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Flex-Fuel Vehicle Launch Stuck: Auto Firms, Oil Companies Clash

Flex-Fuel Vehicle Launch Stuck: Auto Firms, Oil Companies Clash
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नई दिल्ली29 मिनट पहले

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सरकार देश में पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के लिए फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां तेजी से सड़क पर उतारना चाहती है, लेकिन यह प्लान अब ‘ पहले मुर्गी आई या अंडे’ वाली उलझन में फंस गया है।

ऑटोमोबाइल कंपनियां बड़े पैमाने पर तब तक हाई-एथेनॉल ब्लेंड वाली गाड़ियां बनाने को तैयार नहीं हैं, जब तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में फ्लैक्स फ्यूल उपलब्ध न हो।

वहीं, तेल कंपनियां तब तक E85 और E100 जैसे फ्यूल के स्टोरेज और सप्लाई में निवेश करने से कतरा रही हैं, जब तक सड़कों पर इन्हें चलाने वाली गाड़ियां न आ जाएं। अब सरकार दोनों पक्षों से बात कर रही है।

क्या है फ्लेक्स-फ्यूल और भारत की जरूरत?

फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां सामान्य गाड़ियों से अलग होती हैं, क्योंकि ये पेट्रोल के साथ किसी भी मात्रा में एथेनॉल-मिक्स पेट्रोल पर चल सकती हैं। अभी भारत में 20% एथेनॉल वाले (E20) पेट्रोल अनिवार्य है।

सरकार अब E85 (85% एथेनॉल + 15% पेट्रोल) और E100 यानी 100% एथेनॉल जैसे फ्लैक्स फ्यूल की ओर बढ़ना चाहती है, ताकि कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सके।

एथेनॉल को गन्ने के रस, मक्का और सड़े हुए अनाज जैसे कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। ये फ्यूल पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद करता है।

28 फरवरी को मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा है।

तेल कंपनियों की चिंता: एथेनॉल स्टॉक खराब होने का डर

तेल कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि हाई-एथेनॉल ब्लेंड वाले फ्यूल को लंबे समय तक स्टोर करना जोखिम भरा है। अगर स्टॉक का उपयोग तुरंत नहीं हुआ, तो एथेनॉल नमी सोख लेता है, जिससे इंजन खराब या कोरोड (जंग लगना) हो सकता है। कंपनियों का मानना है कि जब तक मांग सुनिश्चित नहीं होती, तब तक स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना घाटे का सौदा है।

ऑटो सेक्टर की मांग: फ्यूल सप्लाई पर मिले स्पष्टता

दूसरी तरफ, ऑटो कंपनियों का तर्क है कि फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां सामान्य पेट्रोल गाड़ियों के मुकाबले महंगी होंगी। ऐसे में ग्राहक इन्हें तभी खरीदेंगे जब उन्हें देशभर में फ्यूल की उपलब्धता का भरोसा मिले। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक फ्यूल सप्लाई पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक इन गाड़ियों की डिमांड पैदा करना मुश्किल है।

क्रूड इम्पोर्ट घटाना है सरकार की प्राथमिकता

अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है। हालांकि वित्त वर्ष 2026 में तेल आयात बिल पिछले साल के $137 बिलियन से घटकर $123 बिलियन रहा है, लेकिन सरकार इसे और कम करना चाहती है। पीएम नरेंद्र मोदी ने भी ऊर्जा संकट को देखते हुए वैकल्पिक ईंधन अपनाने पर जोर दिया है।

एथेनॉल उत्पादकों के पास सरप्लस स्टॉक, सरकार से लगाई गुहार

देश के एथेनॉल उत्पादक फिलहाल ओवरकैपेसिटी की समस्या से जूझ रहे हैं। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (Aida) के मुताबिक, उन्होंने करीब 20 अरब लीटर एथेनॉल बनाया है, जबकि सरकार के 20% ब्लेंडिंग टारगेट से केवल 11 अरब लीटर के ऑर्डर मिले हैं। एथेनॉल मेकर्स ने सरकार को पत्र लिखकर फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लिए इंसेंटिव और ऊंचे ब्लेंडिंग टारगेट की मांग की है।

