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Brain Health Indicator; Muscle Fat Ratio

Brain Health Indicator; Muscle Fat Ratio

3 दिन पहलेलेखक: अदिति ओझा

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अगर मैं पूछूं कि “आप फिट हैं या नहीं” तो शायद आप अपने वजन को पैमाना मानकर जवाब देंगे। लेकिन जरा ठहरिए… सिर्फ वजन आपकी सेहत की पूरी कहानी नहीं कहता है।

फिटनेस का सही पैमाना ये है कि आपके शरीर में मसल्स और फैट का रेशियो क्या है? एक कमाल की बात ये है कि अगर ये रेशियो बैलेंस रहे तो ब्रेन हेल्थ पर पॉजिटिव असर होता है।

‘जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स एसोसिएशन’ में हाल ही में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, हमारे शरीर का मसल-फैट रेशियो ब्रेन हेल्थ का इंडिकेटर है। अगर शरीर में मसल का रेशियो फैट से ज्यादा है तो ब्रेन फंक्शनिंग बेहतर रहती है।

इसलिए ‘जरूरत की खबर’ में समझेंगे कि मसल-फैट रेशियो क्या है। साथ ही जानेंगे कि-

  • मसल-फैट रेशियो ब्रेन हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है?
  • इस रेशियो को बैलेंस रखने के लिए क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट- डॉ. जुबैर सरकार, सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, कानपुर

सवाल- मसल-फैट रेशियो क्या होता है?

जवाब- शरीर मुख्य रूप से मसल्स और फैट से मिलकर बना है। किसी की सेहत कितनी अच्छी है, यह इनके बीच के रेशियो से तय होता है यानी शरीर में कितने फीसदी फैट है और कितनी मसल्स हैं। इनके बीच के रेशियो को ही ‘मसल्स-फैट रेशियो’ कहते हैं। यह शरीर की बनावट और मेटाबॉलिक हेल्थ का संकेत देता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो का ब्रेन से क्या कनेक्शन है?

जवाब- हम आमतौर पर सोचते हैं कि ब्रेन शरीर को कंट्रोल करता है। यानी ब्रेन मसल्स को सिग्नल देता है और वो उसके मुताबिक काम करती हैं। ये सही भी है, लेकिन शरीर की मसल्स और उनकी एक्टिविटी भी ब्रेन को सिग्नल वापस भेजती हैं।

उदाहरण के लिए, जब हम एक्सरसाइज करते हैं तो मसल्स कुछ केमिकल्स (जैसे मायोकाइन्स) रिलीज करती हैं। ये केमिकल्स ब्रेन सेल्स को मजबूत करते हैं। इससे याददाश्त सुधरती होती है औ उम्र के साथ कॉग्निटिव डिक्लाइन (ब्रेन के काम करने की क्षमता में गिरावट) का रिस्क भी कम होता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो को लेकर हाल ही में हुई स्टडी क्या कहती है?

जवाब- ‘जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स एसोसिएशन’ में पब्लिश इस स्टडी में ये मुख्य बातें पता चली हैं-

  • आपके शरीर में मसल्स जितनी ज्यादा और चर्बी (फैट) जितनी कम होगी, ब्रेन उतना ही एक्टिव रहेगा।
  • शरीर में फैट ज्यादा हो तो यह ब्रेन एजिंग की रफ्तार को बढ़ा देता है, जबकि मसल्स इस प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं।
  • जब मसल्स बढ़ती हैं तो न सिर्फ बॉडी फिट रहती है, बल्कि याददाश्त और सोचने की शक्ति भी लंबे समय तक तेज बनी रहती है।
  • मसल्स मजबूत होने से भविष्य में अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो और BMI (बॉडी मास इंडेक्स) में क्या अंतर है?

