बॉलीवुड एक्ट्रेस नीना गुप्ता ने कहा कि समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर जितनी बातें की जाती हैं, असलियत उससे कहीं अलग है। आज भी देश के अधिकांश घरों में लड़कियों के लिए सोच नहीं बदली है। उन्होंने कहा कि बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का नारा देने से पहले दादा-दादी और नाना-नानी को पढ़ाओ वाला काम करना होगा, तभी बेटी सच में बचेगी। नीना गुप्ता ने यह बात जयपुर के होटल ललित में आयोजित ‘डायलॉग ऑन मेंटल वेलनेस’ कार्यक्रम में कही। इस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा सच कहूं तो, परिवार, महिलाओं की स्थिति, पालन-पोषण, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और अपने जीवन के अनुभवों पर खुलकर बात की। मेरे पास काम नहीं था तो कोई भी मेरे बारे में कुछ भी लिख देता था नीना गुप्ता ने कहा कि अपनी आत्मकथा लिखने का विचार करीब 25 साल पहले आया था। शुरू में जब मेरे पास काम नहीं था, तब मेरी कोई वैल्यू नहीं थी, तो कोई भी मेरे बारे में कुछ भी लिख देता था। तब मुझे लगा कि किसी को पता ही नहीं कि मैं असल में कैसी हूं। इसलिए मैंने सोचा कि मैं खुद लिखूंगी कि मैं वास्तव में कैसी हूं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्होंने किताब लिखने के लिए एडवांस भी ले लिया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई। मैं मम्मी, पापा, भाई और उनका परिवार के बारे में लिखना चाहती थी। उन्होंने पूरी जिंदगी अपनी सच्चाई छिपाकर रखी थी। मुझे लगा कि मुझे उनकी जिंदगी सामने लाने का अधिकार नहीं है। जब भी लिखना शुरू करती, सोचती कि मम्मी को बुरा लगेगा, पापा को बुरा लगेगा, भाई को बुरा लगेगा और मैं रुक जाती थी। ‘कोविड में हिम्मत आई, क्योंकि अब किसी का डर नहीं था’ उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान जब वह छह महीने अपने पहाड़ी घर में रहीं, तब जाकर किताब पूरी हो सकी। तब तक मेरे परिवार के लगभग सभी लोग इस दुनिया से जा चुके थे। तब मुझे किसी का डर नहीं था। क्योंकि हम सबसे ज्यादा अपने लोगों से ही डरते हैं। मैं तो भगवान से ज्यादा अपनी बेटी से डरती हूं। नीना ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी किताब में भी सब कुछ नहीं लिखा। उन्होंने कहा कि मैंने झूठ नहीं लिखा, लेकिन सब कुछ भी नहीं लिखा। कुछ लोगों के बारे में बातें छिपा दीं क्योंकि लगा कि वह मेरी बेटी मसाबा, मेरे पति या कुछ दूसरे लोगों के लिए ठीक नहीं होगा। मैं किसी से बदला नहीं लेना चाहती थी। मेरे पास मौका था कि जिन लोगों ने मेरे साथ गलत किया, उनके बारे में लिखूं, लेकिन मैंने खुद को रोका। उन्होंने हंसते हुए कहा कि प्रकाशक के वकीलों ने तो उन्हें लगभग सभी लोगों के नाम तक बदलने के लिए कह दिया था। ‘भगवान से लड़ती भी हूं और धन्यवाद भी देती हूं’ मानसिक स्वास्थ्य पर बात करते हुए नीना ने कहा कि वह अपना मन भगवान के सामने खोल देती हैं। मैं दिन में कम से कम दस बार भगवान को धन्यवाद कहती हूं। जब रात को अपनी सफेद चादर पर लेटती हूं तो सबसे पहले ‘थैंक यू’ बोलती हूं। और जब गुस्सा आता है तो भगवान को डांटती भी हूं। कोई तो ताकत है जो मुझसे बड़ी है। मैं उसी