Saturday, 18 Apr 2026 | 03:02 PM

Trending :

EXCLUSIVE

Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB

Sabarimala Temple Women Entry | SC Hearing on Hindu Faith vs Rights
  • Hindi News
  • National
  • Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB | Hindu Beliefs

नई दिल्ली12 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री की इजाजत दी थी। इस फैसले के लिए याचिकाओं पर अब सुनवाई हो रही है।

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई शुरू हो गई है। 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल को पिछली सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।

वहीं मंदिर प्रशासन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि सबरीमाला कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यहां के देवता ब्रह्मचारी हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 4 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…

लाइव अपडेट्स

14 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला में एक ही संप्रदाय भगवान अयप्पा का

एडवोकेट वेंकटेश: मैं नियमित रूप से सबरीमाला जाता हूं। पारंपरिक हिंदू धर्म में, किसी भी तीर्थयात्रा के दौरान, सभी जातियों और समुदायों के बीच के भेद मिट जाते हैं। सभी लोग एक समान ‘वर्ग’ का हिस्सा बन जाते हैं। जब हम सबरीमाला जाते हैं, तो वहां कोई जाति/वर्ग नहीं होता; वहां केवल एक ही चीज होती है जो सबको एक साथ रखती है,वह है भगवान अयप्पा का संप्रदाय, जिसमें सभी तरह के भक्त शामिल होते हैं।

‘संप्रदाय’ शब्द हिंदुओं के सभी वर्गों के आपसी मेल-जोल के लिए इस्तेमाल होता है। यह व्यवस्था स्थिर-जड़ नहीं होनी चाहिए। इसका मतलब है कि हिंदुओं के किसी भी वर्ग को मंदिर में जाने की परमिशन है; लेकिन जब आर्टिकल 26(b) की बात आती है, तो यह अधिकार केवल अपने इंटरनल मैनेजमेंट तक ही सीमित होता है।

इसे ऐसे समझते हैं कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही देखने आते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मामलों का प्रशासनिक प्रबंधन और संचालन असल में रजिस्ट्रार ही करता है। जो कोई भी वहां जाता है, वह आर्टिकल 26(b) के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि वह सुप्रीम कोर्ट के मामलों को मैनेज करेगा।

19 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

ऐसी नीति बनाई जाए जिससे दान को भी आर्टिक 25(2)(a) का संरक्षण मिले

एड. वेंकटेश: एक और उदाहरण लेते हैं, दान। दान अपने आप में एक धर्मनिरपेक्ष कार्य हो सकता है। लेकिन धार्मिक दान धर्म के दायरे में आता है और उसमें किसी तरह का दखल नहीं दिया जाना चाहिए। अब यह हो रहा है कि हमने धार्मिक दान के दायरे को बढ़ाकर उसे दान के दायरे में ला दिया है। फिर हम कहते हैं कि यह एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और उसमें दखलअंदाजी शुरू कर देते हैं।

इसलिए एक ऐसी न्यायिक नीति बनाई जानी चाहिए कि एक बार जब कोई मामला धर्म के क्षेत्र में आ जाए तो दान-पुण्य को भी उसके मूल स्वरूप में, आर्टिकल 25(2)(a) के तहत संरक्षण मिले।

45 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सरकार का धर्म की बाहरी चीजों पर कंट्रोल, मान्यताएं-प्रथाएं तय नहीं कर सकती

एडवोकेट वेंकटेश: मुझे आर्टिकल 25(1) से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था मानने की आजादी देता है। लेकिन अनुच्छेद 25(2)(a) का मतलब सिर्फ इतना है कि सरकार उन चीजों को नियंत्रित कर सकती है जो धर्म से जुड़ी तो हैं, लेकिन असल में आर्थिक, सामाजिक या प्रशासनिक (यानी गैर-धार्मिक) गतिविधियां हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार धर्म के मूल हिस्से (कोर प्रैक्टिस) में दखल दे सकती है।

