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फोन की घंटी से चिढ़ होने लगी है? हर वक्त फोन साइलेंट पर रखते हैं? आपकी मेंटल हेल्थ से जुड़ी हो सकती है ये आदत

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Mental Health Tips: आज के दौर में स्मार्टफोन सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह आंख खुलते ही नोटिफिकेशन चेक करना और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आम बात है. लेकिन इसी बीच एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो अपने फोन को लगभग पूरे दिन साइलेंट मोड पर रखना पसंद करता है. कई लोगों के लिए यह सिर्फ सुविधा होती है, लेकिन साइकोलॉजी और बिहेवियर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह आदत हमारी मानसिक स्थिति, तनाव और निजी शांति से भी गहराई से जुड़ी हो सकती है.

लगातार बजती रिंगटोन, मैसेज अलर्ट और अचानक आने वाली कॉल्स कई बार दिमाग को इतना थका देती हैं कि लोग अनजाने में खुद को डिजिटल शोर से दूर करने लगते हैं. यही वजह है कि अब फोन को साइलेंट में रखना सिर्फ आदत नहीं, बल्कि “मेंटल स्पेस” बचाने का तरीका बनता जा रहा है. खास बात यह है कि इस छोटी सी आदत के पीछे कई भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हो सकते हैं, जिन पर लोग अक्सर ध्यान ही नहीं देते.

हर नोटिफिकेशन दिमाग को क्यों थका देता है?
स्मार्टफोन ने जिंदगी आसान जरूर बनाई है, लेकिन इसके साथ नोटिफिकेशन का दबाव भी तेजी से बढ़ा है. इंस्टाग्राम रील्स, ऑफिस ग्रुप, ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स और लगातार आने वाले मैसेज दिमाग को हर समय एक्टिव रखते हैं. कई लोग बताते हैं कि फोन की छोटी सी बीप भी उनका ध्यान भटका देती है. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, बार-बार नोटिफिकेशन आने से दिमाग को लगातार प्रतिक्रिया देनी पड़ती है. इससे मानसिक थकान बढ़ती है और इंसान अनजाने में चिड़चिड़ा महसूस करने लगता है. ऐसे में फोन को साइलेंट पर रखना कई लोगों के लिए खुद को शांत रखने का आसान तरीका बन जाता है.

अचानक बजती कॉल्स से बढ़ सकती है बेचैनी
कुछ लोगों को अचानक फोन बजने पर घबराहट महसूस होती है. खासकर तब, जब वे पहले से तनाव में हों. अचानक आने वाली कॉल कई बार दिमाग में यह डर पैदा कर देती है कि कहीं कोई बुरी खबर या जरूरी समस्या तो नहीं.

जवाब देने का दबाव भी बनता है वजह
आज की डिजिटल लाइफ में तुरंत रिप्लाई देने का दबाव भी काफी बढ़ गया है. अगर किसी मैसेज का जवाब देर से दिया जाए तो लोग सवाल करने लगते हैं. यही कारण है कि कुछ लोग फोन साइलेंट में रखकर अपने हिसाब से कॉल्स और मैसेज देखते हैं. इससे उन्हें मानसिक राहत महसूस होती है और वे खुद को कम दबाव में पाते हैं.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

फोकस और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने का आसान तरीका
स्टूडेंट्स और वर्किंग प्रोफेशनल्स में फोन साइलेंट रखने की आदत सबसे ज्यादा देखी जाती है. पढ़ाई करते समय या ऑफिस के किसी जरूरी काम के दौरान एक छोटा सा नोटिफिकेशन भी ध्यान तोड़ सकता है.

अक्सर लोग सिर्फ एक मैसेज देखने के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन फिर सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग में कई मिनट या घंटे निकल जाते हैं. यही वजह है कि अब कई लोग “डिजिटल डिस्ट्रैक्शन” से बचने के लिए फोन को साइलेंट पर रखना बेहतर मानते हैं. इससे उनका फोकस बना रहता है और काम तेजी से पूरा होता है.

