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5,000 Indian restaurants on the verge of closure

5,000 Indian restaurants on the verge of closure

द इकोनॉमिस्ट.टोक्यो5 मिनट पहले

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पूर्वी टोक्यो का ‘हिमालयन कारवां’ रेस्टोरेंट पिछले दो दशकों से चल रहा है। कम कीमत में बेहतरीन स्वाद मिलने से दोपहर में ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो अब बड़े संकट में है।- फाइल फोटो

जापान सरकार विदेशी प्रवासियों को लेकर सख्त हो गई है। इस कारण वहां चल रहे नेपाली मालिकाना हक वाले हजारों भारतीय रेस्टोरेंट्स पर बंद होने का खतरा मंडरा गया है। प्रशासन ने रेस्टोरेंट मालिकों के लिए ‘बिजनेस मैनेजमेंट’ वीसा नियम अचानक सख्त कर दिए हैं।

दरअसल सरकार को संदेह है कि अमीर चीनी निवेशक इस परमिट का गलत इस्तेमाल करने के लिए फर्जी कंपनियां बना रहे हैं। इसे रोकने के लिए न्यूनतम पूंजी की शर्त 50 लाख येन (करीब 29.82 लाख रुपए) से बढ़ाकर सीधे 3 करोड़ येन (करीब 1.78 करोड़ रुपए) कर दी गई है। साथ ही हर रेस्टोरेंट में कम से कम एक पूर्णकालिक जापानी नागरिक या स्थायी निवासी को नौकरी पर रखना अनिवार्य कर दिया है। इस बदलाव से आवेदनों में 96% की भारी गिरावट आई है। पुराने संचालकों को ये शर्तें पूरी करने के लिए सिर्फ तीन साल की मोहलत दी गई है।

जानकारों के मुताबिक नियमों में इस बदलाव से जापान में व्यापार करने वाले छोटे विदेशी उद्यमियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। आंतरिक मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक जापान की 9% से भी कम स्थानीय कंपनियों के पास 3 करोड़ येन की पूंजी है। ऐसे में छोटे स्तर पर चलने वाले भारतीय करी हाउस के लिए इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कर पाना बिल्कुल नामुमकिन साबित हो रहा है।

रेस्टोरेंट मालिक 32 वर्षीय अंजू खत्री के मुताबिक जब बड़ी कंपनियों को ही स्थानीय कर्मचारी नहीं मिल पा रहे, तो हम जैसे छोटे विदेशी प्रवासियों को वे कैसे मिलेंगे। पूर्वी टोक्यो की शांत सड़क पर ‘हिमालयन कारवां’ रेस्टोरेंट पिछले दो दशकों से चल रहा है। इसके नेपाली मालिक संजय साहनी साल 2006 में पहली बार बतौर शेफ वहां आए थे। उनके लिए यहां आने वाले नियमित ग्राहक अब एक बड़े परिवार जैसे बन चुके हैं।

इस रेस्टोरेंट का 850 येन का करी-नान लंच सेट कर्मचारियों, आम पाठकों और बुजुर्गों में काफी लोकप्रिय है। कम कीमत में बेहतरीन स्वाद मिलने से दोपहर में ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो अब बड़े संकट में है। विदेशी रसोइया और प्रवासी लोग टोक्यो के खानपान को सांस्कृतिक रूप देने के साथ ही सस्ते भोजन के विकल्प देते हैं। अगर इस फैसले से भारतीय, थाई और वियतनामी रेस्टोरेंट बंद हो गए, तो स्थानीय कर्मचारियों के दोपहर के भोजन के सबसे पसंदीदा विकल्प हमेशा के लिए छिन जाएंगे।

