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The return of football’s ‘lost’ generation

The return of football's 'lost' generation
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लंदन29 मिनट पहले

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फीफा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से संगठित रूप से फुटबॉल खेलने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या 24% बढ़कर 1.66 करोड़ के पार पहुंच गई है।- प्रतीकात्मक फोटो

मौजूदा दौर में जब लड़कियां टीवी पर महिला वर्ल्ड कप और यूरोपियन चैम्पियनशिप जैसे बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट देख रही हैं, तब एक पीढ़ी ऐसी भी है जिसके दिल में एक गहरी टीस है। यह उन महिलाओं की ‘खोई हुई’ पीढ़ी है जो 70, 80 और 90 के दशक में फुटबॉल के जुनून के साथ बड़ी तो हुईं, लेकिन उन्हें खेलने का कोई मंच नहीं मिला।

अब जब यही महिलाएं 40 या 50 की उम्र पार कर चुकी हैं, तो वे अपने उस छूटे हुए ख्वाब को फिर से जी रही हैं। भावनाएं इस कदर जुड़ी हैं कि जब एक 46 साल की महिला ने जिंदगी में पहली बार पूरी किट (बूट्स, शिन पैड्स और जर्सी) पहनकर मैदान पर कदम रखा, तो आंखों से आंसू छलक पड़े।

फीफा की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से संगठित रूप से फुटबॉल खेलने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या 24% बढ़कर 1.66 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2027 तक इसे 6 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य है। लेकिन, ग्रासरूट लेवल पर उन महिलाओं की एक बड़ी तादाद है, जिन्हें उनके दौर में सुविधाओं और सामाजिक नजरिए के अभाव में पीछे छोड़ दिया गया था।

करीब 40-50 साल पहले, लड़कियों के लिए शौक के तौर पर भी फुटबॉल खेलना एक बड़ा संघर्ष था। जो लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं, उन्हें अक्सर ‘टॉमबॉय’ कहकर चिढ़ाया जाता था। स्कूलों में भी खेल बंटे हुए थे। लड़कियों को नेटबॉल और हॉकी की तरफ भेज दिया जाता था, जबकि फुटबॉल और रग्बी लड़कों के लिए आरक्षित माने जाते थे। महिलाओं की कोई स्थानीय टीम या क्लब नहीं होते थे। ऐसे में लड़कियों को ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर लड़कों की टीमों के बीच अपना खेल साबित करना पड़ता था।

वर्षों बाद अब यह पीढ़ी अपने उस छूटे हुए खेल को दोबारा गले लगा रही है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ‘वेटरन विमंस क्लब’ बन रहे हैं, जहां उम्रदराज महिलाएं प्रतिस्पर्धी फुटबॉल खेल रही हैं। 2015 में कैरल बेट्स ने 25 से 80 साल की महिलाओं के लिए ‘क्रॉली ओल्ड गर्ल्स’ नाम से एक क्लब बनाया। बेट्स खुद उसी पीढ़ी से आती हैं, जिनसे उनका खेल छिन गया था। इसी तर्ज पर जो ट्रेहर्न ने उन महिलाओं के लिए ‘कैंटरबरी ओल्ड बैग्स’ की शुरुआत की, जो जिंदगी के इस पड़ाव पर खेल का हिस्सा बनना चाहती हैं।

35 से 50 साल की उम्र में मैदान पर लौट रहीं इन महिलाओं की कहानियां भावुक करने वाली हैं। इनमें से कई ने बचपन में बिना गोलपोस्ट या बुनियादी सुविधाओं के खेला था। अब जब ये महिलाएं पूरी किट पहनकर मैदान पर उतरती हैं, तो यह उनके लिए सिर्फ एक खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक तरह का सशक्तिकरण बन जाता है। जो महिलाएं खेल नहीं पा रही हैं, वे अब लड़कियों की टीमों को कोचिंग देकर अपना सपना पूरा कर रही हैं। यह केवल फुटबॉल की वापसी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की जीत है जिसने अपने खेल से कभी हार नहीं मानी।

