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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: 15 साल का राज, अब अग्नि परीक्षा…बंगाल में फिर से क्या दिखा ‘ब्रांड ममता’?

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: 15 साल का राज, अब अग्नि परीक्षा...बंगाल में फिर से क्या दिखा 'ब्रांड ममता'?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सत्ता में लगातार 15 साल तक बनी रहीं और एक बार फिर इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ी हो गईं। समाजवादी कांग्रेस की सुप्रीमो के तौर पर उन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर अपना प्रभाव बनाए रखा है।

ऐसे समय में जब भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के दम पर पूरे जोर-शोर से चुनाव लड़ रही है, तब एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के रूप में ममता बनर्जी अब भी नजर आ रही हैं। उनके शासनकाल में जहां ऑर्केस्ट्रा ऑर्केस्ट्रा का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया, वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी काफी कमजोर हो गई। हालाँकि, बीजेपी ने हाल के वर्षों में राज्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाते हुए खुद को मुख्य चुनौती के रूप में स्थापित किया है।

ब्रांड ‘दीदी’ की अग्नि परीक्षा

इस चुनाव में ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी है। समर्थकों के आरोप और सत्य-विरोधी इतिहासकारों की चर्चाओं के बीच यह अहम सवाल है कि क्या सिद्धांत अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वियों को फिर से माता दे मापदंड। ममता की प्राथमिकता सिर्फ उनके शासन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी सादगी और “मां, माटी, मानुष” की राजनीति ने उन्हें जनता से गहराई से जोड़ दिया है।

राजनीतिक यात्रा और मनोरंजन

1970-80 के दशक में छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाली ममता बनर्जी ने कांग्रेस (आई) से अपने इतिहास की शुरुआत की। वे 1984 में पहली बार पश्चिम बंगाल में वामपंथ के विरुद्ध सबसे मुखर चेहरा बने।

1997 में वे क्लासिक कांग्रेस की स्थापना के खिलाफ और सीपीएम के मजबूत विकल्प के रूप में उभरे। 2006 में सिंगुर आंदोलन के खिलाफ उनकी राजनीति टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जहां उन्होंने किसानों के पक्ष में आंदोलन चलाया।

2011: सत्ता परिवर्तन का वर्ष

2011 विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 34 साल से सत्ता में रही वाम सरकार को 294 में 184 से 184 में प्रवेश करके ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके साथ ही वे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उन्होंने दो बार जीत हासिल की। 2021 में नंदीग्राम से हार के बाद वे भवानीपुर सोलन में मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त एक अहम बदलाव है, जहां एक तरफ बीजेपी सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी अपनी पकड़ और “ब्रांड दोस्तों” की छवि के साथ फिर से जीत का दावा कर रही हैं।

ये भी पढ़ें: ‘जनता पर किसान की मार’, आखिरी चरण की वोटिंग से पहले राहुल गांधी का पेट्रोल-डीजल की कीमत पर बड़ा बयान

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ऐसे समय में जब भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के दम पर पूरे जोर-शोर से चुनाव लड़ रही है, तब एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के रूप में ममता बनर्जी अब भी नजर आ रही हैं। उनके शासनकाल में जहां ऑर्केस्ट्रा ऑर्केस्ट्रा का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया, वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी काफी कमजोर हो गई। हालाँकि, बीजेपी ने हाल के वर्षों में राज्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाते हुए खुद को मुख्य चुनौती के रूप में स्थापित किया है।

ब्रांड ‘दीदी’ की अग्नि परीक्षा

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1970-80 के दशक में छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाली ममता बनर्जी ने कांग्रेस (आई) से अपने इतिहास की शुरुआत की। वे 1984 में पहली बार पश्चिम बंगाल में वामपंथ के विरुद्ध सबसे मुखर चेहरा बने।

1997 में वे क्लासिक कांग्रेस की स्थापना के खिलाफ और सीपीएम के मजबूत विकल्प के रूप में उभरे। 2006 में सिंगुर आंदोलन के खिलाफ उनकी राजनीति टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जहां उन्होंने किसानों के पक्ष में आंदोलन चलाया।

2011: सत्ता परिवर्तन का वर्ष

2011 विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 34 साल से सत्ता में रही वाम सरकार को 294 में 184 से 184 में प्रवेश करके ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके साथ ही वे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उन्होंने दो बार जीत हासिल की। 2021 में नंदीग्राम से हार के बाद वे भवानीपुर सोलन में मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त एक अहम बदलाव है, जहां एक तरफ बीजेपी सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी अपनी पकड़ और “ब्रांड दोस्तों” की छवि के साथ फिर से जीत का दावा कर रही हैं।

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