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रुबीना दिलैक बोलीं- मां बनना सिर्फ खुशी नहीं:भावनात्मक बदलावों से जूझीं, कहा- महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी मुश्किल स्थिति में पहुंच जाती हैं

रुबीना दिलैक बोलीं- मां बनना सिर्फ खुशी नहीं:भावनात्मक बदलावों से जूझीं, कहा- महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी मुश्किल स्थिति में पहुंच जाती हैं

टीवी एक्ट्रेस रुबीना दिलैक इन दिनों अपने रियलिटी शो ‘द वार्ड’ को लेकर चर्चा में हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रुबीना ने मदरहुड, पोस्टपार्टम डिप्रेशन, महिलाओं की मानसिक सेहत और परिवार के सपोर्ट जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि मां बनना सिर्फ खुशियों का सफर नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक बदलावों से भरा दौर भी होता है, जिस पर समाज में कम बात होती है। रुबीना ने यह भी कहा कि नई मांओं को सबसे ज्यादा समझ, सपोर्ट और सही काउंसिलिंग की जरूरत होती है, ताकि वे खुद को फिर से संभाल सकें। सवाल: ‘द वार्ड’ एक इमोशनल एक्सपेरिमेंट जैसा शो है। इस शो ने आपको कैसे प्रभावित किया? जवाब: मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूं कि मैंने इस शो को खुद अपनी जिंदगी में महसूस किया था। जब मैं मां बनी, तब मुझे एहसास हुआ कि मदरहुड सिर्फ खुशियां नहीं लाता, बल्कि इसके साथ शरीर, दिमाग और भावनाओं में बहुत बदलाव आते हैं। लेकिन इन बातों पर लोग खुलकर बात नहीं करते। मुझे हमेशा लगता था कि काश किसी ने मुझे पहले यह सब समझाया होता। इसी सोच के साथ मैंने चाहा कि एक ऐसी कम्युनिटी बने, जहां नई मांएं और प्रेग्नेंट महिलाएं खुलकर अपने अनुभव और परेशानियां साझा कर सकें। जब ‘द वार्ड’ शो आया, तो लगा कि यही वो मंच है जिसकी मैं कल्पना कर रही थी। हमने अलग-अलग महिलाओं को एक साथ लाकर उनकी कहानियां, संघर्ष और भावनाएं समझने की कोशिश की। तब महसूस हुआ कि हर महिला की प्रेग्नेंसी अलग हो सकती है, लेकिन भावनाएं लगभग एक जैसी होती हैं। सवाल: भारत में मदरहुड और उसके त्याग को तो सेलिब्रेट किया जाता है, लेकिन मां बनने के बाद एक महिला की अपनी पहचान खो जाती है। इस शो में इस मुद्दे पर कैसे बात की गई? जवाब: हमने इस शो के जरिए यही समझाने की कोशिश की है कि बच्चा पैदा होने के बाद परिवार तो अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा बदलाव एक नई मां की जिंदगी में आते हैं। उसे खुद को दोबारा पहचानने में समय लगता है। इसलिए हमने अलग-अलग शहरों और गांवों से आई महिलाओं की कहानियां सामने रखीं। किसी को परिवार का साथ मिला, तो किसी को नहीं मिला। अलग-अलग संस्कृतियों और परिवारों की सोच भी देखने को मिली। इन कहानियों के जरिए हमने यह दिखाने की कोशिश की कि महिलाओं को इस समय सबसे ज्यादा सपोर्ट की जरूरत होती है और परिवार मिलकर उनका सहारा बन सकता है। सवाल: मदरहुड के दौरान महिलाओं को हर तरफ से सलाह मिलती है। आपने खुद इन सलाहों को कैसे संभाला? जवाब: मदरहुड में हर कोई आपको सलाह देता है और खुद को एक्सपर्ट समझता है। लेकिन मैंने यह सीखा कि हर महिला की जर्नी अलग होती है। मैंने सबकी बातें सुनीं, लेकिन वही किया जो मुझे और मेरे बच्चों के लिए सही लगा। मैं शो में आई महिलाओं से भी यही कहती थी कि खुद पर भरोसा करें। अपने मन की आवाज सुनें। आपका दिल आपको बता देगा कि आपके लिए क्या सही है और क्या गलत। हमारा मकसद हर महिला को इतना मजबूत बनाना था कि वह अपनी पहचान के साथ इस सफर को तय कर सके। सवाल: प्रेग्नेंसी में शारीरिक स्वास्थ्य पर तो बात होती है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य और काउंसिलिंग को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। आपने