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चीन में 56 जातीय समूहों को एक पहचान मिलेगी:अलग-अलग समुदायों में शादी को बढ़ावा, बच्चों को कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम सिखाने की बात

चीन में 56 जातीय समूहों को एक पहचान मिलेगी:अलग-अलग समुदायों में शादी को बढ़ावा, बच्चों को कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम सिखाने की बात

चीन में जिनपिंग सरकार एक नए कानून को मंजूरी देने की तैयारी कर रही है, जिसमें अलग-अलग जातीय समूहों (एथनिक ग्रुप्स) को एक ही राष्ट्रीय पहचान दी जाएगी। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इस कानून का नाम ‘लॉ ऑन प्रोमोटिंग एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस’ है। चीन में हान, उइगुर, तिब्बती, मंगोल जैसे 56 जातीय समूह हैं। चीन की सरकार पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वह देश के जातीय अल्पसंख्यकों (एथनिक माइनॉरिटी) को दबाने वाली नीतियां अपनाती है और उन्हें जबरन बहुसंख्यक हान चीनी संस्कृति में घुलने-मिलने के लिए मजबूर करती है। रिपोर्ट के मुताबिक अब चीन की संसद के सालाना सत्र में एक नया कानून पास होने वाला है। एक्सपर्ट्स और ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट का कहना है कि यह कानून अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा उनकी संस्कृति के लिए खतरा बढ़ाएगा। हालांकि चीन सरकार का कहना है कि यह कानून देश में लोगों के बीच एकता बढ़ाने और देश को आधुनिक बनाने के लिए जरूरी है। सरकार इसे ‘जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून’ बता रही है। नए कानून के कुछ मुख्य बातें- मंदारिन को ज्यादा अहमियत दी जाएगी। दूसरी भाषाओं का दर्जा घटेगा। अलग-अलग जातीय समूहों के बीच शादी को प्रोत्साहन मिलेगा और ऐसी शादी रोकने की कोशिशों को गलत माना जाएगा। माता-पिता को बच्चों को यह सिखाना होगा कि वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम करें। अगर कोई व्यक्ति, संगठन या गतिविधि ऐसी बात कहे या करे जिससे अलग-अलग जातीय समुदायों के बीच झगड़ा, नफरत या अलग होने की मांग बढ़े, तो उस पर रोक लगाई जाएगी। जिनपिंग की नीति को मजबूत करेगा नया कानून
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहले भी कई बार धर्म के ‘चीनीकरण’ की बात कर चुके हैं। इसका मतलब है कि धार्मिक परंपराएं और प्रथाएं भी कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चीनी संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नया कानून इसी नीति को और मजबूत करेगा। पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के एरन ग्लासरमैन के मुताबिक, मंदारिन को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यकों की पहचान तथा धार्मिक अभिव्यक्ति पर नियंत्रण जैसी नीतियां पहले भी लागू थीं। अब चीन सरकार इन नीतियों को सिर्फ नीति नहीं बल्कि कानून का रूप दे रही है। चीन में अल्पसंख्यक समुदायों पर बंदिशें चीन सरकार का कहना है कि इन हिंसक घटनाओं की वजह से कड़े कदम उठाना जरूरी था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि 10 लाख से ज्यादा उइगर मुसलमानों को हिरासत शिविरों में रखा गया। चीन सरकार इन्हें ‘री-एजुकेशन और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र’ बताती है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि उइगरों की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई गई और कई मस्जिदें बंद कर दी गईं। तिब्बत में भी मठों पर कड़ा नियंत्रण है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों को अब सरकारी स्कूलों में मंदारिन भाषा में पढ़ाई करनी होती है और वे बौद्ध धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ सकते। पहले बच्चे मठों के स्कूलों में जाकर भिक्षु बनने की ट्रेनिंग लेते थे। हाल के वर्षों में इनर मंगोलिया में मंगोलियन भाषा की पढ़ाई पर प्रतिबंध और निंग्शिया में हुई मुस्लिम मस्जिदों को गिराने के आदेश के बाद भी विरोध हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार को इन क्षेत्रों में अस्थिरता की आशंका के कारण नया कानून लाने की जरूरत महसूस हुई। इससे सरकार को उन इलाकों पर ज्यादा नियंत्रण मिलेगा जो चीन को पड़ोसी देशों और वैश्विक व्यापार मार्गों से जोड़ते हैं।

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहले भी कई बार धर्म के ‘चीनीकरण’ की बात कर चुके हैं। इसका मतलब है कि धार्मिक परंपराएं और प्रथाएं भी कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चीनी संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नया कानून इसी नीति को और मजबूत करेगा। पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के एरन ग्लासरमैन के मुताबिक, मंदारिन को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यकों की पहचान तथा धार्मिक अभिव्यक्ति पर नियंत्रण जैसी नीतियां पहले भी लागू थीं। अब चीन सरकार इन नीतियों को सिर्फ नीति नहीं बल्कि कानून का रूप दे रही है। चीन में अल्पसंख्यक समुदायों पर बंदिशें चीन सरकार का कहना है कि इन हिंसक घटनाओं की वजह से कड़े कदम उठाना जरूरी था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि 10 लाख से ज्यादा उइगर मुसलमानों को हिरासत शिविरों में रखा गया। चीन सरकार इन्हें ‘री-एजुकेशन और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र’ बताती है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि उइगरों की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई गई और कई मस्जिदें बंद कर दी गईं। तिब्बत में भी मठों पर कड़ा नियंत्रण है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों को अब सरकारी स्कूलों में मंदारिन भाषा में पढ़ाई करनी होती है और वे बौद्ध धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ सकते। पहले बच्चे मठों के स्कूलों में जाकर भिक्षु बनने की ट्रेनिंग लेते थे। हाल के वर्षों में इनर मंगोलिया में मंगोलियन भाषा की पढ़ाई पर प्रतिबंध और निंग्शिया में हुई मुस्लिम मस्जिदों को गिराने के आदेश के बाद भी विरोध हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार को इन क्षेत्रों में अस्थिरता की आशंका के कारण नया कानून लाने की जरूरत महसूस हुई। इससे सरकार को उन इलाकों पर ज्यादा नियंत्रण मिलेगा जो चीन को पड़ोसी देशों और वैश्विक व्यापार मार्गों से जोड़ते हैं।

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