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रेगिस्तान में बकरियां चराती थीं, आज फुटबॉल खिलाड़ी:लड़कियों के शॉर्ट्स पहनने का विरोध हुआ, कोच ने बेच दी थी अपनी 15 बीघा जमीन

रेगिस्तान में बकरियां चराती थीं, आज फुटबॉल खिलाड़ी:लड़कियों के शॉर्ट्स पहनने का विरोध हुआ, कोच ने बेच दी थी अपनी 15 बीघा जमीन

तपती रेत, दूर-दूर तक फैला सन्नाटा, और रूढ़िवादिता की मजबूत बेड़ियां। ढाई हजार की आबादी का यह छोटा सा गांव ढींगसरी, राजस्थान के नक्शे पर किसी भी आम रेतीले गांव जैसा ही नजर आता है। इन दिनों इस गांव की हवा बदली हुई है। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले, जब पूरा रेगिस्तान सो रहा होता है, तब यहां की रेतीली जमीन पर जूतों की थाप और फुटबॉल की ‘टप-टप’ की आवाजें गूंजने लगती हैं। यह कहानी सिर्फ एक खेल की नहीं है। यह कहानी है उस संघर्ष की, जिसने बकरियां चराने वाली और घर-खेत के कामों में सिमटी बच्चियों को अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बना दिया। आज वर्ल्ड फुटबॉल डे के मौके पर बीकानेर शहर से दक्षिण में 58 किलोमीटर दूर ढींगसरी गांव हम आपके ले चलते हैं, जहां की बेटियां फुटबॉल में नाम कमा रही हैं। जो कल तक बकरियां चराती थीं, वो आज देश के लिए गोल दाग रही हैं ढींगसरी गांव की एक बेटी है- मुन्नी भांभू। मुन्नी आज इस गांव की हर उस बच्ची की उम्मीद का चेहरा बन चुकी है, जो कभी पिंजरे में कैद थी।
एक बेहद सामान्य परिवार से आने वाली मुन्नी के पास कभी खेलने के लिए ढंग के जूते तक नहीं थे। वो संसाधनों की कमी के बावजूद सबसे पहले मैदान पहुंचती और देर शाम तक अकेले पसीना बहाती। आज मुन्नी भांभू भारतीय अंडर-17 महिला फुटबॉल टीम की मुख्य गोलकीपर हैं और चीन में हुए ‘एशियन कप क्वालिफायर मैच’ में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। 27 साल बाद राजस्थान से भारतीय महिला फुटबॉल टीम में जगह बनाने वाली वे पहली खिलाड़ी हैं। इतना ही नहीं, ‘SAFF U-19 महिला चैंपियनशिप 2026’ में मुन्नी को ‘सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर’ का अवॉर्ड भी मिल चुका है। मुन्नी भावुक हो जाती हैं और कहती हैं- मैं तो गांव में बस सामान्य पढ़ाई कर रही थी। विक्रम सर ने उंगली थामी और मुझे फुटबॉल से जोड़ा। आज मैं जो कुछ भी हूं, उन्हीं की बदौलत हूं। गांव की बेटियां गोलकीपर के दस्ताने पहनकर तूफानी शॉट रोक रहीं ढींगसरी गांव की मुन्नी अकेली नहीं है। इस रेतीले धोरों से फुटबॉल की ऐसी पौध निकली है कि आज गांव की करीब 60 बेटियां मैदान पर पसीना बहा रही हैं। ये वो बच्चियां हैं, जिनके हाथों में कुछ समय पहले तक या तो बकरियां चराने की लाठी थी, या फिर चूल्हा-चौका संभालते हुए घरेलू काम का बोझ। जिन उंगलियों को सिर्फ गोबर के उपले थापना सिखाया जा रहा था, आज वे गोलकीपर के दस्ताने पहनकर तूफानी शॉट रोक रही हैं। लड़कों ने नहीं दिखाया इंटरेस्ट, तो कोच ने थामी लड़कियों की उंगली इस सुनहरे सफर की शुरुआत साल 2020 में हुई थी। भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान और अर्जुन अवॉर्डी मगन सिंह राजवी के बेटे विक्रम सिंह राजवी (जो खुद रेलवे में हैं और फुटबॉल कोच हैं) ने नई पीढ़ी को तराशने का बीड़ा उठाया। उन्होंने शुरुआत गांव के लड़कों से की थी, लेकिन लड़कों ने खेल में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। वे कभी प्रैक्टिस में आते, तो कभी गायब हो जाते। गांव की बेटियों को मैदान में उतारा यह राह इतनी आसान नहीं थी। विक्रम