Friday, 23 Oct 2026 | 06:17 AM

Trending :

चीन ने बिना हथियार बेचे ईरान को कैसे मजबूत बनाया:मिसाइल बनाने की टेक्निक दी, अमेरिका ने बैन लगाया तो छुपकर मदद पहुंचाई

चीन ने बिना हथियार बेचे ईरान को कैसे मजबूत बनाया:मिसाइल बनाने की टेक्निक दी, अमेरिका ने बैन लगाया तो छुपकर मदद पहुंचाई

पिछले करीब दो दशकों से चीन और ईरान के रिश्तों में संतुलन बना हुआ था। चीन, ईरान को सीधे हथियार बेचने की बजाय परोक्ष (इनडायरेक्ट) तरीके से मदद करता रहा। जंग शुरू होने के बाद अमेरिकी अधिकारियों का ध्यान फिर से इस पर गया है। खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं कि क्या चीन ने ईरान को कंधे पर रखकर दागी जाने वाले मिसाइल भेजी हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक अभी तक सबूत पक्के नहीं हैं। अगर यह सही निकला, तो मिडिल ईस्ट में चीन की रणनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि अगर यह सच साबित होता है तो चीन से आने वाले सामान पर 50% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया जाएगा। चीन ने आरोप को झूठ बताया और कहा कि टैरिफ लगाए गए तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। चीन सीधे हथियार नहीं, हथियारों का सामान देता है चीन ने 1980 के दशक में ईरान को बड़े पैमाने पर हथियार बेचे थे, लेकिन पिछले 10 साल में यह लगभग बंद हो गया। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय दबाव है। 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर सख्त प्रतिबंध लगाए। इनके तहत किसी भी देश के लिए ईरान को सीधे हथियार देना मुश्किल हो गया। अमेरिका ने भी आर्थिक और व्यापारिक पाबंदियां लगाईं, जिससे ईरान को सैन्य मदद देने वाले देशों को नुकसान हो सकता है। इसी कारण चीन ने अपनी रणनीति बदल दी। उसने सीधे हथियार देने की बजाय ‘ड्यूल-यूज’ यानी ऐसी तकनीक और सामान देना शुरू किया, जिनका इस्तेमाल सिविल और सैन्य दोनों कामों में हो सकता है। जैसे कि- इस तरीके से चीन सीधे हथियार बेचने से बच जाता है, लेकिन ईरान की सैन्य क्षमता को मजबूत करने में मदद करता रहता है। अब यह जानिए कि चीन ने समय के साथ ईरान को दी जाने वाली सैन्य मदद कैसे बदली… 1980: ईरान-इराक जंग में हथियार बेच मुनाफा कमाया 1980 में ईरान-इराक युद्ध शुरू हुआ। उसी समय चीन में आर्थिक सुधार हो रहे थे। सरकारी कंपनियों से कहा गया कि वे सरकार पर निर्भर न रहें, बल्कि खुद कमाई कर मुनाफा कमाएं। इसका असर डिफेंस सेक्टर पर भी पड़ा। पहले जो कंपनियां सिर्फ देश के लिए हथियार बनाती थीं, उन्हें अब बाहर के देशों को हथियार बेचने की छूट मिल गई। 1982 से 1987 के बीच चीन ने ईरान को मिसाइल, लड़ाकू विमान, टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और राइफल्स बेचीं। दिलचस्प बात यह थी कि चीन ने इराक को भी हथियार बेचे। दोनों दुश्मन देश एक-दूसरे पर चीनी हथियारों से हमला कर रहे थे। चीन के लिए यह पूरी तरह व्यापार का मामला था। वह दोनों ही पक्षों से पैसा कमा रहा था। 1987: US शिप पर हमले के बाद चीन पर दबाव बढ़ा 1987 में फारस की खाड़ी में तेल ले जाने वाले जहाजों पर हमले बढ़ गए थे। इसी बीच ईरान ने एक चीनी मिसाइल का इस्तेमाल करके कुवैत के पास एक तेल टैंकर पर हमला कर दिया। यह अमेरिकी जहाज था। यह पहली बार था जब अमेरिका को लगा कि चीन के बिकने वाले हथियार उसे नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके जवाब में अमेरिका ने चीन को हाई-टेक तकनीक और उपकरणों की बिक्री पर रोक लगा दी। क्योंकि इसका इस्तेमाल सैन्य क्षेत्र में हो सकता था। यह चीन के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि वह पश्चिमी तकनीक पर निर्भर था। चीन ने कहा कि वह सीधे ईरान को हथियार नहीं बेच रहा, लेकिन निर्यात पर सख्ती करेगा ताकि हथियार ‘तीसरे देशों’ से ईरान तक न पहुंचें। 1990: चीन ने ईरान को देशी मिसाइल बनाने में मदद दी 1988 में जंग खत्म होने के बाद ईरान ने समझ लिया था कि विदेशी हथियारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने खुद की रक्षा क्षमता बढ़ाने की कोशिश की, जिसमें चीन ने मदद की। ईरान ने नूर एंटी-शिप मिसाइल बनाई, जो चीनी C-802 मिसाइल की रिवर्स इंजीनियरिंग से बनी थी। यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ती है, जिससे इसे पकड़ना मुश्किल होता है। इसे समुद्र किनारे से भी दागा जा सकता था। यह जहाजों को निशाना बनाने के लिए उपयुक्त थी। इससे ईरान की समुद्री ताकत बढ़ गई, खासकर फारस की खाड़ी में। चीन ने ईरान को सिर्फ डिजाइन या मिसाइल ही नहीं दी, बल्कि पूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद की। इससे ईरान धीरे-धीरे अपने हथियार खुद बनाने में सक्षम हुआ और उसे बाहर से खरीद पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। 