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भारत से प्रशिक्षित हैं कजाकिस्तान की अख्माराल काइनाजारोवा:सेंट्रल एशिया के 5 देशों के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया, कई ने अमेरिका-जापान जैसे देशों में करियर बनाया

भारत से प्रशिक्षित हैं कजाकिस्तान की अख्माराल काइनाजारोवा:सेंट्रल एशिया के 5 देशों के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया, कई ने अमेरिका-जापान जैसे देशों में करियर बनाया

ओकसाना ब्रिटेन में भरतनाट्यम कलाकार हैं… उल्मेनाई जापान में… तात्याना, कासिएट और दामिर अमेरिका में भरतनाट्यम के स्टेज शो करते हैं। स्वेतलाना रूस में भरतनाट्यम सिखाती हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में भारतीय नृत्य और संस्कृति की पहचान बने ये कलाकार न भारतीय हैं और न ही इन्होंने भारत से नृत्य की शिक्षा ली है। इनकी गुरु हैं अख्माराल काइनाजारोवा। भारत से दूर कजाकिस्तान की पूर्व राजधानी अल्माटी में काइनाजारोवा भरतनाट्यम सिखाती हैं। वे भारत में प्रशिक्षित सेंट्रल एशिया में अकेली भरतनाट्यम कलाकार हैं। उन्होंने तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के ​इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स कलाक्षेत्र से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया। काइनाजारोवा इस मायने में सेंट्रल एशिया में भरतनाट्यम ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एंबेसडर हैं कि उन्होंने 20 साल में सेंट्रल एशिया के पांच देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया। इनमें 17 साल से लेकर 70 साल तक के लोग शामिल हैं। वे कहती हैं- ‘सेंट्रल एशिया में लोग भारत से प्यार और यहां की संस्कृति को पसंद करते हैं। यही वजह है कि मेरे पास भरतनाट्यम सीखने कजाकिस्तान से ही नहीं, पड़ोसी देशों से भी लोग आते हैं। मैं 15 छात्रों को कथक भी सीखा रही हूं। मैं दिल्ली में कथक सीख रही थी, लेकिन अपनी डिग्री पूरी नहीं कर सकी। इसलिए सिर्फ उन्हें ही सिखाती हूं जो सिर्फ कथक ही सीखने आते हैं। हमारे देश में भरतनाट्यम से कमाई नहीं हो सकती। इसलिए मेरे सिखाए जिन लोगों ने भरतनाट्यम को करियर बनाया वे अमेरिका, जापान जैसे देशों में चले जाते हैं।’ रवींद्रनाथ टैगोर की फैन थीं दादी, उन्हीं से भारत को जाना काइनाजारोवा कहती हैं- मेरी दादी रवींद्रनाथ टैगोर की किताबों की फैन थीं। उनकी ही किताबों से मैं भारत के बारे में जान पाई। जब देश आजाद हुआ और हमारे यहां भारतीय दूतावास खुला तो मैंने वहां जाकर कहा कि मुझे भरतनाट्यम सीखना है। इसके बाद मेरे लिए रास्ते खुले और मैं भारत आ गई। यहां मैं चेन्नई, मुंबई और दिल्ली में रही। मेरी बेटी ने यहीं तमिल सीखी। हमने भारतीय संस्कृति को जीया। आईसीसीआर फेलो होने वाली पहली कजाक नागरिक हैं 1991 में कजाकिस्तान की आजादी के बाद काइनाजारोवा वह पहली शख्स हैं, जिन्हें आईसीसीआर की फेलोशिप मिली। इस फेलोशिप पर वे भरतनाट्यम सीखने भारत आईं। उन्होंने यहां योग भी सीखा। वे 200 से ज्यादा लोगों को योग सीखा रही हैं। भारत आने के बाद वे शाकाहारी हो गईं। वे बताती हैं कि हमारे देश में जहां तापमान -20 से -50 डिग्री तक जाता है। शाकाहारी होना बहुत मुश्किल है। जब वे चेन्नई से भरतनाट्यम सीख रहीं थीं तब उनकी बेटी ने वहां तमिल भी सीख लिया था।