ब्राजील मॉडल से सीख और पायलट प्रोजेक्ट का सुझाव

एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को ब्राजील से सीखना चाहिए, जहां 2003 में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां आईं और आज वहां 90% से ज्यादा नई गाड़ियां इसी तकनीक पर चलती हैं। टेरी (TERI) की एसोसिएट डायरेक्टर संयुक्ता सुबुद्धि ने सुझाव दिया है कि एक छोटे लेवल पर ‘पायलट प्रोजेक्ट’ शुरू करना चाहिए। इससे तेल और ऑटो कंपनियों को जरूरी डेटा मिलेगा और बड़े स्तर पर रोलआउट करना आसान होगा।

विदेशी मुद्रा की बचत: मंत्री ने गिनाए फायदे

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, साल 2025 में E20 ब्लेंडिंग की वजह से भारत ने लगभग $19.3 बिलियन (करीब 1.6 लाख करोड़ रुपए) की विदेशी मुद्रा बचाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों और ईंधन, दोनों पर खरीदारी की छूट देती है, तो इस डेडलॉक को तोड़ा जा सकता है।

टोयोटा, मारुति इथेनॉल वाले वाहन पेश कर चुके

टोयोटा और मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां पहले ही हाई इथेनॉल ब्लेंड से चलने वाले वाहन पेश कर चुकी हैं। टीवीएस मोटर के चेयरमैन सुदर्शन वेणु ने भी संकेत दिए हैं कि कंपनी अपाचे सहित अपने कई सेगमेंट में इथेनॉल से चलने वाले वाहन लाने की योजना बना रही है।

इन 4 मोर्चों पर चुनौतियों से निपटना होगा

S&P ग्लोबल के डायरेक्टर पुनीत गुप्ता का कहना है कि E85 को अपनाने के लिए बड़े इकोसिस्टम की जरूरत होगी। इसमें 4 मुख्य चुनौतियां हैं:

  • फ्यूल स्टेशनों पर अलग पंप और डिस्पेंसर लगाना।
  • इंफ्रास्ट्रक्चर की टेस्टिंग और वैलिडेशन।
  • इथेनॉल बनाने की क्षमता में भारी इजाफा।
  • सरकार की ओर से 5 से 15 साल का लंबा और स्पष्ट रोडमैप।

माइलेज और कीमत बन सकती है रुकावट

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तकनीक से ज्यादा बड़ी चुनौती फ्यूल की कीमत और माइलेज है। इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का माइलेज 20 से 30% तक गिर सकता है। इस कमी की भरपाई के लिए फ्यूल की कीमत कम रखनी होगी ।

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सरकार देश में पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के लिए फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां तेजी से सड़क पर उतारना चाहती है, लेकिन यह प्लान अब ‘ पहले मुर्गी आई या अंडे’ वाली उलझन में फंस गया है।

ऑटोमोबाइल कंपनियां बड़े पैमाने पर तब तक हाई-एथेनॉल ब्लेंड वाली गाड़ियां बनाने को तैयार नहीं हैं, जब तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में फ्लैक्स फ्यूल उपलब्ध न हो।

वहीं, तेल कंपनियां तब तक E85 और E100 जैसे फ्यूल के स्टोरेज और सप्लाई में निवेश करने से कतरा रही हैं, जब तक सड़कों पर इन्हें चलाने वाली गाड़ियां न आ जाएं। अब सरकार दोनों पक्षों से बात कर रही है।

क्या है फ्लेक्स-फ्यूल और भारत की जरूरत?

फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां सामान्य गाड़ियों से अलग होती हैं, क्योंकि ये पेट्रोल के साथ किसी भी मात्रा में एथेनॉल-मिक्स पेट्रोल पर चल सकती हैं। अभी भारत में 20% एथेनॉल वाले (E20) पेट्रोल अनिवार्य है।

सरकार अब E85 (85% एथेनॉल + 15% पेट्रोल) और E100 यानी 100% एथेनॉल जैसे फ्लैक्स फ्यूल की ओर बढ़ना चाहती है, ताकि कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सके।

एथेनॉल को गन्ने के रस, मक्का और सड़े हुए अनाज जैसे कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। ये फ्यूल पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद करता है।

28 फरवरी को मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा है।

तेल कंपनियों की चिंता: एथेनॉल स्टॉक खराब होने का डर

तेल कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि हाई-एथेनॉल ब्लेंड वाले फ्यूल को लंबे समय तक स्टोर करना जोखिम भरा है। अगर स्टॉक का उपयोग तुरंत नहीं हुआ, तो एथेनॉल नमी सोख लेता है, जिससे इंजन खराब या कोरोड (जंग लगना) हो सकता है। कंपनियों का मानना है कि जब तक मांग सुनिश्चित नहीं होती, तब तक स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना घाटे का सौदा है।