सिंह उन घरों तक पहुंचे जहां बच्चियां सिर्फ स्कूल, चूल्हे-चौके या खेत के कामों तक सीमित थीं। शुरुआत में हर दरवाजे से ‘ना’ सुनने को मिली। लोग बेटियों को बाहर भेजने को तैयार नहीं थे। लेकिन कोच की जिद के आगे कुछ परिवार राजी हुए और साल 2021 में 20 लड़कियों के साथ ढींगसरी की रेतीली जमीन पर ट्रेनिंग शुरू हुई। जब ‘शॉर्ट्स’ पहनने पर हुआ विरोध, तो घर की महिलाओं को मैदान में उतारा गांव में लड़कियों का फुटबॉल खेलना ही बड़ी बात थी, लेकिन असली परीक्षा तब हुई जब बच्चियों को लोअर (शॉर्ट्स) पहनकर खेलने को कहा गया। रूढ़िवादी माहौल में बच्चियों के छोटे कपड़े पहनकर खेलने को लेकर खूब विरोध हुआ। परिवार वाले अड़ गए। तब कोच विक्रम सिंह ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने कोटा फुटबॉल एकेडमी की टीम को ढींगसरी में मैच के लिए बुलाया। उस मैच में कोटा की लड़कियां शॉर्ट्स पहनकर उतरीं और ढींगसरी की टीम हार गई। विक्रम सिंह ने बच्चियों और उनके माता-पिता को समझाया कि इस खेल में फुर्ती के लिए शॉर्ट्स पहनना मजबूरी है, शौक नहीं। ग्रामीणों का झिझक और डर दूर करने के लिए कोच की पत्नी और उनके घर की महिलाएं भी हर रोज प्रैक्टिस के दौरान मैदान पर बैठने लगीं। तब जाकर माता-पिता का भरोसा जागा। कोच विक्रम सिंह राजवी कहते हैं- शुरुआत में जो बच्चियां 4-5 किलोमीटर दूर से आती थीं, उन्हें खुद अपनी गाड़ी से मैदान लाता था। उनके पैर न रुकें, बस यही एक जिद थी। एक खिलाड़ी की सगाई हुई, तो पूरी टीम को लेकर कोटा चले गए कोच साल 2022 में इस सफर में एक और बड़ा मोड़ आया। टीम की एक होनहार खिलाड़ी की उसके घर वालों ने कोटा में सगाई तय कर दी। विक्रम सिंह को डर था कि कहीं एक लड़की के जाने से पूरी टीम का हौसला न टूट जाए। उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। वे सभी 20 बच्चियों को लेकर खुद कोटा शिफ्ट हो गए। वहां उनका स्कूल में एडमिशन कराया और एकेडमी जॉइन कराई। दो साल की इस तपस्या का फल तब मिला, जब कर्नाटक के बेलगाम में नेशनल टूर्नामेंट हुआ। राजस्थान की टीम में चुने गए 22 खिलाड़ियों में से 12 लड़कियां अकेले ढींगसरी गांव की थीं। जब इन बेटियों ने कर्नाटक में नेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट जीता, तो पूरे ढींगसरी गांव की आंखों में आंसू आ गए। जो गांव कभी विरोध कर रहा था, वो अब अपनी बेटियों के स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा था। बेटियों के सपनों के लिए बेच डाली 15 बीघा जमीन साल 2024 में विक्रम सिंह बच्चियों को लेकर वापस गांव लौट आए। अब गांव वालों का विश्वास मजबूत हो चुका था, लेकिन ट्रेनिंग के लिए एक बड़े मैदान की जरूरत थी। विक्रम सिंह ने पहले अपनी जमा पूंजी से गांव में 10 बीघा जमीन खरीदी, लेकिन मैदान छोटा पड़ रहा था। उन्हें 8.50 बीघा जमीन और चाहिए थी। विक्रम सिंह बताते हैं- गांव से दूर मेरी 15 बीघा पुश्तैनी जमीन और थी। लेकिन एकेडमी मुझे इसी गांव में बनानी थी। मैंने अपनी वो पूरी 15 बीघा जमीन बेच दी और उस पैसे से गांव में ही जमीन खरीदकर दो शानदार फुटबॉल मैदान तैयार किए। इस मैदान का करिश्मा देखिए… साल 2024 में 60 साल बाद राजस्थान की लड़कियों ने फुटबॉल की नेशनल ट्रॉफी जीती। इस टीम में भी 12 लड़कियां ढींगसरी की थीं। यह एक अद्भुत संयोग था कि 60 साल पहले कोच विक्रम सिंह के पिता मगन सिंह राजवी ने जो नेशनल ट्रॉफी जीती थी, ठीक 60 साल बाद उसी गांव की बेटियों ने इतिहास दोहरा दिया। बदल गई ढींगसरी की तस्वीर, अब 100 बेटियां