Tuesday, 08 Sep 2026 | 04:44 AM

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Chhattisgarh Naxal Paparao Confesses Karma-Mandavi Murder Case

Chhattisgarh Naxal Paparao Confesses Karma-Mandavi Murder Case

सरेंडर्ड नक्सली लीडर पापाराव ने दैनिक भास्कर की टीम से खास बातचीत की।

बस्तर में नक्सल आतंक का चेहरा रहा पापाराव अब सरेंडर कर चुका है। सरेंडर के बाद दैनिक भास्कर से बातचीत में उसने माना कि रास्ता गलत था। पापाराव ने कहा कि, जिन परिवारों ने अपनों को खोया, उनसे माफी मांगना चाहता हूं।

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पापाराव का जन्म सुकमा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। 17-18 साल की उम्र में नक्सलियों की नजर उस पर पड़ी। एक दिन कुख्यात नक्सली लीडर रमन्ना उसे अपने साथ जंगलों में ले गया। पापाराव करीब 30-31 साल तक नक्सल संगठन से जुड़ा रहा।

पार्टी सदस्य से लेकर DKSZCM कैडर तक पहुंचा। पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज रहा। उस पर 25 लाख रुपए का इनाम घोषित था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत से पापाराव का नाम जुड़ा है।

अंबेली और तर्रेम IED ब्लास्ट, टेकलगुडेम और ताड़मेटला जैसी बड़ी वारदातों में पापाराव की भूमिका बताई जाती है। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान पापाराव ने महेंद्र कर्मा और भीमा मंडावी की हत्या से जुड़े कई खुलासे भी किए। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

बातचीत के दौरान पापाराव ने महेंद्र कर्मा और भीमा मंडावी की हत्या के पीछे की कहानी भी बताई।

सवाल- 17-18 साल की उम्र में बंदूक तक कैसे पहुंचे? मजबूरी थी या विचारधारा?

जवाब – मेरा घर का सुनम चंद्रय्या है। 5वीं क्लास तक पढ़ा हूं। मैं करीब 17-18 साल का था तब हम पर सरकार का दबाव था। उस समय छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। हम मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। तब कांग्रेस की सरकार थी। हमें गांव में मारते पीटते थे। सरकारी काम करवाना, पौधे लगवाना, ठेकेदार जबरदस्ती काम करवाते थे।

इसी वजह से दिसंबर 1995 में मुझे नक्सल लीडर रमन्ना ने पार्टी में भर्ती करवाया। फिर उसी ने मेरा नाम पापाराव रखा था। यहीं से मैं चंद्रय्या से पापाराव बना। पार्टी सदस्य से लेकर ACM, DVCM और DKSZCM कैडर तक पहुंचा। करीब 30-31 सालों तक नक्सल संगठन के साथ जुड़कर काम किया। पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज था।

सवाल- नक्सल संगठन में नसबंदी का नियम था, फिर आपके 3 बच्चे कैसे? क्या ये दोहरी नीति नहीं?

जवाब- मेरी 2 शादी हुई थी। पहली शादी तब हुई जब मैं गांव में था। नक्सल संगठन में नहीं जुड़ा था। हां ये सच है कि मेरे 3 बच्चे हैं। लेकिन ये तब हुए जब मैं संगठन के साथ नहीं जुड़ा था। जब संगठन के साथ जुड़ा तो बाद में पत्नी को भी साथ ले आया। 2007 में जगरगुंडा में हुई एक मुठभेड़ में वो मारी गई।

फिर साल 2009 में मैंने संगठन में ही एक महिला नक्सली उर्मिला से शादी की थी। तब मैंने नसबंदी करवाई थी। उर्मिला भी साल 2025 में एक मुठभेड़ में मारी गई। नक्सल संगठन में सब के लिए एक जैसा ही नियम है। लेकिन CCM, पोलित ब्यूरो के कितने बच्चे हैं, वो नसबंदी करवाए हैं या नहीं ये मैं नहीं जानता।

सवाल- 2005 में सलवा जुडूम का दौर चला था। आप लोगों ने एक बार भी नहीं सोचा और अपने ही लोगों का पूरा गांव खाली करवा दिया, ऐसा क्यों?

