स्वरा वर्मा साल 2023 के लास्ट में पहला ब्रेक मासूम शर्मा ने दिया और उसके बाद लगातार आगे बढ़ रही हैं
हरियाणा के करनाल के असंध की एक साधारण परिवार की बेटी आज देश के सबसे बड़े म्यूजिक प्लेटफॉर्म पर अपनी आवाज का परचम लहरा रही है। स्वरा वर्मा का ‘शीशा’ गीत बिलबोर्ड इंडिया पर लगातार दूसरे स्थान पर बना हुआ है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी उतनी ही कठ
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कभी उसके घर की आर्थिक हालत ऐसी थी कि उसे पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, कभी स्टूडियो जाने के लिए दोस्तों से 200 रुपये उधार लेने पड़े, तो कभी लोगों के तानों ने मन तोड़ने की कोशिश की।
लेकिन इन सबके बीच स्वरा ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। क्लबों में छोटी-छोटी रकम पर गाना गाने वाली यह बेटी आज लाखों युवाओं के लिए उम्मीद और हौसले की मिसाल बन चुकी है।
स्वरा वर्मा क्लब में जाकर गाना गाती थी
सबसे पहले ‘शीशा’ सॉन्ग के बारे में जानिए…
बिलबोर्ड इंडिया चार्ट तक पहुंचने वाले ‘शीशा’ गाने के पीछे भी एक दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी है। स्वरा वर्मा बताती हैं कि इस गाने के लेखक मीता रोड, जो मूल रूप से करनाल के ही रहने वाले हैं और इन दिनों अमेरिका में जॉब कर रहे हैं, ने साल 2025 में सोशल मीडिया के जरिए उनसे संपर्क किया था।
मीता पहले से ही शायरी और कंटेंट क्रिएशन में एक्टिव थे और उन्होंने स्वरा की आवाज और उनके संघर्ष को देखकर इस गाने के लिए कोलैबोरेशन का प्रस्ताव रखा। शुरुआत में स्वरा को यह एक सामान्य ऑफर लगा, लेकिन जब मीता ने गाने की थीम, बोल और विजन विस्तार से समझाया, तो उन्हें महसूस हुआ कि यह कुछ बड़ा हो सकता है।
इसके बाद “शीशा” गाने की ऑडियो करनाल के विक्की तरावड़ी के स्टूडियो में रिकॉर्ड की गई। गाना रिलीज होते ही इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर तेजी से ट्रेंड करने लगा।पहले दिल्ली में और फिर पूरे भारत में यह लोगों की जुबान पर चढ़ गया। गाने की लोकप्रियता को देखते हुए 2026 में इसकी फीचरिंग और वीडियो सोनी म्यूजिक इंडिया द्वारा रिलीज किया गया, जिसके बाद यह सीधा बिलबोर्ड इंडिया चार्ट में पहुंच गया और लगातार दूसरे स्थान पर बना हुआ है।
स्वरा के मुताबिक, इस गाने की सफलता में मीता रोड का कॉन्सेप्ट, बोल और इंटरनेशनल सोच के साथ उनकी आवाज का मेल ही सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ। अब जानिए कौन है नेपाली सिंगर स्वरा वर्मा की कहानी… नेपाल से हरियाणा तक एक परिवार की संघर्ष भरी कहानी:स्वरा वर्मा का परिवार मूल रूप से काठमांडू, नेपाल का रहने वाला है। बेहतर भविष्य की तलाश में उनके माता-पिता हरियाणा के करनाल जिले के असंध में आकर बस गए। साल 2004 में यहीं स्वरा का जन्म हुआ। एक छोटे से घर में सीमित संसाधनों के बीच पली-बढ़ी स्वरा ने बचपन से ही अभावों को करीब से देखा। घर की हालत ऐसी थी कि हर दिन एक नई चिंता सामने खड़ी रहती थी। गरीबी के कारण बीच में छोड़ी पढ़ाई, लेकिन नहीं छीना हौसला:परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि स्वरा अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकीं। घर चलाने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उनके कंधों पर भी आने लगी। मां घर-घर जाकर खाना बनाती थीं और पिता भी कुकिंग का काम करके जैसे-तैसे परिवार का पेट भरते थे। कई बार ऐसा भी समय आता था जब खर्च और जरूरतों के बीच संतुलन बैठाना मुश्किल हो जाता था। ऐसे में स्वरा ने पढ़ाई छोड़कर परिवार का सहारा बनने का फैसला किया- यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन हालात ने उन्हें समय से पहले बड़ा बना दिया।

मासूम शर्मा के साथ स्टूडियों में स्वरा वर्मा
