26 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक धुरंधर रणवीर सिंह के करियर की अब तक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। बचपन से अमिताभ बच्चन जैसा बनने का सपना देखने वाले रणवीर सिंह का सफर संघर्ष, जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल है। फिल्मों में जगह बनाने के दौरान उन्हें कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने समझौता करने से इनकार कर दिया। स्ट्रगल के दिनों में वह पृथ्वी थिएटर में झाड़ू-पोंछा लगाने और छोटे-मोटे काम करते रहे। इस दौरान उनके पिता ने सपना पूरा करने के लिए घर और गाड़ी बेच दी। लंबी मेहनत के बाद उन्हें बैंड बाजा बारात से बॉलीवुड में डेब्यू मिला, जिससे उन्हें पहचान मिली। उतार-चढ़ाव के बाद धुरंधर ने उनके करियर को नई ऊंचाई पर पहुंचाया और उन्हें बड़ा स्टार बना दिया। आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानते हैं रणवीर सिंह के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें। रणवीर सिंह का पूरा नाम रणवीर सिंह भावनानी है। अमिताभ बच्चन जैसा बनना चाहता था रणवीर सिंह ने ABP के साथ बातचीत में बताया था- बचपन से ही मेरा सपना एक्टर बनने का था। मैं अमिताभ बच्चन जैसा बनना चाहता था। उनकी फिल्में जैसे शहंशाह, तूफान और अजूबा देखकर मुझे प्रेरणा मिलती थी। मैं छोटा और थोड़ा मोटा बच्चा था, लेकिन जब कोई पूछता कि बड़े होकर क्या बनोगे, तो मैं बिना सोचे कहता था-“हीरो बनूंगा।” मैं बाकी बच्चों की तरह बाहर खेलने नहीं जाता था। मैं घर में बैठकर वीसीआर पर फिल्में देखता था, म्यूजिक सुनता था और फिल्मी मैगजीन पढ़ता था। मेरी दादी ने मुझे सबसे ज्यादा प्रोत्साहित किया। वह मुझे अमिताभ बच्चन की फिल्में दिखाती थीं और कहती थीं कि तुझे बड़ा होकर इनके जैसा बनना है। वहीं से यह सपना पक्का हो गया। सात साल की उम्र में मैंने पहली बार गार्डन में परफॉर्म किया था। मैंने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘हम’ के गाने ‘जुम्मा चुम्मा’ पर डांस किया था। वही मेरा पहला स्टेज अनुभव था। रणवीर सिंह ने मुंबई के एच.आर. कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की है। एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपीराइटर के तौर पर काम किया पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपीराइटर के तौर पर काम किया, क्योंकि मुझे लिखने का शौक था। स्कूल में एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, जिसमें हमें प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन बनाना था और मैं पहले स्थान पर आया था। मुझे नाम और टैगलाइन सोचने में मजा आया, तभी लगा कि इसे प्रोफेशन बना सकता हूं। फिर पता चला कि यह काम करने वालों को कॉपीराइटर कहते हैं, इसलिए मैंने यह बनने का तय किया। कुछ दिन काम किया, लेकिन दिल नहीं लगा। उसके बाद मैं अमेरिका गया और वहां से एक्टिंग की पढ़ाई करके लौटा, ताकि बॉलीवुड में सपना पूरा कर सकूं। एक्टिंग क्लास में सिर्फ एक सीट बची थी मैं क्लासेस के लिए देर से रजिस्टर कर रहा था, इसलिए ज्यादातर क्लासेस भर चुकी थीं। सिर्फ एक क्लास ‘एक्टिंग वन’ में एक सीट बची थी। मैंने वही एडमिशन ले ली। पहले दिन प्रोफेसर ने कहा