Sunday, 12 Jul 2026 | 10:40 AM

Trending :

'स्पाइडरमैन' फेम टॉम हॉलैंड ने पी कटिंग चाय:'द ओडिसी' के भारत में प्रीमियर से पहले क्रिस्टोफर नोलन के साथ पहुंचे कैफे 'स्पाइडरमैन' फेम टॉम हॉलैंड ने पी कटिंग चाय:'द ओडिसी' के भारत में प्रीमियर से पहले क्रिस्टोफर नोलन के साथ पहुंचे कैफे सीनियर टीचर भर्ती परीक्षा आज से,12 लाख कैंडिडेट शामिल होंगे:एक घंटे पहले तक मिलेगी एंट्री, 27 जिलों में बनाए 1221 सेंटर 'चौधरी साहब,आ गया स्टेज पे'….जैस्मिन सैंडलास ने मंगेतर इंट्रोड्यूस कराया:गुरुग्राम में कॉन्सर्ट में दौड़कर गले लगाया; बिजनेसमैन संग सगाई का ऐलान अमेरिका ने ईरान पर एयरस्ट्राइक की:न्यूक्लियर सिटी बुशहर को निशाना बनाया; ईरान की जवाबी कार्रवाई की धमकी, होर्मुज बंद का ऐलान Jasmine Sandlas Stage Confession for Chaudhary Sahib latest update
EXCLUSIVE

दो जांबाज ईरानी महिलाओं ने साझा किया दमन का दौर:न झुकीं, न डरीं; ईरान में अपने हक के लिए महिलाओं की जंग 47 साल से जारी है

दो जांबाज ईरानी महिलाओं ने साझा किया दमन का दौर:न झुकीं, न डरीं; ईरान में अपने हक के लिए महिलाओं की जंग 47 साल से जारी है

ईरानी महिला अधिकार एक्टिविस्ट मसीह अलीनेजाद कहती हैं- ईरान में जारी युद्ध और संघर्ष पर हमें दर्द भी है और उम्मीद भी। मैं नहीं चाहती कि किसी निर्दोष नागरिक को नुकसान पहुंचे। ईरानी लोगों का संदेश है कि हमें इस घायल और खूंखार शासन के भरोसे अकेला न छोड़ें। इस काम को पूरा करें (शासन परिवर्तन), वरना ये लोग निहत्थे मासूमों से बदला लेंगे। यह ईरान के लिए ‘बर्लिन की दीवार’ गिरने जैसा पल है। ईरान की ‘मॉरैलिटी पुलिस’ के डीएनए में ही महिलाओं को पीटना शामिल है। अनिवार्य हिजाब सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि महिलाओं के दमन का प्रतीक है। अगर हम इस दीवार को गिरा देते हैं, तो यह कट्टरपंथी शासन खत्म हो जाएगा। मैं हिजाब के खिलाफ नहीं हूं, बल्कि ‘जबरदस्ती’ के खिलाफ हूं। महिलाओं को चुनने का हक होना चाहिए। निडर हैं ईरानी महिलाएं मुझे 1994 में 18 की उम्र में सरकार विरोधी पर्चे बांटने पर गिरफ्तार किया गया था। 2007 में देश छोड़ना पड़ा। 2014 में मैंने ‘माई स्टेल्थी फ्रीडम’ नाम से फेसबुक पेज शुरू किया, जहां ईरानी महिलाएं बिना हिजाब और अपने संघर्ष की तस्वीरें निडर होकर साझा करती हैं। 80% ईरानी बदलाव चाहते हैं। इस्लामी गणराज्य ने हमसे सब कुछ छीन लिया है, सिवाय उम्मीद के। संसद की 299 सीटों में से 9 पर ही महिलाएं हैं और वे भी शासन की समर्थक हैं, न कि महिलाओं की रक्षक। इस बार शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में मध्यम वर्ग और छात्र शामिल हैं। वर्तमान बदलाव उम्मीद जगाता है। सिर्फ मैं ही नहीं, ज्यादातर ईरानी खुश हैं। इस शासन ने मेरे लोगों को मारा और फांसी पर लटकाया है। ईरान में लोग खुशी से नाच रहे थे और उन प्रियजनों की कब्रों पर गए, जिन्हें शासन ने मार दिया था। मेरी दो बहनें, जिन्हें शासन ने अंधा कर दिया था, वे भी सड़कों पर खुशी से झूम उठीं। मैं और मेरी जैसी लाखों महिलाएं न झुकीं और न ही डरीं। संघर्ष जारी है और रहेगा।
पहले दिन से विरोध ईरानी एक्टिविस्ट और आर्टिस्ट फरीबा नजेमी कहती हैं- ईरान में इस्लामी क्रांति के पहले महिलाएं स्वतंत्र थीं। 1979 से ही अनिवार्य हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया था। 2017 में एक महिला ने सफेद दुपट्टा लहराकर विरोध दर्ज किया तो 2022 में ‘वुमन लाइफ फ्रीडम’ में महिलाएं सड़कों उतरीं। हकों की यह लड़ाई जारी रहेगी। क्रांति से पहले ईरान की पहचान धर्म के आधार पर तय नहीं होती थी। अधिकतर लोग खुद को सबसे पहले मुसलमान के रूप में पेश नहीं करते थे। समाज खुला था और जीवन शैली में विविधता थी, लेकिन 47 साल पहले 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद समाज पर शरीयत कानून लागू कर दिया गया। उस समय मैं बहुत युवा थी और कट्टरपंथियों के उभार से खुश नहीं थी, हालांकि समाज के एक हिस्से ने नई व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया था। सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब विश्वविद्यालयों में लगभग 66% छात्राएं थीं, लेकिन धीरे-धीरे अवसर कम हो गए। रोजगार में भी रुकावटें आईं। अब तो अगर किसी महिला के सिर पर डाले गए दुपट्टे से बाल का एक हिस्सा भी दिख जाए तो उसे परेशान किया जाता है या हिरासत में ले लिया जाता है। महिलाओं को रोका जाता है, धक्का दिया जाता है, पीटा जाता है या जबरन वैन में बैठाकर ले जाया जाता है। गश्त-ए-इरशाद जैसे संगठन सड़कों पर गश्त करते हैं और ड्रेस कोड के उल्लंघन पर महिलाओं को गिरफ्तार कर सकते हैं। हिरासत में लेते समय सुरक्षा गार्ड महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, युवा लड़कियों को ही निशाना बनाया जाता है। कानून महिलाओं की निजी जिंदगी पर भी पाबंदियां लगाता है। कानून इस तरह बनाए गए हैं कि वे महिलाओं को तलाक लेने से हतोत्साहित करते हैं। विदेश यात्रा के लिए भी महिलाओं को पति की अनुमति चाहिए होती है। अब यह हालात बदलने चाहिए।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
वैभव सूर्यवंशी बोले- मैं वर्ल्ड क्रिकेट को डोमिनेट करूंगा:मुझे रेड बॉल खेलना पसंद, कोहली के कंधे पर हाथ रखना सपने जैसा था