जवाब- 2005 में जुडूम शुरू हुआ। नक्सल संगठन ने, हमने कोई गांव खाली नहीं करवाया था। सरकार और पुलिस ने पूरा गांव जला दिया था। गांव वालों को काफी नुकसान हुआ था। कुछ लोग पार्टी के विरोध में रहते थे, ऐसे लोगों को पार्टी के निर्णय के बाद गांव से बाहर निकाला था।

सवाल- IED ब्लास्ट करना, कैंप पर या फिर ऑपरेशन पर निकले जवानों पर हमला करने की प्लानिंग आप लोग कैसे बनाते थे?

जवाब- हम पहले रेकी करवाकर ये देखते थे कि कैंप मजबूत है या फिर कच्चा है। जिसके बाद अटैक का प्लान बनाते थे। IED लगाने से पहले फोर्स का मूवमेंट देखते थे, कहां से फोर्स आ-जा रही है। फिर IED लगाकर रखते थे। पुलिस आने वाली है इसकी जानकारी जनता देती थी। कमांडर स्तर के नक्सलियों के पास ही ज्यादा जानकारी होती थी। पूरा मैप होता था।

सवाल- पुलिस मानती है कि ताड़मेटला (76), टेकलगुडेम (21), अंबेली (9) और झीरम हमलों के आप जिम्मेदार हैं, इन्हें कैसे अंजाम दिया?

जवाब- ताड़मेटला की घटना में मैं नहीं था। पार्टी के किसी काम के सिलसिले में मैं माड़ डिवीजन गया हुआ था। टेकलगुडेम मुठभेड़ में भी मैं शामिल नहीं था। मैं पश्चिम बस्तर का इंचार्ज था। वो वारदात दक्षिण बस्तर डिवीजन में हुई थी। मैं तर्रेम और अंबेली IED ब्लास्ट की घटना में था।

तर्रेम में 16 और अंबेली में 9 जवान शहीद हुए थे। पुलिस ने माड़ अभियान चलाया था। लौट रहे थे। हमने प्लानिंग की, प्लानिंग का काम कमांडर लोगों का होता है। बाकी अन्य सभी घटनाओं में मेरा सीधे तौर पर कोई हाथ नहीं था। मैं झीरम हमले में भी नहीं था।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत के पीछे इसका नाम जुड़ा है।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत के पीछे इसका नाम जुड़ा है।

सवाल- नक्सलियों के पास भारी हथियार और विदेशी गन कैसे पहुंचती थीं? सप्लाई कौन करता था?

जवाब- AK-47, SLR जैसे ये सारे हथियार पुलिस जवानों से ही लूटे हुए हैं। हम पुलिस पर हमला करते थे फिर उन्हीं का हथियार लेकर आते थे। ताड़मेटला की घटना के बाद वहां से 76 हथियार लेकर आए। मुरकीनार, रानी बोदली, गीदम पुलिस थाना में हमला कर वहां से हथियार लूटे थे।

विदेशी हथियार कहां से आया इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। यह जानकारी सिर्फ केंद्रीय कमेटी के सदस्यों को होती थी।

सवाल- सरेंडर से पहले नक्सली संगठन आर्थिक रूप से कितना मजबूत था? करोड़ों कैश और गोल्ड कहां से आते थे?

