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Working Parents Guilt; Emotional Bonding Lapse

Working Parents Guilt; Emotional Bonding Lapse
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11 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं दिल्ली से हूं। मेरा 8 साल का एक बेटा है। मैं और मेरे हसबैंड, दोनों कॉरपोरेट जॉब करते हैं। काम की वजह से हम बच्चे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे। इस कमी को पूरा करने के लिए हम अक्सर उसे महंगे गिफ्ट्स, गैजेट्स दे दिया करते थे। उसकी हर इच्छा भी पूरी करते थे।

लेकिन कुछ समय से हमें ऐसा लग रहा है कि बेटे की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं। वह अपनी बात मनवाने के लिए इमोशनली ब्लैकमेल भी करने लगा है। हमें अब अपनी गलती का एहसास भी हो रहा है, लेकिन ये समझ नहीं आ रहा कि इसे ठीक कैसे करें। सही संतुलन कैसे बनाएं? प्लीज हेल्प।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। यह सवाल आज कई वर्किंग पेरेंट्स की स्थिति को दिखाता है। वर्किंग पेरेंट्स के लिए काम और परिवार के बीच संतुलन बनाना चैलेंजिंग होता है। ऐसे में बच्चे को पर्याप्त समय न दे पाने पर गिल्ट होना स्वाभाविक है।

बहुत से पेरेंट्स इस कमी को पूरा करने के लिए बच्चों को महंगे खिलौने, गैजेट्स या पैसे देकर खुश करने की कोशिश करते हैं।

शुरुआत में यह तरीका आसान लगता है। लेकिन धीरे-धीरे बच्चे के मन में यह धारणा बन जाती है कि प्यार का मतलब सिर्फ भौतिक चीजें या सुख-सुविधाएं हैं।

हालांकि अच्छी बात है कि आपने समय रहते इस बदलाव को नोटिस किया है। ऐसे में समझदारी से इस स्थिति को मैनेज किया जा सकता है।

वर्किंग पेरेंट्स को गिल्ट क्यों होता है?

  • वर्किंग पेरेंट्स ऑफिस और घर की जिम्मेदारियों के बीच बच्चे के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। यही सोच गिल्ट पैदा करती है।
  • सामाजिक प्रेशर और सोशल मीडिया हर पेरेंट पर ‘परफेक्ट’ बनने का दबाव बनाते हैं।
  • जब असल जिंदगी अलग होती है तो पेरेंट्स गिल्ट महसूस करते हैं।
  • अगर बच्चा कहता है- ‘आप मेरे साथ नहीं रहते’ या उदास, चिड़चिड़ा दिखता है तो गिल्ट बढ़ जाता है।

गिल्ट के और कई कारण हो सकते हैं-

‘गिल्ट पेरेंटिंग’ का बच्चे पर प्रभाव

गिल्ट की वजह से पेरेंट्स बच्चे को जरूरत से ज्यादा चीजें, छूट या लाड़-प्यार देते हैं। शुरुआत में यह ‘प्यार’ लगता है, लेकिन लंबे समय में इसका असर बच्चे की सोच, व्यवहार और इमोशनल डेवलपमेंट पर पड़ता है।

  • बच्चा मानने लगता है कि प्यार का मतलब गिफ्ट्स, पैसे और चीजें हैं।
  • वह इमोशनल कनेक्शन की बजाय चीजों पर निर्भर हो जाता है।
  • हर डिमांड पूरी होने पर ‘ना’ सुनने की आदत खत्म हो जाती है। इससे बच्चा जिद्दी और चिड़चिड़ा हो सकता है।
  • बच्चा भौतिक चीजों से खुश तो होता है, लेकिन पेरेंट्स से जुड़ाव कमजोर होता जाता है।
  • तुरंत सब कुछ मिलने से बच्चा धैर्य और इंतजार करना नहीं सीखता है।
  • बाहर की दुनिया उसकी हर मांग पूरी नहीं करती, जिससे निराशा, गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन बढ़ सकता है।
  • इमोशनल सिक्योरिटी चीजों से नहीं, रिश्तों से मिलती है। इसकी कमी से बच्चा असुरक्षित महसूस कर सकता है।

ग्राफिक में देखिए गिल्ट पेरेंटिंग का बच्चे पर क्या असर होता है-

आइए, अब ‘गिल्ट पेरेंटिंग’ को मैनेज करने के तरीके समझते हैं।

वर्किंग पेरेंट्स ‘गिल्ट’ कैसे मैनेज करें?