जवाब- BMI (बॉडी मास इंडेक्स) एक फिटनेस इंडेक्स है, जो शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर निकाला जाता है। इससे पता चलता है कि व्यक्ति अंडरवेट, नॉर्मल, ओवरवेट या ओबीज कैटेगरी में है या नहीं। लेकिन BMI से यह नहीं पता चलता कि शरीर के वजन की वजह मसल है या फैट।

जबकि मसल-फैट रेशियो शरीर में मौजूद मांसपेशियों और फैट के एक्चुअल रेशियो को बताता है। यह बॉडी कंपोजिशन पता करने का अधिक सटीक पैमाना है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो ब्रेन हेल्थ के लिए क्यों जरूरी है?

जवाब- मसल-फैट रेशियो का सीधा संबंध ब्रेन की फंक्शनिंग से जुड़ा है।

  • इसके बैलेंस रहने से हॉर्मोन भी बैलेंस्ड रहता है।
  • इससे स्ट्रेस हॉर्मोन (कोर्टिसोल) कंट्रोल में रहता है।
  • बेहतर मसल-फैट रेशियो से ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है।
  • ब्रेन तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व सही मात्रा में पहुंचते हैं।
  • शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) कम रहता है।
  • ब्रेन एजिंग और मेमोरी लॉस का रिस्क घटता है।

नीचे ग्राफिक में हेल्दी मसल–फैट रेशियो के फायदे दो हिस्सों में समझाए गए हैं।

सवाल- अगर बॉडी में फैट ज्यादा हो और मसल्स कम तो इससे ब्रेन को क्या नुकसान होता है?

जवाब- इसका ब्रेन पर कई तरह से प्रभाव पड़ता है–

ज्यादा बॉडी फैट खासकर विसरल फैट (पेट की चर्बी) शरीर में लो-ग्रेड इंफ्लेमेशन बढ़ाता है। यह इंफ्लेमेशन धीरे-धीरे ब्रेन तक असर डाल सकता है।

मसल्स कम होने से इंसुलिन सेंसिटिविटी घटती है। इससे ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव हो सकता है।

यह लंबे समय में ब्रेन फंक्शन पर नेगेटिव असर डालता है।

ऐसी स्थिति में याददाश्त कमजोर होना, फोकस में कमी और उम्र के साथ कॉग्निटिव डिक्लाइन (ब्रेन की फंक्शनिंग में कमजोरी) का जोखिम बढ़ सकता है।

सवाल– किन कारणों से शरीर में मसल रेशियो कम होता है?

जवाब- मसल रेशियो कम होने का मतलब है कि शरीर में मसल्स घट रही हैं और फैट का हिस्सा बढ़ रहा है। इसकी वजह सिर्फ उम्र नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल, हॉर्मोनल बदलाव, बीमारियां और कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। नीचे ग्राफिक में मसल लॉस के संभावित कारणों को अलग-अलग कैटेगरी में समझाया गया है।

सवाल- क्या मसल्स बढ़ाने से ब्रेन एजिंग की गति धीमी होती है?

जवाब- यह सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता कि मसल्स बढ़ाने से ब्रेन एजिंग की स्पीड रुक जाती है, लेकिन मजबूत और एक्टिव मसल्स ब्रेन हेल्थ को सपोर्ट जरूर करती हैं।

मसल्स एक्टिव टिश्यू होते हैं। वे मायोकाइन्स जैसे केमिकल रिलीज करते हैं, जो इंफ्लेमेशन कम करने और ब्रेन सेल्स के बीच कनेक्शन बनाने में मदद कर सकते हैं।

सवाल- क्या हाई-प्रोटीन डाइट ब्रेन हेल्थ को सीधे फायदा पहुंचाती है?

जवाब- जब हम प्रोटीन खाते हैं, तो शरीर उसे छोटे हिस्सों में तोड़ देता है। इन्हें अमीनो एसिड कहते हैं। यही अमीनो एसिड ब्रेन में ऐसे केमिकल बनाने में काम आते हैं, जो ब्रेन की कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाते हैं। इन केमिकल्स की वजह से-

  • कॉग्निटिव परफॉर्मेंस बेहतर होता है।
  • मूड स्टेबल रहता है।
  • फोकस बढ़ता है।
  • ब्रेन सेल्स रिपेयर होती हैं।
  • एजिंग स्पीड स्लो होती है।
  • एनर्जी लेवल स्थिर रहता है
  • न्यूरोट्रांसमीटर बैलेंस्ड रहता है।

सवाल- कैसे पता चलता है कि हमारी बॉडी में फैट रेशियो ज्यादा है?

