वीट्स और सार्वजनिक टिप्पणियां अक्सर टीवी डिबेट और सोशल मीडिया बहस का हिस्सा बनीं।

समर्थकों ने उन्हें बेबाक और राष्ट्रवादी छवि वाला अभिनेता बताया, जबकि आलोचकों ने कहा कि वरिष्ठ अभिनेता और पूर्व सांसद होने के नाते उन्हें अधिक जिम्मेदारी से बयान देने चाहिए।

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और आलोचना

परेश रावल लंबे समय तक ट्विटर पर सक्रिय रहे। धर्म, राष्ट्रवाद, चुनाव और सामाजिक मुद्दों पर उनके ट्वीट्स अक्सर वायरल होते रहे। कई बार उनके समर्थन में ट्रेंड चले, तो कई बार उन्हें ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ा।

हालांकि कुछ मामलों में उन्होंने सफाई दी और माफी भी मांगी। खासकर बंगाली विवाद के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय का अपमान करना नहीं था।

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जूनियर एनटीआर आज टॉलीवुड ही नहीं, पूरे भारतीय सिनेमा के बड़े सितारों में गिने जाते हैं। दादा एन. टी. रामा राव की फिल्मी विरासत संभालने वाले जूनियर एनटीआर ने 13 साल की उम्र में नेशनल अवॉर्ड जीता था। कभी लुक्स और वजन को लेकर ट्रोल हुए, तो कभी उनकी एक झलक पाने के लिए लाखों फैंस उमड़ पड़े। पूरी खबर पढ़ें..

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