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मौजूदा दौर में जब लड़कियां टीवी पर महिला वर्ल्ड कप और यूरोपियन चैम्पियनशिप जैसे बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट देख रही हैं, तब एक पीढ़ी ऐसी भी है जिसके दिल में एक गहरी टीस है। यह उन महिलाओं की ‘खोई हुई’ पीढ़ी है जो 70, 80 और 90 के दशक में फुटबॉल के जुनून के साथ बड़ी तो हुईं, लेकिन उन्हें खेलने का कोई मंच नहीं मिला।

अब जब यही महिलाएं 40 या 50 की उम्र पार कर चुकी हैं, तो वे अपने उस छूटे हुए ख्वाब को फिर से जी रही हैं। भावनाएं इस कदर जुड़ी हैं कि जब एक 46 साल की महिला ने जिंदगी में पहली बार पूरी किट (बूट्स, शिन पैड्स और जर्सी) पहनकर मैदान पर कदम रखा, तो आंखों से आंसू छलक पड़े।

फीफा की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से संगठित रूप से फुटबॉल खेलने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या 24% बढ़कर 1.66 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2027 तक इसे 6 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य है। लेकिन, ग्रासरूट लेवल पर उन महिलाओं की एक बड़ी तादाद है, जिन्हें उनके दौर में सुविधाओं और सामाजिक नजरिए के अभाव में पीछे छोड़ दिया गया था।

करीब 40-50 साल पहले, लड़कियों के लिए शौक के तौर पर भी फुटबॉल खेलना एक बड़ा संघर्ष था। जो लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं, उन्हें अक्सर ‘टॉमबॉय’ कहकर चिढ़ाया जाता था। स्कूलों में भी खेल बंटे हुए थे। लड़कियों को नेटबॉल और हॉकी की तरफ भेज दिया जाता था, जबकि फुटबॉल और रग्बी लड़कों के लिए आरक्षित माने जाते थे। महिलाओं की कोई स्थानीय टीम या क्लब नहीं होते थे। ऐसे में लड़कियों को ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर लड़कों की टीमों के बीच अपना खेल साबित करना पड़ता था।

वर्षों बाद अब यह पीढ़ी अपने उस छूटे हुए खेल को दोबारा गले लगा रही है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ‘वेटरन विमंस क्लब’ बन रहे हैं, जहां उम्रदराज महिलाएं प्रतिस्पर्धी फुटबॉल खेल रही हैं। 2015 में कैरल बेट्स ने 25 से 80 साल की महिलाओं के लिए ‘क्रॉली ओल्ड गर्ल्स’ नाम से एक क्लब बनाया। बेट्स खुद उसी पीढ़ी से आती हैं, जिनसे उनका खेल छिन गया था। इसी तर्ज पर जो ट्रेहर्न ने उन महिलाओं के लिए ‘कैंटरबरी ओल्ड बैग्स’ की शुरुआत की, जो जिंदगी के इस पड़ाव पर खेल का हिस्सा बनना चाहती हैं।

35 से 50 साल की उम्र में मैदान पर लौट रहीं इन महिलाओं की कहानियां भावुक करने वाली हैं। इनमें से कई ने बचपन में बिना गोलपोस्ट या बुनियादी सुविधाओं के खेला था। अब जब ये महिलाएं पूरी किट पहनकर मैदान पर उतरती हैं, तो यह उनके लिए सिर्फ एक खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक तरह का सशक्तिकरण बन जाता है। जो महिलाएं खेल नहीं पा रही हैं, वे अब लड़कियों की टीमों को कोचिंग देकर अपना सपना पूरा कर रही हैं। यह केवल फुटबॉल की वापसी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की जीत है जिसने अपने खेल से कभी हार नहीं मानी।

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