जवाब- कुछ खास संकेत और टेस्ट इसमें मदद करते हैं-

  • सबसे सटीक तरीका बॉडी फैट परसेंटेज मापना है।
  • इसके लिए DEXA स्कैन (एक तरह का X-रे), BIA मशीन या स्किनफोल्ड टेस्ट किया जाता है। ये तीनों बॉडी फैट पता करने के लिए जरूरी टेस्ट हैं।
  • पेट के आसपास ज्यादा चर्बी होना भी हाई फैट रेशियो का संकेत हो सकता है।
  • अगर कमर का माप ज्यादा है तो पेट की चर्बी अधिक हो सकती है।
  • अगर कमर आपकी लंबाई के आधे से ज्यादा है तो यह जोखिम का संकेत माना जाता है।
  • सीढ़ियां चढ़ते समय जल्दी सांस फूलना या ताकत कम महसूस होना भी हाई फैट और लो मसल मास की ओर इशारा कर सकता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो संतुलित रखने के लिए हमारी डाइट कैसी होनी चाहिए?

जवाब- मसल-फैट रेशियो बेहतर रखने के लिए बैलेंस डाइट जरूरी है। डाइट में हाई-क्वालिटी प्रोटीन, हेल्दी फैट, भरपूर फाइबर और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट होने चाहिए। ग्राफिक से समझते हैं कि डाइट कैसी होनी चाहिए-

सवाल- मसल-फैट रेशियो बैलेंस्ड रखने के लिए ओवरऑल हमारी लाइफस्टाइल कैसी होनी चाहिए?

जवाब- इसकी सभी जरूरी बातों को नीचे पॉइंटर्स से समझते हैं-

  • रेगुलर एक्सरसाइज करें।
  • स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें।
  • लंबे समय तक बैठने से बचें।
  • प्रोटीन रिच डाइट लें।
  • रिफाइंड कार्ब कम करें।
  • शुगर की मात्रा घटाएं।
  • अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड न खाएं।
  • शुगरी ड्रिंक्स, पैकेज्ड फूड कम खाएं।
  • शराब न पिएं।
  • स्मोकिंग न करें।
  • 8 घंटे की नींद पूरी लें।
  • स्क्रीन टाइम कम करें।
  • स्ट्रेस मैनेज करें।

……………………..

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सवाल- मसल-फैट रेशियो क्या होता है?

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उदाहरण के लिए, जब हम एक्सरसाइज करते हैं तो मसल्स कुछ केमिकल्स (जैसे मायोकाइन्स) रिलीज करती हैं। ये केमिकल्स ब्रेन सेल्स को मजबूत करते हैं। इससे याददाश्त सुधरती होती है औ उम्र के साथ कॉग्निटिव डिक्लाइन (ब्रेन के काम करने की क्षमता में गिरावट) का रिस्क भी कम होता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो को लेकर हाल ही में हुई स्टडी क्या कहती है?

जवाब- ‘जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स एसोसिएशन’ में पब्लिश इस स्टडी में ये मुख्य बातें पता चली हैं-

  • आपके शरीर में मसल्स जितनी ज्यादा और चर्बी (फैट) जितनी कम होगी, ब्रेन उतना ही एक्टिव रहेगा।
  • शरीर में फैट ज्यादा हो तो यह ब्रेन एजिंग की रफ्तार को बढ़ा देता है, जबकि मसल्स इस प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं।
  • जब मसल्स बढ़ती हैं तो न सिर्फ बॉडी फिट रहती है, बल्कि याददाश्त और सोचने की शक्ति भी लंबे समय तक तेज बनी रहती है।
  • मसल्स मजबूत होने से भविष्य में अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।

सवाल- मसल-फैट रेशियो और BMI (बॉडी मास इंडेक्स) में क्या अंतर है?