से बात करती हूं। महिलाओं की स्थिति पर उन्होंने कहा कि शहरों में थोड़ा बदलाव जरूर दिखता है, लेकिन गांवों और छोटे कस्बों में हालात अब भी पहले जैसे हैं। हम लोग शायद एक-दो प्रतिशत आबादी की बात कर रहे हैं। बाकी जगह आज भी घूंघट है, पैर छूना है, सेवा करना है। बहुत कुछ नहीं बदला है। पंचायत वेबसीरीज का सुनाया किस्सा नीना ने पंचायत की शूटिंग के दौरान मध्य प्रदेश के एक गांव का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि मैंने एक लड़की से पूछा कि क्या पढ़ती हो? उसकी मां बोली- पढ़ तो रही है, लेकिन 18 साल की होते ही शादी कर देंगे। फिर घूंघट करेगी, घर संभालेगी, बच्चे पैदा करेगी। यह आज भी हो रहा है। उन्होंने कहा कि केवल बेटी को पढ़ाने से बदलाव नहीं आएगा। मैंने अपनी एक दोस्त से कहा कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ से पहले दादा-दादी और नाना-नानी को पढ़ाओ। जब तक उनकी सोच नहीं बदलेगी, बेटी पढ़ भी जाएगी तो उससे कहा जाएगा कि अब बर्तन मांजो। ‘बच्चों पर गुस्सा नहीं, प्यार से बात कीजिए’ उन्होंने अपनी बेटी मसाबा के साथ रिश्ते का जिक्र करते हुए कहा कि समय के साथ उन्होंने खुद भी बहुत कुछ सीखा। पहले मैं कहती थी- नहीं जाना है तो नहीं जाना है। फिर जवाब मिलता था- मैं तो जाऊंगी। बाद में समझ आया कि अगर वही बात प्यार से कहूं कि बेटा, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा… बाकी फैसला तुम्हारा है, तो वह खुद सोचती थी। उन्होंने कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो माता-पिता करते हैं। एक दिन मैंने बेटी से कहा कि चिल्लाओ मत। उसने जवाब दिया- आप भी तो चिल्लाती हैं। तब समझ आया कि बच्चे वही दोहराते हैं जो हमें करते हुए देखते हैं। ‘मेरा फोकस काम से हटकर रिश्तों पर चला गया’ कार्यक्रम में अपने करियर को लेकर उन्होंने खुलकर आत्ममंथन किया। उन्होंने कहा कि अगर मेरा फोकस सही रहता तो मैं और ऊंचाई तक पहुंच सकती थी। एक समय ऐसा आया जब मेरा ध्यान काम से ज्यादा एक अच्छे जीवनसाथी की तलाश पर चला गया। मुझे लगता है कि यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। महिलाओं का फोकस कई बार करियर से हटकर पति ढूंढने पर चला जाता है। अर्जुन की तरह अगर सिर्फ लक्ष्य पर नजर रहे तो मंजिल जरूर मिलती है। ‘आज की पीढ़ी बहुत कन्फ्यूज है’ युवाओं की मानसिक स्थिति पर उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी सबसे ज्यादा भ्रम में है। मैं बहुत सारी युवा लड़कियों के साथ काम कर रही हूं। वे कहती हैं कि अच्छे लड़के नहीं मिलते। डेटिंग ऐप्स पर जा रही हैं, लेकिन वहां भी परेशान हैं। दूसरी तरफ लड़के भी यही कहते होंगे कि अच्छी लड़कियां नहीं मिलतीं। यह पीढ़ी बहुत कन्फ्यूज है। घर में पुराने विचार हैं और बाहर बहुत आधुनिक सोच। ऐसे में उन्हें समझ नहीं आता कि सही क्या है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कहा कि जिंदगी में ठोकरें जरूरी हैं। जीवन जीना कोई सिखा नहीं सकता। हर किसी की परेशानियां अलग होती हैं। अनुभव से सीखना पड़ता है। अगर ऊपर पहुंचना है तो गिरना भी पड़ेगा। बिना गिरे कोई आगे नहीं बढ़ता।
















