कि उन्हें यह नहीं जानना कि हम कौन हैं या कहां से आए हैं। हर स्टूडेंट को स्टेज पर जाकर गाना, डांस या कुछ और परफॉर्म करना होगा। मैं स्टेज पर गया और मेरे पास बस एक ही चीज थी- फिल्म “दीवार” का डायलॉग। चार-पांच साल से मैंने एक्टिंग नहीं की थी। कॉलेज और स्कूल में मुझे बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड मिलते थे, लेकिन काफी समय से वो छूट गया था। फिर भी मैंने पूरी ईमानदारी और जज्बे के साथ डायलॉग बोला। क्लास में बैठे अमेरिकन स्टूडेंट्स को मेरी भाषा समझ नहीं आई, लेकिन मेरे इमोशन और एनर्जी ने उन्हें छू लिया। सबने रिएक्ट किया। उन्हें समझ नहीं आया मैं क्या कह रहा हूं, लेकिन कुछ तो था उस परफॉर्मेंस में। फिल्मी बैक ग्राउंड नहीं, फिर भी हीरो बनने की जिद चार साल अमेरिका में बिताने के बाद 2007 में मैं मुंबई लौट आया। वापस आते ही बचपन का सपना फिर जाग गया कि फिल्मों में हीरो बनना है। यह रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि मेरा कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था, लेकिन मैंने ठान लिया था कि मुझे यही करना है। मैं मुंबई के बांद्रा इलाके में पला-बढ़ा हूं, जहां सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान जैसे बड़े सितारे रहते हैं। लेकिन वहां रहना और उनके जैसा बनना अलग बातें हैं। स्टार बनने के बाद रणवीर सिंह ने डायरेक्टर शाद अली की किल दिल (2014) फिल्म में काम किया। संघर्ष के शुरुआती दिनों में शाद अली ने मेरा साथ दिया मेरे संघर्ष के शुरुआती दिनों में मेरे दोस्त शाद अली ने मेरा साथ दिया। उस समय वह अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘झूम बराबर झूम’ कर रहे थे और विज्ञापनों का निर्देशन भी कर रहे थे। मैंने उनसे नौकरी मांगी, तो उन्होंने मुझे असिस्टेंट डायरेक्टर रख लिया। मुझे लगा यह अच्छा मौका है, क्योंकि इससे मैं सेट पर जाकर एक्टर्स और कास्टिंग डायरेक्टर्स से मिल सकूंगा और इंडस्ट्री में पहचान बना सकूंगा। करीब डेढ़ साल तक मैंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। इस दौरान मैंने क्राउड कंट्रोल, कास्टिंग और प्री-प्रोडक्शन जैसे कई काम किए। मैं पूरी तरह असिस्टेंट डायरेक्टर की तरह काम कर रहा था। असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी फिर मैंने बड़ा फैसला लिया और असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी। डेढ़ साल काम करने के बाद जब मैंने खुद को देखा, तो आंखों के नीचे काले घेरे थे और पेट भी निकल आया था। तब मुझे लगा कि इस हालत में मैं एक्टर नहीं बन पाऊंगा। इसके बाद मैंने पूरा ध्यान फिर से एक्टिंग पर लगाया। यूनिवर्सिटी में थिएटर की पढ़ाई की थी और कुछ नाटक किए थे, लेकिन वह बीच में छूट गया था। अब मैंने दोबारा एक्टिंग सीखनी शुरू की। मुझे लगा कि पश्चिमी ड्रामा की ट्रेनिंग मिल गई है, अब भारतीय एक्टिंग भी सीखनी चाहिए। इसलिए मैंने इंडियन एक्टिंग क्लासेस जॉइन कीं और स्टेज पर काम शुरू किया। शाद अली ने मुझे सलाह दी थी कि फिल्मों में आने से पहले थोड़ा ड्रामा और थिएटर करना चाहिए। उन्होंने कहा-“तेरी वेस्टर्न ट्रेनिंग हो गई है, अब थोड़ी देसी ट्रेनिंग ले ले।” उनकी बात मानकर मैंने किशोर नमित कपूर के एक्टिंग स्कूल