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अय्यर के लेटर का थरूर ने दिया जवाब:कहा- मेरी देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत; अय्यर ने लिखा था- क्या आप मोदी की कृपा चाहते हैं

अय्यर के लेटर का थरूर ने दिया जवाब:कहा- मेरी देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत; अय्यर ने लिखा था- क्या आप मोदी की कृपा चाहते हैं

कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं शशि थरूर और मणि शंकर अय्यर के बीच तनाव अब और बढ़ गया है। शशि थरूर ने गुरुवार को अय्यर के ओपन लेटर का जवाब ओपन लेटर लिखकर दिया है। थरूर ने भी कहा है कि विदेश नीति पर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इससे किसी की नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। मणि शंकर अय्यर ने अपने लेटर में विदेश नीति पर थरूर के रुख की आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि शशि थरूर ने अमेरिका-इजराइल और ईरान से जुड़े मुद्दों पर भारत के नैतिक रुख को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि भारत को शक्तिशाली देशों के दबाव में चुप नहीं रहना चाहिए और गांधी-नेहरू की नैतिक राजनीति से प्रेरणा लेनी चाहिए। अय्यर ने लेटर में लिखा था कि क्या आप सचमुच नरेंद्र मोदी की कृपा पाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे आपको वह लाभ दे सकते हैं जो विपक्ष आपको नहीं दे सकता? अय्यर ने लिखा- यहीं से हमारे रास्ते अलग हो जाते हैं। इसपर थरूर ने जवाब में कहा है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियां कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया था। थरूर का लेटर पढ़िए- लोकतंत्र की खूबी यही है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। असहमति होना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई विदेश नीति को थोड़ा अलग तरीके से देखता है, उसकी नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। आपने मेरे विचारों और मेरे चरित्र के बारे में जो सार्वजनिक टिप्पणी की है, उसका जवाब देना जरूरी हो गया है। मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को भारत के राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखा है। मेरे लिए भारत की सुरक्षा, भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत की इज्जत सबसे ऊपर है। दुनिया की राजनीतिक हकीकत को समझना और भारत के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लेना कोई “मोरल सरेंडर” नहीं है — यह जिम्मेदार स्टेटक्राफ्ट है। भारत की विदेश नीति हमेशा principle और pragmatism दोनों का संतुलन रही है। Jawaharlal Nehru की Non-Alignment policy से लेकर आज की multi-alignment diplomacy तक भारत का मकसद हमेशा एक ही रहा है, अपनी संप्रभुता की रक्षा करना और दुनिया में न्याय की बात करना। संसद में हो या संसद के बाहर, मेरा रिकॉर्ड इसी संतुलन को दिखाता है। देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का अधिकार नहीं है। और न ही गांधी जी या नेहरू जी को समझने का अधिकार किसी एक समूह के पास है। असली सम्मान यही है कि उनके विचारों को आज के समय की हकीकत के साथ समझकर लागू किया जाए। इतिहास में भी भारत ने कई बार ऐसा किया है कि किसी देश की गलत कार्रवाई को तुरंत सार्वजनिक रूप से नहीं ललकारा, क्योंकि हमारे अपने राष्ट्रीय हित उससे जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, सोवियत यूनियन के साथ हमारे रिश्ते इतने महत्वपूर्ण थे कि हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान के मामलों में भी भारत ने बहुत संतुलित रुख अपनाया।