June 7, 2026/
1:02 pm

वैभव सूर्यवंशी के भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने के बाद राजस्थान रॉयल्स ने सोशल मीडिया पर उनका एक इंटरव्यू...

मणिपुर में प्रदर्शनकारियों-सुरक्षा बलों में झड़प, आंसू गैस छोड़ी:मशाल रैली रोकने पर टकराव हुआ; सगोलबंद हिंसा में 21 गिरफ्तार

April 20, 2026/
12:07 pm

मणिपुर में शटडाउन के बीच रविवार रात कई इलाकों में प्रदर्शन हुए। इंफाल ईस्ट के कोईरेंगेई, इंफाल वेस्ट के उरिपोक...

MP Board 12th Result 2026 Toppers List LIVE Update; MPBSE

April 15, 2026/
5:00 am

12वीं में 79.41% छात्राएं पास हुईं, जबकि छात्रों का पास प्रतिशत 72.39% रहा। रिजल्ट के बाद मिठाइयां बांटीं। एमबी बोर्ड...

MI Vs SRH Live Score, IPL 2026

April 29, 2026/
8:30 pm

आखरी अपडेट:29 अप्रैल, 2026, 20:30 IST सीएनएन-न्यूज18 के एग्जिट पोल अनुमानों में पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी को आगे,...

बास्केटबॉल दिग्गज कोबे ब्रायंट की सफलता का सीक्रेट:आंख खुलते ही फोन देखने की बजाय 15 मिनट शांत बैठें; मेमोरी बढ़ेगी, तनाव दूर होगा

May 4, 2026/
1:13 pm

भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते। ऐसे में दिवंगत बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट...

भारत 2023 के बाद पहली बार ICC इवेंट में हारा:बुमराह हाईएस्ट विकेट टेकर, टी-20 में भारत की दूसरी सबसे बड़ी हार; रिकॉर्ड्स

February 23, 2026/
4:30 am

अहमदाबाद में भारत 2023 के बाद पहली बार किसी ICC इवेंट में मैच हार गया। टी-20 वर्ल्ड कप के सुपर-8...

