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weakened Iran is insisting on prolonging the war

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तेहरान/तेल अवीव/वॉशिंगटन डीसी7 मिनट पहले

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ईरान इस समय अब तक के सबसे बड़े खतरे का सामना कर रहा है। इसके बावजूद वह अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे संघर्ष को लंबा खींचने में लगा हुआ है। पिछले कुछ हफ्तों में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। उसके कई बड़े नेता और सैन्य कमांड ढांचे के अहम लोग मारे गए हैं। इससे उसकी नेतृत्व व्यवस्था को गंभीर झटका लगा है।

ईरान के अंदर भी हालात अच्छे नहीं हैं। लोगों को जरूरी सामान की कमी, बुनियादी ढांचे के नुकसान और सख्त सुरक्षा माहौल झेलना पड़ रहा है। इसके बावजूद ईरान की बची हुई लीडरशिप लगातार आक्रामक बयान दे रही है।

वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान लंबे समय तक संघर्ष झेल सकता है। उन्हें और नेताओं के मारे जाने की परवाह नहीं है और वे इस युद्ध को लंबा खींचने के लिए तैयार हैं, चाहे इसका असर पूरे क्षेत्र और दुनिया पर क्यों न पड़े।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान का मकसद इस युद्ध में जीत हासिल करना नहीं है। उसका असली मकसद है अपने अस्तित्व को बचाना, दुश्मनों को डराना और ऐसी स्थिति बनाना जिसमें वह युद्ध के बाद की शर्तें तय कर सके। वह संघर्ष बढ़ा रहा है ताकि बाकी देशों के लिए इसे जारी रखना बहुत महंगा हो जाए और वे समझौता करने पर मजबूर हो जाएं।

इस महीने UAE के मीना अल फजेर से दिख रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर और मालवाहक जहाज।

इस महीने UAE के मीना अल फजेर से दिख रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर और मालवाहक जहाज।

जंग खत्म करने के लिए हर्जाना चाहता है ईरान

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान से सरेंडर करने को कहा है। लेकिन ईरान इसके उलट खुद को मजबूत स्थिति में दिखा रहा है। वह कह रहा है कि वह इस संघर्ष में टिके रहने में सफल रहा है और अब शांति के लिए अपनी शर्तें रख रहा है।

ईरान चाहता है कि युद्ध खत्म होने के बाद क्षेत्र में नई व्यवस्था बनाई जाए। वह युद्ध के नुकसान की भरपाई (मुआवजा) भी मांग रहा है और खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों में बदलाव चाहता है।

ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि युद्धविराम तभी संभव है जब यह सुनिश्चित हो जाए कि दुश्मन दोबारा हमला नहीं करेगा। उनका कहना है कि अगर युद्धविराम से दुश्मन को अपनी ताकत फिर से तैयार करने का मौका मिलता है, जैसे रडार ठीक करना या मिसाइल सिस्टम मजबूत करना, तो ऐसा युद्धविराम बेकार है।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान तब तक लड़ाई जारी रखेगा जब तक दुश्मन अपने हमले पर पछतावा न करे और दुनिया और क्षेत्र में सही राजनीतिक और सुरक्षा हालात न बन जाएं।

ईरानी विदेश मंत्री बोले- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया नियम बने

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया नियम बनाया जाना चाहिए, जिसमें ईरान के हितों को ध्यान में रखा जाए। उन्होंने कहा कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही कुछ खास शर्तों के तहत ही होनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान आगे चलकर अपने विदेशों में फंसे पैसे को छुड़ाने की मांग कर सकता है या इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करने वाले देशों से टैक्स भी ले सकता है। गालिबाफ ने साफ कहा कि होर्मुज की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रहेगी।

अब ‘युद्ध के बाद क्या होगा’ इस सवाल पर भी दबाव बढ़ रहा है। दो दशकों तक पश्चिमी देशों और ईरान के बीच बातचीत चलती रही, लेकिन पिछले महीने अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। इस हमले में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और देश की सैन्य व प्रशासनिक व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा।

इसके जवाब में ईरान ने तेज और लगातार हमले किए। उसने पूरे क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे। इससे खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्ते और खराब हो गए और ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर भी असर पड़ा। खासकर होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमलों के कारण।

दबाव को अपने फायदे में बदलना चाहता है ईरान

मिडिल ईस्ट से जुड़े मामलों की एक्सपर्ट सिना तूस्सी ने CNN से कहा कि ईरान चाहता है कि अभी जो दबाव है, उसे बाद में अपने फायदे में बदल सके। वह ऐसी स्थिति चाहता है जहां उसे अलग-थलग या खत्म करने की कोशिश न हो, बल्कि उसे क्षेत्र की स्थिरता का जरूरी हिस्सा माना जाए।