ऑटो सेक्टर की मांग: फ्यूल सप्लाई पर मिले स्पष्टता

दूसरी तरफ, ऑटो कंपनियों का तर्क है कि फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां सामान्य पेट्रोल गाड़ियों के मुकाबले महंगी होंगी। ऐसे में ग्राहक इन्हें तभी खरीदेंगे जब उन्हें देशभर में फ्यूल की उपलब्धता का भरोसा मिले। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक फ्यूल सप्लाई पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक इन गाड़ियों की डिमांड पैदा करना मुश्किल है।

क्रूड इम्पोर्ट घटाना है सरकार की प्राथमिकता

अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है। हालांकि वित्त वर्ष 2026 में तेल आयात बिल पिछले साल के $137 बिलियन से घटकर $123 बिलियन रहा है, लेकिन सरकार इसे और कम करना चाहती है। पीएम नरेंद्र मोदी ने भी ऊर्जा संकट को देखते हुए वैकल्पिक ईंधन अपनाने पर जोर दिया है।

एथेनॉल उत्पादकों के पास सरप्लस स्टॉक, सरकार से लगाई गुहार

देश के एथेनॉल उत्पादक फिलहाल ओवरकैपेसिटी की समस्या से जूझ रहे हैं। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (Aida) के मुताबिक, उन्होंने करीब 20 अरब लीटर एथेनॉल बनाया है, जबकि सरकार के 20% ब्लेंडिंग टारगेट से केवल 11 अरब लीटर के ऑर्डर मिले हैं। एथेनॉल मेकर्स ने सरकार को पत्र लिखकर फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लिए इंसेंटिव और ऊंचे ब्लेंडिंग टारगेट की मांग की है।

ब्राजील मॉडल से सीख और पायलट प्रोजेक्ट का सुझाव

एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को ब्राजील से सीखना चाहिए, जहां 2003 में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां आईं और आज वहां 90% से ज्यादा नई गाड़ियां इसी तकनीक पर चलती हैं। टेरी (TERI) की एसोसिएट डायरेक्टर संयुक्ता सुबुद्धि ने सुझाव दिया है कि एक छोटे लेवल पर ‘पायलट प्रोजेक्ट’ शुरू करना चाहिए। इससे तेल और ऑटो कंपनियों को जरूरी डेटा मिलेगा और बड़े स्तर पर रोलआउट करना आसान होगा।

विदेशी मुद्रा की बचत: मंत्री ने गिनाए फायदे

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, साल 2025 में E20 ब्लेंडिंग की वजह से भारत ने लगभग $19.3 बिलियन (करीब 1.6 लाख करोड़ रुपए) की विदेशी मुद्रा बचाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों और ईंधन, दोनों पर खरीदारी की छूट देती है, तो इस डेडलॉक को तोड़ा जा सकता है।

टोयोटा, मारुति इथेनॉल वाले वाहन पेश कर चुके

टोयोटा और मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां पहले ही हाई इथेनॉल ब्लेंड से चलने वाले वाहन पेश कर चुकी हैं। टीवीएस मोटर के चेयरमैन सुदर्शन वेणु ने भी संकेत दिए हैं कि कंपनी अपाचे सहित अपने कई सेगमेंट में इथेनॉल से चलने वाले वाहन लाने की योजना बना रही है।

इन 4 मोर्चों पर चुनौतियों से निपटना होगा

S&P ग्लोबल के डायरेक्टर पुनीत गुप्ता का कहना है कि E85 को अपनाने के लिए बड़े इकोसिस्टम की जरूरत होगी। इसमें 4 मुख्य चुनौतियां हैं:

  • फ्यूल स्टेशनों पर अलग पंप और डिस्पेंसर लगाना।
  • इंफ्रास्ट्रक्चर की टेस्टिंग और वैलिडेशन।
  • इथेनॉल बनाने की क्षमता में भारी इजाफा।
  • सरकार की ओर से 5 से 15 साल का लंबा और स्पष्ट रोडमैप।

माइलेज और कीमत बन सकती है रुकावट

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तकनीक से ज्यादा बड़ी चुनौती फ्यूल की कीमत और माइलेज है। इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का माइलेज 20 से 30% तक गिर सकता है। इस कमी की भरपाई के लिए फ्यूल की कीमत कम रखनी होगी ।

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