New Clinical Trials for Anti Aging: हर किसी की उम्र धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और इसका असर शरीर के सभी अंगों पर पड़ने लगता है. उम्र के साथ इंसानों के सभी ऑर्गन्स की क्षमता कम होने लगती है. बुढ़ापे में अधिकतर लोगों को किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ता है. एजिंग को रोकने के लिए अब तक तमाम कोशिशें होती रही हैं, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली है. माना जाता है कि एजिंग एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे रोका नहीं जा सकता है. हालांकि अब एक फिर फिर दुनिया में एंटी-एजिंग रिसर्च को लेकर एक बड़ी चर्चा शुरू हो गई है.
इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि क्या उम्रदराज कोशिकाओं को सुरक्षित तरीके से फिर से रीफ्रेश किया जा सकता है. इसमें सेल्स की असली पहचान को नुकसान पहुंचाए बिना रिज्यूवेनेट किया जाएगा. इस तकनीक की नींव जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका की खोज पर आधारित है. उन्होंने यह साबित किया था कि वयस्क कोशिकाओं को कुछ विशेष प्रोटीन की मदद से स्टेम सेल जैसी शुरुआती अवस्था में बदला जा सकता है. इन प्रोटीन को यामानाका फैक्टर कहा जाता है. अब वैज्ञानिक इसी खोज का सुरक्षित रूप विकसित कर रहे हैं, जिसमें कोशिकाओं को पूरी तरह रीसेट करने की बजाय उन्हें थोड़ी देर के लिए आंशिक रूप से रीप्रोग्राम किया जाता है, ताकि वे फिर से युवा जैसी कार्यक्षमता हासिल कर सकें.
शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रक्रिया को मोबाइल फोन को रीसेट करने की बजाय रिफ्रेश करने जैसा समझा जा सकता है, जिसमें जरूरी डाटा सुरक्षित रहता है, लेकिन सिस्टम बेहतर तरीके से काम करने लगता है. जानवरों पर किए गए शुरुआती प्रयोगों में इसके काफी सकारात्मक परिणाम मिले हैं. चूहों पर किए गए परीक्षणों में मांसपेशियों और त्वचा की मरम्मत बेहतर हुई, दिल की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं में सुधार देखा गया और यहां तक कि उम्र से जुड़ी आंखों की समस्याओं में भी सुधार पाया गया. कुछ मामलों में याददाश्त और मस्तिष्क की कार्यक्षमता में भी बेहतर प्रदर्शन देखा गया.
इन नतीजों के बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक मनुष्यों में भी उम्र से जुड़ी बीमारियों जैसे विजन लॉस, अंगों की कमजोरी और अन्य डीजेनरेटिव डिजीज के इलाज में मददगार हो सकती है. इसी दिशा में अगला कदम मानव परीक्षण है, जिसकी शुरुआत ग्लूकोमा के मरीजों पर की जाएगी. यह एक ऐसी बीमारी है जो आंखों की नसों को नुकसान पहुंचाकर धीरे-धीरे दृष्टि खोने का कारण बनती है. इस ट्रायल में वैज्ञानिक तीन यामानाका फैक्टर को एक विशेष वायरस के जरिए आंखों में पहुंचाएंगे. इस प्रक्रिया को बहुत कंट्रोल्ड तरीके से डिजाइन किया गया है, जिसमें दवा के माध्यम से ही इन फैक्टर्स को एक्टिव किया जाएगा ताकि जोखिम को कम किया जा सके. यह परीक्षण छोटे स्तर पर किया जाएगा और कई वर्षों तक मरीजों की सेहत और असर पर नजर रखी जाएगी, क्योंकि सुरक्षा इस पूरे प्रयोग की सबसे बड़ी प्राथमिकता है.
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि यह तकनीक जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही संवेदनशील भी है. अगर कोशिकाओं को जरूरत से ज्यादा रीप्रोग्राम किया गया, तो वे अपनी मूल पहचान खो सकती हैं, सही तरीके से काम करना बंद कर सकती हैं या यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर स्थिति का कारण भी बन सकती हैं. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इस रीसेट और स्टेबिलिटी के बीच सही संतुलन कैसे बनाए रखें. फिलहाल यह शोध शुरुआती चरण में है, लेकिन यह निश्चित रूप से चिकित्सा विज्ञान में एक नई क्रांति की ओर इशारा करता है.













