भाषा बनी चुनौती, तानों ने दी ताकत:घर में नेपाली भाषा बोली जाती थी, जबकि बाहर हरियाणवी माहौल था। शुरुआत में स्वरा को हरियाणवी बोलने और समझने में काफी परेशानी होती थी। लोगों के ताने-“तुमसे हरियाणवी नहीं होगी”, “तुम गाना नहीं गा पाओगी” उनके कानों में गूंजते रहते थे। लेकिन यही ताने उनके लिए प्रेरणा बन गए। उन्होंने ठान लिया कि अब खुद को साबित करना है। दिन-रात मेहनत कर उन्होंने हरियाणवी सीखी और उसी भाषा में अपनी पहचान बना ली। किटी पार्टियों और क्लबों से शुरू हुआ सफर:साल 2020 में स्वरा ने प्राइवेट पार्टियों, किटी पार्टियों और क्लबों में गाना शुरू किया। उस समय उन्हें संगीत की कोई तकनीकी जानकारी नहीं थी। ना सुर की समझ, ना ताल की पहचान। बस गाने का शौक और कुछ करने की जिद थी। छोटी-छोटी जगहों पर गाते हुए उन्हें 1000 से 1500 रुपये मिलते थे, लेकिन उनके लिए यह सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि अपने सपनों की पहली सीढ़ी थी। 200 रुपये से शुरू हुआ सफर, मां का भरोसा बना ताकत:स्वरा की जिंदगी का एक भावुक पल वह था, जब पहली बार स्टूडियो जाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने अपनी मां से किराए के लिए 200 रुपये मांगे। मां ने जैसे-तैसे वह पैसे दिए।शायद उन्हें भी नहीं पता था कि यही 200 रुपये उनकी बेटी की किस्मत बदल देंगे। स्वरा कहती हैं कि वही 200 रुपये उनके करियर की सबसे बड़ी पूंजी थे। दिन-रात मेहनत, एक दिन में 20 गाने तक रिकॉर्ड:संघर्ष के दिनों में स्वरा ने कभी काम से पीछे हटना नहीं सीखा। कई बार वह एक दिन में 15 से 20 गाने तक रिकॉर्ड करती थीं। इसके बदले उन्हें सिर्फ 1000-1500 रुपये मिलते थे। वह रोहतक, दिल्ली और करनाल के अलग-अलग स्टूडियो में जातीं, घंटों काम करतीं और फिर अगले दिन उसी जिद के साथ फिर खड़ी हो जातीं। यह सिलसिला करीब तीन साल तक चला। सोशल मीडिया से मिली राह:सोशल मीडिया के जरिए उनकी मुलाकात दीपक से हुई, जिन्होंने उन्हें सुर और ताल की बारीकियां सिखाईं। इसके बाद असंध के ही प्रदीप पांचाल ने उन्हें स्टूडियो में गाने के तरीके सिखाए। धीरे-धीरे वह समझने लगीं कि संगीत सिर्फ शौक नहीं, बल्कि एक कला है, जिसे सीखना और निखारना जरूरी है। मासूम शर्मा ने दिया पहला ब्रेक:2023 के अंत में जब मासूम शर्मा का फोन आया, तो स्वरा को यकीन ही नहीं हुआ। उन्हें लगा कोई मजाक कर रहा है। लेकिन जब सच्चाई सामने आई, तो उनकी जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। ‘ठेकेदार का ब्याह’ गाने ने उन्हें पहचान दिलाई और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दोनों की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया और गाने करोड़ों व्यूज तक पहुंच गए। स्वरा वर्मा ने बताया कि मासूम शर्मा की लाइसेंस मूवी में भी उन्होंने गाना गाया है।

स्वरा वर्मा अपने परिवार के साथ
पहली बार 5000 रुपये-आंखों में आ गए आंसू स्वरा बताती हैं कि जब उन्हें पहली बार 5000 रुपये मिले, तो वह पल उनके लिए बेहद खास था। पहले जहां वह 1000-1500 रुपये में काम करती थीं, वहीं यह रकम उनके लिए किसी सपने से कम नहीं थी। उस दिन उन्हें लगा कि उनकी मेहनत अब रंग लाने लगी है। इसके बाद स्वरा ने ‘लोफर’, ‘चंबल के डाकू’, ‘वार्निंग’, ‘महाशय जी’, ‘चार-पांच पिस्तौल’ और ‘ब्लडर’ जैसे कई हिट गानों में अपनी आवाज दी। उन्होंने केडी और खासा आला चहर जैसे कलाकारों के साथ भी काम किया, जिससे उनकी पहचान हरियाणा ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों तक पहुंच गई। ‘शीशा’ ने दिलाई देशभर में पहचान करनाल के मीता रोड द्वारा लिखे गए ‘शीशा’ गाने ने स्वरा की किस्मत बदल दी। यह गाना पहले सोशल मीडिया पर ट्रेंड हुआ, फिर धीरे-धीरे पूरे देश में छा गया। आज यह Billboard India पर दूसरे स्थान पर बना हुआ है। इस गाने ने स्वरा को एक नई पहचान और बड़ा मंच दिया।‘शीशा’ की सफलता के बाद स्वरा को हरियाणा, पंजाब और मुंबई से ऑफर मिल रहे हैं। फिलहाल वह पंजाबी इंडस्ट्री में काम करना चाहती हैं, लेकिन उनका सपना बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने का है। परिवार बना सबसे बड़ा सहारा आज स्वरा के पिता और भाई असंध में फूड कैफे चला रहे हैं, जबकि उनका दूसरा भाई उनके काम को मैनेज करता है। जो परिवार कभी उन्हें बाहर भेजने से डरता था, आज वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। संघर्ष की कहानी स्वरा वर्मा की कहानी सिर्फ एक सिंगर की सफलता नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। 200 रुपये से शुरू हुआ यह सफर आज बिलबोर्ड तक पहुंच चुका है और यह साबित करता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
















































