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₹21,000 Cr Outflow in March 2026 Amid West Asia Crisis

₹21,000 Cr Outflow in March 2026 Amid West Asia Crisis
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मुंबई43 मिनट पहले

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भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की ओर से भारी बिकवाली देखने को मिल रही है। वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव और ग्लोबल रिस्क सेंटीमेंट बिगड़ने के कारण पिछले कारोबारी हफ्ते यानी 4 ट्रेडिंग सेशन में विदेशी निवेशकों ने बाजार से करीब 21,000 करोड़ रुपए निकाले हैं।

यह बिकवाली मार्च के पहले हफ्ते (2 से 6 मार्च) के दौरान हुई है। 3 मार्च को होली के अवसर पर भारतीय बाजार बंद रहा था। खास बात यह है कि फरवरी में FPI ने भारतीय बाजार में 22,615 करोड़ रुपए का निवेश किया था, जो पिछले 17 महीनों में सबसे ज्यादा था।

युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर

मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बिकवाली की सबसे बड़ी वजह वेस्ट एशिया में बढ़ता जियोपॉलिटिकल टेंशन है। 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के ईरान पर किए गए हमले के बाद क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई रुकने के डर से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 92 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चा तेल महंगा होना भारतीय इकोनॉमी के लिए निगेटिव माना जा रहा है।

डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर के पार

विदेशी निवेशकों की बाजार में बिकवाली की एक बड़ी वजह भारतीय रुपए में आई गिरावट भी है। डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर को पार कर गया है।

जब रुपया कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशकों को डॉलर में मिलने वाला रिटर्न कम हो जाता है, इसलिए वे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी और डॉलर में शिफ्ट होने लगते हैं।

इन 4 वजहों से बाजार पर बना दबाव

  • वेस्ट एशिया संकट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान-इजराइल युद्ध के बढ़ने की आशंका बढ़ गई है।
  • अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशक जोखिम वाले शेयर बाजार से पैसा निकालकर सरकारी बॉन्ड्स में लगा रहे हैं।
  • कॉर्पोरेट अर्निंग्स: वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही (Q4) के शुरुआती रुझान मिले-जुले हैं। वहीं IT-कंजम्पशन सेक्टर में मार्जिन पर दबाव है।
  • महंगाई का डर: कच्चा तेल महंगा होने से भारत में करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है।

घरेलू निवेशकों ने बाजार संभाला

विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार पूरी तरह क्रैश नहीं हुए हैं। इसकी वजह डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) हैं।

म्यूचुअल फंड्स में हर महीने आने वाली सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) की रकम ने बाजार को सपोर्ट दिया है। रिटेल निवेशकों के भरोसे के चलते बाजार में गिरावट सीमित रही है।

क्या आगे और गिरेगा बाजार?

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का कहना है कि जब तक जियोपॉलिटिकल हालात नहीं सुधरते और कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं, तब तक FPIs की वापसी मुश्किल है।

मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के हिमांशु श्रीवास्तव ने कहा कि ग्लोबल अनिश्चितता के कारण निवेशक फिलहाल सुरक्षित एसेट्स की तलाश में हैं।

ये खबर भी पढ़ें…

टॉप-10 कंपनियों में 8 की वैल्यू ₹2.81 लाख करोड़ घटी: SBI टॉप लूजर रहा, इसकी वैल्यू ₹53,953 करोड़ घटी; ICICI और HDFC बैंक का मार्केट कैप भी घटा

मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से देश की 10 सबसे बड़ी कंपनियों में से 8 की वैल्यू बीते हफ्ते के कारोबार में 2.81 लाख करोड़ रुपए घट गई। इस दौरान SBI की वैल्यू सबसे ज्यादा घटी। SBI का मार्केट कैप 53,953 करोड़ रुपए घटकर ₹10.55 लाख करोड़ पर आ गया।

ICICI बैंक की मार्केट वैल्यू ₹46,937 करोड़ घटकर ₹9.40 लाख करोड़ पर आ गई। वहीं HDFC बैंक का मार्केट कैप 46,552 करोड़ रुपए घटकर ₹13.19 लाख करोड़ पर आ गया। पूरी खबर पढ़ें…

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भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की ओर से भारी बिकवाली देखने को मिल रही है। वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव और ग्लोबल रिस्क सेंटीमेंट बिगड़ने के कारण पिछले कारोबारी हफ्ते यानी 4 ट्रेडिंग सेशन में विदेशी निवेशकों ने बाजार से करीब 21,000 करोड़ रुपए निकाले हैं।

यह बिकवाली मार्च के पहले हफ्ते (2 से 6 मार्च) के दौरान हुई है। 3 मार्च को होली के अवसर पर भारतीय बाजार बंद रहा था। खास बात यह है कि फरवरी में FPI ने भारतीय बाजार में 22,615 करोड़ रुपए का निवेश किया था, जो पिछले 17 महीनों में सबसे ज्यादा था।

युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर

मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बिकवाली की सबसे बड़ी वजह वेस्ट एशिया में बढ़ता जियोपॉलिटिकल टेंशन है। 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के ईरान पर किए गए हमले के बाद क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई रुकने के डर से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 92 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चा तेल महंगा होना भारतीय इकोनॉमी के लिए निगेटिव माना जा रहा है।

डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर के पार

विदेशी निवेशकों की बाजार में बिकवाली की एक बड़ी वजह भारतीय रुपए में आई गिरावट भी है। डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर को पार कर गया है।

जब रुपया कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशकों को डॉलर में मिलने वाला रिटर्न कम हो जाता है, इसलिए वे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी और डॉलर में शिफ्ट होने लगते हैं।

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  • वेस्ट एशिया संकट: ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान-इजराइल युद्ध के बढ़ने की आशंका बढ़ गई है।
  • अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशक जोखिम वाले शेयर बाजार से पैसा निकालकर सरकारी बॉन्ड्स में लगा रहे हैं।
  • कॉर्पोरेट अर्निंग्स: वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही (Q4) के शुरुआती रुझान मिले-जुले हैं। वहीं IT-कंजम्पशन सेक्टर में मार्जिन पर दबाव है।
  • महंगाई का डर: कच्चा तेल महंगा होने से भारत में करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है।

घरेलू निवेशकों ने बाजार संभाला

विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार पूरी तरह क्रैश नहीं हुए हैं। इसकी वजह डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) हैं।

म्यूचुअल फंड्स में हर महीने आने वाली सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) की रकम ने बाजार को सपोर्ट दिया है। रिटेल निवेशकों के भरोसे के चलते बाजार में गिरावट सीमित रही है।

क्या आगे और गिरेगा बाजार?

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का कहना है कि जब तक जियोपॉलिटिकल हालात नहीं सुधरते और कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं, तब तक FPIs की वापसी मुश्किल है।

मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के हिमांशु श्रीवास्तव ने कहा कि ग्लोबल अनिश्चितता के कारण निवेशक फिलहाल सुरक्षित एसेट्स की तलाश में हैं।

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