Tuesday, 22 Sep 2026 | 09:20 PM

Trending :

DC Movie Review | Lokesh Kanagaraj Acting Performance Action Style Film

DC Movie Review | Lokesh Kanagaraj Acting Performance Action Style Film

20 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

  • कॉपी लिंक

हर खूबसूरत दिखने वाली फिल्म अच्छी हो, यह जरूरी नहीं। कुछ फिल्में अपने शानदार कैमरा वर्क, दमदार एक्शन और शानदार संगीत से शुरुआत में प्रभावित तो करती हैं, लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका जादू उतरने लगता है। डीसी भी ऐसी ही फिल्म है। यहां स्टाइल भरपूर है, हिंसा भरपूर है, लेकिन दिल को छू लेने वाली कहानी और किरदारों का भावनात्मक सफर कहीं पीछे छूट जाता है। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 22 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार की रेटिंग दी है।

फिल्म की कहानी कैसी है?

कहानी देवदास (लोकेश कनगराज) की है, जो अपराध की दुनिया का बड़ा नाम है और पुलिस से बचता फिर रहा है। एक हादसा उसकी जिंदगी बदल देता है और इसी दौरान उसकी मुलाकात चंद्रा (वामिका गब्बी) से होती है। चंद्रा बचपन से ही शोषण और हिंसा का शिकार रही है और अब उसकी जिंदगी में बचा ही क्या है, इसका जवाब वह खुद भी नहीं जानती।

दो टूटे हुए लोग एक दूसरे का सहारा बनते हैं और फिर शुरू होती है खून, बदले और गोलियों से भरी लड़ाई। बीच में पार्वती (संजना कृष्णमूर्ति) की एंट्री होती है। शुरुआत में लगता है कि उनका किरदार कहानी की दिशा बदल देगा, लेकिन कुछ ही देर बाद वह सिर्फ एक अधूरी संभावना बनकर रह जाता है।

पहला हिस्सा रहस्य और माहौल बनाने में सफल रहता है, लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म एक ही तरह के एक्शन और हिंसा को बार बार दोहराती रहती है। गोलियां चलती रहती हैं, लोग मरते रहते हैं, लेकिन कहानी वहीं की वहीं खड़ी नजर आती है।

स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?

मुख्य अभिनेता के तौर पर लोकेश कनगराज उम्मीद से बेहतर साबित होते हैं। अभिनय में अनुभव की कमी कहीं कहीं दिखती है, लेकिन किरदार को निभाने की उनकी ईमानदार कोशिश साफ नजर आती है। कम संवादों में भी वह चेहरे के भाव से असर छोड़ने की कोशिश करते हैं।

वामिका गब्बी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। दर्द, गुस्सा और बेबसी को उन्होंने बेहद सहज तरीके से पर्दे पर उतारा है। उनका किरदार सबसे ज्यादा याद रह जाता है।

संजना कृष्णमूर्ति को जितनी अहमियत के साथ पेश किया जाता है, पटकथा उन्हें उतना ही जल्दी भूल जाती है। बाकी कलाकार अपने हिस्से का काम ठीक करते हैं, लेकिन किसी को भी यादगार बनने का मौका नहीं मिलता।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

अरुण मथेश्वरन की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनका विजुअल ट्रीटमेंट रहा है और यहां भी वही नजर आता है। हर फ्रेम बेहद खूबसूरती से रचा गया है। लाल और नीले रंग का इस्तेमाल सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि किरदारों की मानसिक स्थिति दिखाने के लिए किया गया है।

लेकिन निर्देशन वहीं कमजोर पड़ जाता है जहां कहानी को भावनाओं की जरूरत होती है। फिल्म लगातार यह बताती रहती है कि किरदार टूटे हुए हैं, लेकिन दर्शक कभी उनके दर्द से जुड़ नहीं पाता। दूसरे हिस्से में एक्शन इतना ज्यादा हो जाता है कि कुछ देर बाद उसका असर ही खत्म होने लगता है।

कैमरा वर्क बेहतरीन है। कई दृश्य किसी पेंटिंग जैसे लगते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन और लोकेशन फिल्म को अलग पहचान देते हैं। संपादन भी तेज है, लेकिन मजबूत पटकथा के बिना तकनीकी चमक ज्यादा देर तक काम नहीं आती।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक?

अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। कई साधारण दृश्य भी उनके पृष्ठभूमि संगीत की वजह से बड़े और प्रभावशाली लगते हैं। एक्शन दृश्यों में उनका संगीत अलग ही रोमांच पैदा करता है। अफसोस, पटकथा उस स्तर का साथ नहीं दे पाती।

फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?

डीसी ऐसी फिल्म है जो आंखों को प्रभावित करती है, कानों को रोमांचित करती है, लेकिन दिल तक नहीं पहुंच पाती। लोकेश कनगराज अभिनय में अच्छी शुरुआत करते हैं, वामिका गब्बी शानदार काम करती हैं और अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म को कई बार संभाल लेता है। लेकिन कमजोर पटकथा, दोहराव से भरा दूसरा हिस्सा और किरदारों से भावनात्मक दूरी इसे औसत अनुभव बनाकर छोड़ देती है।

अगर आप सिर्फ स्टाइलिश एक्शन और शानदार विजुअल्स के लिए फिल्म देखना चाहते हैं तो शायद निराश नहीं होंगे। लेकिन मजबूत कहानी और यादगार भावनाओं की उम्मीद लेकर जाएंगे तो यह फिल्म अधूरी सी लगेगी।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
Smoke rises after an Israeli strike on a bridge in lebanon. (File Image: Reuters)

March 26, 2026/
9:25 am

आखरी अपडेट:26 मार्च, 2026, 09:25 IST सूत्रों का कहना है कि ‘चार्जशीट’ दस्तावेज़ एक प्रमुख अभियान उपकरण होगा, बीजेपी इसे...

एनसीईआरटी ने मोहनजो-दारो "डांसिंग गर्ल" पाठ्यपुस्तक चित्रण पंक्ति को समीक्षा के लिए विशेषज्ञों के पास भेजा | न्यूज18

June 15, 2026/
5:02 pm

कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में 4,500 साल पुरानी मोहनजो-दारो “डांसिंग गर्ल” के बदले हुए चित्रण पर बहस के बीच, एनसीईआरटी...

Airlines ATF Price Hike | Govt Meeting Indigo Fare Increase

April 3, 2026/
2:16 pm

नई दिल्ली32 मिनट पहले कॉपी लिंक एयरलाइंस के लिए जेट-फ्यूल सबसे बड़ा खर्च होता है। कुल ऑपरेटिंग खर्च में इसकी...

Blue & Silver Lead Demand; White Tops Resale Value

July 8, 2026/
12:33 pm

नई दिल्ली7 मिनट पहले कॉपी लिंक नई कार खरीदते समय सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि कौन-सा कलर चुनें?...

Govt Support Less Than 2% of Tesla, SpaceX Value

June 16, 2026/
3:36 pm

सैन फ्रांसिस्को13 मिनट पहले कॉपी लिंक टेस्ला और स्पेसएक्स के CEO इलॉन मस्क ने उन दावों को पूरी तरह खारिज...

आयरलैंड के जॉन मूनी DC के फील्डिंग कोच बने:तीन वनडे वर्ल्ड कप खेल चुके, दिल्ली को पहले खिताब का इंतजार

March 19, 2026/
2:59 pm

IPL टीम दिल्ली कैपिटल्स ने आयरलैंड के पूर्व ऑलराउंडर जॉन मूनी को टीम का नया फील्डिंग कोच बनाया है। रिपोर्ट...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

DC Movie Review | Lokesh Kanagaraj Acting Performance Action Style Film

DC Movie Review | Lokesh Kanagaraj Acting Performance Action Style Film

20 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

  • कॉपी लिंक

हर खूबसूरत दिखने वाली फिल्म अच्छी हो, यह जरूरी नहीं। कुछ फिल्में अपने शानदार कैमरा वर्क, दमदार एक्शन और शानदार संगीत से शुरुआत में प्रभावित तो करती हैं, लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका जादू उतरने लगता है। डीसी भी ऐसी ही फिल्म है। यहां स्टाइल भरपूर है, हिंसा भरपूर है, लेकिन दिल को छू लेने वाली कहानी और किरदारों का भावनात्मक सफर कहीं पीछे छूट जाता है। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 22 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार की रेटिंग दी है।

फिल्म की कहानी कैसी है?

