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Sarcopenia Symptoms; Muscle Weakness Prevention Tips

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  • Sarcopenia Symptoms; Muscle Weakness Prevention Tips | National Library Of Medicine Research

16 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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फर्ज करिए, आपकी उम्र 35 साल है। सीढ़ियां चढ़ते वक्त अब पहले जैसी फुर्ती नहीं रही। थोड़ा सा वजन उठाते ही सांस फूलने लगती है। ये बदलाव शरीर के अंदर चल रही एक साइलेंट समस्या ‘सार्कोपेनिया’ का संकेत हो सकता है।

आमतौर पर ये समस्या बूढ़े लोगों को होती है, लेकिन सिडेंटरी लाइफस्टाइल के कारण 30-40 की उम्र से ही ये शुरु हो सकती है। ऐसे मामलों में यह समस्या बुढ़ापे तक गंभीर हो जाती है।

साल 2024 में ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 35 से 70 साल के लगभग 28% लोग सार्कोपेनिया से पीड़ित हैं।

इसलिए आज ‘फिजिकल हेल्थ’ में जानेंगे कि-

  • सार्कोपेनिया क्या है?
  • इसके शुरुआती संकेत क्या हैं?
  • इससे बचाव के लिए लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करें?

सवाल- सार्कोपेनिया क्या है?

जवाब- सार्कोपेनिया एक मेडिकल कंडीशन है, जिसमें–

  • उम्र बढ़ने के साथ मसल मास (बॉडी में मौजूद मसल्स) घटने लगता है।
  • मांसपेशियों की ताकत कम होेने लगती है।
  • चलने-फिरने में परेशानी होती है।
  • रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी भारी लगने लगते हैं।
  • आमतौर पर ये समस्या बुजुर्गों को ज्यादा होती है।

सवाल- सार्कोपेनिया क्यों होता है?

जवाब- सार्कोपेनिया उम्र के साथ शरीर में होने वाले कई बदलावों का नतीजा है। इसके लिए शरीर में होने वाले ये बदलाव जिम्मेदार होते हैं-

  • नर्व सेल्स कम होने लगती हैं। इससे मसल्स को सही सिग्नल नहीं मिल पाते हैं।
  • ग्रोथ हॉर्मोन का लेवल घटता है।
  • टेस्टोस्टेरोन और IGF-1 हॉर्मोन प्रभावित होते हैं।
  • टेस्टोस्टेरोन हाॅर्मोन शरीर में मसल्स, ताकत, एनर्जी और सेक्स ड्राइव को कंट्रोल करता है।
  • IGF-1 हाॅर्मोन शरीर में ग्रोथ, मसल्स बनने और सेल रिपेयर के लिए जिम्मेदार है।
  • शरीर भाेजन से मिलने वाले प्रोटीन को मसल्स बनाने और उसे रिपेयर करने में पहले जितना प्रभावी तरीके से उपयोग नहीं कर पाता है।
  • क्रॉनिक बीमारियों के कारण शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ता है।
  • आमतौर पर मसल्स उम्र के साथ घटती हैं, लेकिन सार्कोपेनिया में यह रफ्तार ज्यादा तेज हो जाती है।

सवाल- सार्कोपेनिया के लक्षण क्या हैं?

जवाब- इसका असर व्यक्ति डेली लाइफ और कामकाज पर पड़ता है। इसके कारण चलने-फिरने में परेशानी होती है, बैलेंस बिगड़ने लगता है। ग्राफिक में इसके सभी लक्षण देखिए-

सवाल- सार्कोपेनिया शरीर को किस तरह प्रभावित करता है?

जवाब- सार्कोपेनिया का असर सिर्फ मसल्स तक सीमित नहीं रहता है। इसका असर शरीर की ताकत, बैलेंस और डेली लाइफ पर भी पड़ता है।

डेली लाइफ पर असर-

  • शरीर की ताकत कम हो जाती है।
  • जल्दी थकान महसूस होती है।
  • चलने की गति धीमी हो जाती है।
  • बैलेंस बिगड़ने लगता है।
  • गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ता है।
  • सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल होता है।
  • वजन उठाने में दिक्कत होती है।
  • लंबे समय तक खड़े रहना कठिन हो जाता है।
  • छोटे-छोटे काम भी भारी लगने लगते हैं।

हेल्थ पर असर-

  • हड्डियां कमजोर हो सकती हैं।
  • फ्रैक्चर का रिस्क बढ़ता है।
  • मेटाबॉलिज्म स्लो हो जाता है।
  • मोटापा तेजी से बढ़ सकता है।
  • गंभीर मामलों में व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है।

सवाल- सार्कोपेनिया कैसे डायग्नोज होता है?

जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझते हैं-

  • आमतौर पर डॉक्टर इसकी डायग्नोसिस फिजिकल टेस्ट और लक्षणों के आधार पर करते हैं।
  • इसमें पेशेंट से उसकी डेली एक्टिविटी और कमजोरी से जुड़े सवाल पूछे जाते हैैं।
  • सेल्फ-रिपोर्टेड क्वेश्चनायर से मांसपेशियों की ताकत का आकलन किया जाता है।
  • अगर इस शुरुआती जांच के सेल्फ एसेसमेंट में स्कोर ज्यादा आता है, तो आगे के टेस्ट किए जाते हैं।

सवाल- सार्कोपेनिया के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?