जवाब – नक्सली संगठन आर्थिक रूप से काफी कमजोर था। खाने पीने का सामान आम जनता से लेते थे, कपड़े तक आम जनता हमें देती थी। पश्चिम बस्तर डिवीजन के पास 1 करोड़ से ज्यादा थे। जब मैं सरेंडर के लिए आया तो अपने साथ 10 लाख रुपए लेकर आया था।

बाद में पुलिस को ठिकाना बताकर और पैसे की जानकारी दी। यह डंप हम जंगल में एक डिब्बे में डालकर जमीन में दबाकर रखते थे। जिसे अब पुलिस ने बरामद कर लिया है।

सवाल- आप लोगों ने बस्तर की धरती में और कितनी IED कहां-कहां पर दबा कर रखी है? क्या उसका कोई मैप है आपके पास?

जवाब- हमने बहुत सारी IED लगाई थी। कई IED निकाल दिए, कई IED ब्लास्ट हो गई। मैंने अपने संगठन के लोगों से कहा था कि सामान्य लोग मारे जा रहे हैं इसलिए IED को निकाल दो।

IED और हथियार बनाने में हम काफी मजबूत थे। जिलेटिन, कॉर्डेक्स , बारूद का हमारे पास भंडार हुआ करता था। बंदूक भी हम बनाते थे। लेकिन अब कितनी बंदूकें बची है ये नहीं बता सकता।

सवाल- क्या मौत के डर से सरेंडर किया, या मुख्यधारा में आने का फैसला है? विचारधारा बदली या वही है?

जवाब- पहले सोनू दादा, देवजी रूपेश दादा ने आत्मसमर्पण किया। संग्राम, दामोदर ने भी समर्पण कर दिया। मैं अंतिम तक सोचा कि क्या करना चाहिए। मेरे साथ कुल 18 लोग थे। फिर मैंने उनसे कहा और हम भी हथियार डाल दिए। आत्मसमर्पण कर दिए हैं।

सवाल- हिड़मा-देवा के बाद तीसरे बड़े नक्सली लीडर रहे, आदिवासियों की हत्या के आरोप हैं, अब गांव में उनका सामना कैसे करेंगे?

जवाब- पार्टी में रहने के समय मैं अकेले नहीं मारा। पार्टी का निर्णय रहता था। जन अदालत लगाकर मारना है या फिर छोड़ना है ये पार्टी का और जनता का निर्णय ही होता था। मैं अकेला दोषी नहीं हूं। मैं अकेले किसी की हत्या नहीं किया हूं।

सवाल- मार्च में शुरू होने वाला TCOC कभी हमलों का दौर होता था। लेकिन पिछले 2 साल में नक्सलवाद कहां कमजोर पड़ा? कौन सी कड़ी टूटी जो फिर जुड़ नहीं पाई?

जवाब- हमने समीक्षा की तो पता चला कि हम घेरे में फंस रहे हैं। हमारा दंडकारण्य आंदोलन भी कमजोर पड़ गया था। महासचिव बसवाराजू के एनकाउंटर के बाद हम ज्यादा कमजोर पड़ गए थे। नेतृत्व क्षमता हमारी कमजोर हो गई थी। लगातार CCM मारे जा रहे थे। सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं ओडिशा समेत अन्य राज्यों में भी मारे गए।

हमारे लोग आत्म समर्पण कर दिए। लगातार पुलिस कैंप खुल रहे थे। हमारा कई एरिया खत्म हो गया। हम पूरी तरह से कमजोर हो गए थे। इसी वजह से पूरा आंदोलन खत्म हो गया। नेशनल पार्क एरिया में बहुत से कैंप खुल गए। हर जगह फोर्स है। मेरे पीछे भी बहुत सी फोर्स लगी हुई थी। इसलिए सरेंडर का रास्ता चुना।

पापाराव 17-18 साल का था, तब नक्सल संगठन में भर्ती हुआ था।

पापाराव 17-18 साल का था, तब नक्सल संगठन में भर्ती हुआ था।

सवाल- जल-जंगल-जमीन के नाम पर हथियार, लेकिन 2000 नागरिक-1400 जवान मारे गए यह कैसा आंदोलन था?