जवाब- BMI (बॉडी मास इंडेक्स) एक फिटनेस इंडेक्स है, जो शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर निकाला जाता है। इससे पता चलता है कि व्यक्ति अंडरवेट, नॉर्मल, ओवरवेट या ओबीज कैटेगरी में है या नहीं। लेकिन BMI से यह नहीं पता चलता कि शरीर के वजन की वजह मसल है या फैट।

जबकि मसल-फैट रेशियो शरीर में मौजूद मांसपेशियों और फैट के एक्चुअल रेशियो को बताता है। यह बॉडी कंपोजिशन पता करने का अधिक सटीक पैमाना है।

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  • इसके बैलेंस रहने से हॉर्मोन भी बैलेंस्ड रहता है।
  • इससे स्ट्रेस हॉर्मोन (कोर्टिसोल) कंट्रोल में रहता है।
  • बेहतर मसल-फैट रेशियो से ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है।
  • ब्रेन तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व सही मात्रा में पहुंचते हैं।
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  • ब्रेन एजिंग और मेमोरी लॉस का रिस्क घटता है।

नीचे ग्राफिक में हेल्दी मसल–फैट रेशियो के फायदे दो हिस्सों में समझाए गए हैं।

सवाल- अगर बॉडी में फैट ज्यादा हो और मसल्स कम तो इससे ब्रेन को क्या नुकसान होता है?

जवाब- इसका ब्रेन पर कई तरह से प्रभाव पड़ता है–

ज्यादा बॉडी फैट खासकर विसरल फैट (पेट की चर्बी) शरीर में लो-ग्रेड इंफ्लेमेशन बढ़ाता है। यह इंफ्लेमेशन धीरे-धीरे ब्रेन तक असर डाल सकता है।

मसल्स कम होने से इंसुलिन सेंसिटिविटी घटती है। इससे ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव हो सकता है।

यह लंबे समय में ब्रेन फंक्शन पर नेगेटिव असर डालता है।

ऐसी स्थिति में याददाश्त कमजोर होना, फोकस में कमी और उम्र के साथ कॉग्निटिव डिक्लाइन (ब्रेन की फंक्शनिंग में कमजोरी) का जोखिम बढ़ सकता है।

सवाल– किन कारणों से शरीर में मसल रेशियो कम होता है?

जवाब- मसल रेशियो कम होने का मतलब है कि शरीर में मसल्स घट रही हैं और फैट का हिस्सा बढ़ रहा है। इसकी वजह सिर्फ उम्र नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल, हॉर्मोनल बदलाव, बीमारियां और कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। नीचे ग्राफिक में मसल लॉस के संभावित कारणों को अलग-अलग कैटेगरी में समझाया गया है।

सवाल- क्या मसल्स बढ़ाने से ब्रेन एजिंग की गति धीमी होती है?

जवाब- यह सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता कि मसल्स बढ़ाने से ब्रेन एजिंग की स्पीड रुक जाती है, लेकिन मजबूत और एक्टिव मसल्स ब्रेन हेल्थ को सपोर्ट जरूर करती हैं।

मसल्स एक्टिव टिश्यू होते हैं। वे मायोकाइन्स जैसे केमिकल रिलीज करते हैं, जो इंफ्लेमेशन कम करने और ब्रेन सेल्स के बीच कनेक्शन बनाने में मदद कर सकते हैं।

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  • सबसे सटीक तरीका बॉडी फैट परसेंटेज मापना है।
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  • अगर कमर का माप ज्यादा है तो पेट की चर्बी अधिक हो सकती है।
  • अगर कमर आपकी लंबाई के आधे से ज्यादा है तो यह जोखिम का संकेत माना जाता है।
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सवाल- मसल-फैट रेशियो बैलेंस्ड रखने के लिए ओवरऑल हमारी लाइफस्टाइल कैसी होनी चाहिए?

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