2002: ईरान के परमाणु कार्यक्रम चलाने का खुलासा साल 2002 में खुलासा हुआ कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। खास तौर पर दो जगहें सामने आईं। नतांज (यूरेनियम संवर्धन प्लांट) और अराक (हेवी वाटर रिएक्टर)। यह जानकारी बेहद अहम थी, क्योंकि ईरान ने इन साइट्स की जानकारी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को नहीं दी थी। ईरान का कहना था कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ बिजली बनाने और शांति के कामों के लिए है। लेकिन अमेरिका और कई पश्चिमी देशों को शक था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने ईरान से जवाब मांगा और जांच शुरू की। 2003 में IAEA के निरीक्षक ईरान पहुंचे और उन्होंने पाया कि ईरान लंबे समय से यूरेनियम संवर्धन पर काम कर रहा था। कई गतिविधियां बिना बताए की जा रही थीं और कुछ उपकरण और तकनीक विदेशों से गुप्त तरीके से लाई गई थी। जांच के दौरान यह भी पता चला कि ईरान ने पहले पाकिस्ती वैज्ञानिक नेटवर्क (ए.क्यू. खान नेटवर्क) से परमाणु तकनीक हासिल की थी। उसने सेंट्रीफ्यूज (यूरेनियम संवर्धन मशीन) पर प्रयोग किए थे। इसमें से कुछ प्रयोगों की जानकारी IAEA को नहीं दी गई थी। हालांकि IAEA को उस समय सीधे परमाणु हथियार बनाने का पक्का सबूत नहीं मिला, लेकिन जानकारी छिपाना, सीक्रेट साइट्स बनाना और संवर्धन तकनीक पर काम की वजह से दुनिया को शक हुआ कि ईरान का इरादा सिर्फ शांतिपूर्ण नहीं हो सकता। 2006: ईरान पर प्रतिबंध लगा तो मदद का तरीका बदला इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने 2006 में ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाए, जिनका चीन ने समर्थन किया। चीन की मजबूरी थी कि एक तरफ वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक रिश्ते खराब नहीं करना चाहता था, दूसरी तरफ वह ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध भी बनाए रखना चाहता था। इसलिए चीन ने रास्ता बदला। उसने सीधे हथियार देने कम कर दिए और उसकी जगह ऐसे उपकरण देने शुरू किए, जिनका इस्तेमाल दो तरह से हो सकता था। अमेरिका का आरोप है कि चीन और हांगकांग की कुछ कंपनियां ईरान के लिए ऐसे पार्ट्स जुटाने में मदद कर रही हैं, जिन पर अमेरिकी ट्रेजरी ने प्रतिबंध भी लगाए हैं। अमेरिका के मुताबिक, चीन और हांगकांग में कुछ ‘फ्रंट कंपनियां’ बनाई जाती हैं। फ्रंट कंपनी का मतलब होता है ऐसी कंपनी जो असली काम छिपाकर किसी और के लिए सामान खरीदती है। ये कंपनियां अलग-अलग देशों से पार्ट्स और केमिकल खरीदती हैं। कागजों में दिखाती हैं कि यह सामान किसी आम इंडस्ट्री के लिए है, लेकिन असल में यह सामान ईरान तक पहुंचाया जाता है। इनमें मिसाइल बनाने में काम आने वाले इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे, ड्रोन के लिए नेविगेशन सिस्टम और सेंसर, रॉकेट फ्यूल बनाने के केमिकल और मेटल और मशीन टूल्स शामिल होते हैं। ये आम और सैन्य दोनों काम में आती है, इसलिए इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है। रिपोर्ट: चीनी सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा ईरान अब एक नई चिंता यह भी है कि ईरान चीन के बायडू सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर सकता है, जो GPS का विकल्प है। अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने मिडिल ईस्ट में अपने मिसाइल और ड्रोन हमलों में इसका इस्तेमाल किया हो सकता है। जैसे अमेरिका का GPS है, वैसे ही बयाडू चीन का अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है। यह सिस्टम किसी भी जगह की सटीक लोकेशन बताता है, रास्ता दिखाता है और हथियारों को टारगेट तक पहुंचने में मदद करता है। अब चिंता यह है कि ईरान इसका इस्तेमाल सैन्य हमलों में कर सकता है। अमेरिकी कांग्रेस से जुड़ी एक संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने मिडिल ईस्ट में अपने कुछ ड्रोन और मिसाइल हमलों में चीनी नेविगेशन का इस्तेमाल किया हो सकता है। इससे उसकी स्ट्राइक क्षमता (हमला करने की ताकत) पहले से ज्यादा सटीक और खतरनाक हो जाती है यह अमेरिका के लिए चिंता की बात है क्योंकि इससे ईरान की सैन्य ताकत बढ़ती है। हालांकि चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह से गलत बताया है। ———————————- ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज के बाद अब ट्रम्प की मलक्का स्ट्रेट पर नजर:इंडोनेशिया से रक्षा करार किया, अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशियाई इलाके में जाने की इजाजत हॉर्मुज स्ट्रेट में इस समय हालात काफी तनाव भरे हैं। अमेरिका वहां ईरान से जुड़ी जहाजों की गतिविधियों पर सख्ती कर रहा है। इसी बीच अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक नया रक्षा समझौता हुआ है। लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
AP Inter Results 2026 Live Updates: Manabadi Intermediate 1st, 2nd year results link release date and time.(AI Image)

