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1971 के नायक रहे राजस्थान के सपूत को बांग्लादेशी सम्मान:22 साल की उम्र में अंतिम सांस तक पाकिस्तानी ठिकानों पर करते रहे थे बमबारी

1971 के नायक रहे राजस्थान के सपूत को बांग्लादेशी सम्मान:22 साल की उम्र में अंतिम सांस तक पाकिस्तानी ठिकानों पर करते रहे थे बमबारी

1971 के भारत-पाक युद्ध में मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले पिलानी (झुंझुनूं) के शहीद धर्मपाल डूडी के अदम्य साहस को आधी सदी बाद एक नई पहचान मिली है। बांग्लादेश सरकार ने शहीद के सर्वोच्च बलिदान को नमन करते हुए उनके परिवार को ‘विशेष प्रशस्ति पत्र’ और ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न’ भेंट किया।
गुरुवार को जब सेना के अधिकारी यह सम्मान लेकर शहीद के पैतृक गांव धींधवा पहुंचे, तो पूरा माहौल ‘शहीद धर्मपाल अमर रहे’ के नारों से गूंज उठा। बांग्लादेश से भेजे गए सम्मान की PHOTOS…. 54 साल का इंतजार, 2018 में जारी हुआ था पत्र, अब पहुंचा घर
बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना और राष्ट्रपति मोहम्मद अब्दुल हमीद के हस्ताक्षरों वाला यह सम्मान पत्र 27 नवंबर 2018 को जारी किया गया था। प्रशासनिक कारणों से इसे पहुंचने में देरी हुई, लेकिन गुरुवार दोपहर 2:30 बजे जब 65 मीडियम रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट विक्रांत, हवलदार रामबीर और अग्निवीर जीतू सिंह गांव पहुंचे, तो शहीद की यादें फिर ताजा हो गईं। जवानों ने शहीद स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें सलामी दी। शरीर जख्मी था, लेकिन हौसला फौलादी
3 दिसंबर 1971 को अखोरा (ढाका) में भीषण जंग जारी थी। धर्मपाल डूडी और उनकी टीम पाकिस्तानी ठिकानों पर कहर बनकर टूट रही थी। इसी बीच पाकिस्तान की ओर से किए गए भारी बम हमले में धर्मपाल गंभीर रूप से घायल हो गए। शहीद के भतीजे सुनील कुमार डूडी ने बताया- दुश्मन का गोला उनके पास गिरा, वे लहूलुहान थे। शरीर से खून बह रहा था, लेकिन उन्होंने अपना रेडियो सेट और गन नहीं छोड़ी। दर्द असहनीय था, पर उनके दिमाग में सिर्फ दुश्मन को तबाह करने का लक्ष्य था। घायल अवस्था में भी वे अंतिम सांस तक पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक बमबारी करवाते रहे और अंततः 4 दिसंबर 1971 को वह वीरगति को प्राप्त हुए। 13 जनवरी 1970 को सेना में भर्ती हुए थे
धर्मपाल डूडी (शहीद) के भतीजे सुनील कुमार डूडी ने गर्व से बताया कि उनके चाचा 13 जनवरी 1970 को सेना में भर्ती हुए थे। महज 22 साल की उम्र में वह शहीद हो गए थे। सम्मान- यूनिट ने ‘धर्मपाल बैट्री’ रखा नाम
लेफ्टिनेंट विक्रांत ने बताया कि 65 मीडियम रेजिमेंट की आर्टलरी यूनिट की एक बैट्री का नाम अब ‘शहीद धर्मपाल बैट्री’ रखा गया है। यह किसी भी सैनिक के लिए अद्वितीय सम्मान है। भारत सरकार उन्हें पहले ही ‘पूर्वी स्टार’ से नवाज चुकी है। 7 भाइयों में से 6 ने सेना में दीं सेवाएं
शहीद धर्मपाल समेत परिवार में सात भाई हैं। इनमें सबसे बड़े भाई मक्खन लाल का 2002 में निधन हो चुका है। वे गांव में ही खेती करते थे। इसके अलावा
लांस नायक अमर सिंह, सूबेदार शुभकरण, सूबेदार रणनीत सिंह, सूबेदार सत्यवीर सिंह, सूबेदार रामजीलाल सेना से रिटायर हो चुके हैं। शहीद धर्मपाल सिंह पांचवे नंबर के भाई थे। —- यह खबर भी पढ़िए… ऑपरेशन-सिंदूर में शहीद हुए सुरेंद्र मोगा वायु-सेना मेडल से सम्मानित:वीरांगना बोलीं-सुरेंद्र हमेशा कहते थे-देश पहले बाकी सब बाद में ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए सार्जेंट सुरेंद्र मोगा को सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘वायु सेना मेडल (गैलंट्री)’ से सम्मानित किया गया। 93वें वायु सेना दिवस के अवसर पर गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर आयोजित समारोह में भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह ने यह वीरता सम्मान शहीद की वीरांगना पत्नी सीमा मोगा को प्रदान किया। (पढ़ें पूरी खबर)

