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Indias $10 Trillion Economy Needs Law, Not Just Capital: CJI Surya Kant

Indias $10 Trillion Economy Needs Law, Not Just Capital: CJI Surya Kant

नई दिल्ली35 मिनट पहले

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CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनॉमी बनाने के लिए सिर्फ पूंजी और पॉलिसी काफी नहीं होंगी। इसके लिए मजबूत और भरोसेमंद कानूनी व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होगी। निवेशकों का भरोसा इसी पर टिका होता है।

जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के ‘रूल ऑफ लॉ कन्वेंशन 2026’ में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

उन्होंने भरोसा जताया कि देश इस चुनौती को पूरा करेगा, लेकिन इसके लिए कानून की गुणवत्ता, स्थिरता और पारदर्शिता जरूरी होगी, क्योंकि इसी पर आर्थिक वादों और निवेश का आधार टिका होता है।

भारत को लंबी अवधि के निवेश की जरूरत CJI ने कहा कि अब भारत को ऐसे निवेश की जरूरत है जो जल्दी मुनाफा कमाने के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने वाले हों और भरोसे पर आधारित हों। जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर में पेंशन फंड का पैसा लगाना, टेक कंपनियों का अपना ज्ञान साझा करना या बड़ी विदेशी कंपनियों का सप्लाई चेन बनाना- ये सब लंबे समय की जिम्मेदारियां होती हैं।

उन्होंने कहा कि निवेशक सबसे पहले ये देखते हैं कि जिस देश में वे पैसा लगा रहे हैं, वहां का कानून आगे भी ईमानदार, स्थिर और भरोसेमंद रहेगा या नहीं। उनके मुताबिक असली बात सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट निभाने की नहीं है, बल्कि पूरे रिश्ते में भरोसा बनाए रखने की है।

उन्होंने ये भी बताया कि पिछले 20 साल में बिजनेस विवादों का नेचर बदल गया है। पहले झगड़े आम तौर पर पेमेंट या सामान की सप्लाई जैसे सीधे मुद्दों पर होते थे, लेकिन अब ये लंबे और जटिल कारोबारी रिश्तों से जुड़े होते हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था भी बड़ी और जटिल हो गई है।

सीजेआई ने कहा कि अब कानून की जिम्मेदारी सिर्फ समझौते के वक्त तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पूरे कारोबारी रिश्ते के दौरान भी न्याय बना रहना चाहिए।

कानून विवादों के लिए तीन अहम जरूरतें

  • कानून में स्थिरता ताकि अलग-अलग हालात में भी एक जैसे सिद्धांत लागू हों।
  • विवाद होने से पहले ही उन्हें रोकने की संस्कृति, जिसमें ‘गुड फेथ’ यानी ईमानदारी से अनुबंध निभाने की भावना हो। उन्होंने कहा कि अगर मध्यस्थता को बढ़ावा दिया जाए और विवादों को पहले ही सुलझाने की संस्कृति बने, तो इससे भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बहुत फायदा होगा। इससे मुकदमे आखिरी विकल्प बनेंगे, न कि पहला कदम।
  • स्पेशलाइजेनश (विशेषज्ञता) बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज के व्यापारिक विवाद इतने जटिल हो गए हैं कि सामान्य कानूनी प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइनेंस और डिजिटल सेक्टर जैसे मामलों के लिए खास ज्ञान जरूरी है।

तकनीक का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया को आसान और तेज बनाना

CJI ने यह भी कहा कि जजों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण जरूरी है, ताकि वे आर्थिक व्यवस्था की बारीकियों को समझ सकें। इसके लिए डोमेन एक्सपर्ट्स के साथ बातचीत जैसे कदम उठाने की जरूरत है।

तकनीक की भूमिका पर बात करते हुए CJI ने कहा कि इसे कानूनी सिस्टम का हिस्सा माना जाना चाहिए, न कि सिर्फ एक अतिरिक्त सुविधा। डिजिटल केस मैनेजमेंट, AI आधारित रिसर्च और इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाएं न्याय की गति और लागत को सीधे प्रभावित करती हैं।

हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि तकनीक के बावजूद इंसानी निर्णय ही न्याय का केंद्र रहेगा। तकनीक का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया को आसान और तेज बनाना है।

अंत में उन्होंने बार (वकीलों) की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि देश की आर्थिक प्रगति में उनकी भी अहम जिम्मेदारी है। उन्हें खुद को सिर्फ सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि देश के आर्थिक भविष्य का भागीदार मानना होगा।

उन्होंने कहा कि जो पीढ़ी भारत की 10 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लिए कमर्शियल कानून को आकार देगी, उसे उसी तरह याद किया जाएगा, जैसे संविधान बनाने वाली पीढ़ी को याद किया जाता है।

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ये खबर भी पढ़ें:

CJI बोले- AI ज्यूडीशियरी को मजबूत करने में मदद करे:डेटा-रिकॉर्ड संभाले, पैटर्न पहचाने लेकिन फैसले सुनाने के काम में दखल न दे

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जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के ‘रूल ऑफ लॉ कन्वेंशन 2026’ में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

उन्होंने भरोसा जताया कि देश इस चुनौती को पूरा करेगा, लेकिन इसके लिए कानून की गुणवत्ता, स्थिरता और पारदर्शिता जरूरी होगी, क्योंकि इसी पर आर्थिक वादों और निवेश का आधार टिका होता है।

भारत को लंबी अवधि के निवेश की जरूरत CJI ने कहा कि अब भारत को ऐसे निवेश की जरूरत है जो जल्दी मुनाफा कमाने के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने वाले हों और भरोसे पर आधारित हों। जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर में पेंशन फंड का पैसा लगाना, टेक कंपनियों का अपना ज्ञान साझा करना या बड़ी विदेशी कंपनियों का सप्लाई चेन बनाना- ये सब लंबे समय की जिम्मेदारियां होती हैं।

उन्होंने कहा कि निवेशक सबसे पहले ये देखते हैं कि जिस देश में वे पैसा लगा रहे हैं, वहां का कानून आगे भी ईमानदार, स्थिर और भरोसेमंद रहेगा या नहीं। उनके मुताबिक असली बात सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट निभाने की नहीं है, बल्कि पूरे रिश्ते में भरोसा बनाए रखने की है।

उन्होंने ये भी बताया कि पिछले 20 साल में बिजनेस विवादों का नेचर बदल गया है। पहले झगड़े आम तौर पर पेमेंट या सामान की सप्लाई जैसे सीधे मुद्दों पर होते थे, लेकिन अब ये लंबे और जटिल कारोबारी रिश्तों से जुड़े होते हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था भी बड़ी और जटिल हो गई है।

सीजेआई ने कहा कि अब कानून की जिम्मेदारी सिर्फ समझौते के वक्त तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पूरे कारोबारी रिश्ते के दौरान भी न्याय बना रहना चाहिए।

कानून विवादों के लिए तीन अहम जरूरतें

  • कानून में स्थिरता ताकि अलग-अलग हालात में भी एक जैसे सिद्धांत लागू हों।
  • विवाद होने से पहले ही उन्हें रोकने की संस्कृति, जिसमें ‘गुड फेथ’ यानी ईमानदारी से अनुबंध निभाने की भावना हो। उन्होंने कहा कि अगर मध्यस्थता को बढ़ावा दिया जाए और विवादों को पहले ही सुलझाने की संस्कृति बने, तो इससे भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बहुत फायदा होगा। इससे मुकदमे आखिरी विकल्प बनेंगे, न कि पहला कदम।
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हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि तकनीक के बावजूद इंसानी निर्णय ही न्याय का केंद्र रहेगा। तकनीक का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया को आसान और तेज बनाना है।

अंत में उन्होंने बार (वकीलों) की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि देश की आर्थिक प्रगति में उनकी भी अहम जिम्मेदारी है। उन्हें खुद को सिर्फ सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि देश के आर्थिक भविष्य का भागीदार मानना होगा।

उन्होंने कहा कि जो पीढ़ी भारत की 10 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लिए कमर्शियल कानून को आकार देगी, उसे उसी तरह याद किया जाएगा, जैसे संविधान बनाने वाली पीढ़ी को याद किया जाता है।

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