राजनीति

दो जांबाज ईरानी महिलाओं ने साझा किया दमन का दौर:न झुकीं, न डरीं; ईरान में अपने हक के लिए महिलाओं की जंग 47 साल से जारी है

दो जांबाज ईरानी महिलाओं ने साझा किया दमन का दौर:न झुकीं, न डरीं; ईरान में अपने हक के लिए महिलाओं की जंग 47 साल से जारी है

ईरानी महिला अधिकार एक्टिविस्ट मसीह अलीनेजाद कहती हैं- ईरान में जारी युद्ध और संघर्ष पर हमें दर्द भी है और उम्मीद भी। मैं नहीं चाहती कि किसी निर्दोष नागरिक को नुकसान पहुंचे। ईरानी लोगों का संदेश है कि हमें इस घायल और खूंखार शासन के भरोसे अकेला न छोड़ें। इस काम को पूरा करें (शासन परिवर्तन), वरना ये लोग निहत्थे मासूमों से बदला लेंगे। यह ईरान के लिए ‘बर्लिन की दीवार’ गिरने जैसा पल है। ईरान की ‘मॉरैलिटी पुलिस’ के डीएनए में ही महिलाओं को पीटना शामिल है। अनिवार्य हिजाब सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि महिलाओं के दमन का प्रतीक है। अगर हम इस दीवार को गिरा देते हैं, तो यह कट्टरपंथी शासन खत्म हो जाएगा। मैं हिजाब के खिलाफ नहीं हूं, बल्कि ‘जबरदस्ती’ के खिलाफ हूं। महिलाओं को चुनने का हक होना चाहिए। निडर हैं ईरानी महिलाएं मुझे 1994 में 18 की उम्र में सरकार विरोधी पर्चे बांटने पर गिरफ्तार किया गया था। 2007 में देश छोड़ना पड़ा। 2014 में मैंने ‘माई स्टेल्थी फ्रीडम’ नाम से फेसबुक पेज शुरू किया, जहां ईरानी महिलाएं बिना हिजाब और अपने संघर्ष की तस्वीरें निडर होकर साझा करती हैं। 80% ईरानी बदलाव चाहते हैं। इस्लामी गणराज्य ने हमसे सब कुछ छीन लिया है, सिवाय उम्मीद के। संसद की 299 सीटों में से 9 पर ही महिलाएं हैं और वे भी शासन की समर्थक हैं, न कि महिलाओं की रक्षक। इस बार शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में मध्यम वर्ग और छात्र शामिल हैं। वर्तमान बदलाव उम्मीद जगाता है। सिर्फ मैं ही नहीं, ज्यादातर ईरानी खुश हैं। इस शासन ने मेरे लोगों को मारा और फांसी पर लटकाया है। ईरान में लोग खुशी से नाच रहे थे और उन प्रियजनों की कब्रों पर गए, जिन्हें शासन ने मार दिया था। मेरी दो बहनें, जिन्हें शासन ने अंधा कर दिया था, वे भी सड़कों पर खुशी से झूम उठीं। मैं और मेरी जैसी लाखों महिलाएं न झुकीं और न ही डरीं। संघर्ष जारी है और रहेगा।
पहले दिन से विरोध ईरानी एक्टिविस्ट और आर्टिस्ट फरीबा नजेमी कहती हैं- ईरान में इस्लामी क्रांति के पहले महिलाएं स्वतंत्र थीं। 1979 से ही अनिवार्य हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया था। 2017 में एक महिला ने सफेद दुपट्टा लहराकर विरोध दर्ज किया तो 2022 में ‘वुमन लाइफ फ्रीडम’ में महिलाएं सड़कों उतरीं। हकों की यह लड़ाई जारी रहेगी। क्रांति से पहले ईरान की पहचान धर्म के आधार पर तय नहीं होती थी। अधिकतर लोग खुद को सबसे पहले मुसलमान के रूप में पेश नहीं करते थे। समाज खुला था और जीवन शैली में विविधता थी, लेकिन 47 साल पहले 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद समाज पर शरीयत कानून लागू कर दिया गया। उस समय मैं बहुत युवा थी और कट्टरपंथियों के उभार से खुश नहीं थी, हालांकि समाज के एक हिस्से ने नई व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया था। सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब विश्वविद्यालयों में लगभग 66% छात्राएं थीं, लेकिन धीरे-धीरे अवसर कम हो गए। रोजगार में भी रुकावटें आईं। अब तो अगर किसी महिला के सिर पर डाले गए दुपट्टे से बाल का एक हिस्सा भी दिख जाए तो उसे परेशान किया जाता है या हिरासत में ले लिया जाता है। महिलाओं को रोका जाता है, धक्का दिया जाता है, पीटा जाता है या जबरन वैन में बैठाकर ले जाया जाता है। गश्त-ए-इरशाद जैसे संगठन सड़कों पर गश्त करते हैं और ड्रेस कोड के उल्लंघन पर महिलाओं को गिरफ्तार कर सकते हैं। हिरासत में लेते समय सुरक्षा गार्ड महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, युवा लड़कियों को ही निशाना बनाया जाता है। कानून महिलाओं की निजी जिंदगी पर भी पाबंदियां लगाता है। कानून इस तरह बनाए गए हैं कि वे महिलाओं को तलाक लेने से हतोत्साहित करते हैं। विदेश यात्रा के लिए भी महिलाओं को पति की अनुमति चाहिए होती है। अब यह हालात बदलने चाहिए।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.