वर्किंग पेरेंट्स के लिए ‘गिल्ट’ पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। लेकिन इसे मैनेज किया जा सकता है। आइए इसे प्रैक्टिकल तरीके से समझते हैं-

  • सबसे पहले तो समझें कि कोई भी पेरेंट ‘परफेक्ट’ नहीं हो सकता है।
  • बच्चे के लिए ‘डेडिकेटेड टाइम‘ निकालें। इस दौरान फोन का इस्तेमाल न करें।
  • आपका थोड़ा समय भी बच्चे के लिए मायने रखता है।
  • गिल्ट में आकर गिफ्ट देना बंद करें। इसे खास मौके तक सीमित रखें।
  • बच्चे से ईमानदारी से बात करें। ‘हम काम क्यों करते हैं’ इसे समझाएं।
  • दोनों पेरेंट्स समय निकालें, एक पर दबाव न डालें।
  • थकान या समय न मिलने पर खुद को दोष न दें।
  • गिल्ट में आकर बच्चे को फोन देना आसान लगता है, लेकिन इससे दूरी और बढ़ती है। इसलिए बच्चे का स्क्रीन टाइम सीमित रखें।
  • अगर संभव हो तो अलग-अलग शिफ्ट में काम करें, ताकि एक व्यक्ति बच्चे के साथ रहे।
  • ध्यान रखें, आपका समय और अटेंशन बच्चे की सबसे बड़ी जरूरत है।
  • वीक ऑफ एक ही दिन रखें। काम के घंटे कम करें या रिमोट वर्क देखें।
  • दादा-दादी या नाना-नानी की मदद लेना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

कुल मिलाकर इस समय बच्चे को ज्यादा समय, ज्यादा अटेंशन और ज्यादा साथ की जरूरत है। पेरेंटिंग गिल्ट को मैनेज करने के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। इसे ग्राफिक में देखिए-

बच्चे के लिए पेरेंट्स का साथ जरूरी

बच्चे के लिए पेरेंट्स का साथ उसकी इमोशनल, मेंटल और सोशल ग्रोथ की बुनियाद होता है। यह उसकी पर्सनैलिटी को आकार देता है।

  • जब पेरेंट्स साथ होते हैं, बच्चा खुद को सेफ महसूस करता है।
  • उसे लगता है कि “कोई है, जो मुझे समझता है और मेरे साथ है।” इससे कॉन्फिडेंस बढ़ता है।
  • पेरेंट्स से बात करते-करते बच्चा बोलना सीखता है। फीलिंग्स एक्सप्रेस करना सीखता है।
  • बच्चे पेरेंट्स को देखकर सीखते हैं। आप जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही वह अपनाता है।
  • पेरेंट्स के साथ रहने से बच्चा गुस्सा संभालना, निराशा से निपटना और शेयर करना जैसी लाइफ स्किल्स सीखता है।
  • बच्चे के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट महंगी चीजें नहीं, आपका ‘साथ’ है। आज दिया गया साथ, बच्चे का कल मजबूत बनाता है।

बच्चे को समय की कमी कैसे समझाएं?

6–10 साल के बच्चे में समझने की क्षमता विकसित हो रही होती है। ऐसे में उन्हें अपने काम के बारे में तर्क से समझाया जा सकता है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें-

  • सीधे “हम बिजी हैं” कहने से बच्चा खुद को इग्नोर्ड महसूस कर सकता है।
  • इसकी बजाय कहें- “हम काम करते हैं ताकि तुम्हारी जरूरतें पूरी कर सकें, लेकिन तुम्हारे साथ रहना हमें सबसे अच्छा लगता है।”
  • उसे बताएं, “हमें तुम्हारे साथ खेलना बहुत पसंद है, हम इस संडे साथ में जरूर खेलेंगे।”
  • उसे बताएं कि बाकी दिनों में आपको पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है।
  • उसे बताएं कि आपका काम परिवार के लिए क्यों जरूरी है।
  • ईमानदारी से बातचीत करना भरोसा बनाने में मदद करता है।

अंत में यही कहूंगी कि बच्चों के लिए सबसे बड़ी जरूरत महंगे गिफ्ट्स नहीं, बल्कि माता-पिता का समय, अटेंशन और प्यार है। अगर पेरेंट्स रोज थोड़ी देर भी बिना मोबाइल, बिना काम के बच्चे के साथ बिताते हैं तो यह बच्चे के लिए बहुत मायने रखता है।

…………………..

पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए

पेरेंटिंग- 10 साल की बेटी एकदम मुंहफट है: जो मुंह में आए, बोल देती है, ये उसकी साफगोई है या संवेदना की कमी, उसे कैसे समझाएं

10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है। पूरी खबर पढ़िए…

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लेकिन कुछ समय से हमें ऐसा लग रहा है कि बेटे की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं। वह अपनी बात मनवाने के लिए इमोशनली ब्लैकमेल भी करने लगा है। हमें अब अपनी गलती का एहसास भी हो रहा है, लेकिन ये समझ नहीं आ रहा कि इसे ठीक कैसे करें। सही संतुलन कैसे बनाएं? प्लीज हेल्प।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। यह सवाल आज कई वर्किंग पेरेंट्स की स्थिति को दिखाता है। वर्किंग पेरेंट्स के लिए काम और परिवार के बीच संतुलन बनाना चैलेंजिंग होता है। ऐसे में बच्चे को पर्याप्त समय न दे पाने पर गिल्ट होना स्वाभाविक है।

बहुत से पेरेंट्स इस कमी को पूरा करने के लिए बच्चों को महंगे खिलौने, गैजेट्स या पैसे देकर खुश करने की कोशिश करते हैं।

शुरुआत में यह तरीका आसान लगता है। लेकिन धीरे-धीरे बच्चे के मन में यह धारणा बन जाती है कि प्यार का मतलब सिर्फ भौतिक चीजें या सुख-सुविधाएं हैं।

हालांकि अच्छी बात है कि आपने समय रहते इस बदलाव को नोटिस किया है। ऐसे में समझदारी से इस स्थिति को मैनेज किया जा सकता है।

वर्किंग पेरेंट्स को गिल्ट क्यों होता है?

  • वर्किंग पेरेंट्स ऑफिस और घर की जिम्मेदारियों के बीच बच्चे के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। यही सोच गिल्ट पैदा करती है।
  • सामाजिक प्रेशर और सोशल मीडिया हर पेरेंट पर ‘परफेक्ट’ बनने का दबाव बनाते हैं।
  • जब असल जिंदगी अलग होती है तो पेरेंट्स गिल्ट महसूस करते हैं।
  • अगर बच्चा कहता है- ‘आप मेरे साथ नहीं रहते’ या उदास, चिड़चिड़ा दिखता है तो गिल्ट बढ़ जाता है।

गिल्ट के और कई कारण हो सकते हैं-

‘गिल्ट पेरेंटिंग’ का बच्चे पर प्रभाव

गिल्ट की वजह से पेरेंट्स बच्चे को जरूरत से ज्यादा चीजें, छूट या लाड़-प्यार देते हैं। शुरुआत में यह ‘प्यार’ लगता है, लेकिन लंबे समय में इसका असर बच्चे की सोच, व्यवहार और इमोशनल डेवलपमेंट पर पड़ता है।

  • बच्चा मानने लगता है कि प्यार का मतलब गिफ्ट्स, पैसे और चीजें हैं।
  • वह इमोशनल कनेक्शन की बजाय चीजों पर निर्भर हो जाता है।
  • हर डिमांड पूरी होने पर ‘ना’ सुनने की आदत खत्म हो जाती है। इससे बच्चा जिद्दी और चिड़चिड़ा हो सकता है।
  • बच्चा भौतिक चीजों से खुश तो होता है, लेकिन पेरेंट्स से जुड़ाव कमजोर होता जाता है।
  • तुरंत सब कुछ मिलने से बच्चा धैर्य और इंतजार करना नहीं सीखता है।
  • बाहर की दुनिया उसकी हर मांग पूरी नहीं करती, जिससे निराशा, गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन बढ़ सकता है।
  • इमोशनल सिक्योरिटी चीजों से नहीं, रिश्तों से मिलती है। इसकी कमी से बच्चा असुरक्षित महसूस कर सकता है।

ग्राफिक में देखिए गिल्ट पेरेंटिंग का बच्चे पर क्या असर होता है-

आइए, अब ‘गिल्ट पेरेंटिंग’ को मैनेज करने के तरीके समझते हैं।

वर्किंग पेरेंट्स ‘गिल्ट’ कैसे मैनेज करें?