हॉस्टल में रहकर ले रहीं ट्रेनिंग आज ढींगसरी गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। सीनियर खिलाड़ी हंसा राजवी कहती हैं- पहले हम सिर्फ घर का काम करते थे, पानी भरते थे। अब सुबह 5:30 बजे मैदान में होते हैं। वहीं राजस्थान टीम की कप्तान संजू राजवी कहती हैं- अब गांव के लोगों की सोच बदल गई है। छोटी उम्र में लड़कियों की शादी करने की बजाय लोग उन्हें खिलाना चाहते हैं। अर्जुन अवॉर्डी बोले- 100 बच्चियां ट्रेनिं ले रही हैं अर्जुन अवॉर्डी मगन सिंह राजवी कहते हैं- हमने अपनी पूरी पूंजी लगा दी, लेकिन आज खुशी है कि 100 बच्चियां यहां ट्रेनिंग ले रही हैं। इस पुनीत कार्य में अब भामाशाह भी आगे आ रहे हैं।

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एक बेहद सामान्य परिवार से आने वाली मुन्नी के पास कभी खेलने के लिए ढंग के जूते तक नहीं थे। वो संसाधनों की कमी के बावजूद सबसे पहले मैदान पहुंचती और देर शाम तक अकेले पसीना बहाती। आज मुन्नी भांभू भारतीय अंडर-17 महिला फुटबॉल टीम की मुख्य गोलकीपर हैं और चीन में हुए ‘एशियन कप क्वालिफायर मैच’ में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। 27 साल बाद राजस्थान से भारतीय महिला फुटबॉल टीम में जगह बनाने वाली वे पहली खिलाड़ी हैं। इतना ही नहीं, ‘SAFF U-19 महिला चैंपियनशिप 2026’ में मुन्नी को ‘सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर’ का अवॉर्ड भी मिल चुका है। मुन्नी भावुक हो जाती हैं और कहती हैं- मैं तो गांव में बस सामान्य पढ़ाई कर रही थी। विक्रम सर ने उंगली थामी और मुझे फुटबॉल से जोड़ा। आज मैं जो कुछ भी हूं, उन्हीं की बदौलत हूं। गांव की बेटियां गोलकीपर के दस्ताने पहनकर तूफानी शॉट रोक रहीं ढींगसरी गांव की मुन्नी अकेली नहीं है। इस रेतीले धोरों से फुटबॉल की ऐसी पौध निकली है कि आज गांव की करीब 60 बेटियां मैदान पर पसीना बहा रही हैं। ये वो बच्चियां हैं, जिनके हाथों में कुछ समय पहले तक या तो बकरियां चराने की लाठी थी, या फिर चूल्हा-चौका संभालते हुए घरेलू काम का बोझ। जिन उंगलियों को सिर्फ गोबर के उपले थापना सिखाया जा रहा था, आज वे गोलकीपर के दस्ताने पहनकर तूफानी शॉट रोक रही हैं। लड़कों ने नहीं दिखाया इंटरेस्ट, तो कोच ने थामी लड़कियों की उंगली इस सुनहरे सफर की शुरुआत साल 2020 में हुई थी। भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान और अर्जुन अवॉर्डी मगन सिंह राजवी के बेटे विक्रम सिंह राजवी (जो खुद रेलवे में हैं और फुटबॉल कोच हैं) ने नई पीढ़ी को तराशने का बीड़ा उठाया। उन्होंने शुरुआत गांव के लड़कों से की थी, लेकिन लड़कों ने खेल में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। वे कभी प्रैक्टिस में आते, तो कभी गायब हो जाते। गांव की बेटियों को मैदान में उतारा यह राह इतनी आसान नहीं थी। विक्रम सिंह उन घरों तक पहुंचे जहां बच्चियां सिर्फ स्कूल, चूल्हे-चौके या खेत के कामों तक सीमित थीं। शुरुआत में हर दरवाजे से ‘ना’ सुनने को मिली। लोग बेटियों को बाहर भेजने को तैयार नहीं थे। लेकिन कोच की जिद के आगे कुछ परिवार राजी हुए और साल 2021 में 20 लड़कियों के साथ ढींगसरी की रेतीली जमीन पर ट्रेनिंग शुरू हुई। जब ‘शॉर्ट्स’ पहनने पर हुआ विरोध, तो घर की महिलाओं को मैदान में उतारा गांव में लड़कियों का फुटबॉल खेलना ही बड़ी बात थी, लेकिन असली परीक्षा तब हुई जब बच्चियों को लोअर (शॉर्ट्स) पहनकर खेलने को कहा गया। रूढ़िवादी माहौल में बच्चियों के छोटे कपड़े पहनकर खेलने को लेकर खूब