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ओकसाना ब्रिटेन में भरतनाट्यम कलाकार हैं… उल्मेनाई जापान में… तात्याना, कासिएट और दामिर अमेरिका में भरतनाट्यम के स्टेज शो करते हैं। स्वेतलाना रूस में भरतनाट्यम सिखाती हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में भारतीय नृत्य और संस्कृति की पहचान बने ये कलाकार न भारतीय हैं और न ही इन्होंने भारत से नृत्य की शिक्षा ली है। इनकी गुरु हैं अख्माराल काइनाजारोवा। भारत से दूर कजाकिस्तान की पूर्व राजधानी अल्माटी में काइनाजारोवा भरतनाट्यम सिखाती हैं। वे भारत में प्रशिक्षित सेंट्रल एशिया में अकेली भरतनाट्यम कलाकार हैं। उन्होंने तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के ​इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स कलाक्षेत्र से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया। काइनाजारोवा इस मायने में सेंट्रल एशिया में भरतनाट्यम ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एंबेसडर हैं कि उन्होंने 20 साल में सेंट्रल एशिया के पांच देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया। इनमें 17 साल से लेकर 70 साल तक के लोग शामिल हैं। वे कहती हैं- ‘सेंट्रल एशिया में लोग भारत से प्यार और यहां की संस्कृति को पसंद करते हैं। यही वजह है कि मेरे पास भरतनाट्यम सीखने कजाकिस्तान से ही नहीं, पड़ोसी देशों से भी लोग आते हैं। मैं 15 छात्रों को कथक भी सीखा रही हूं। मैं दिल्ली में कथक सीख रही थी, लेकिन अपनी डिग्री पूरी नहीं कर सकी। इसलिए सिर्फ उन्हें ही सिखाती हूं जो सिर्फ कथक ही सीखने आते हैं। हमारे देश में भरतनाट्यम से कमाई नहीं हो सकती। इसलिए मेरे सिखाए जिन लोगों ने भरतनाट्यम को करियर बनाया वे अमेरिका, जापान जैसे देशों में चले जाते हैं।’ रवींद्रनाथ टैगोर की फैन थीं दादी, उन्हीं से भारत को जाना काइनाजारोवा कहती हैं- मेरी दादी रवींद्रनाथ टैगोर की किताबों की फैन थीं। उनकी ही किताबों से मैं भारत के बारे में जान पाई। जब देश आजाद हुआ और हमारे यहां भारतीय दूतावास खुला तो मैंने वहां जाकर कहा कि मुझे भरतनाट्यम सीखना है। इसके बाद मेरे लिए रास्ते खुले और मैं भारत आ गई। यहां मैं चेन्नई, मुंबई और दिल्ली में रही। मेरी बेटी ने यहीं तमिल सीखी। हमने भारतीय संस्कृति को जीया। आईसीसीआर फेलो होने वाली पहली कजाक नागरिक हैं 1991 में कजाकिस्तान की आजादी के बाद काइनाजारोवा वह पहली शख्स हैं, जिन्हें आईसीसीआर की फेलोशिप मिली। इस फेलोशिप पर वे भरतनाट्यम सीखने भारत आईं। उन्होंने यहां योग भी सीखा। वे 200 से ज्यादा लोगों को योग सीखा रही हैं। भारत आने के बाद वे शाकाहारी हो गईं। वे बताती हैं कि हमारे देश में जहां तापमान -20 से -50 डिग्री तक जाता है। शाकाहारी होना बहुत मुश्किल है। जब वे चेन्नई से भरतनाट्यम सीख रहीं थीं तब उनकी बेटी ने वहां तमिल भी सीख लिया था।

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