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने मंगलवार को कहा कि ईरान युद्ध हार रहा है। ट्रम्प ने भी कहा कि ईरान की सेना लगभग खत्म हो चुकी है और उसके नेता लगभग हर स्तर पर खत्म कर दिए गए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान फिर कभी अमेरिका, उसके सहयोगियों या दुनिया को धमकी न दे सके। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद ईरान ने 61वीं बार हमला किया, जिसमें इजराइल में एक दंपति की मौत हो गई।

एक्सपर्ट बोले- ईरान जीत नहीं रहा, उसे जीतने की जरूरत भी नहीं

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नारगिस बाजोगली का कहना है कि पारंपरिक युद्ध के हिसाब से ईरान जीत नहीं रहा है, लेकिन उसे उसी तरह जीतने की जरूरत भी नहीं है। उसकी रणनीति अलग है।

ईरान एक अलग रणनीति अपना रहा है, जिसमें वह युद्ध को इतना महंगा बना देना चाहता है कि सामने वाला देश उसे जारी न रख सके।

उनका कहना है कि अमेरिका और खाड़ी देश लंबे समय तक तेल व्यापार में रुकावट और बढ़ती कीमतों को सहन नहीं कर सकते। किसी समय वे कहेंगे कि अब बहुत हो गया और यही दबाव ईरान बनाना चाहता है।

ईरान ने पहले से ही ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रखी थी। रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने ऐसे प्लान बनाए थे कि बड़े हमले होने पर छोटे-छोटे यूनिट्स अलग-अलग जगहों से काम कर सकें।

पुराने अफसरों की मौत, नए अफसर फैसले ले रहे

ईरान कहता है कि वह सिर्फ अमेरिकी हितों को निशाना बना रहा है, लेकिन उसके हमलों में ओमान, यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर, इराक और सऊदी अरब में होटल, एयरपोर्ट, ऊंची इमारतें और ऊर्जा फैसिलिटीज भी प्रभावित हुई हैं।

इससे साफ है कि ईरान क्षेत्र में नई ताकत का संतुलन बनाना चाहता है और भविष्य में अपने खिलाफ हमलों को रोकने के लिए डर पैदा करना चाहता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब IRGC में एक नई पीढ़ी के कमांडर सामने आए हैं, जो पहले के नेताओं के मारे जाने के बाद उभरे हैं। इन नए नेताओं ने इराक और सीरिया में ईरान की ताकत का इस्तेमाल होते देखा है और उसी आधार पर वे फैसले ले रहे हैं।

ईरान की रणनीति अब यह है कि वह अपनी स्थिरता को पूरे क्षेत्र की स्थिरता से जोड़ दे। मतलब अगर ईरान अस्थिर होगा, तो पूरा खाड़ी क्षेत्र भी अस्थिर हो सकता है।

हाल के दिनों में जहाजों पर हमले और तेल बाजार में उतार-चढ़ाव ने दिखाया है कि ईरान के पास दबाव बनाने के मजबूत साधन हैं। ईरान की सेना के प्रवक्ता ने दावा किया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिकी लीडरशिप वाली व्यवस्था अब खत्म हो चुकी है।

‘इजराइल के और करीब आ सकते हैं खाड़ी देश’

हालांकि यह साफ नहीं है कि ईरान की यह रणनीति सफल होगी या नहीं। अब तक ज्यादातर खाड़ी देश इस युद्ध में सीधे शामिल नहीं हुए हैं, हालांकि उन पर हमले हुए हैं।

ऐसे में कई देशों ने साफ कर दिया है कि वे अमेरिका और इजराइल के साथ अपने रिश्ते और मजबूत करेंगे।

UAE के एक वरिष्ठ अधिकारी ने CNN से कहा कि खाड़ी देशों में ईरान को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है और यह सोच आने वाले कई दशकों तक नहीं बदलेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि UAE होर्मुज को खोलने के लिए किसी गठबंधन में शामिल हो सकता है। उनका मानना है कि ईरान की रणनीति गलतफहमी पर आधारित है और युद्ध के बाद खाड़ी देश इजराइल के और करीब आ सकते हैं।

UAE की एक मंत्री ने कहा कि उनके देश पर हमला होने के बावजूद अमेरिका और इजराइल के साथ उनके रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ उनका रिश्ता लंबे समय से बना हुआ है और यह भरोसे पर टिका है, जो संकट के समय भी नहीं टूटेगा।

