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शुगर कंट्रोल, खून की कमी दूर…बागेश्वर का लाल चावल सेहत के लिए वरदान, बना देगा जिम वाली बॉडी

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Red Rice Benefits : बागेश्वर का लाल चावल कपकोट, शामा, रीमा और आसपास के पहाड़ी इलाकों में उगता है. इसे स्थानीय भाषा में जुमरिया धान कहते हैं. स्वाद, सुगंध और पोषण से भरपूर है. लोकल 18 से बागेश्वर के आयुष चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि लाल चावल सफेद वाले की तुलना में ज्यादा पौष्टिक माना जाता है. इसमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट तत्व पाए जाते हैं. यह शरीर को ताकत देने, खून की कमी दूर करने और पाचन तंत्र को मजबूत रखने में रामबाण है.

बागेश्वर. उत्तराखंड के बागेश्वर में उगने वाला पारंपरिक लाल चावल अपनी खास खूबियों के लिए जाना जाता है. ये जिले के कपकोट, शामा, रीमा और आसपास के पहाड़ी इलाकों में उगता है. इस चावल को स्थानीय भाषा में ‘जुमरिया’ धान के नाम से जाना जाता है. स्वाद, सुगंध और पोषण से भरपूर यह चावल अब जिले की खास पहचान बनता जा रहा है. पहले यह चावल केवल स्थानीय घरों और पर्व-त्योहारों तक सीमित था, लेकिन अब इसकी मांग बाजारों तक पहुंच गई है. लोकल 18 से बागेश्वर के आयुष चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि लाल चावल सामान्य सफेद चावल की तुलना में ज्यादा पौष्टिक माना जाता है. इसमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट तत्व अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर को ताकत देने, खून की कमी दूर करने और पाचन तंत्र को मजबूत रखने में मददगार है.

डॉ. पटेल बताते हैं कि इस चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम माना जाता है, जिससे यह मधुमेह रोगियों के लिए भी सफेद चावल की तुलना में अच्छा विकल्प बन रहा है. इसके नियमित सेवन से शरीर को ऊर्जा मिलती है, लंबे समय तक पेट भरा रहने का अहसास होता है. यही वजह है कि फिटनेस पसंद करने वाले लोग भी इसे अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं.

शादी और पूजा के लिए स्पेशल

बागेश्वर की व्यापारी संतोषी देवी बताती हैं कि लाल चावल की खेती पारंपरिक तरीके से की जाती है. पहाड़ों के सीढ़ीदार खेतों में वर्षा जल और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे इसकी खेती होती है. कई किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं करते, जिससे यह चावल काफी हद तक जैविक माना जाता है. प्राकृतिक खेती से इसकी गुणवत्ता और स्वाद दोनों बेहतर बने रहते हैं. लाल चावल पकने के बाद हल्की सुगंध देता है, खाने में स्वादिष्ट होता है. इससे खीर, मीठे चावल, भात, पुलाव और कई पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन तैयार किए जाते हैं. शादी-विवाह, पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर भी इस चावल का उपयोग किया जाता है.

ऑनलाइन बाजार ने बढ़ाई कीमत

अब यह लाल चावल स्थानीय मंडियों के साथ ऑनलाइन बाजारों में भी जगह बना रहा है. बाहर से आने वाले पर्यटक भी इसे खरीदकर ले जा रहे हैं. इससे किसानों को अच्छी कीमत मिलने लगी है, उनकी आय बढ़ने की उम्मीद जगी है. यदि इस पारंपरिक धान को बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और सरकारी प्रोत्साहन मिले तो बागेश्वर का लाल चावल राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान बना सकता है. स्वाद, सेहत और परंपरा का अनोखा मेल होने के कारण यह चावल भविष्य में जिले की आर्थिक ताकत भी बन सकता है.

About the Author

Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें

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बागेश्वर. उत्तराखंड के बागेश्वर में उगने वाला पारंपरिक लाल चावल अपनी खास खूबियों के लिए जाना जाता है. ये जिले के कपकोट, शामा, रीमा और आसपास के पहाड़ी इलाकों में उगता है. इस चावल को स्थानीय भाषा में ‘जुमरिया’ धान के नाम से जाना जाता है. स्वाद, सुगंध और पोषण से भरपूर यह चावल अब जिले की खास पहचान बनता जा रहा है. पहले यह चावल केवल स्थानीय घरों और पर्व-त्योहारों तक सीमित था, लेकिन अब इसकी मांग बाजारों तक पहुंच गई है. लोकल 18 से बागेश्वर के आयुष चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि लाल चावल सामान्य सफेद चावल की तुलना में ज्यादा पौष्टिक माना जाता है. इसमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट तत्व अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर को ताकत देने, खून की कमी दूर करने और पाचन तंत्र को मजबूत रखने में मददगार है.

डॉ. पटेल बताते हैं कि इस चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम माना जाता है, जिससे यह मधुमेह रोगियों के लिए भी सफेद चावल की तुलना में अच्छा विकल्प बन रहा है. इसके नियमित सेवन से शरीर को ऊर्जा मिलती है, लंबे समय तक पेट भरा रहने का अहसास होता है. यही वजह है कि फिटनेस पसंद करने वाले लोग भी इसे अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं.

शादी और पूजा के लिए स्पेशल

बागेश्वर की व्यापारी संतोषी देवी बताती हैं कि लाल चावल की खेती पारंपरिक तरीके से की जाती है. पहाड़ों के सीढ़ीदार खेतों में वर्षा जल और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे इसकी खेती होती है. कई किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं करते, जिससे यह चावल काफी हद तक जैविक माना जाता है. प्राकृतिक खेती से इसकी गुणवत्ता और स्वाद दोनों बेहतर बने रहते हैं. लाल चावल पकने के बाद हल्की सुगंध देता है, खाने में स्वादिष्ट होता है. इससे खीर, मीठे चावल, भात, पुलाव और कई पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन तैयार किए जाते हैं. शादी-विवाह, पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर भी इस चावल का उपयोग किया जाता है.

ऑनलाइन बाजार ने बढ़ाई कीमत

अब यह लाल चावल स्थानीय मंडियों के साथ ऑनलाइन बाजारों में भी जगह बना रहा है. बाहर से आने वाले पर्यटक भी इसे खरीदकर ले जा रहे हैं. इससे किसानों को अच्छी कीमत मिलने लगी है, उनकी आय बढ़ने की उम्मीद जगी है. यदि इस पारंपरिक धान को बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और सरकारी प्रोत्साहन मिले तो बागेश्वर का लाल चावल राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान बना सकता है. स्वाद, सेहत और परंपरा का अनोखा मेल होने के कारण यह चावल भविष्य में जिले की आर्थिक ताकत भी बन सकता है.

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प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें

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