इस पर कितना ध्यान दिया? जवाब: हमने इस बात पर बहुत ध्यान दिया। क्योंकि अगर कोई महिला मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगे, तो उसके लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के दौरान शरीर में बहुत बदलाव आते हैं, जिनका असर मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। अगर सही समय पर काउंसिलिंग और सपोर्ट न मिले, तो महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी स्थिति में जा सकती है। पहले लोग इन बातों पर खुलकर चर्चा नहीं करते थे, लेकिन अब जागरूकता बढ़ रही है। हमारा मकसद यही है कि महिलाएं अपने भावनात्मक बदलावों को पहचानें और जरूरत पड़ने पर मदद लेने से न हिचकें। सवाल: आपने खुद पोस्टपार्टम डिप्रेशन का सामना किया। उस दौर से कैसे बाहर निकलीं? जवाब: पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक ऐसा दौर है, जो हर महिला के लिए अलग होता है। यह कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक रह सकता है। इससे पूरी तरह बचना मुश्किल है, लेकिन अगर आपको इसकी जानकारी हो, तो इसे संभालना आसान हो जाता है। मेरी न्यूट्रिशनिस्ट ने मुझे पहले ही समझा दिया था कि बच्चे के जन्म के बाद अलग-अलग समय पर हार्मोनल बदलाव आएंगे। इसलिए मैंने खुद पर ध्यान देना शुरू किया। अगर मूड खराब हो रहा है, बिना वजह रोना आ रहा है या लोगों से बात करने का मन नहीं है, तो यह संकेत हो सकते हैं। ऐसे समय में मैंने छोटी-छोटी चीजें कीं, जैसे थोड़ी वॉक करना, स्ट्रेचिंग करना और खुद को एक्टिव रखने की कोशिश करना। जागरूकता ही सबसे बड़ी ताकत है। सवाल: इस दौर में पति का सपोर्ट कितना जरूरी होता है? जवाब: पति का सपोर्ट बहुत जरूरी होता है। अगर आपका पार्टनर आपको समझने के बजाय लगातार शिकायत करे, तो महिला की परेशानी और बढ़ जाती है। पोस्टपार्टम के दौरान कई बार महिला मानसिक रूप से बहुत थकी हुई होती है। उसे अकेले समय की जरूरत होती है। अगर पति समझदारी दिखाए और महिला पर दबाव न डाले, तो वह इस दौर से बेहतर तरीके से बाहर निकल सकती है। सवाल: छोटे शहरों और गांवों में आज भी मानसिक स्वास्थ्य और काउंसिलिंग को लेकर जागरूकता कम है। वहां की महिलाओं और परिवारों से क्या कहना चाहेंगी? जवाब: हम इस शो के जरिए छोटे-छोटे कदम उठाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे शो में गांवों और छोटे शहरों की महिलाएं भी आईं, जिन्होंने खुलकर अपनी परेशानियां बताईं। आज भी कई लोग काउंसलर या थेरेपिस्ट के पास जाने को गलत मानते हैं, लेकिन हम यही कहना चाहते हैं कि अगर मदद की जरूरत हो, तो उसे लेने में शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, जहां वे खुलकर अपनी बात कह सकें। सवाल: प्रेग्नेंसी में खान-पान को लेकर भी कई गलत धारणाएं होती हैं। इस पर आपका क्या कहना है? जवाब: हमारे शो में डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट और गायनेकोलॉजिस्ट लगातार मौजूद थे। हर मां के खान-पान का खास ध्यान रखा गया। सही न्यूट्रिशन सिर्फ मां के लिए नहीं, बल्कि बच्चे के लिए भी जरूरी होता है। हम मानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान मां जो खाती है और जैसा माहौल रखती है, उसका असर बच्चे पर भी पड़ता है। इसलिए गर्भ संस्कार का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सही खान-पान और अच्छे विचार भी हैं। सवाल: आज भी समाज में बेटे और बेटी में फर्क किया जाता है। आप इस सोच को कैसे देखती हैं? जवाब: आज हम विज्ञान और तकनीक में बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन सोच कई जगह अब भी पुरानी है। बेटा-बेटी का फर्क आज भी गांवों से लेकर शहरों तक देखने को मिलता है। मैं खुद तीन बहनों में से हूं और हमने बहुत कुछ सुना है। इसलिए हमने तय किया कि अगर हमारी बेटियां होंगी, तो हम उन्हें गर्व के साथ पालेंगे। आज मेरी दो बेटियां हैं और हम खुद को बहुत खुशकिस्मत मानते हैं। हमने हमेशा अपने माता-पिता का उतना ही ख्याल रखा है, जितना बेटों से उम्मीद की जाती है। हम अपनी अगली पीढ़ी को यही सिखाना चाहते हैं कि बेटियां भी परिवार की जिम्मेदारी उतनी ही अच्छे से निभा सकती हैं। सवाल: मां बनने के बाद आपने खुद में क्या बदलाव महसूस किए? जवाब: मां बनने के बाद इंसान भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत हो जाता है। पहले अगर मेरी नींद पूरी नहीं होती थी, तो मेरा पूरा मूड खराब हो जाता था। लेकिन अब दो घंटे की नींद भी मिल जाए, तो मैं फ्रेश महसूस करती हूं। मेरे ट्विन्स थे, इसलिए शुरुआती छह महीने बहुत मुश्किल थे। रातों की नींद पूरी नहीं होती थी, लेकिन फिर भी शरीर और दिमाग खुद आपको संभाल लेते हैं। मुझे लगता है कि भगवान मां बनने के साथ एक अलग ताकत भी देता है। सवाल: खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से फिट कैसे रखती हैं? जवाब: मैं अपनी सेहत को बहुत गंभीरता से लेती हूं। मैं क्या खाती हूं, कितना आराम करती हूं और अपनी बॉडी को कैसे एक्टिव रखती हूं, इन सबका ध्यान रखती हूं। अच्छा दिखना और फिट रहना उसी का नतीजा है। मैं अपने खाने, आराम और सेल्फ-केयर में समझौता नहीं करती। क्योंकि अगर मैं खुद अच्छा महसूस नहीं करूंगी, तो अपने काम और परिवार दोनों को ठीक से समय नहीं दे पाऊंगी। सवाल: आखिर में इस शो के जरिए आप लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगी? जवाब: एक महिला परिवार की रीढ़ होती है और एक मां पूरे समाज की ताकत होती है। जब एक औरत मां बनती है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक नई शुरुआत करती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका परिवार खुशहाल और मजबूत बने, तो सबसे पहले नई मां का ख्याल रखिए।

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रुबीना दिलैक बोलीं- मां बनना सिर्फ खुशी नहीं:भावनात्मक बदलावों से जूझीं, कहा- महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी मुश्किल स्थिति में पहुंच जाती हैं

टीवी एक्ट्रेस रुबीना दिलैक इन दिनों अपने रियलिटी शो ‘द वार्ड’ को लेकर चर्चा में हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रुबीना ने मदरहुड, पोस्टपार्टम डिप्रेशन, महिलाओं की मानसिक सेहत और परिवार के सपोर्ट जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि मां बनना सिर्फ खुशियों का सफर नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक बदलावों से भरा दौर भी होता है, जिस पर समाज में कम बात होती है। रुबीना ने यह भी कहा कि नई मांओं को सबसे ज्यादा समझ, सपोर्ट और सही काउंसिलिंग की जरूरत होती है, ताकि वे खुद को फिर से संभाल सकें। सवाल: ‘द वार्ड’ एक इमोशनल एक्सपेरिमेंट जैसा शो है। इस शो ने आपको कैसे प्रभावित किया? जवाब: मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूं कि मैंने इस शो को खुद अपनी जिंदगी में महसूस किया था। जब मैं मां बनी, तब मुझे एहसास हुआ कि मदरहुड सिर्फ खुशियां नहीं लाता, बल्कि इसके साथ शरीर, दिमाग और भावनाओं में बहुत बदलाव आते हैं। लेकिन इन बातों पर लोग खुलकर बात नहीं करते। मुझे हमेशा लगता था कि काश किसी ने मुझे पहले यह सब समझाया होता। इसी सोच के साथ मैंने चाहा कि एक ऐसी कम्युनिटी बने, जहां नई मांएं और प्रेग्नेंट महिलाएं खुलकर अपने अनुभव और परेशानियां साझा कर सकें। जब ‘द वार्ड’ शो आया, तो लगा कि यही वो मंच है जिसकी मैं कल्पना कर रही थी। हमने अलग-अलग महिलाओं को एक साथ लाकर उनकी कहानियां, संघर्ष और भावनाएं समझने की कोशिश की। तब महसूस हुआ कि हर महिला की