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ईरान इस समय अब तक के सबसे बड़े खतरे का सामना कर रहा है। इसके बावजूद वह अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे संघर्ष को लंबा खींचने में लगा हुआ है। पिछले कुछ हफ्तों में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। उसके कई बड़े नेता और सैन्य कमांड ढांचे के अहम लोग मारे गए हैं। इससे उसकी नेतृत्व व्यवस्था को गंभीर झटका लगा है।

ईरान के अंदर भी हालात अच्छे नहीं हैं। लोगों को जरूरी सामान की कमी, बुनियादी ढांचे के नुकसान और सख्त सुरक्षा माहौल झेलना पड़ रहा है। इसके बावजूद ईरान की बची हुई लीडरशिप लगातार आक्रामक बयान दे रही है।

वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान लंबे समय तक संघर्ष झेल सकता है। उन्हें और नेताओं के मारे जाने की परवाह नहीं है और वे इस युद्ध को लंबा खींचने के लिए तैयार हैं, चाहे इसका असर पूरे क्षेत्र और दुनिया पर क्यों न पड़े।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान का मकसद इस युद्ध में जीत हासिल करना नहीं है। उसका असली मकसद है अपने अस्तित्व को बचाना, दुश्मनों को डराना और ऐसी स्थिति बनाना जिसमें वह युद्ध के बाद की शर्तें तय कर सके। वह संघर्ष बढ़ा रहा है ताकि बाकी देशों के लिए इसे जारी रखना बहुत महंगा हो जाए और वे समझौता करने पर मजबूर हो जाएं।

इस महीने UAE के मीना अल फजेर से दिख रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर और मालवाहक जहाज।

इस महीने UAE के मीना अल फजेर से दिख रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर और मालवाहक जहाज।

जंग खत्म करने के लिए हर्जाना चाहता है ईरान

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान से सरेंडर करने को कहा है। लेकिन ईरान इसके उलट खुद को मजबूत स्थिति में दिखा रहा है। वह कह रहा है कि वह इस संघर्ष में टिके रहने में सफल रहा है और अब शांति के लिए अपनी शर्तें रख रहा है।

ईरान चाहता है कि युद्ध खत्म होने के बाद क्षेत्र में नई व्यवस्था बनाई जाए। वह युद्ध के नुकसान की भरपाई (मुआवजा) भी मांग रहा है और खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों में बदलाव चाहता है।

ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि युद्धविराम तभी संभव है जब यह सुनिश्चित हो जाए कि दुश्मन दोबारा हमला नहीं करेगा। उनका कहना है कि अगर युद्धविराम से दुश्मन को अपनी ताकत फिर से तैयार करने का मौका मिलता है, जैसे रडार ठीक करना या मिसाइल सिस्टम मजबूत करना, तो ऐसा युद्धविराम बेकार है।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान तब तक लड़ाई जारी रखेगा जब तक दुश्मन अपने हमले पर पछतावा न करे और दुनिया और क्षेत्र में सही राजनीतिक और सुरक्षा हालात न बन जाएं।

ईरानी विदेश मंत्री बोले- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया नियम बने

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया नियम बनाया जाना चाहिए, जिसमें ईरान के हितों को ध्यान में रखा जाए। उन्होंने कहा कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही कुछ खास शर्तों के तहत ही होनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान आगे चलकर अपने विदेशों में फंसे पैसे को छुड़ाने की मांग कर सकता है या इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करने वाले देशों से टैक्स भी ले सकता है। गालिबाफ ने साफ कहा कि होर्मुज की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रहेगी।

अब ‘युद्ध के बाद क्या होगा’ इस सवाल पर भी दबाव बढ़ रहा है। दो दशकों तक पश्चिमी देशों और ईरान के बीच बातचीत चलती रही, लेकिन पिछले महीने अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। इस हमले में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और देश की सैन्य व प्रशासनिक व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा।

इसके जवाब में ईरान ने तेज और लगातार हमले किए। उसने पूरे क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे। इससे खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्ते और खराब हो गए और ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर भी असर पड़ा। खासकर होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमलों के कारण।

दबाव को अपने फायदे में बदलना चाहता है ईरान

मिडिल ईस्ट से जुड़े मामलों की एक्सपर्ट सिना तूस्सी ने CNN से कहा कि ईरान चाहता है कि अभी जो दबाव है, उसे बाद में अपने फायदे में बदल सके। वह ऐसी स्थिति चाहता है जहां उसे अलग-थलग या खत्म करने की कोशिश न हो, बल्कि उसे क्षेत्र की स्थिरता का जरूरी हिस्सा माना जाए।