जापान में विदेशी नागरिक सिर्फ 3%, पर भारतीय रेस्टोरेंट मैकडॉनल्ड्स से भी ज्यादा

जापान में सिर्फ 59 हजार भारतीय रहते हैं, लेकिन वहां करीब 5,000 भारतीय रेस्टोरेंट मौजूद हैं। यह वहां चल रहे दुनिया के सबसे बड़े फास्ट फूड ब्रांड मैकडॉनल्ड्स के आउटलेट की कुल संख्या से भी ज्यादा है। छोटे निवेशकों के दम पर ही यह कारोबार फैला है। जापान की आबादी में विदेशी नागरिकों का हिस्सा सिर्फ 3% है। यह ओईसीडी देशों के 15% औसत से बेहद कम है। वहां चल रहे ज्यादातर भारतीय रेस्टोरेंट्स के मालिक और स्टाफ नेपाली प्रवासी हैं, जिनकी कुल संख्या वहां अभी करीब 3 लाख है।

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पूर्वी टोक्यो का ‘हिमालयन कारवां’ रेस्टोरेंट पिछले दो दशकों से चल रहा है। कम कीमत में बेहतरीन स्वाद मिलने से दोपहर में ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो अब बड़े संकट में है।- फाइल फोटो

जापान सरकार विदेशी प्रवासियों को लेकर सख्त हो गई है। इस कारण वहां चल रहे नेपाली मालिकाना हक वाले हजारों भारतीय रेस्टोरेंट्स पर बंद होने का खतरा मंडरा गया है। प्रशासन ने रेस्टोरेंट मालिकों के लिए ‘बिजनेस मैनेजमेंट’ वीसा नियम अचानक सख्त कर दिए हैं।

दरअसल सरकार को संदेह है कि अमीर चीनी निवेशक इस परमिट का गलत इस्तेमाल करने के लिए फर्जी कंपनियां बना रहे हैं। इसे रोकने के लिए न्यूनतम पूंजी की शर्त 50 लाख येन (करीब 29.82 लाख रुपए) से बढ़ाकर सीधे 3 करोड़ येन (करीब 1.78 करोड़ रुपए) कर दी गई है। साथ ही हर रेस्टोरेंट में कम से कम एक पूर्णकालिक जापानी नागरिक या स्थायी निवासी को नौकरी पर रखना अनिवार्य कर दिया है। इस बदलाव से आवेदनों में 96% की भारी गिरावट आई है। पुराने संचालकों को ये शर्तें पूरी करने के लिए सिर्फ तीन साल की मोहलत दी गई है।

जानकारों के मुताबिक नियमों में इस बदलाव से जापान में व्यापार करने वाले छोटे विदेशी उद्यमियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। आंतरिक मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक जापान की 9% से भी कम स्थानीय कंपनियों के पास 3 करोड़ येन की पूंजी है। ऐसे में छोटे स्तर पर चलने वाले भारतीय करी हाउस के लिए इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कर पाना बिल्कुल नामुमकिन साबित हो रहा है।

रेस्टोरेंट मालिक 32 वर्षीय अंजू खत्री के मुताबिक जब बड़ी कंपनियों को ही स्थानीय कर्मचारी नहीं मिल पा रहे, तो हम जैसे छोटे विदेशी प्रवासियों को वे कैसे मिलेंगे। पूर्वी टोक्यो की शांत सड़क पर ‘हिमालयन कारवां’ रेस्टोरेंट पिछले दो दशकों से चल रहा है। इसके नेपाली मालिक संजय साहनी साल 2006 में पहली बार बतौर शेफ वहां आए थे। उनके लिए यहां आने वाले नियमित ग्राहक अब एक बड़े परिवार जैसे बन चुके हैं।

इस रेस्टोरेंट का 850 येन का करी-नान लंच सेट कर्मचारियों, आम पाठकों और बुजुर्गों में काफी लोकप्रिय है। कम कीमत में बेहतरीन स्वाद मिलने से दोपहर में ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो अब बड़े संकट में है। विदेशी रसोइया और प्रवासी लोग टोक्यो के खानपान को सांस्कृतिक रूप देने के साथ ही सस्ते भोजन के विकल्प देते हैं। अगर इस फैसले से भारतीय, थाई और वियतनामी रेस्टोरेंट बंद हो गए, तो स्थानीय कर्मचारियों के दोपहर के भोजन के सबसे पसंदीदा विकल्प हमेशा के लिए छिन जाएंगे।

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