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जान जोखिम में पर 45,000 की तनख्वाह छोड़ना मुश्किल:खाड़ी से रेमिटेंस बंद हुआ तो डूब जाएगी 2.4 करोड़ परिवारों की इकोनॉमी

जान जोखिम में पर 45,000 की तनख्वाह छोड़ना मुश्किल:खाड़ी से रेमिटेंस बंद हुआ तो डूब जाएगी 2.4 करोड़ परिवारों की इकोनॉमी

जब सायरन बजता है, तो नॉर्मा टैक्टाकॉन बस दुआ करती हैं। 49 साल की नॉर्मा कतर में घरेलू कामगार हैं। फिलीपींस में उनके पति और तीन बच्चे हैं। अमेरिका-इजराइल से जंग के बीच खाड़ी के देश ईरान के निशाने पर हैं। नॉर्मा उसी आग की लपटों में फंसी हैं। वे कहती हैं, ‘हवा में मिसाइलें देखकर डर लगता है। मुझे जिंदा रहना है- बच्चों के लिए। मैं ही उनका सब कुछ हूं।’ दरअसल फिलीपींस में घरेलू काम से जो मिलता है, उससे 4-5 गुना यानी प्रति माह 500 डॉलर (करीब 45,000 रुपए) खाड़ी में मिलता है। यही वजह है कि जान जोखिम में होने के बावजूद वो घर नहीं लौट पा रहीं। नॉर्मा अकेली नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक, खाड़ी देशों में 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। इनमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, फिलीपींस और इंडोनेशिया के लोग सबसे ज्यादा हैं। इस युद्ध में अब तक कम से कम 12 दक्षिण एशियाई मजदूर जान गंवा चुके हैं। नेपाल के दिबास श्रेष्ठ (29) अबुधाबी में सिक्योरिटी गार्ड थे। 1 मार्च को ईरान के हमले में उनकी मौत हो गई। उनके चाचा रमेश बताते हैं, ‘मैंने उन्हें नेपाल लौटने को कहा था, पर वे कहते थे- यहां अच्छी जिंदगी है।’ दिबास 2015 के भूकंप में क्षतिग्रस्त हुए माता-पिता का घर बनवाने के लिए पैसे जोड़ रहे थे। दुबई में बांग्लादेश के 55 साल के अहमद अली की मौत मिसाइल के मलबे से हुई। अली हर महीने 45-55 हजार रुपए घर भेजते थे। घर लौटना आसान भी नहीं है। युद्ध ने दुबई, अबुधाबी और कतर की उड़ानें बाधित कर दी हैं। फिलीपींस की आखिरी वापसी फ्लाइट में 234 मजदूरों को कुवैत, कतर और बहरीन से 8 घंटे सड़क मार्ग से सऊदी अरब ले जाया गया, तब जाकर वे फ्लाइट पकड़ पाए। पर ज्यादातर लोग घर जाना ही नहीं चाहते। म्यांमार की सू सू (31) दुबई में रियल एस्टेट कंपनी में काम करती हैं। वह म्यांमार में गृहयुद्ध से भागकर आई थीं। वे घर में काम कर रही हैं, सायरन सुनकर खिड़की से दूर हो जाती हैं। फिर भी कहती हैं, ‘यहां का माहौल शांत लगता है। मुझे भरोसा है कि सब ठीक हो जाएगा।’ खाड़ी से आए पैसे पर कुछ देशों की अर्थव्यवस्था 10% तक निर्भर फिलीपींस के कुल विदेशी मजदूरों में से आधे से ज्यादा करीब 10 लाख खाड़ी देशों में हैं। उनके भेजे पैसे फिलीपींस की अर्थव्यवस्था का 10% हैं। बांग्लादेश के 1.4 करोड़ प्रवासियों में से अधिकांश खाड़ी में काम करते हैं। उनकी रेमिटेंस देश की जीडीपी की जीवनरेखा है। आईएलओ के मुताबिक, खाड़ी में 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जो कंस्ट्रक्शन से लेकर घरेलू काम तक हर सेक्टर की रीढ़ हैं। युद्ध ने इस पूरी व्यवस्था को हिला दिया है।

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