अगर कोई कानून यह कहकर दखल देता है कि वह व्यवस्था सुधार रहा है, लेकिन असल में यह तय करने लगता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “जरूरी” है और कौन-सी नहीं, और इससे लोगों की धार्मिक आजादी कम होती है, तो यह अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन माना जाएगा, यानी ऐसा कानून गलत होगा।

लेकिन हमने जो किया, उससे पूरा सिद्धांत ही उलट गया है। हमने धार्मिक कानून को धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं के साथ जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया, फिर धार्मिक प्रथाओं को एक दायरे में सीमित कर दिया है और धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं में दखल देने का रास्ता खोल दिया है।

54 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

धर्म और राज्य का एक-दूसरे के काम में दखल होता है, यही टकराव स्पष्ट हो

एडवोकेट वेंकटेश: एक ओर तो हम यह दावा करते हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं, क्योंकि हम धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं देते। वहीं दूसरी ओर, हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि राज्य के ‘धर्मनिरपेक्ष पहलुओं’ के दायरे में धर्म का कोई, दखल नहीं होना चाहिए। इन दोनों के बीच कुछ न कुछ ‘टकराव’ और ‘अतिव्याप्ति’ (इंटरनसेक्शन) तो जरूर है। इस दुनिया में कोई भी चीज पूरी तरह ‘निरपेक्ष’ नहीं होती।

लेकिन फिर भी यह टकराव और अतिव्याप्ति बहुत कम होनी चाहिए। बेहद छोटी और साफ-साफ परिभाषित होनी चाहिए। उसी परिभाषा के आधार पर ही, कोर्ट को नियम-कानून स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाने चाहिए।

06:00 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

फैसले में अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ का अंतर नजरअंदाज किया

एडवोकेट वेंकटेश: मैं खुद से यह सवाल पूछूंगा कि कितनी स्वतंत्रता वास्तव में स्वतंत्रता है। व्यवहार क्या है? समान रूप से हकदार क्या है? अंतरात्मा की स्वतंत्रता और सभी व्यक्तियों की स्वतंत्रता, जो अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़ी है, जिनके लिए संभवतः इस कोर्ट से स्पष्टीकरण और दखल देने की जरूरत है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य जो मूल रूप से किसी न किसी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता को कम करने की कोशिश करता है, वह अनुच्छेद 25(1) के अलावा बुनियादी संरचना सिद्धांत के खिलाफ है।

अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ के बीच साफ-साफ अंतर किया था। मेरा मानना ​​है कि सबरीमाला फैसले में इस अंतर को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि यह एक अहम पॉइंट है और अंबेडकर के भाषणों से ही यह सामने आया है।

05:51 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

वेंकटेश ने पूछा- गैर संप्रदायिक मंदिरों का क्या, उनके पास कोई अधिकार नहीं

आर्टिकल 25(2) (a) और (b) का कोई उदाहरण नहीं है और ये अद्वितीय हैं। जो भारतीय संविधान के लिए विशेष रूप से बनाए गए हैं। यदि संप्रदायिक मंदिरों की परिभाषा है और कोई खास वर्ग इसके अंतर्गत आता है, तो गैर-संप्रदायिक मंदिरों का क्या होगा? क्या उनका कोई अधिकार नहीं है? यह सब एक पब्लिक प्लेस की तरह हो जाते हैं जैसे बस स्टैंड, जहां कोई भी आ-जा सकता है।

05:45 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

धर्म, धार्मिक प्रथा, धार्मिक संस्थाएं, धार्मिक संप्रदाय की एक परिभाषा संभव नहीं

आत्मतम ट्रस्ट की ओर से एडवोकेट एमआर वेंकटेश दलीलें रख रहे हैं।

एडवोकेट वेंकटेश: मैं कहना चाहूंगा वह यह है कि अनुच्छेद 25 में ‘धर्म’ शब्द, अनुच्छेद 25(2)(a) में ‘धार्मिक प्रथा’, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत ‘हिंदू धार्मिक संस्थाएं’, अनुच्छेद 26 के तहत ‘धार्मिक संप्रदाय’ (डिनॉमिनेशन), और अनुच्छेद 26(2)(b) के तहत ‘धर्म से जुड़े मामले’… ये सभी शब्द अनिश्चित हैं और शायद इन्हें परिभाषित करना संभव नहीं है।