जवाब- जब नक्सलवाद बस्तर में आया तो हम लोगों को बहुत मोटिवेट किया गया था। हमारा मकसद था कि हमें यहां कम्युनिस्ट सरकार खड़ी करनी है। जनताना सरकार बनाई। बस्तर समेत देश के आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते थे। हमने उन्हें मारा जो हमारी पार्टी के खिलाफ थे। सरकार ने भी तो झूठी मुठभेड़ में कई आदिवासियों को मारा, ये सवाल कोई नहीं पूछता।

लेकिन माओवाद पार्टी ने कुछ हत्या कर दी तो सभी दोष देने लग गए। माओवादियों ने भी कई लोगों को भगा दिया है, ये निर्णय पार्टी का रहा। कइयों को मारा गया। इसमें मेरा नाम भी आ रहा है। मैं गांव जाऊंगा। गांव वालों से बोलूंगा गलती हो गई। इस गलती के लिए माफी मांगूंगा।

सवाल- कल तक AK-47, अब हाथ में संविधान, सरेंडर के बाद आगे क्या? नौकरी की उम्र नहीं, क्या चुनाव लड़ने का इरादा है?

जवाब- हमने काली वर्दी छोड़ दी, हथियार पुलिस को सौंप दिए। अब बस्तर में ऐसी कोई जगह नहीं बची जहां हम छिप सकें। मैं गांव जाऊंगा। कुछ काम करूंगा। जो संगठन जनता के लिए काम करती है मैं उस संगठन से जुड़ जाऊंगा। दोबारा हथियार उठाने की नहीं सोचूंगा। हमारी वैचारिक लड़ाई जारी रहेगी। सिर्फ जनता के साथ हम काम करेंगे।

सवाल- क्या बाहरी नक्सलियों ने बस्तर के लोगों को गुमराह कर ढाल बनाया? अपने मारे गए तो डर में हथियार छोड़े?

जवाब – सिर्फ बस्तर ही नहीं बल्कि देशभर के आंदोलन को चलाया है। बस्तर के आदिवासी भी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में आए हैं। जो बड़े लीडर थे उन्हें सुरक्षा में रहना पड़ता था। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में पहले भी स्कूल नहीं थी। हमने उन स्कूलों को बम से उड़ाया जहां पुलिस फोर्स रुकती थी। बच्चों को पढ़ने नहीं देना ये हमारी मानसिकता कभी नहीं रही है। हम ढाल बनकर काम नहीं किए।

सवाल- आप शिक्षा की बात करते हैं, फिर शिक्षकों की हत्या क्यों? उनकी क्या गलती थी?

जवाब- आदिवासी बच्चों को अब भी अच्छी पढ़ाई नहीं मिलती है। शिक्षकों को स्कूल नहीं भेजा जा रहा है। टीचर्स और डॉक्टर हमारे टारगेट में कभी नहीं रहे हैं। जिन शिक्षकों की हत्या की वो लोग मुखबिरी का काम करते थे। इसलिए उन्हें सजा दी गई। जनता ने हमें बताया था कि ये लोग मुखबिरी करते थे, जिससे हमारे कई साथी मारे गए थे।

सवाल- कांग्रेस के महेंद्र कर्मा और भाजपा के MLA रहे भीमा मंडावी की हत्या क्यों करवाई?

जवाब – महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम शुरू किया था। बेकसूर लोगों को मरवाने में हाथ था। यही वजह रही कि उन्हें नक्सल संगठन ने टारगेट किया। नंद कुमार पटेल समेत अन्य की हत्या करने का कोई मकसद नहीं था। ये गलती हुई थी। CCM ने इसकी समीक्षा की थी।

भीमा मंडावी भी कहते थे कि माओवादियों को खत्म करना है। यही वजह थी कि उनकी भी हत्या की गई। भीमा की हत्या में चैतू, देवा इन लोगों का हाथ था।