April 10, 2026/
4:46 pm

आखरी अपडेट:10 अप्रैल, 2026, 16:46 IST हुमायूं कबीर ने वायरल वीडियो को बीजेपी द्वारा एआई जनित बताया, ममता बनर्जी पर...

सनी देओल की नई एक्शन थ्रिलर की शूटिंग शुरू हुई:रितेश-फरहान और ए. आर. मुरुगदॉस साथ आए, ज्योतिका निभाएंगी फिल्म में अहम किरदार

March 2, 2026/
7:04 pm

एक्सेल एंटरटेनमेंट ने एक और बड़े प्रोजेक्ट का आगाज कर दिया है। इस बार बैनर के साथ जुड़ रहे हैं...

ऑपरेशन के बाद युवक की मौत पर सतना में हंगामा:परिजनों ने शव रखकर जाम किया; 20 करोड़ मुआवजा और डॉक्टरों पर केस की मांग

April 13, 2026/
11:05 pm

सतना में कथित तौर पर डॉक्टरों की लापरवाही के कारण सोमवार को एक युवक की रीवा में मौत हो गई।...

West Indies vs Ireland Live Score: ICC Women's T20 World Cup 2026 Match Today Updates From Bristol (AP)

June 27, 2026/
10:00 pm

आखरी अपडेट:27 जून, 2026, 22:00 IST वाइको ने कहा कि पार्टी आगामी विधानसभा उपचुनावों में सत्तारूढ़ टीवीके का समर्थन करेगी...