संप्रदाय शब्द लैटिन भाषा के ‘डेनोमिटेनस’ से आया है, जिससे ईसाई धर्म में इस शब्द को एक विशेष संप्रदाय से जोड़ा जा सका। इसे आयरिश संविधान ने अपनाया। इसकी जड़ें काफी हद तक विदेशी हैं, और इसी वजह से हमारी समझ के दायरे में इन शब्दों की अपनी कुछ सीमाएं हैं।

05:05 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

9 जजों की बेंच कर रही सबरीमाला केस की सुनवाई

05:05 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला सहित 5 मामले, जिन पर SC फैसला करेगा

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं।

2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

4. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

05:04 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई गाइडलाइन बन सकती है

05:03 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला मंदिर केस की टाइमलाइन, 36 साल से यह मामला अदालतों में

खबरें और भी हैं…
WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
Trump Tariff Cancelled by US Supreme Court

February 20, 2026/
8:47 pm

वॉशिंगटन डीसी40 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ रद्द करने के फैसले के तीन घंटे बाद ट्रम्प...

सुप्रीम कोर्ट में प्याज-लहसुन को तामसिक मानने की याचिका:CJI ने पूछा-आधी रात को पिटीशन ड्राफ्ट करते हो क्या; फालतू बताकर 5 याचिकाएं खारिज

March 9, 2026/
3:09 pm

सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने 5 पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन(PIL)/जनहित याचिका फाइल की थीं। इनमें से एक कहा गया था...

Follow Chennai Super Kings vs Delhi Capitals live from Chepauk

April 11, 2026/
8:32 pm

आखरी अपडेट:11 अप्रैल, 2026, 20:32 IST कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव में उम्मीदवार चयन...

सुकेश के खिलाफ जैकलीन सरकारी गवाह बनेंगी:₹200 करोड़ की ठगी केस में सहयोग को तैयार; इन्हीं पैसों से लग्जरी गिफ्ट लिए थे

April 17, 2026/
3:06 pm

बॉलीवुड एक्ट्रेस जैकलीन फर्नांडिस ने 200 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग केस में सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई है।...

सीधी के सम्राट चौक पर कांग्रेस का प्रदर्शन:पूर्व मंत्री पटेल के नेतृत्व में महंगाई-बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों को लेकर दिया धरना

April 6, 2026/
6:38 pm

सीधी जिला मुख्यालय के सम्राट चौक पर सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने जनहित के मुद्दों को लेकर धरना प्रदर्शन किया।...

जॉब - शिक्षा

हेल्थ & फिटनेस

राजनीति

Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB

Sabarimala Temple Women Entry | SC Hearing on Hindu Faith vs Rights
  • Hindi News
  • National
  • Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB | Hindu Beliefs

नई दिल्ली12 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री की इजाजत दी थी। इस फैसले के लिए याचिकाओं पर अब सुनवाई हो रही है।

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई शुरू हो गई है। 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल को पिछली सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।

वहीं मंदिर प्रशासन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि सबरीमाला कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यहां के देवता ब्रह्मचारी हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 4 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…

लाइव अपडेट्स

14 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला में एक ही संप्रदाय भगवान अयप्पा का

एडवोकेट वेंकटेश: मैं नियमित रूप से सबरीमाला जाता हूं। पारंपरिक हिंदू धर्म में, किसी भी तीर्थयात्रा के दौरान, सभी जातियों और समुदायों के बीच के भेद मिट जाते हैं। सभी लोग एक समान ‘वर्ग’ का हिस्सा बन जाते हैं। जब हम सबरीमाला जाते हैं, तो वहां कोई जाति/वर्ग नहीं होता; वहां केवल एक ही चीज होती है जो सबको एक साथ रखती है,वह है भगवान अयप्पा का संप्रदाय, जिसमें सभी तरह के भक्त शामिल होते हैं।