प्रेग्नेंसी अलग हो सकती है, लेकिन भावनाएं लगभग एक जैसी होती हैं। सवाल: भारत में मदरहुड और उसके त्याग को तो सेलिब्रेट किया जाता है, लेकिन मां बनने के बाद एक महिला की अपनी पहचान खो जाती है। इस शो में इस मुद्दे पर कैसे बात की गई? जवाब: हमने इस शो के जरिए यही समझाने की कोशिश की है कि बच्चा पैदा होने के बाद परिवार तो अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा बदलाव एक नई मां की जिंदगी में आते हैं। उसे खुद को दोबारा पहचानने में समय लगता है। इसलिए हमने अलग-अलग शहरों और गांवों से आई महिलाओं की कहानियां सामने रखीं। किसी को परिवार का साथ मिला, तो किसी को नहीं मिला। अलग-अलग संस्कृतियों और परिवारों की सोच भी देखने को मिली। इन कहानियों के जरिए हमने यह दिखाने की कोशिश की कि महिलाओं को इस समय सबसे ज्यादा सपोर्ट की जरूरत होती है और परिवार मिलकर उनका सहारा बन सकता है। सवाल: मदरहुड के दौरान महिलाओं को हर तरफ से सलाह मिलती है। आपने खुद इन सलाहों को कैसे संभाला? जवाब: मदरहुड में हर कोई आपको सलाह देता है और खुद को एक्सपर्ट समझता है। लेकिन मैंने यह सीखा कि हर महिला की जर्नी अलग होती है। मैंने सबकी बातें सुनीं, लेकिन वही किया जो मुझे और मेरे बच्चों के लिए सही लगा। मैं शो में आई महिलाओं से भी यही कहती थी कि खुद पर भरोसा करें। अपने मन की आवाज सुनें। आपका दिल आपको बता देगा कि आपके लिए क्या सही है और क्या गलत। हमारा मकसद हर महिला को इतना मजबूत बनाना था कि वह अपनी पहचान के साथ इस सफर को तय कर सके। सवाल: प्रेग्नेंसी में शारीरिक स्वास्थ्य पर तो बात होती है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य और काउंसिलिंग को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। आपने इस पर कितना ध्यान दिया? जवाब: हमने इस बात पर बहुत ध्यान दिया। क्योंकि अगर कोई महिला मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगे, तो उसके लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के दौरान शरीर में बहुत बदलाव आते हैं, जिनका असर मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। अगर सही समय पर काउंसिलिंग और सपोर्ट न मिले, तो महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी स्थिति में जा सकती है। पहले लोग इन बातों पर खुलकर चर्चा नहीं करते थे, लेकिन अब जागरूकता बढ़ रही है। हमारा मकसद यही है कि महिलाएं अपने भावनात्मक बदलावों को पहचानें और जरूरत पड़ने पर मदद लेने से न हिचकें। सवाल: आपने खुद पोस्टपार्टम डिप्रेशन का सामना किया। उस दौर से कैसे बाहर निकलीं? जवाब: पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक ऐसा दौर है, जो हर महिला के लिए अलग होता है। यह कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक रह सकता है। इससे पूरी तरह बचना मुश्किल है, लेकिन अगर आपको इसकी जानकारी हो, तो इसे संभालना आसान हो जाता है। मेरी न्यूट्रिशनिस्ट ने मुझे पहले ही समझा दिया था कि बच्चे के जन्म के बाद अलग-अलग समय पर हार्मोनल बदलाव आएंगे। इसलिए मैंने खुद पर ध्यान देना शुरू किया। अगर मूड खराब हो रहा है, बिना वजह रोना आ रहा है या लोगों से बात करने का मन नहीं है, तो यह संकेत हो सकते हैं। ऐसे समय में मैंने छोटी-छोटी चीजें कीं, जैसे थोड़ी वॉक करना, स्ट्रेचिंग करना और खुद को एक्टिव रखने की कोशिश करना। जागरूकता ही सबसे बड़ी ताकत है। सवाल: इस दौर में पति का सपोर्ट कितना जरूरी होता है? जवाब: पति का सपोर्ट बहुत जरूरी होता है। अगर आपका पार्टनर आपको समझने के बजाय लगातार शिकायत करे, तो महिला की परेशानी और बढ़ जाती है। पोस्टपार्टम के दौरान कई बार महिला मानसिक रूप से बहुत थकी हुई होती है। उसे अकेले समय की जरूरत होती है। अगर पति समझदारी दिखाए और महिला पर