जवाब- सार्कोपेनिया अचानक होने वाली बीमारी नहीं है। इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। कुछ खराब आदतें और हेल्थ कंडीशंस इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं। ग्राफिक में इसके प्रमुख रिस्क फैक्टर्स देखिए-

सवाल- किन लोगों को सार्कोपेनिया का रिस्क ज्यादा है?

जवाब- यह समस्या किसी भी वयस्क को हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों को इसका जोखिम ज्यादा होता है। ग्राफिक से समझते हैं-

सवाल- क्या महिलाओं में मेनोपॉज के बाद सार्कोपेनिया का रिस्क बढ़ जाता है?

जवाब- हां, मेनोपॉज के बाद हॉर्मोनल बदलाव के कारण इसका रिस्क बढ़ जाता है। पॉइंटर्स से इसके सभी कारण समझते हैं-

  • मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हॉर्मोन तेजी से घटता है।
  • यह हॉर्मोन मसल्स की ताकत और रिकवरी के लिए जरूरी होता है। इसकी कमी से मसल्स तेजी से ब्रेक होने लगती हैं।
  • नए मसल्स बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
  • ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, महिलाओं में सार्कोपेनिया की दर-
  • प्री-मेनोपॉज में 5.5% होती है।
  • पोस्ट-मेनोपॉज में ये बढ़कर 7.43% हो जाती है।
  • लेट पोस्ट-मेनोपॉज में जोखिम इससे भी ज्यादा बढ़ जाता है।

सवाल- क्या डाइट से सार्कोपेनिया के रिस्क को कम किया जा सकता है?

जवाब- हां, हेल्दी और संतुलित डाइट (आहार) की मदद से सार्कोपेनिया का रिस्क काफी हद तक कम किया जा सकता है।

‘जर्नल ऑफ फूड बायोकेमेस्ट्री’ के मुताबिक, बैलेंस्ड डाइट मांसपेशियों को हेल्दी बनाए रखने में मदद करती है। जरूरी न्यूट्रिएंट्स उनकी कार्यक्षमता सुधारने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ग्राफिक में देखिए कि हेल्दी मसल्स के लिए क्या खाना चाहिए-

सवाल- सार्कोपेनिया से कैसे बचें?

जवाब- सार्कोपेनिया से बचाव के लिए नियमित एक्सरसाइज और हेल्दी डाइट का कॉम्बिनेशन फायदेमंद माना जाता है। ग्राफिक में देखिए सार्कोपेनिया से बचाव के टिप्स-

समय पर पहचान और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलावों से मसल्स की कमजोरी को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। उम्र बढ़ना तय है, लेकिन मसल्स को मजबूत बनाए रखना काफी हद तक हमारी लाइफस्टाइल चॉइस पर निर्भर करता है।

………………………………….

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16 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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फर्ज करिए, आपकी उम्र 35 साल है। सीढ़ियां चढ़ते वक्त अब पहले जैसी फुर्ती नहीं रही। थोड़ा सा वजन उठाते ही सांस फूलने लगती है। ये बदलाव शरीर के अंदर चल रही एक साइलेंट समस्या ‘सार्कोपेनिया’ का संकेत हो सकता है।

आमतौर पर ये समस्या बूढ़े लोगों को होती है, लेकिन सिडेंटरी लाइफस्टाइल के कारण 30-40 की उम्र से ही ये शुरु हो सकती है। ऐसे मामलों में यह समस्या बुढ़ापे तक गंभीर हो जाती है।

साल 2024 में ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 35 से 70 साल के लगभग 28% लोग सार्कोपेनिया से पीड़ित हैं।

इसलिए आज ‘फिजिकल हेल्थ’ में जानेंगे कि-

  • सार्कोपेनिया क्या है?
  • इसके शुरुआती संकेत क्या हैं?
  • इससे बचाव के लिए लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करें?

सवाल- सार्कोपेनिया क्या है?

जवाब- सार्कोपेनिया एक मेडिकल कंडीशन है, जिसमें–

  • उम्र बढ़ने के साथ मसल मास (बॉडी में मौजूद मसल्स) घटने लगता है।
  • मांसपेशियों की ताकत कम होेने लगती है।
  • चलने-फिरने में परेशानी होती है।
  • रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी भारी लगने लगते हैं।
  • आमतौर पर ये समस्या बुजुर्गों को ज्यादा होती है।

सवाल- सार्कोपेनिया क्यों होता है?