‘संप्रदाय’ शब्द हिंदुओं के सभी वर्गों के आपसी मेल-जोल के लिए इस्तेमाल होता है। यह व्यवस्था स्थिर-जड़ नहीं होनी चाहिए। इसका मतलब है कि हिंदुओं के किसी भी वर्ग को मंदिर में जाने की परमिशन है; लेकिन जब आर्टिकल 26(b) की बात आती है, तो यह अधिकार केवल अपने इंटरनल मैनेजमेंट तक ही सीमित होता है।

इसे ऐसे समझते हैं कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही देखने आते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मामलों का प्रशासनिक प्रबंधन और संचालन असल में रजिस्ट्रार ही करता है। जो कोई भी वहां जाता है, वह आर्टिकल 26(b) के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि वह सुप्रीम कोर्ट के मामलों को मैनेज करेगा।

19 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

ऐसी नीति बनाई जाए जिससे दान को भी आर्टिक 25(2)(a) का संरक्षण मिले

एड. वेंकटेश: एक और उदाहरण लेते हैं, दान। दान अपने आप में एक धर्मनिरपेक्ष कार्य हो सकता है। लेकिन धार्मिक दान धर्म के दायरे में आता है और उसमें किसी तरह का दखल नहीं दिया जाना चाहिए। अब यह हो रहा है कि हमने धार्मिक दान के दायरे को बढ़ाकर उसे दान के दायरे में ला दिया है। फिर हम कहते हैं कि यह एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और उसमें दखलअंदाजी शुरू कर देते हैं।

इसलिए एक ऐसी न्यायिक नीति बनाई जानी चाहिए कि एक बार जब कोई मामला धर्म के क्षेत्र में आ जाए तो दान-पुण्य को भी उसके मूल स्वरूप में, आर्टिकल 25(2)(a) के तहत संरक्षण मिले।

45 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सरकार का धर्म की बाहरी चीजों पर कंट्रोल, मान्यताएं-प्रथाएं तय नहीं कर सकती

एडवोकेट वेंकटेश: मुझे आर्टिकल 25(1) से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था मानने की आजादी देता है। लेकिन अनुच्छेद 25(2)(a) का मतलब सिर्फ इतना है कि सरकार उन चीजों को नियंत्रित कर सकती है जो धर्म से जुड़ी तो हैं, लेकिन असल में आर्थिक, सामाजिक या प्रशासनिक (यानी गैर-धार्मिक) गतिविधियां हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार धर्म के मूल हिस्से (कोर प्रैक्टिस) में दखल दे सकती है।

अगर कोई कानून यह कहकर दखल देता है कि वह व्यवस्था सुधार रहा है, लेकिन असल में यह तय करने लगता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “जरूरी” है और कौन-सी नहीं, और इससे लोगों की धार्मिक आजादी कम होती है, तो यह अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन माना जाएगा, यानी ऐसा कानून गलत होगा।

लेकिन हमने जो किया, उससे पूरा सिद्धांत ही उलट गया है। हमने धार्मिक कानून को धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं के साथ जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया, फिर धार्मिक प्रथाओं को एक दायरे में सीमित कर दिया है और धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं में दखल देने का रास्ता खोल दिया है।

54 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

धर्म और राज्य का एक-दूसरे के काम में दखल होता है, यही टकराव स्पष्ट हो

एडवोकेट वेंकटेश: एक ओर तो हम यह दावा करते हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं, क्योंकि हम धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं देते। वहीं दूसरी ओर, हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि राज्य के ‘धर्मनिरपेक्ष पहलुओं’ के दायरे में धर्म का कोई, दखल नहीं होना चाहिए। इन दोनों के बीच कुछ न कुछ ‘टकराव’ और ‘अतिव्याप्ति’ (इंटरनसेक्शन) तो जरूर है। इस दुनिया में कोई भी चीज पूरी तरह ‘निरपेक्ष’ नहीं होती।