……………………………

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छत्तीसगढ़ के बस्तर को नक्सल मुक्त घोषित करने की डेडलाइन से करीब एक हफ्ते पहले बस्तर के अंतिम बड़े कैडर के नक्सली पापाराव ने सरेंडर कर दिया है। पापाराव अपने साथियों के साथ AK-47 समेत अन्य हथियार लेकर बीजापुर जिले के कुटरू थाने पहुंचा। यहां से बस सभी को लेकर जगदलपुर के लिए रवाना हुई। पढ़ें पूरी खबर…

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पापाराव का जन्म सुकमा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। 17-18 साल की उम्र में नक्सलियों की नजर उस पर पड़ी। एक दिन कुख्यात नक्सली लीडर रमन्ना उसे अपने साथ जंगलों में ले गया। पापाराव करीब 30-31 साल तक नक्सल संगठन से जुड़ा रहा।

पार्टी सदस्य से लेकर DKSZCM कैडर तक पहुंचा। पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज रहा। उस पर 25 लाख रुपए का इनाम घोषित था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत से पापाराव का नाम जुड़ा है।

अंबेली और तर्रेम IED ब्लास्ट, टेकलगुडेम और ताड़मेटला जैसी बड़ी वारदातों में पापाराव की भूमिका बताई जाती है। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान पापाराव ने महेंद्र कर्मा और भीमा मंडावी की हत्या से जुड़े कई खुलासे भी किए। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

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सवाल- 17-18 साल की उम्र में बंदूक तक कैसे पहुंचे? मजबूरी थी या विचारधारा?

जवाब – मेरा घर का सुनम चंद्रय्या है। 5वीं क्लास तक पढ़ा हूं। मैं करीब 17-18 साल का था तब हम पर सरकार का दबाव था। उस समय छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। हम मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। तब कांग्रेस की सरकार थी। हमें गांव में मारते पीटते थे। सरकारी काम करवाना, पौधे लगवाना, ठेकेदार जबरदस्ती काम करवाते थे।

इसी वजह से दिसंबर 1995 में मुझे नक्सल लीडर रमन्ना ने पार्टी में भर्ती करवाया। फिर उसी ने मेरा नाम पापाराव रखा था। यहीं से मैं चंद्रय्या से पापाराव बना। पार्टी सदस्य से लेकर ACM, DVCM और DKSZCM कैडर तक पहुंचा। करीब 30-31 सालों तक नक्सल संगठन के साथ जुड़कर काम किया। पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज था।

सवाल- नक्सल संगठन में नसबंदी का नियम था, फिर आपके 3 बच्चे कैसे? क्या ये दोहरी नीति नहीं?

जवाब- मेरी 2 शादी हुई थी। पहली शादी तब हुई जब मैं गांव में था। नक्सल संगठन में नहीं जुड़ा था। हां ये सच है कि मेरे 3 बच्चे हैं। लेकिन ये तब हुए जब मैं संगठन के साथ नहीं जुड़ा था। जब संगठन के साथ जुड़ा तो बाद में पत्नी को भी साथ ले आया। 2007 में जगरगुंडा में हुई एक मुठभेड़ में वो मारी गई।

फिर साल 2009 में मैंने संगठन में ही एक महिला नक्सली उर्मिला से शादी की थी। तब मैंने नसबंदी करवाई थी। उर्मिला भी साल 2025 में एक मुठभेड़ में मारी गई। नक्सल संगठन में सब के लिए एक जैसा ही नियम है। लेकिन CCM, पोलित ब्यूरो के कितने बच्चे हैं, वो नसबंदी करवाए हैं या नहीं ये मैं नहीं जानता।

सवाल- 2005 में सलवा जुडूम का दौर चला था। आप लोगों ने एक बार भी नहीं सोचा और अपने ही लोगों का पूरा गांव खाली करवा दिया, ऐसा क्यों?