सरेआम गोद में बैठाने वाले राघव जुयाल हैं खास दोस्त:शहनाज गिल बोलीं- उनकी फिल्म जरूर देखें, हाथ पकड़ने से अफेयर की चर्चा

July 15, 2026/
4:00 pm

डेटिंग की अफवाहों के बीच शहनाज गिल ने राघव जुयाल को अपना बेहद करीबी और अच्छा दोस्त बताया। साथ ही...

युवा वयस्कों में उच्च कोलेस्ट्रॉल: 20-30 वर्ष की आयु में बढ़ रहा है कोलेस्ट्रॉल, ये लक्षण खतरनाक होना होगा; बचाव के लिए क्या करें?

April 10, 2026/
8:13 pm

युवा वयस्कों में उच्च कोलेस्ट्रॉल: आज के दौर में खराब लाइफस्टाइल और गलत खान-पान की गलत स्थिति ने शर्त का...

आसाराम ने रामलला का VIP दर्शन किया:अति विशिष्ट शंकराचार्य द्वार से 3 वाहनों के काफिले के साथ पहुंचा, हनुमानगढ़ी की सीढ़ियां नहीं चढ़ सका

March 11, 2026/
10:31 am

अयोध्या पहुंचे नाबालिग से रेप केस में सजायफ्ता आसाराम ने बुधवार को रामलला का दर्शन किया। 3 वाहनों का काफिला...

राजनीति

चीन ने बिना हथियार बेचे ईरान को कैसे मजबूत बनाया:मिसाइल बनाने की टेक्निक दी, अमेरिका ने बैन लगाया तो छुपकर मदद पहुंचाई

चीन ने बिना हथियार बेचे ईरान को कैसे मजबूत बनाया:मिसाइल बनाने की टेक्निक दी, अमेरिका ने बैन लगाया तो छुपकर मदद पहुंचाई