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने मंगलवार को कहा कि ईरान युद्ध हार रहा है। ट्रम्प ने भी कहा कि ईरान की सेना लगभग खत्म हो चुकी है और उसके नेता लगभग हर स्तर पर खत्म कर दिए गए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान फिर कभी अमेरिका, उसके सहयोगियों या दुनिया को धमकी न दे सके। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद ईरान ने 61वीं बार हमला किया, जिसमें इजराइल में एक दंपति की मौत हो गई।

एक्सपर्ट बोले- ईरान जीत नहीं रहा, उसे जीतने की जरूरत भी नहीं

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नारगिस बाजोगली का कहना है कि पारंपरिक युद्ध के हिसाब से ईरान जीत नहीं रहा है, लेकिन उसे उसी तरह जीतने की जरूरत भी नहीं है। उसकी रणनीति अलग है।

ईरान एक अलग रणनीति अपना रहा है, जिसमें वह युद्ध को इतना महंगा बना देना चाहता है कि सामने वाला देश उसे जारी न रख सके।

उनका कहना है कि अमेरिका और खाड़ी देश लंबे समय तक तेल व्यापार में रुकावट और बढ़ती कीमतों को सहन नहीं कर सकते। किसी समय वे कहेंगे कि अब बहुत हो गया और यही दबाव ईरान बनाना चाहता है।

ईरान ने पहले से ही ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रखी थी। रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने ऐसे प्लान बनाए थे कि बड़े हमले होने पर छोटे-छोटे यूनिट्स अलग-अलग जगहों से काम कर सकें।

पुराने अफसरों की मौत, नए अफसर फैसले ले रहे

ईरान कहता है कि वह सिर्फ अमेरिकी हितों को निशाना बना रहा है, लेकिन उसके हमलों में ओमान, यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर, इराक और सऊदी अरब में होटल, एयरपोर्ट, ऊंची इमारतें और ऊर्जा फैसिलिटीज भी प्रभावित हुई हैं।

इससे साफ है कि ईरान क्षेत्र में नई ताकत का संतुलन बनाना चाहता है और भविष्य में अपने खिलाफ हमलों को रोकने के लिए डर पैदा करना चाहता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब IRGC में एक नई पीढ़ी के कमांडर सामने आए हैं, जो पहले के नेताओं के मारे जाने के बाद उभरे हैं। इन नए नेताओं ने इराक और सीरिया में ईरान की ताकत का इस्तेमाल होते देखा है और उसी आधार पर वे फैसले ले रहे हैं।

ईरान की रणनीति अब यह है कि वह अपनी स्थिरता को पूरे क्षेत्र की स्थिरता से जोड़ दे। मतलब अगर ईरान अस्थिर होगा, तो पूरा खाड़ी क्षेत्र भी अस्थिर हो सकता है।

हाल के दिनों में जहाजों पर हमले और तेल बाजार में उतार-चढ़ाव ने दिखाया है कि ईरान के पास दबाव बनाने के मजबूत साधन हैं। ईरान की सेना के प्रवक्ता ने दावा किया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिकी लीडरशिप वाली व्यवस्था अब खत्म हो चुकी है।

‘इजराइल के और करीब आ सकते हैं खाड़ी देश’

हालांकि यह साफ नहीं है कि ईरान की यह रणनीति सफल होगी या नहीं। अब तक ज्यादातर खाड़ी देश इस युद्ध में सीधे शामिल नहीं हुए हैं, हालांकि उन पर हमले हुए हैं।

ऐसे में कई देशों ने साफ कर दिया है कि वे अमेरिका और इजराइल के साथ अपने रिश्ते और मजबूत करेंगे।

UAE के एक वरिष्ठ अधिकारी ने CNN से कहा कि खाड़ी देशों में ईरान को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है और यह सोच आने वाले कई दशकों तक नहीं बदलेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि UAE होर्मुज को खोलने के लिए किसी गठबंधन में शामिल हो सकता है। उनका मानना है कि ईरान की रणनीति गलतफहमी पर आधारित है और युद्ध के बाद खाड़ी देश इजराइल के और करीब आ सकते हैं।

UAE की एक मंत्री ने कहा कि उनके देश पर हमला होने के बावजूद अमेरिका और इजराइल के साथ उनके रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ उनका रिश्ता लंबे समय से बना हुआ है और यह भरोसे पर टिका है, जो संकट के समय भी नहीं टूटेगा।

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