जवाब- 2005 में जुडूम शुरू हुआ। नक्सल संगठन ने, हमने कोई गांव खाली नहीं करवाया था। सरकार और पुलिस ने पूरा गांव जला दिया था। गांव वालों को काफी नुकसान हुआ था। कुछ लोग पार्टी के विरोध में रहते थे, ऐसे लोगों को पार्टी के निर्णय के बाद गांव से बाहर निकाला था।

सवाल- IED ब्लास्ट करना, कैंप पर या फिर ऑपरेशन पर निकले जवानों पर हमला करने की प्लानिंग आप लोग कैसे बनाते थे?

जवाब- हम पहले रेकी करवाकर ये देखते थे कि कैंप मजबूत है या फिर कच्चा है। जिसके बाद अटैक का प्लान बनाते थे। IED लगाने से पहले फोर्स का मूवमेंट देखते थे, कहां से फोर्स आ-जा रही है। फिर IED लगाकर रखते थे। पुलिस आने वाली है इसकी जानकारी जनता देती थी। कमांडर स्तर के नक्सलियों के पास ही ज्यादा जानकारी होती थी। पूरा मैप होता था।

सवाल- पुलिस मानती है कि ताड़मेटला (76), टेकलगुडेम (21), अंबेली (9) और झीरम हमलों के आप जिम्मेदार हैं, इन्हें कैसे अंजाम दिया?

जवाब- ताड़मेटला की घटना में मैं नहीं था। पार्टी के किसी काम के सिलसिले में मैं माड़ डिवीजन गया हुआ था। टेकलगुडेम मुठभेड़ में भी मैं शामिल नहीं था। मैं पश्चिम बस्तर का इंचार्ज था। वो वारदात दक्षिण बस्तर डिवीजन में हुई थी। मैं तर्रेम और अंबेली IED ब्लास्ट की घटना में था।

तर्रेम में 16 और अंबेली में 9 जवान शहीद हुए थे। पुलिस ने माड़ अभियान चलाया था। लौट रहे थे। हमने प्लानिंग की, प्लानिंग का काम कमांडर लोगों का होता है। बाकी अन्य सभी घटनाओं में मेरा सीधे तौर पर कोई हाथ नहीं था। मैं झीरम हमले में भी नहीं था।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत के पीछे इसका नाम जुड़ा है।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत के पीछे इसका नाम जुड़ा है।

सवाल- नक्सलियों के पास भारी हथियार और विदेशी गन कैसे पहुंचती थीं? सप्लाई कौन करता था?

जवाब- AK-47, SLR जैसे ये सारे हथियार पुलिस जवानों से ही लूटे हुए हैं। हम पुलिस पर हमला करते थे फिर उन्हीं का हथियार लेकर आते थे। ताड़मेटला की घटना के बाद वहां से 76 हथियार लेकर आए। मुरकीनार, रानी बोदली, गीदम पुलिस थाना में हमला कर वहां से हथियार लूटे थे।

विदेशी हथियार कहां से आया इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। यह जानकारी सिर्फ केंद्रीय कमेटी के सदस्यों को होती थी।

सवाल- सरेंडर से पहले नक्सली संगठन आर्थिक रूप से कितना मजबूत था? करोड़ों कैश और गोल्ड कहां से आते थे?

जवाब – नक्सली संगठन आर्थिक रूप से काफी कमजोर था। खाने पीने का सामान आम जनता से लेते थे, कपड़े तक आम जनता हमें देती थी। पश्चिम बस्तर डिवीजन के पास 1 करोड़ से ज्यादा थे। जब मैं सरेंडर के लिए आया तो अपने साथ 10 लाख रुपए लेकर आया था।

बाद में पुलिस को ठिकाना बताकर और पैसे की जानकारी दी। यह डंप हम जंगल में एक डिब्बे में डालकर जमीन में दबाकर रखते थे। जिसे अब पुलिस ने बरामद कर लिया है।

सवाल- आप लोगों ने बस्तर की धरती में और कितनी IED कहां-कहां पर दबा कर रखी है? क्या उसका कोई मैप है आपके पास?