जवाब- सार्कोपेनिया उम्र के साथ शरीर में होने वाले कई बदलावों का नतीजा है। इसके लिए शरीर में होने वाले ये बदलाव जिम्मेदार होते हैं-

  • नर्व सेल्स कम होने लगती हैं। इससे मसल्स को सही सिग्नल नहीं मिल पाते हैं।
  • ग्रोथ हॉर्मोन का लेवल घटता है।
  • टेस्टोस्टेरोन और IGF-1 हॉर्मोन प्रभावित होते हैं।
  • टेस्टोस्टेरोन हाॅर्मोन शरीर में मसल्स, ताकत, एनर्जी और सेक्स ड्राइव को कंट्रोल करता है।
  • IGF-1 हाॅर्मोन शरीर में ग्रोथ, मसल्स बनने और सेल रिपेयर के लिए जिम्मेदार है।
  • शरीर भाेजन से मिलने वाले प्रोटीन को मसल्स बनाने और उसे रिपेयर करने में पहले जितना प्रभावी तरीके से उपयोग नहीं कर पाता है।
  • क्रॉनिक बीमारियों के कारण शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ता है।
  • आमतौर पर मसल्स उम्र के साथ घटती हैं, लेकिन सार्कोपेनिया में यह रफ्तार ज्यादा तेज हो जाती है।

सवाल- सार्कोपेनिया के लक्षण क्या हैं?

जवाब- इसका असर व्यक्ति डेली लाइफ और कामकाज पर पड़ता है। इसके कारण चलने-फिरने में परेशानी होती है, बैलेंस बिगड़ने लगता है। ग्राफिक में इसके सभी लक्षण देखिए-

सवाल- सार्कोपेनिया शरीर को किस तरह प्रभावित करता है?

जवाब- सार्कोपेनिया का असर सिर्फ मसल्स तक सीमित नहीं रहता है। इसका असर शरीर की ताकत, बैलेंस और डेली लाइफ पर भी पड़ता है।

डेली लाइफ पर असर-

  • शरीर की ताकत कम हो जाती है।
  • जल्दी थकान महसूस होती है।
  • चलने की गति धीमी हो जाती है।
  • बैलेंस बिगड़ने लगता है।
  • गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ता है।
  • सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल होता है।
  • वजन उठाने में दिक्कत होती है।
  • लंबे समय तक खड़े रहना कठिन हो जाता है।
  • छोटे-छोटे काम भी भारी लगने लगते हैं।

हेल्थ पर असर-

  • हड्डियां कमजोर हो सकती हैं।
  • फ्रैक्चर का रिस्क बढ़ता है।
  • मेटाबॉलिज्म स्लो हो जाता है।
  • मोटापा तेजी से बढ़ सकता है।
  • गंभीर मामलों में व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है।

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  • आमतौर पर डॉक्टर इसकी डायग्नोसिस फिजिकल टेस्ट और लक्षणों के आधार पर करते हैं।
  • इसमें पेशेंट से उसकी डेली एक्टिविटी और कमजोरी से जुड़े सवाल पूछे जाते हैैं।
  • सेल्फ-रिपोर्टेड क्वेश्चनायर से मांसपेशियों की ताकत का आकलन किया जाता है।
  • अगर इस शुरुआती जांच के सेल्फ एसेसमेंट में स्कोर ज्यादा आता है, तो आगे के टेस्ट किए जाते हैं।

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जवाब- हां, मेनोपॉज के बाद हॉर्मोनल बदलाव के कारण इसका रिस्क बढ़ जाता है। पॉइंटर्स से इसके सभी कारण समझते हैं-

  • मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हॉर्मोन तेजी से घटता है।
  • यह हॉर्मोन मसल्स की ताकत और रिकवरी के लिए जरूरी होता है। इसकी कमी से मसल्स तेजी से ब्रेक होने लगती हैं।
  • नए मसल्स बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
  • ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, महिलाओं में सार्कोपेनिया की दर-
  • प्री-मेनोपॉज में 5.5% होती है।
  • पोस्ट-मेनोपॉज में ये बढ़कर 7.43% हो जाती है।
  • लेट पोस्ट-मेनोपॉज में जोखिम इससे भी ज्यादा बढ़ जाता है।

सवाल- क्या डाइट से सार्कोपेनिया के रिस्क को कम किया जा सकता है?

जवाब- हां, हेल्दी और संतुलित डाइट (आहार) की मदद से सार्कोपेनिया का रिस्क काफी हद तक कम किया जा सकता है।

‘जर्नल ऑफ फूड बायोकेमेस्ट्री’ के मुताबिक, बैलेंस्ड डाइट मांसपेशियों को हेल्दी बनाए रखने में मदद करती है। जरूरी न्यूट्रिएंट्स उनकी कार्यक्षमता सुधारने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ग्राफिक में देखिए कि हेल्दी मसल्स के लिए क्या खाना चाहिए-

सवाल- सार्कोपेनिया से कैसे बचें?

जवाब- सार्कोपेनिया से बचाव के लिए नियमित एक्सरसाइज और हेल्दी डाइट का कॉम्बिनेशन फायदेमंद माना जाता है। ग्राफिक में देखिए सार्कोपेनिया से बचाव के टिप्स-

समय पर पहचान और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलावों से मसल्स की कमजोरी को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। उम्र बढ़ना तय है, लेकिन मसल्स को मजबूत बनाए रखना काफी हद तक हमारी लाइफस्टाइल चॉइस पर निर्भर करता है।

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