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1971 के भारत-पाक युद्ध में मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले पिलानी (झुंझुनूं) के शहीद धर्मपाल डूडी के अदम्य साहस को आधी सदी बाद एक नई पहचान मिली है। बांग्लादेश सरकार ने शहीद के सर्वोच्च बलिदान को नमन करते हुए उनके परिवार को ‘विशेष प्रशस्ति पत्र’ और ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न’ भेंट किया।
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3 दिसंबर 1971 को अखोरा (ढाका) में भीषण जंग जारी थी। धर्मपाल डूडी और उनकी टीम पाकिस्तानी ठिकानों पर कहर बनकर टूट रही थी। इसी बीच पाकिस्तान की ओर से किए गए भारी बम हमले में धर्मपाल गंभीर रूप से घायल हो गए। शहीद के भतीजे सुनील कुमार डूडी ने बताया- दुश्मन का गोला उनके पास गिरा, वे लहूलुहान थे। शरीर से खून बह रहा था, लेकिन उन्होंने अपना रेडियो सेट और गन नहीं छोड़ी। दर्द असहनीय था, पर उनके दिमाग में सिर्फ दुश्मन को तबाह करने का लक्ष्य था। घायल अवस्था में भी वे अंतिम सांस तक पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक बमबारी करवाते रहे और अंततः 4 दिसंबर 1971 को वह वीरगति को प्राप्त हुए। 13 जनवरी 1970 को सेना में भर्ती हुए थे
धर्मपाल डूडी (शहीद) के भतीजे सुनील कुमार डूडी ने गर्व से बताया कि उनके चाचा 13 जनवरी 1970 को सेना में भर्ती हुए थे। महज 22 साल की उम्र में वह शहीद हो गए थे। सम्मान- यूनिट ने ‘धर्मपाल बैट्री’ रखा नाम
लेफ्टिनेंट विक्रांत ने बताया कि 65 मीडियम रेजिमेंट की आर्टलरी यूनिट की एक बैट्री का नाम अब ‘शहीद धर्मपाल बैट्री’ रखा गया है। यह किसी भी सैनिक के लिए अद्वितीय सम्मान है। भारत सरकार उन्हें पहले ही ‘पूर्वी स्टार’ से नवाज चुकी है। 7 भाइयों में से 6 ने सेना में दीं सेवाएं
शहीद धर्मपाल समेत परिवार में सात भाई हैं। इनमें सबसे बड़े भाई मक्खन लाल का 2002 में निधन हो चुका है। वे गांव में ही खेती करते थे। इसके अलावा
लांस नायक अमर सिंह, सूबेदार शुभकरण, सूबेदार रणनीत सिंह, सूबेदार सत्यवीर सिंह, सूबेदार रामजीलाल सेना से रिटायर हो चुके हैं। शहीद धर्मपाल सिंह पांचवे नंबर के भाई थे। —- यह खबर भी पढ़िए… ऑपरेशन-सिंदूर में शहीद हुए सुरेंद्र मोगा वायु-सेना मेडल से सम्मानित:वीरांगना बोलीं-सुरेंद्र हमेशा कहते थे-देश पहले बाकी सब बाद में ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए सार्जेंट सुरेंद्र मोगा को सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘वायु सेना मेडल (गैलंट्री)’ से सम्मानित किया गया। 93वें वायु सेना दिवस के अवसर पर गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर आयोजित समारोह में भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह ने यह वीरता सम्मान शहीद की वीरांगना पत्नी सीमा मोगा को प्रदान किया। (पढ़ें पूरी खबर)

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