आज भी खाड़ी देशों के साथ भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हैं। लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, हमारी एनर्जी सिक्योरिटी और करीब 90 लाख भारतीय वहां काम कर रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति बनाते समय इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। यथार्थ को समझना किसी के आगे झुकना नहीं होता। आज अमेरिका में ऐसी सरकार है जो अंतरराष्ट्रीय कानून को हमेशा उसी तरह प्राथमिकता नहीं देती जैसे हम देना चाहते हैं। लेकिन अगर हम उसे खुलकर चुनौती देते हैं तो उसके परिणाम भी हो सकते हैं।अपने हाल के Indian Express लेख में मैंने साफ लिखा है कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इसे तुरंत खत्म होना चाहिए। लेकिन साथ ही मैंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ हमारे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं, उन्हें खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी। विदेश नीति आखिरकार राष्ट्रीय हित के बारे में ही होती है, केवल भाषण देने या दिखावे की राजनीति करने के बारे में नहीं। मेरी विदेश यात्राओं को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं। ऑपरेशन सिंदूर को छोड़कर मेरी बाकी विदेश यात्राएं मेरी प्राइवेट कैपेसिटी में होती हैं। न उन्हें सरकार आयोजित करती है, न सरकार उनका खर्च उठाती है। दुनिया भर के कई विश्वविद्यालय और संस्थान मुझे बुलाते हैं, जितने निमंत्रण आते हैं, उनमें से ज्यादातर को मैं अपने काम के कारण स्वीकार भी नहीं कर पाता।जहाँ तक क्षेत्रीय राजनीति की बात है, मेरे विचार सालों से एक जैसे रहे हैं।मैंने हमेशा Israel और Palestine के बीच two-state solution का समर्थन किया है। और यह भी कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि वहाँ सेना के पास देश है, न कि देश के पास सेना। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब हमने दुनिया में भारत का पक्ष रखा, तो मेरा संदेश साफ था — “भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। हम शांति चाहते हैं। लेकिन शांति का मतलब कमजोरी नहीं होता। अगर आतंकवाद हमारे लोगों की जान लेगा, तो भारत मजबूती से जवाब देगा।”सबरीमाला के मुद्दे पर भी आपकी आलोचना मुझे थोड़ी अजीब लगी। एक तरफ आप मुझे “गलत विचारों” के लिए कोसते हैं, दूसरी तरफ उसी मुद्दे पर पार्टी के निर्णय के साथ खड़े होने के लिए भी आलोचना करते हैं। मेरी जन्मतिथि को लेकर की गई टिप्पणी भी इस बहस से जुड़ी नहीं है। महात्मा गांधी का सम्मान करने के लिए यह जरूरी नहीं कि किसी को उनकी गोद में खेलने का मौका मिला हो। मैंने गांधी जी और नेहरू जी पर काफी लिखा है और उनका सम्मान मेरे विचारों में गहराई से मौजूद है।विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन principled pragmatism को गलत समझना ठीक नहीं है। मेरा मानना है कि भारत को ऐसी राष्ट्रवादी सोच की जरूरत है जो नैतिक मूल्यों और वास्तविक दुनिया की राजनीति, दोनों को साथ लेकर चले।आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में मेरा समर्थन किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।और जब आपको पार्टी से निलंबित किया गया था, तब मैंने भी आपके समर्थन में आवाज उठाई थी। मुझे खुशी है कि वह निर्णय बाद में ठीक किया गया। आपने अपने पत्र के अंत में “रास्ते अलग होने” की बात कही। सच यह है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियां कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया, इसलिए दे रहा हूं।