जवाब- हमने बहुत सारी IED लगाई थी। कई IED निकाल दिए, कई IED ब्लास्ट हो गई। मैंने अपने संगठन के लोगों से कहा था कि सामान्य लोग मारे जा रहे हैं इसलिए IED को निकाल दो।

IED और हथियार बनाने में हम काफी मजबूत थे। जिलेटिन, कॉर्डेक्स , बारूद का हमारे पास भंडार हुआ करता था। बंदूक भी हम बनाते थे। लेकिन अब कितनी बंदूकें बची है ये नहीं बता सकता।

सवाल- क्या मौत के डर से सरेंडर किया, या मुख्यधारा में आने का फैसला है? विचारधारा बदली या वही है?

जवाब- पहले सोनू दादा, देवजी रूपेश दादा ने आत्मसमर्पण किया। संग्राम, दामोदर ने भी समर्पण कर दिया। मैं अंतिम तक सोचा कि क्या करना चाहिए। मेरे साथ कुल 18 लोग थे। फिर मैंने उनसे कहा और हम भी हथियार डाल दिए। आत्मसमर्पण कर दिए हैं।

सवाल- हिड़मा-देवा के बाद तीसरे बड़े नक्सली लीडर रहे, आदिवासियों की हत्या के आरोप हैं, अब गांव में उनका सामना कैसे करेंगे?

जवाब- पार्टी में रहने के समय मैं अकेले नहीं मारा। पार्टी का निर्णय रहता था। जन अदालत लगाकर मारना है या फिर छोड़ना है ये पार्टी का और जनता का निर्णय ही होता था। मैं अकेला दोषी नहीं हूं। मैं अकेले किसी की हत्या नहीं किया हूं।

सवाल- मार्च में शुरू होने वाला TCOC कभी हमलों का दौर होता था। लेकिन पिछले 2 साल में नक्सलवाद कहां कमजोर पड़ा? कौन सी कड़ी टूटी जो फिर जुड़ नहीं पाई?

जवाब- हमने समीक्षा की तो पता चला कि हम घेरे में फंस रहे हैं। हमारा दंडकारण्य आंदोलन भी कमजोर पड़ गया था। महासचिव बसवाराजू के एनकाउंटर के बाद हम ज्यादा कमजोर पड़ गए थे। नेतृत्व क्षमता हमारी कमजोर हो गई थी। लगातार CCM मारे जा रहे थे। सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं ओडिशा समेत अन्य राज्यों में भी मारे गए।

हमारे लोग आत्म समर्पण कर दिए। लगातार पुलिस कैंप खुल रहे थे। हमारा कई एरिया खत्म हो गया। हम पूरी तरह से कमजोर हो गए थे। इसी वजह से पूरा आंदोलन खत्म हो गया। नेशनल पार्क एरिया में बहुत से कैंप खुल गए। हर जगह फोर्स है। मेरे पीछे भी बहुत सी फोर्स लगी हुई थी। इसलिए सरेंडर का रास्ता चुना।

पापाराव 17-18 साल का था, तब नक्सल संगठन में भर्ती हुआ था।

पापाराव 17-18 साल का था, तब नक्सल संगठन में भर्ती हुआ था।

सवाल- जल-जंगल-जमीन के नाम पर हथियार, लेकिन 2000 नागरिक-1400 जवान मारे गए यह कैसा आंदोलन था?

जवाब- जब नक्सलवाद बस्तर में आया तो हम लोगों को बहुत मोटिवेट किया गया था। हमारा मकसद था कि हमें यहां कम्युनिस्ट सरकार खड़ी करनी है। जनताना सरकार बनाई। बस्तर समेत देश के आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते थे। हमने उन्हें मारा जो हमारी पार्टी के खिलाफ थे। सरकार ने भी तो झूठी मुठभेड़ में कई आदिवासियों को मारा, ये सवाल कोई नहीं पूछता।

लेकिन माओवाद पार्टी ने कुछ हत्या कर दी तो सभी दोष देने लग गए। माओवादियों ने भी कई लोगों को भगा दिया है, ये निर्णय पार्टी का रहा। कइयों को मारा गया। इसमें मेरा नाम भी आ रहा है। मैं गांव जाऊंगा। गांव वालों से बोलूंगा गलती हो गई। इस गलती के लिए माफी मांगूंगा।

सवाल- कल तक AK-47, अब हाथ में संविधान, सरेंडर के बाद आगे क्या? नौकरी की उम्र नहीं, क्या चुनाव लड़ने का इरादा है?

