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रुड़की की सोनिया ने सीनियर नेशनल एथलेटिक्स में जीता सिल्वर:रांची के ट्रैक पर 10 हजार मीटर दौड़ीं; पहले ही दिन हासिल किया पदक

रुड़की की सोनिया ने सीनियर नेशनल एथलेटिक्स में जीता सिल्वर:रांची के ट्रैक पर 10 हजार मीटर दौड़ीं; पहले ही दिन हासिल किया पदक

झारखंड की राजधानी रांची के बिरसा मुंडा स्टेडियम में शुक्रवार से शुरू हुई 29वीं नेशनल सीनियर एथलेटिक्स फेडरेशन चैंपियनशिप में उत्तराखंड की बेटी ने पहले ही दिन पदक हासिल कर लिया। रुड़की के एक छोटे से गांव की रहने वाली एथलीट कुमारी सोनिया ने महिला वर्ग की 10,000 मीटर रेस में सिल्वर मेडल जीतकर राज्य को गौरवान्वित किया। सोनिया ने यह रेस 36 मिनट 16.22 सेकंड में पूरी की। वह स्पोर्ट्स कॉलेज में उत्तराखंड के वरिष्ठ कोच लोकेश कुमार से प्रशिक्षण ले रही हैं। सोनिया की इस सफलता के पीछे उनके संघर्षों की एक लंबी कहानी है। यह वही सोनिया हैं, जिन्होंने संसाधनों की भारी कमी के बावजूद कभी हालातों के आगे घुटने नहीं टेके। फटे जूतों से रांची के पोडियम तक का सफर सोनिया की असली पहचान 2025 में हुए राष्ट्रीय खेलों के दौरान बनी थी, जब उन्होंने 10,000 मीटर की दौड़ में ही ब्रॉन्ज मेडल जीता था। उस जीत की सबसे बड़ी बात यह थी कि सोनिया के पास दौड़ने के लिए सही स्पाइक्स तक नहीं थे। वह फटे जूतों में ट्रैक पर उतरी थीं। इसके बाद उन्होंने जापान के फुकुओका में हुई 18वीं एशियन क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप में भी ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया था। महंगे सप्लीमेंट्स तो दूर, वह ऑनलाइन मिलने वाले सस्ते मल्टी-विटामिन के सहारे ही अपनी तैयारी कर रही थीं। स्नेह राणा ने बढ़ा था हौसला, दिए थे नए स्पाइक्स हाल ही में जब सोनिया के संघर्ष की यह कहानी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार ऑलराउंडर स्नेह राणा तक पहुंची थी, तो उन्होंने देहरादून स्थित अपने स्पोर्ट्स स्ट्राइव टर्फ पर सोनिया को बुलाया था। फटे जूतों में दौड़ने वाली सोनिया को जब स्नेह राणा ने प्रोफेशनल स्पोर्ट्स शूज और बेहतर न्यूट्रिशन सपोर्ट सौंपा, तो वह भावुक हो गई थीं। नए स्पाइक्स और स्नेह राणा से मिले उसी नए आत्मविश्वास को लेकर सोनिया रांची के ट्रैक पर उतरीं और सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया। पिता करते हैं मजदूरी, बहनों ने निभाया मां का फर्ज सोनिया का पूरा बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार में चार बहनें और एक भाई हैं। पिता मजदूरी करके घर चलाते हैं और मां का निधन हो चुका है। सोनिया बताती हैं कि कई बार ऐसा वक्त आया जब तंगी के कारण ट्रेनिंग छोड़ने का मन हुआ, लेकिन उनकी बहनों ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया। बहनों ने ही मां की कमी पूरी की और हर मुश्किल में साथ खड़ी रहीं। गांव के तानों को बनाया अपनी ताकत सोनिया के सफर में सिर्फ गरीबी ही नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव भी बड़ी चुनौती रहा। गांव के लोग अक्सर ताने मारते थे और परिवार से कहते थे कि लड़की को वापस बुला लो। लेकिन, सोनिया ने इन बातों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने लोगों को जवाब देने के बजाय अपनी मेहनत से खुद को साबित करने का रास्ता चुना और आज रांची में जीता गया यह सिल्वर मेडल उन सभी तानों का जवाब है।

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