वर्किंग पेरेंट्स के लिए ‘गिल्ट’ पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। लेकिन इसे मैनेज किया जा सकता है। आइए इसे प्रैक्टिकल तरीके से समझते हैं-

  • सबसे पहले तो समझें कि कोई भी पेरेंट ‘परफेक्ट’ नहीं हो सकता है।
  • बच्चे के लिए ‘डेडिकेटेड टाइम‘ निकालें। इस दौरान फोन का इस्तेमाल न करें।
  • आपका थोड़ा समय भी बच्चे के लिए मायने रखता है।
  • गिल्ट में आकर गिफ्ट देना बंद करें। इसे खास मौके तक सीमित रखें।
  • बच्चे से ईमानदारी से बात करें। ‘हम काम क्यों करते हैं’ इसे समझाएं।
  • दोनों पेरेंट्स समय निकालें, एक पर दबाव न डालें।
  • थकान या समय न मिलने पर खुद को दोष न दें।
  • गिल्ट में आकर बच्चे को फोन देना आसान लगता है, लेकिन इससे दूरी और बढ़ती है। इसलिए बच्चे का स्क्रीन टाइम सीमित रखें।
  • अगर संभव हो तो अलग-अलग शिफ्ट में काम करें, ताकि एक व्यक्ति बच्चे के साथ रहे।
  • ध्यान रखें, आपका समय और अटेंशन बच्चे की सबसे बड़ी जरूरत है।
  • वीक ऑफ एक ही दिन रखें। काम के घंटे कम करें या रिमोट वर्क देखें।
  • दादा-दादी या नाना-नानी की मदद लेना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

कुल मिलाकर इस समय बच्चे को ज्यादा समय, ज्यादा अटेंशन और ज्यादा साथ की जरूरत है। पेरेंटिंग गिल्ट को मैनेज करने के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। इसे ग्राफिक में देखिए-

बच्चे के लिए पेरेंट्स का साथ जरूरी

बच्चे के लिए पेरेंट्स का साथ उसकी इमोशनल, मेंटल और सोशल ग्रोथ की बुनियाद होता है। यह उसकी पर्सनैलिटी को आकार देता है।

  • जब पेरेंट्स साथ होते हैं, बच्चा खुद को सेफ महसूस करता है।
  • उसे लगता है कि “कोई है, जो मुझे समझता है और मेरे साथ है।” इससे कॉन्फिडेंस बढ़ता है।
  • पेरेंट्स से बात करते-करते बच्चा बोलना सीखता है। फीलिंग्स एक्सप्रेस करना सीखता है।
  • बच्चे पेरेंट्स को देखकर सीखते हैं। आप जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही वह अपनाता है।
  • पेरेंट्स के साथ रहने से बच्चा गुस्सा संभालना, निराशा से निपटना और शेयर करना जैसी लाइफ स्किल्स सीखता है।
  • बच्चे के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट महंगी चीजें नहीं, आपका ‘साथ’ है। आज दिया गया साथ, बच्चे का कल मजबूत बनाता है।

बच्चे को समय की कमी कैसे समझाएं?

6–10 साल के बच्चे में समझने की क्षमता विकसित हो रही होती है। ऐसे में उन्हें अपने काम के बारे में तर्क से समझाया जा सकता है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें-

  • सीधे “हम बिजी हैं” कहने से बच्चा खुद को इग्नोर्ड महसूस कर सकता है।
  • इसकी बजाय कहें- “हम काम करते हैं ताकि तुम्हारी जरूरतें पूरी कर सकें, लेकिन तुम्हारे साथ रहना हमें सबसे अच्छा लगता है।”
  • उसे बताएं, “हमें तुम्हारे साथ खेलना बहुत पसंद है, हम इस संडे साथ में जरूर खेलेंगे।”
  • उसे बताएं कि बाकी दिनों में आपको पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है।
  • उसे बताएं कि आपका काम परिवार के लिए क्यों जरूरी है।
  • ईमानदारी से बातचीत करना भरोसा बनाने में मदद करता है।

अंत में यही कहूंगी कि बच्चों के लिए सबसे बड़ी जरूरत महंगे गिफ्ट्स नहीं, बल्कि माता-पिता का समय, अटेंशन और प्यार है। अगर पेरेंट्स रोज थोड़ी देर भी बिना मोबाइल, बिना काम के बच्चे के साथ बिताते हैं तो यह बच्चे के लिए बहुत मायने रखता है।

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10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है। पूरी खबर पढ़िए…

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