जवाब- हमने काली वर्दी छोड़ दी, हथियार पुलिस को सौंप दिए। अब बस्तर में ऐसी कोई जगह नहीं बची जहां हम छिप सकें। मैं गांव जाऊंगा। कुछ काम करूंगा। जो संगठन जनता के लिए काम करती है मैं उस संगठन से जुड़ जाऊंगा। दोबारा हथियार उठाने की नहीं सोचूंगा। हमारी वैचारिक लड़ाई जारी रहेगी। सिर्फ जनता के साथ हम काम करेंगे।

सवाल- क्या बाहरी नक्सलियों ने बस्तर के लोगों को गुमराह कर ढाल बनाया? अपने मारे गए तो डर में हथियार छोड़े?

जवाब – सिर्फ बस्तर ही नहीं बल्कि देशभर के आंदोलन को चलाया है। बस्तर के आदिवासी भी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में आए हैं। जो बड़े लीडर थे उन्हें सुरक्षा में रहना पड़ता था। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में पहले भी स्कूल नहीं थी। हमने उन स्कूलों को बम से उड़ाया जहां पुलिस फोर्स रुकती थी। बच्चों को पढ़ने नहीं देना ये हमारी मानसिकता कभी नहीं रही है। हम ढाल बनकर काम नहीं किए।

सवाल- आप शिक्षा की बात करते हैं, फिर शिक्षकों की हत्या क्यों? उनकी क्या गलती थी?

जवाब- आदिवासी बच्चों को अब भी अच्छी पढ़ाई नहीं मिलती है। शिक्षकों को स्कूल नहीं भेजा जा रहा है। टीचर्स और डॉक्टर हमारे टारगेट में कभी नहीं रहे हैं। जिन शिक्षकों की हत्या की वो लोग मुखबिरी का काम करते थे। इसलिए उन्हें सजा दी गई। जनता ने हमें बताया था कि ये लोग मुखबिरी करते थे, जिससे हमारे कई साथी मारे गए थे।

सवाल- कांग्रेस के महेंद्र कर्मा और भाजपा के MLA रहे भीमा मंडावी की हत्या क्यों करवाई?

जवाब – महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम शुरू किया था। बेकसूर लोगों को मरवाने में हाथ था। यही वजह रही कि उन्हें नक्सल संगठन ने टारगेट किया। नंद कुमार पटेल समेत अन्य की हत्या करने का कोई मकसद नहीं था। ये गलती हुई थी। CCM ने इसकी समीक्षा की थी।

भीमा मंडावी भी कहते थे कि माओवादियों को खत्म करना है। यही वजह थी कि उनकी भी हत्या की गई। भीमा की हत्या में चैतू, देवा इन लोगों का हाथ था।

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बस में चढ़ते समय हंसते हुए सरेंडर नक्सली पापाराव।

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छत्तीसगढ़ के बस्तर को नक्सल मुक्त घोषित करने की डेडलाइन से करीब एक हफ्ते पहले बस्तर के अंतिम बड़े कैडर के नक्सली पापाराव ने सरेंडर कर दिया है। पापाराव अपने साथियों के साथ AK-47 समेत अन्य हथियार लेकर बीजापुर जिले के कुटरू थाने पहुंचा। यहां से बस सभी को लेकर जगदलपुर के लिए रवाना हुई। पढ़ें पूरी खबर…

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