कहानी देवदास (लोकेश कनगराज) की है, जो अपराध की दुनिया का बड़ा नाम है और पुलिस से बचता फिर रहा है। एक हादसा उसकी जिंदगी बदल देता है और इसी दौरान उसकी मुलाकात चंद्रा (वामिका गब्बी) से होती है। चंद्रा बचपन से ही शोषण और हिंसा का शिकार रही है और अब उसकी जिंदगी में बचा ही क्या है, इसका जवाब वह खुद भी नहीं जानती।

दो टूटे हुए लोग एक दूसरे का सहारा बनते हैं और फिर शुरू होती है खून, बदले और गोलियों से भरी लड़ाई। बीच में पार्वती (संजना कृष्णमूर्ति) की एंट्री होती है। शुरुआत में लगता है कि उनका किरदार कहानी की दिशा बदल देगा, लेकिन कुछ ही देर बाद वह सिर्फ एक अधूरी संभावना बनकर रह जाता है।

पहला हिस्सा रहस्य और माहौल बनाने में सफल रहता है, लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म एक ही तरह के एक्शन और हिंसा को बार बार दोहराती रहती है। गोलियां चलती रहती हैं, लोग मरते रहते हैं, लेकिन कहानी वहीं की वहीं खड़ी नजर आती है।

स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?

मुख्य अभिनेता के तौर पर लोकेश कनगराज उम्मीद से बेहतर साबित होते हैं। अभिनय में अनुभव की कमी कहीं कहीं दिखती है, लेकिन किरदार को निभाने की उनकी ईमानदार कोशिश साफ नजर आती है। कम संवादों में भी वह चेहरे के भाव से असर छोड़ने की कोशिश करते हैं।

वामिका गब्बी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। दर्द, गुस्सा और बेबसी को उन्होंने बेहद सहज तरीके से पर्दे पर उतारा है। उनका किरदार सबसे ज्यादा याद रह जाता है।

संजना कृष्णमूर्ति को जितनी अहमियत के साथ पेश किया जाता है, पटकथा उन्हें उतना ही जल्दी भूल जाती है। बाकी कलाकार अपने हिस्से का काम ठीक करते हैं, लेकिन किसी को भी यादगार बनने का मौका नहीं मिलता।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

अरुण मथेश्वरन की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनका विजुअल ट्रीटमेंट रहा है और यहां भी वही नजर आता है। हर फ्रेम बेहद खूबसूरती से रचा गया है। लाल और नीले रंग का इस्तेमाल सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि किरदारों की मानसिक स्थिति दिखाने के लिए किया गया है।

लेकिन निर्देशन वहीं कमजोर पड़ जाता है जहां कहानी को भावनाओं की जरूरत होती है। फिल्म लगातार यह बताती रहती है कि किरदार टूटे हुए हैं, लेकिन दर्शक कभी उनके दर्द से जुड़ नहीं पाता। दूसरे हिस्से में एक्शन इतना ज्यादा हो जाता है कि कुछ देर बाद उसका असर ही खत्म होने लगता है।

कैमरा वर्क बेहतरीन है। कई दृश्य किसी पेंटिंग जैसे लगते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन और लोकेशन फिल्म को अलग पहचान देते हैं। संपादन भी तेज है, लेकिन मजबूत पटकथा के बिना तकनीकी चमक ज्यादा देर तक काम नहीं आती।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक?

अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। कई साधारण दृश्य भी उनके पृष्ठभूमि संगीत की वजह से बड़े और प्रभावशाली लगते हैं। एक्शन दृश्यों में उनका संगीत अलग ही रोमांच पैदा करता है। अफसोस, पटकथा उस स्तर का साथ नहीं दे पाती।

फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?

डीसी ऐसी फिल्म है जो आंखों को प्रभावित करती है, कानों को रोमांचित करती है, लेकिन दिल तक नहीं पहुंच पाती। लोकेश कनगराज अभिनय में अच्छी शुरुआत करते हैं, वामिका गब्बी शानदार काम करती हैं और अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म को कई बार संभाल लेता है। लेकिन कमजोर पटकथा, दोहराव से भरा दूसरा हिस्सा और किरदारों से भावनात्मक दूरी इसे औसत अनुभव बनाकर छोड़ देती है।

अगर आप सिर्फ स्टाइलिश एक्शन और शानदार विजुअल्स के लिए फिल्म देखना चाहते हैं तो शायद निराश नहीं होंगे। लेकिन मजबूत कहानी और यादगार भावनाओं की उम्मीद लेकर जाएंगे तो यह फिल्म अधूरी सी लगेगी।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.