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राजनीति

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कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं शशि थरूर और मणि शंकर अय्यर के बीच तनाव अब और बढ़ गया है। शशि थरूर ने गुरुवार को अय्यर के ओपन लेटर का जवाब ओपन लेटर लिखकर दिया है। थरूर ने भी कहा है कि विदेश नीति पर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इससे किसी की नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। मणि शंकर अय्यर ने अपने लेटर में विदेश नीति पर थरूर के रुख की आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि शशि थरूर ने अमेरिका-इजराइल और ईरान से जुड़े मुद्दों पर भारत के नैतिक रुख को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि भारत को शक्तिशाली देशों के दबाव में चुप नहीं रहना चाहिए और गांधी-नेहरू की नैतिक राजनीति से प्रेरणा लेनी चाहिए। अय्यर ने लेटर में लिखा था कि क्या आप सचमुच नरेंद्र मोदी की कृपा पाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे आपको वह लाभ दे सकते हैं जो विपक्ष आपको नहीं दे सकता? अय्यर ने लिखा- यहीं से हमारे रास्ते अलग हो जाते हैं। इसपर थरूर ने जवाब में कहा है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियां कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया था। थरूर का लेटर पढ़िए- लोकतंत्र की खूबी यही है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। असहमति होना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई विदेश नीति को थोड़ा अलग तरीके से देखता है, उसकी नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। आपने मेरे विचारों और मेरे चरित्र के बारे में जो सार्वजनिक टिप्पणी की है, उसका जवाब देना जरूरी हो गया है। मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को भारत के राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखा है। मेरे लिए भारत की सुरक्षा, भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत की इज्जत सबसे ऊपर है। दुनिया की राजनीतिक हकीकत को समझना और भारत के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लेना कोई “मोरल सरेंडर” नहीं है — यह जिम्मेदार स्टेटक्राफ्ट है। भारत की विदेश नीति हमेशा principle और pragmatism दोनों का संतुलन रही है। Jawaharlal Nehru की Non-Alignment policy से लेकर आज की multi-alignment diplomacy तक भारत का मकसद हमेशा एक ही रहा है, अपनी संप्रभुता की रक्षा करना और दुनिया में न्याय की बात करना। संसद में हो या संसद के बाहर, मेरा रिकॉर्ड इसी संतुलन को दिखाता है। देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का अधिकार नहीं है। और न ही गांधी जी या नेहरू जी को समझने का अधिकार किसी एक समूह के पास है। असली सम्मान यही है कि उनके विचारों को आज के समय की हकीकत के साथ समझकर लागू किया जाए। इतिहास में भी भारत ने कई बार ऐसा किया है कि किसी देश की गलत कार्रवाई को तुरंत सार्वजनिक रूप से नहीं ललकारा, क्योंकि हमारे अपने राष्ट्रीय हित उससे जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, सोवियत यूनियन के साथ हमारे रिश्ते इतने महत्वपूर्ण थे कि हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान के मामलों में भी भारत ने बहुत संतुलित रुख अपनाया।आज भी खाड़ी देशों के साथ भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हैं। लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, हमारी एनर्जी सिक्योरिटी और करीब 90 लाख भारतीय वहां काम कर रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति बनाते समय इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। यथार्थ को समझना किसी के आगे झुकना नहीं होता। आज अमेरिका में ऐसी सरकार है जो अंतरराष्ट्रीय कानून को हमेशा उसी तरह प्राथमिकता नहीं देती जैसे हम देना चाहते हैं। लेकिन अगर हम उसे खुलकर चुनौती देते हैं तो उसके परिणाम भी हो सकते हैं।अपने हाल के Indian Express लेख में मैंने साफ लिखा है कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इसे तुरंत खत्म होना चाहिए। लेकिन साथ ही मैंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ हमारे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं, उन्हें खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी। विदेश नीति आखिरकार राष्ट्रीय हित के बारे में ही होती है, केवल भाषण देने या दिखावे की राजनीति करने के बारे में नहीं। मेरी विदेश यात्राओं को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं। ऑपरेशन सिंदूर को छोड़कर मेरी बाकी विदेश यात्राएं मेरी प्राइवेट कैपेसिटी में होती हैं। न उन्हें सरकार आयोजित करती है, न सरकार उनका खर्च उठाती है। दुनिया भर के कई विश्वविद्यालय और संस्थान मुझे बुलाते हैं, जितने निमंत्रण आते हैं, उनमें से ज्यादातर को मैं अपने काम के कारण स्वीकार भी नहीं कर पाता।जहाँ तक क्षेत्रीय राजनीति की बात है, मेरे विचार सालों से एक जैसे रहे हैं।मैंने हमेशा Israel और Palestine के बीच two-state solution का समर्थन किया है। और यह भी कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि वहाँ सेना के पास देश है, न कि देश के पास सेना। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब हमने दुनिया में भारत का पक्ष रखा, तो मेरा संदेश साफ था — “भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। हम शांति चाहते हैं। लेकिन शांति का मतलब कमजोरी नहीं होता। अगर आतंकवाद हमारे लोगों की जान लेगा, तो भारत मजबूती से जवाब देगा।”सबरीमाला के मुद्दे पर भी आपकी आलोचना मुझे थोड़ी अजीब लगी। एक तरफ आप मुझे “गलत विचारों” के लिए कोसते हैं, दूसरी तरफ उसी मुद्दे पर पार्टी के निर्णय के साथ खड़े होने के लिए भी आलोचना करते हैं। मेरी जन्मतिथि को लेकर की गई टिप्पणी भी इस बहस से जुड़ी नहीं है। महात्मा गांधी का सम्मान करने के लिए यह जरूरी नहीं कि किसी को उनकी गोद में खेलने का मौका मिला हो। मैंने गांधी जी और नेहरू जी पर काफी लिखा है और उनका सम्मान मेरे विचारों में गहराई से मौजूद है।विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन principled pragmatism को गलत समझना ठीक नहीं है। मेरा मानना है कि भारत को ऐसी राष्ट्रवादी सोच की जरूरत है जो नैतिक मूल्यों और वास्तविक दुनिया की राजनीति, दोनों को साथ लेकर चले।आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में मेरा समर्थन किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।और जब आपको पार्टी से निलंबित किया गया था, तब मैंने भी आपके समर्थन में आवाज उठाई थी। मुझे खुशी है कि वह निर्णय बाद में ठीक किया गया। आपने अपने पत्र के अंत में “रास्ते अलग होने” की बात कही। सच यह है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियां कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया, इसलिए दे रहा हूं।

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