विरोध हुआ। परिवार वाले अड़ गए। तब कोच विक्रम सिंह ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने कोटा फुटबॉल एकेडमी की टीम को ढींगसरी में मैच के लिए बुलाया। उस मैच में कोटा की लड़कियां शॉर्ट्स पहनकर उतरीं और ढींगसरी की टीम हार गई। विक्रम सिंह ने बच्चियों और उनके माता-पिता को समझाया कि इस खेल में फुर्ती के लिए शॉर्ट्स पहनना मजबूरी है, शौक नहीं। ग्रामीणों का झिझक और डर दूर करने के लिए कोच की पत्नी और उनके घर की महिलाएं भी हर रोज प्रैक्टिस के दौरान मैदान पर बैठने लगीं। तब जाकर माता-पिता का भरोसा जागा। कोच विक्रम सिंह राजवी कहते हैं- शुरुआत में जो बच्चियां 4-5 किलोमीटर दूर से आती थीं, उन्हें खुद अपनी गाड़ी से मैदान लाता था। उनके पैर न रुकें, बस यही एक जिद थी। एक खिलाड़ी की सगाई हुई, तो पूरी टीम को लेकर कोटा चले गए कोच साल 2022 में इस सफर में एक और बड़ा मोड़ आया। टीम की एक होनहार खिलाड़ी की उसके घर वालों ने कोटा में सगाई तय कर दी। विक्रम सिंह को डर था कि कहीं एक लड़की के जाने से पूरी टीम का हौसला न टूट जाए। उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। वे सभी 20 बच्चियों को लेकर खुद कोटा शिफ्ट हो गए। वहां उनका स्कूल में एडमिशन कराया और एकेडमी जॉइन कराई। दो साल की इस तपस्या का फल तब मिला, जब कर्नाटक के बेलगाम में नेशनल टूर्नामेंट हुआ। राजस्थान की टीम में चुने गए 22 खिलाड़ियों में से 12 लड़कियां अकेले ढींगसरी गांव की थीं। जब इन बेटियों ने कर्नाटक में नेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट जीता, तो पूरे ढींगसरी गांव की आंखों में आंसू आ गए। जो गांव कभी विरोध कर रहा था, वो अब अपनी बेटियों के स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा था। बेटियों के सपनों के लिए बेच डाली 15 बीघा जमीन साल 2024 में विक्रम सिंह बच्चियों को लेकर वापस गांव लौट आए। अब गांव वालों का विश्वास मजबूत हो चुका था, लेकिन ट्रेनिंग के लिए एक बड़े मैदान की जरूरत थी। विक्रम सिंह ने पहले अपनी जमा पूंजी से गांव में 10 बीघा जमीन खरीदी, लेकिन मैदान छोटा पड़ रहा था। उन्हें 8.50 बीघा जमीन और चाहिए थी। विक्रम सिंह बताते हैं- गांव से दूर मेरी 15 बीघा पुश्तैनी जमीन और थी। लेकिन एकेडमी मुझे इसी गांव में बनानी थी। मैंने अपनी वो पूरी 15 बीघा जमीन बेच दी और उस पैसे से गांव में ही जमीन खरीदकर दो शानदार फुटबॉल मैदान तैयार किए। इस मैदान का करिश्मा देखिए… साल 2024 में 60 साल बाद राजस्थान की लड़कियों ने फुटबॉल की नेशनल ट्रॉफी जीती। इस टीम में भी 12 लड़कियां ढींगसरी की थीं। यह एक अद्भुत संयोग था कि 60 साल पहले कोच विक्रम सिंह के पिता मगन सिंह राजवी ने जो नेशनल ट्रॉफी जीती थी, ठीक 60 साल बाद उसी गांव की बेटियों ने इतिहास दोहरा दिया। बदल गई ढींगसरी की तस्वीर, अब 100 बेटियां हॉस्टल में रहकर ले रहीं ट्रेनिंग आज ढींगसरी गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। सीनियर खिलाड़ी हंसा राजवी कहती हैं- पहले हम सिर्फ घर का काम करते थे, पानी भरते थे। अब सुबह 5:30 बजे मैदान में होते हैं। वहीं राजस्थान टीम की कप्तान संजू राजवी कहती हैं- अब गांव के लोगों की सोच बदल गई है। छोटी उम्र में लड़कियों की शादी करने की बजाय लोग उन्हें खिलाना चाहते हैं। अर्जुन अवॉर्डी बोले- 100 बच्चियां ट्रेनिं ले रही हैं अर्जुन अवॉर्डी मगन सिंह राजवी कहते हैं- हमने अपनी पूरी पूंजी लगा दी, लेकिन आज खुशी है कि 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