दबाव न डाले, तो वह इस दौर से बेहतर तरीके से बाहर निकल सकती है। सवाल: छोटे शहरों और गांवों में आज भी मानसिक स्वास्थ्य और काउंसिलिंग को लेकर जागरूकता कम है। वहां की महिलाओं और परिवारों से क्या कहना चाहेंगी? जवाब: हम इस शो के जरिए छोटे-छोटे कदम उठाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे शो में गांवों और छोटे शहरों की महिलाएं भी आईं, जिन्होंने खुलकर अपनी परेशानियां बताईं। आज भी कई लोग काउंसलर या थेरेपिस्ट के पास जाने को गलत मानते हैं, लेकिन हम यही कहना चाहते हैं कि अगर मदद की जरूरत हो, तो उसे लेने में शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, जहां वे खुलकर अपनी बात कह सकें। सवाल: प्रेग्नेंसी में खान-पान को लेकर भी कई गलत धारणाएं होती हैं। इस पर आपका क्या कहना है? जवाब: हमारे शो में डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट और गायनेकोलॉजिस्ट लगातार मौजूद थे। हर मां के खान-पान का खास ध्यान रखा गया। सही न्यूट्रिशन सिर्फ मां के लिए नहीं, बल्कि बच्चे के लिए भी जरूरी होता है। हम मानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान मां जो खाती है और जैसा माहौल रखती है, उसका असर बच्चे पर भी पड़ता है। इसलिए गर्भ संस्कार का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सही खान-पान और अच्छे विचार भी हैं। सवाल: आज भी समाज में बेटे और बेटी में फर्क किया जाता है। आप इस सोच को कैसे देखती हैं? जवाब: आज हम विज्ञान और तकनीक में बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन सोच कई जगह अब भी पुरानी है। बेटा-बेटी का फर्क आज भी गांवों से लेकर शहरों तक देखने को मिलता है। मैं खुद तीन बहनों में से हूं और हमने बहुत कुछ सुना है। इसलिए हमने तय किया कि अगर हमारी बेटियां होंगी, तो हम उन्हें गर्व के साथ पालेंगे। आज मेरी दो बेटियां हैं और हम खुद को बहुत खुशकिस्मत मानते हैं। हमने हमेशा अपने माता-पिता का उतना ही ख्याल रखा है, जितना बेटों से उम्मीद की जाती है। हम अपनी अगली पीढ़ी को यही सिखाना चाहते हैं कि बेटियां भी परिवार की जिम्मेदारी उतनी ही अच्छे से निभा सकती हैं। सवाल: मां बनने के बाद आपने खुद में क्या बदलाव महसूस किए? जवाब: मां बनने के बाद इंसान भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत हो जाता है। पहले अगर मेरी नींद पूरी नहीं होती थी, तो मेरा पूरा मूड खराब हो जाता था। लेकिन अब दो घंटे की नींद भी मिल जाए, तो मैं फ्रेश महसूस करती हूं। मेरे ट्विन्स थे, इसलिए शुरुआती छह महीने बहुत मुश्किल थे। रातों की नींद पूरी नहीं होती थी, लेकिन फिर भी शरीर और दिमाग खुद आपको संभाल लेते हैं। मुझे लगता है कि भगवान मां बनने के साथ एक अलग ताकत भी देता है। सवाल: खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से फिट कैसे रखती हैं? जवाब: मैं अपनी सेहत को बहुत गंभीरता से लेती हूं। मैं क्या खाती हूं, कितना आराम करती हूं और अपनी बॉडी को कैसे एक्टिव रखती हूं, इन सबका ध्यान रखती हूं। अच्छा दिखना और फिट रहना उसी का नतीजा है। मैं अपने खाने, आराम और सेल्फ-केयर में समझौता नहीं करती। क्योंकि अगर मैं खुद अच्छा महसूस नहीं करूंगी, तो अपने काम और परिवार दोनों को ठीक से समय नहीं दे पाऊंगी। सवाल: आखिर में इस शो के जरिए आप लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगी? जवाब: एक महिला परिवार की रीढ़ होती है और एक मां पूरे समाज की ताकत होती है। जब एक औरत मां बनती है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक नई शुरुआत करती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका परिवार खुशहाल और मजबूत बने, तो सबसे पहले नई मां का ख्याल रखिए।

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