क्या यह मेंटल पीस की जरूरत का संकेत है?
कई बार फोन साइलेंट पर रखना सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि मानसिक थकान का संकेत भी हो सकता है. जब कोई व्यक्ति ज्यादा तनाव, भावनात्मक दबाव या निजी परेशानियों से गुजर रहा होता है, तो वह लोगों से थोड़ी दूरी बनाना चाहता है.

फोन को साइलेंट में डालकर लोग खुद के साथ समय बिताने की कोशिश करते हैं. कुछ समय तक बिना कॉल्स और मैसेज के रहना उन्हें मानसिक रूप से हल्का महसूस कराता है. यही वजह है कि अब “डिजिटल डिटॉक्स” जैसे शब्द तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं.

कब यह आदत चिंता का कारण बन सकती है?
अगर कोई व्यक्ति जरूरी कॉल्स से भी बचने लगे, लोगों से बातचीत कम कर दे या हर नोटिफिकेशन से परेशान होने लगे, तो यह मानसिक तनाव या अकेलेपन का संकेत हो सकता है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि लगातार खुद को सोशल इंटरैक्शन से दूर करना लंबे समय में रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर असर डाल सकता है.

सही बैलेंस बनाना क्यों जरूरी है?
हर समय फोन रिंगर पर रखना भी सही नहीं और हर वक्त साइलेंट में रखना भी नुकसानदायक हो सकता है. बेहतर तरीका यही है कि जरूरत के हिसाब से फोन सेटिंग्स का इस्तेमाल किया जाए. काम के समय फोन साइलेंट रखें, लेकिन जरूरी लोगों के नंबर “फेवरेट” या “इमरजेंसी कॉन्टैक्ट” में सेव रखें ताकि अहम कॉल मिस न हो.

इसके अलावा दिन का कुछ समय बिना स्मार्टफोन के बिताना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. छोटी-छोटी डिजिटल आदतें ही लंबे समय में आपकी मानसिक शांति तय करती हैं.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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Mental Health Tips: आज के दौर में स्मार्टफोन सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह आंख खुलते ही नोटिफिकेशन चेक करना और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आम बात है. लेकिन इसी बीच एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो अपने फोन को लगभग पूरे दिन साइलेंट मोड पर रखना पसंद करता है. कई लोगों के लिए यह सिर्फ सुविधा होती है, लेकिन साइकोलॉजी और बिहेवियर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह आदत हमारी मानसिक स्थिति, तनाव और निजी शांति से भी गहराई से जुड़ी हो सकती है.

लगातार बजती रिंगटोन, मैसेज अलर्ट और अचानक आने वाली कॉल्स कई बार दिमाग को इतना थका देती हैं कि लोग अनजाने में खुद को डिजिटल शोर से दूर करने लगते हैं. यही वजह है कि अब फोन को साइलेंट में रखना सिर्फ आदत नहीं, बल्कि “मेंटल स्पेस” बचाने का तरीका बनता जा रहा है. खास बात यह है कि इस छोटी सी आदत के पीछे कई भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हो सकते हैं, जिन पर लोग अक्सर ध्यान ही नहीं देते.

हर नोटिफिकेशन दिमाग को क्यों थका देता है?
स्मार्टफोन ने जिंदगी आसान जरूर बनाई है, लेकिन इसके साथ नोटिफिकेशन का दबाव भी तेजी से बढ़ा है. इंस्टाग्राम रील्स, ऑफिस ग्रुप, ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स और लगातार आने वाले मैसेज दिमाग को हर समय एक्टिव रखते हैं. कई लोग बताते हैं कि फोन की छोटी सी बीप भी उनका ध्यान भटका देती है. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, बार-बार नोटिफिकेशन आने से दिमाग को लगातार प्रतिक्रिया देनी पड़ती है. इससे मानसिक थकान बढ़ती है और इंसान अनजाने में चिड़चिड़ा महसूस करने लगता है. ऐसे में फोन को साइलेंट पर रखना कई लोगों के लिए खुद को शांत रखने का आसान तरीका बन जाता है.

अचानक बजती कॉल्स से बढ़ सकती है बेचैनी
कुछ लोगों को अचानक फोन बजने पर घबराहट महसूस होती है. खासकर तब, जब वे पहले से तनाव में हों. अचानक आने वाली कॉल कई बार दिमाग में यह डर पैदा कर देती है कि कहीं कोई बुरी खबर या जरूरी समस्या तो नहीं.

जवाब देने का दबाव भी बनता है वजह
आज की डिजिटल लाइफ में तुरंत रिप्लाई देने का दबाव भी काफी बढ़ गया है. अगर किसी मैसेज का जवाब देर से दिया जाए तो लोग सवाल करने लगते हैं. यही कारण है कि कुछ लोग फोन साइलेंट में रखकर अपने हिसाब से कॉल्स और मैसेज देखते हैं. इससे उन्हें मानसिक राहत महसूस होती है और वे खुद को कम दबाव में पाते हैं.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

फोकस और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने का आसान तरीका
स्टूडेंट्स और वर्किंग प्रोफेशनल्स में फोन साइलेंट रखने की आदत सबसे ज्यादा देखी जाती है. पढ़ाई करते समय या ऑफिस के किसी जरूरी काम के दौरान एक छोटा सा नोटिफिकेशन भी ध्यान तोड़ सकता है.

अक्सर लोग सिर्फ एक मैसेज देखने के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन फिर सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग में कई मिनट या घंटे निकल जाते हैं. यही वजह है कि अब कई लोग “डिजिटल डिस्ट्रैक्शन” से बचने के लिए फोन को साइलेंट पर रखना बेहतर मानते हैं. इससे उनका फोकस बना रहता है और काम तेजी से पूरा होता है.

क्या यह मेंटल पीस की जरूरत का संकेत है?
कई बार फोन साइलेंट पर रखना सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि मानसिक थकान का संकेत भी हो सकता है. जब कोई व्यक्ति ज्यादा तनाव, भावनात्मक दबाव या निजी परेशानियों से गुजर रहा होता है, तो वह लोगों से थोड़ी दूरी बनाना चाहता है.

फोन को साइलेंट में डालकर लोग खुद के साथ समय बिताने की कोशिश करते हैं. कुछ समय तक बिना कॉल्स और मैसेज के रहना उन्हें मानसिक रूप से हल्का महसूस कराता है. यही वजह है कि अब “डिजिटल डिटॉक्स” जैसे शब्द तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं.

कब यह आदत चिंता का कारण बन सकती है?
अगर कोई व्यक्ति जरूरी कॉल्स से भी बचने लगे, लोगों से बातचीत कम कर दे या हर नोटिफिकेशन से परेशान होने लगे, तो यह मानसिक तनाव या अकेलेपन का संकेत हो सकता है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि लगातार खुद को सोशल इंटरैक्शन से दूर करना लंबे समय में रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर असर डाल सकता है.

सही बैलेंस बनाना क्यों जरूरी है?
हर समय फोन रिंगर पर रखना भी सही नहीं और हर वक्त साइलेंट में रखना भी नुकसानदायक हो सकता है. बेहतर तरीका यही है कि जरूरत के हिसाब से फोन सेटिंग्स का इस्तेमाल किया जाए. काम के समय फोन साइलेंट रखें, लेकिन जरूरी लोगों के नंबर “फेवरेट” या “इमरजेंसी कॉन्टैक्ट” में सेव रखें ताकि अहम कॉल मिस न हो.

इसके अलावा दिन का कुछ समय बिना स्मार्टफोन के बिताना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. छोटी-छोटी डिजिटल आदतें ही लंबे समय में आपकी मानसिक शांति तय करती हैं.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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