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फुटबॉल क्लब नशे से उबारकर बना रहा चैम्पियन:बाप-बेटे ने शुरू किया था सिरुकलाथुर क्लब; यहां के बच्चे विदेशी टीमों से भी जुड़े

फुटबॉल क्लब नशे से उबारकर बना रहा चैम्पियन:बाप-बेटे ने शुरू किया था सिरुकलाथुर क्लब; यहां के बच्चे विदेशी टीमों से भी जुड़े

स्पेनिश फुटबॉल क्लब बार्सिलोना का एक मशहूर नारा है- ‘मेस क्यू अन क्लब’ (एक क्लब से बढ़कर)। तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले के एक छोटे से गांव सिरुकलाथुर में यह बात बिल्कुल सच साबित हो रही है। करीब 2,000 की आबादी वाले इस गांव में फुटबॉल सिर्फ 90 मिनट का खेल नहीं है, बल्कि यह युवाओं को नशे और भटकाव से दूर कर एक नई जिंदगी दे रहा है। ‘सिरुकलाथुर गालटीपेट फुटबॉल क्लब’ की शुरुआत 2014 के फीफा वर्ल्ड कप के दौरान डी. हरिकृष्णन ने की थी। जिस मैदान पर कभी कचरा फेंका जाता था, आज वहां हर हफ्ते 150 से ज्यादा बच्चे ट्रेनिंग लेते हैं। इस क्लब को ‘ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन’ से टू-स्टार मान्यता मिल चुकी है। क्लब के संस्थापक हरिकृष्णन का अपना सफर भी आसान नहीं था। 10वीं में फेल होने और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कोरोना काल में जब स्कूल बंद थे, तब उनके बेटे शिवारमन ने देखा कि गांव के बच्चे शराब, सिगरेट और नशे की लत का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में बाप-बेटे की इस जोड़ी ने बच्चों को वापस मैदान पर लाने की ठानी। क्लब ने महसूस किया कि दिहाड़ी मजदूरों और गरीब परिवारों के इन बच्चों को सही पोषण नहीं मिल पा रहा है। इसलिए क्लब ने ट्रेनिंग करने वाले बच्चों को नाश्ता और रात का खाना (हफ्ते में तीन दिन नॉन-वेज सहित) देना शुरू किया। एक बार हरिकृष्णन ने एक होनहार खिलाड़ी से नशे के इंजेक्शन तक छीने थे। उनका मकसद सिर्फ बेहतरीन खिलाड़ी बनाना नहीं है, बल्कि खेल के जरिए बच्चों को शिक्षा और रोजगार दिलाना है। आज इस क्लब के कई बच्चे बड़े कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। इस छोटे से क्लब की उपलब्धियां किसी बड़े शहर की अकादमी से कम नहीं हैं। यहां के सात खिलाड़ी चेन्नईयिन एफसी की यूथ टीम में, एक बेंगलुरु एफसी और दो एफसी मद्रास में अपनी जगह बना चुके हैं। 2016 में क्लब का एक खिलाड़ी रिशिश ट्रेनिंग के लिए स्पेन गया और फिर स्वीडिश क्लब ‘IK Sirius’ तक पहुंचा। यहां से संतोष ट्रॉफी, जूनियर नेशनल और यूनिवर्सिटी स्तर के 20 से ज्यादा खिलाड़ी निकले हैं। सिरुकलाथुर गांव में अब सुबह की शुरुआत फुटबॉल से होती है। संकरी गलियों और कच्चे रास्तों से निकलकर ये बच्चे अब बड़े मैदानों पर अपना नाम रोशन कर रहे हैं। यहां फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि गरीबी और भटकाव से बाहर निकलने का सबसे मजबूत रास्ता बन चुका है।

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