पिछले करीब दो दशकों से चीन और ईरान के रिश्तों में संतुलन बना हुआ था। चीन, ईरान को सीधे हथियार बेचने की बजाय परोक्ष (इनडायरेक्ट) तरीके से मदद करता रहा। जंग शुरू होने के बाद अमेरिकी अधिकारियों का ध्यान फिर से इस पर गया है। खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं कि क्या चीन ने ईरान को कंधे पर रखकर दागी जाने वाले मिसाइल भेजी हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक अभी तक सबूत पक्के नहीं हैं। अगर यह सही निकला, तो मिडिल ईस्ट में चीन की रणनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि अगर यह सच साबित होता है तो चीन से आने वाले सामान पर 50% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया जाएगा। चीन ने आरोप को झूठ बताया और कहा कि टैरिफ लगाए गए तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। चीन सीधे हथियार नहीं, हथियारों का सामान देता है चीन ने 1980 के दशक में ईरान को बड़े पैमाने पर हथियार बेचे थे, लेकिन पिछले 10 साल में यह लगभग बंद हो गया। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय दबाव है। 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर सख्त प्रतिबंध लगाए। इनके तहत किसी भी देश के लिए ईरान को सीधे हथियार देना मुश्किल हो गया। अमेरिका ने भी आर्थिक और व्यापारिक पाबंदियां लगाईं, जिससे ईरान को सैन्य मदद देने वाले देशों को नुकसान हो सकता है। इसी कारण चीन ने अपनी रणनीति बदल दी। उसने सीधे हथियार देने की बजाय ‘ड्यूल-यूज’ यानी ऐसी तकनीक और सामान देना शुरू किया, जिनका इस्तेमाल सिविल और सैन्य दोनों कामों में हो सकता है। जैसे कि- इस तरीके से चीन सीधे हथियार बेचने से बच जाता है, लेकिन ईरान की सैन्य क्षमता को मजबूत करने में मदद करता रहता है। अब यह जानिए कि चीन ने समय के साथ ईरान को दी जाने वाली सैन्य मदद कैसे बदली… 1980: ईरान-इराक जंग में हथियार बेच मुनाफा कमाया 1980 में ईरान-इराक युद्ध शुरू हुआ। उसी समय चीन में आर्थिक सुधार हो रहे थे। सरकारी कंपनियों से कहा गया कि वे सरकार पर निर्भर न रहें, बल्कि खुद कमाई कर मुनाफा कमाएं। इसका असर डिफेंस सेक्टर पर भी पड़ा। पहले जो कंपनियां सिर्फ देश के लिए हथियार बनाती थीं, उन्हें अब बाहर के देशों को हथियार बेचने की छूट मिल गई। 1982 से 1987 के बीच चीन ने ईरान को मिसाइल, लड़ाकू विमान, टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और राइफल्स बेचीं। दिलचस्प बात यह थी कि चीन ने इराक को भी हथियार बेचे। दोनों दुश्मन देश एक-दूसरे पर चीनी हथियारों से हमला कर रहे थे। चीन के लिए यह पूरी तरह व्यापार का मामला था। वह दोनों ही पक्षों से पैसा कमा रहा था। 1987: US शिप पर हमले के बाद चीन पर दबाव बढ़ा 1987 में फारस की खाड़ी में तेल ले जाने वाले जहाजों पर हमले बढ़ गए थे। इसी बीच ईरान ने एक चीनी मिसाइल का इस्तेमाल करके कुवैत के पास एक तेल टैंकर पर हमला कर दिया। यह अमेरिकी जहाज था। यह पहली बार था जब अमेरिका को लगा कि चीन के बिकने वाले हथियार उसे नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके जवाब में अमेरिका ने चीन को हाई-टेक तकनीक और उपकरणों की बिक्री पर रोक लगा दी। क्योंकि इसका इस्तेमाल सैन्य क्षेत्र में हो सकता था। यह चीन के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि वह पश्चिमी तकनीक पर निर्भर था। चीन ने कहा कि वह सीधे ईरान को हथियार नहीं बेच रहा, लेकिन निर्यात पर सख्ती करेगा ताकि हथियार ‘तीसरे देशों’ से ईरान तक न पहुंचें। 1990: चीन ने ईरान को देशी मिसाइल बनाने में मदद दी 1988 में जंग खत्म होने के बाद ईरान ने समझ लिया था कि विदेशी हथियारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने खुद की रक्षा क्षमता बढ़ाने की कोशिश की, जिसमें चीन ने मदद की। ईरान ने नूर एंटी-शिप मिसाइल बनाई, जो चीनी C-802 मिसाइल की रिवर्स इंजीनियरिंग से बनी थी। यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ती है, जिससे इसे पकड़ना मुश्किल होता है। इसे समुद्र किनारे से भी दागा जा सकता था। यह जहाजों को निशाना बनाने के लिए उपयुक्त थी। इससे ईरान की समुद्री ताकत बढ़ गई, खासकर फारस की खाड़ी में। चीन ने ईरान को सिर्फ डिजाइन या मिसाइल ही नहीं दी, बल्कि पूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद की। इससे ईरान धीरे-धीरे अपने हथियार खुद बनाने में सक्षम हुआ और उसे बाहर से खरीद पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। 