लेकिन फिर भी यह टकराव और अतिव्याप्ति बहुत कम होनी चाहिए। बेहद छोटी और साफ-साफ परिभाषित होनी चाहिए। उसी परिभाषा के आधार पर ही, कोर्ट को नियम-कानून स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाने चाहिए।

06:00 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

फैसले में अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ का अंतर नजरअंदाज किया

एडवोकेट वेंकटेश: मैं खुद से यह सवाल पूछूंगा कि कितनी स्वतंत्रता वास्तव में स्वतंत्रता है। व्यवहार क्या है? समान रूप से हकदार क्या है? अंतरात्मा की स्वतंत्रता और सभी व्यक्तियों की स्वतंत्रता, जो अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़ी है, जिनके लिए संभवतः इस कोर्ट से स्पष्टीकरण और दखल देने की जरूरत है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य जो मूल रूप से किसी न किसी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता को कम करने की कोशिश करता है, वह अनुच्छेद 25(1) के अलावा बुनियादी संरचना सिद्धांत के खिलाफ है।

अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ के बीच साफ-साफ अंतर किया था। मेरा मानना ​​है कि सबरीमाला फैसले में इस अंतर को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि यह एक अहम पॉइंट है और अंबेडकर के भाषणों से ही यह सामने आया है।

05:51 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

वेंकटेश ने पूछा- गैर संप्रदायिक मंदिरों का क्या, उनके पास कोई अधिकार नहीं

आर्टिकल 25(2) (a) और (b) का कोई उदाहरण नहीं है और ये अद्वितीय हैं। जो भारतीय संविधान के लिए विशेष रूप से बनाए गए हैं। यदि संप्रदायिक मंदिरों की परिभाषा है और कोई खास वर्ग इसके अंतर्गत आता है, तो गैर-संप्रदायिक मंदिरों का क्या होगा? क्या उनका कोई अधिकार नहीं है? यह सब एक पब्लिक प्लेस की तरह हो जाते हैं जैसे बस स्टैंड, जहां कोई भी आ-जा सकता है।

05:45 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

धर्म, धार्मिक प्रथा, धार्मिक संस्थाएं, धार्मिक संप्रदाय की एक परिभाषा संभव नहीं

आत्मतम ट्रस्ट की ओर से एडवोकेट एमआर वेंकटेश दलीलें रख रहे हैं।

एडवोकेट वेंकटेश: मैं कहना चाहूंगा वह यह है कि अनुच्छेद 25 में ‘धर्म’ शब्द, अनुच्छेद 25(2)(a) में ‘धार्मिक प्रथा’, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत ‘हिंदू धार्मिक संस्थाएं’, अनुच्छेद 26 के तहत ‘धार्मिक संप्रदाय’ (डिनॉमिनेशन), और अनुच्छेद 26(2)(b) के तहत ‘धर्म से जुड़े मामले’… ये सभी शब्द अनिश्चित हैं और शायद इन्हें परिभाषित करना संभव नहीं है।

संप्रदाय शब्द लैटिन भाषा के ‘डेनोमिटेनस’ से आया है, जिससे ईसाई धर्म में इस शब्द को एक विशेष संप्रदाय से जोड़ा जा सका। इसे आयरिश संविधान ने अपनाया। इसकी जड़ें काफी हद तक विदेशी हैं, और इसी वजह से हमारी समझ के दायरे में इन शब्दों की अपनी कुछ सीमाएं हैं।

05:05 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

9 जजों की बेंच कर रही सबरीमाला केस की सुनवाई

05:05 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला सहित 5 मामले, जिन पर SC फैसला करेगा

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं।

2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

4. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

05:04 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई गाइडलाइन बन सकती है

05:03 AM17 अप्रैल 2026

  • कॉपी लिंक

सबरीमाला मंदिर केस की टाइमलाइन, 36 साल से यह मामला अदालतों में

खबरें और भी हैं…
WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.