2002: ईरान के परमाणु कार्यक्रम चलाने का खुलासा साल 2002 में खुलासा हुआ कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। खास तौर पर दो जगहें सामने आईं। नतांज (यूरेनियम संवर्धन प्लांट) और अराक (हेवी वाटर रिएक्टर)। यह जानकारी बेहद अहम थी, क्योंकि ईरान ने इन साइट्स की जानकारी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को नहीं दी थी। ईरान का कहना था कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ बिजली बनाने और शांति के कामों के लिए है। लेकिन अमेरिका और कई पश्चिमी देशों को शक था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने ईरान से जवाब मांगा और जांच शुरू की। 2003 में IAEA के निरीक्षक ईरान पहुंचे और उन्होंने पाया कि ईरान लंबे समय से यूरेनियम संवर्धन पर काम कर रहा था। कई गतिविधियां बिना बताए की जा रही थीं और कुछ उपकरण और तकनीक विदेशों से गुप्त तरीके से लाई गई थी। जांच के दौरान यह भी पता चला कि ईरान ने पहले पाकिस्ती वैज्ञानिक नेटवर्क (ए.क्यू. खान नेटवर्क) से परमाणु तकनीक हासिल की थी। उसने सेंट्रीफ्यूज (यूरेनियम संवर्धन मशीन) पर प्रयोग किए थे। इसमें से कुछ प्रयोगों की जानकारी IAEA को नहीं दी गई थी। हालांकि IAEA को उस समय सीधे परमाणु हथियार बनाने का पक्का सबूत नहीं मिला, लेकिन जानकारी छिपाना, सीक्रेट साइट्स बनाना और संवर्धन तकनीक पर काम की वजह से दुनिया को शक हुआ कि ईरान का इरादा सिर्फ शांतिपूर्ण नहीं हो सकता। 2006: ईरान पर प्रतिबंध लगा तो मदद का तरीका बदला इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने 2006 में ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाए, जिनका चीन ने समर्थन किया। चीन की मजबूरी थी कि एक तरफ वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक रिश्ते खराब नहीं करना चाहता था, दूसरी तरफ वह ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध भी बनाए रखना चाहता था। इसलिए चीन ने रास्ता बदला। उसने सीधे हथियार देने कम कर दिए और उसकी जगह ऐसे उपकरण देने शुरू किए, जिनका इस्तेमाल दो तरह से हो सकता था। अमेरिका का आरोप है कि चीन और हांगकांग की कुछ कंपनियां ईरान के लिए ऐसे पार्ट्स जुटाने में मदद कर रही हैं, जिन पर अमेरिकी ट्रेजरी ने प्रतिबंध भी लगाए हैं। अमेरिका के मुताबिक, चीन और हांगकांग में कुछ ‘फ्रंट कंपनियां’ बनाई जाती हैं। फ्रंट कंपनी का मतलब होता है ऐसी कंपनी जो असली काम छिपाकर किसी और के लिए सामान खरीदती है। ये कंपनियां अलग-अलग देशों से पार्ट्स और केमिकल खरीदती हैं। कागजों में दिखाती हैं कि यह सामान किसी आम इंडस्ट्री के लिए है, लेकिन असल में यह सामान ईरान तक पहुंचाया जाता है। इनमें मिसाइल बनाने में काम आने वाले इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे, ड्रोन के लिए नेविगेशन सिस्टम और सेंसर, रॉकेट फ्यूल बनाने के केमिकल और मेटल और मशीन टूल्स शामिल होते हैं। ये आम और सैन्य दोनों काम में आती है, इसलिए इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है। रिपोर्ट: चीनी सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा ईरान अब एक नई चिंता यह भी है कि ईरान चीन के बायडू सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर सकता है, जो GPS का विकल्प है। अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने मिडिल ईस्ट में अपने मिसाइल और ड्रोन हमलों में इसका इस्तेमाल किया हो सकता है। जैसे अमेरिका का GPS है, वैसे ही बयाडू चीन का अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है। यह सिस्टम किसी भी जगह की सटीक लोकेशन बताता है, रास्ता दिखाता है और हथियारों को टारगेट तक पहुंचने में मदद करता है। अब चिंता यह है कि ईरान इसका इस्तेमाल सैन्य हमलों में कर सकता है। अमेरिकी कांग्रेस से जुड़ी एक संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने मिडिल ईस्ट में अपने कुछ ड्रोन और मिसाइल हमलों में चीनी नेविगेशन का इस्तेमाल किया हो सकता है। इससे उसकी स्ट्राइक क्षमता (हमला करने की ताकत) पहले से ज्यादा सटीक और खतरनाक हो जाती है यह अमेरिका के लिए चिंता की बात है क्योंकि इससे ईरान की सैन्य ताकत बढ़ती है। हालांकि चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह से गलत बताया है। ———————————- ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज के बाद अब ट्रम्प की मलक्का स्ट्रेट पर नजर:इंडोनेशिया से रक्षा करार किया, अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशियाई इलाके में जाने की इजाजत हॉर्मुज स्ट्रेट में इस समय हालात काफी तनाव भरे हैं। अमेरिका वहां ईरान से जुड़ी जहाजों की गतिविधियों पर सख्ती कर रहा है। इसी बीच अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक नया रक्षा समझौता हुआ है। लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.