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Fertility Crisis in India & World | इंसानी स्पर्म और अंडों पर भारी पड़ रहा है प्लास्टिक का जहर, वैज्ञानिकों ने दी फर्टिलिटी संकट की भयानक चेतावनी

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Fertility Crisis: नई रिसर्च ने खुलासा किया है कि पूरी दुनिया इस समय सिंथेटिक केमिकल्स के समंदर में तैर रही है. इन केमिकल्स की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हमने पृथ्वी की सुरक्षित सीमा को पार कर लिया है. टॉक्सिकोलॉजिस्ट और बायोलॉजिस्ट की एक टीम ने चेतावनी दी है कि पेस्टिसाइड्स, प्रदूषण और प्लास्टिक मिलकर एक ‘साइलेंट’ फर्टिलिटी संकट को जन्म दे रहे हैं. यह संकट केवल इंसानों तक सीमित नहीं है बल्कि जानवरों की प्रजनन क्षमता को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. रिसर्च के मुताबिक खराब होते क्लाइमेट चेंज और बढ़ते प्रदूषण के तालमेल ने फर्टिलिटी, बायोडायवर्सिटी और हेल्थ के लिए ग्लोबल लेवल पर रिस्क पैदा कर दिया है. इसका सीधा असर इंसानों के अलावा समुद्री स्तनधारियों, पक्षियों, मछलियों और रेंगने वाले जीवों पर दिख रहा है. पिछले 50 सालों में दुनिया की वाइल्डलाइफ आबादी में दो-तिहाई से ज्यादा की कमी आई है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पॉल्यूटेंट्स और बदलता मौसम ही माना जा रहा है. इसी दौरान इंसानी पुरुषों और महिलाओं में भी बांझपन की दर तेजी से बढ़ी है. हालांकि इसका सटीक कारण पता लगाना मुश्किल है, लेकिन वैज्ञानिक हमारे जीवन में मौजूद हॉर्मोन बिगाड़ने वाले रसायनों को इसका मुख्य जिम्मेदार मान रहे हैं.

आज मार्केट में 1000 से ज्यादा ऐसे सिंथेटिक केमिकल्स मौजूद हैं जो हमारे शरीर के नेचुरल हॉर्मोन्स की नकल करते हैं या उन्हें ब्लॉक कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से केवल एक प्रतिशत केमिकल्स की ही सुरक्षा जांच सही तरीके से की गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इकोसिस्टम और इंसानी हेल्थ एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं. बढ़ता तापमान और केमिकल एक्सपोजर मिलकर शरीर के रिप्रोडक्शन सिस्टम पर भारी दबाव डाल रहे हैं. यह एक ऐसा अनचाहा खतरा है जिससे कोई भी जीव सुरक्षित नहीं बचा है क्योंकि इन केमिकल्स को बिना पूरी जांच के मार्केट में उतार दिया गया है. (File Photo : Reuters)

प्रदूषण और फर्टिलिटी के बीच का रिश्ता बहुत पुराना और खतरनाक रहा है. ओरेगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने रिसर्च में पाया कि पुराने समय में भी सिंथेटिक केमिकल्स ने जानवरों की आबादी को तबाह किया था. कीटनाशक यानी इंसेक्टिसाइड्स का इस्तेमाल फसलों को बचाने के लिए किया जाता है, लेकिन अब ये इंसानों के स्पर्म काउंट को कम करने का काम कर रहे हैं. (File Photo : Reuters)

डीडीटी जैसा मशहूर कीटनाशक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इसकी वजह से पक्षियों के अंडों के छिलके पतले हो गए थे, जिससे उनकी आबादी गिर गई थी. समुद्री जीवों में भी इसकी वजह से प्रजनन की कमी देखी गई थी, हालांकि बैन लगने के बाद उनकी संख्या में कुछ सुधार हुआ है. (File Photo : Reuters)

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आजकल ‘फॉरएवर केमिकल्स’ यानी पीएफएएस (PFAS) का नाम बहुत चर्चा में है. ये ऐसे केमिकल्स हैं जो पर्यावरण में कभी खत्म नहीं होते. रिसर्च बताती है कि ये सीधे तौर पर एंडोक्राइन सिस्टम को नुकसान पहुंचाते हैं. यह सिस्टम हमारे शरीर के विकास, मेटाबॉलिज्म और रिप्रोडक्शन को कंट्रोल करता है. 1970 के दशक से कंपनियों को पता था कि ये केमिकल्स जहरीले हैं, लेकिन इसे जनता से छुपाया गया. इसकी वजह से प्रेग्नेंट महिलाओं में मिसकैरेज और बच्चों में जन्मजात बीमारियों का खतरा बढ़ गया. ये केमिकल्स इतने ताकतवर होते हैं कि बहुत कम मात्रा में भी शरीर के हॉर्मोन्स का संतुलन बिगाड़ सकते हैं. (File Photo : Reuters)

प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल जमीन और पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर के अंदर तक पहुंच चुका है. माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक अब इंसानों और जानवरों के प्रजनन अंगों में जमा हो रहे हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि हमें अभी तक इनके सटीक नुकसानों के बारे में पूरी जानकारी भी नहीं है. वैज्ञानिक आशंका जता रहे हैं कि अगर ये स्पर्म, अंडों या भ्रूण के लिए जहरीले साबित हुए, तो इस समस्या से निपटना नामुमकिन होगा. प्लास्टिक अब गहरे समंदर से लेकर ऊंचे पहाड़ों तक मौजूद है और इससे बचने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है. (File Photo : Reuters)

वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान में चल रही ‘ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी’ की बातचीत बहुत जरूरी है. यह केवल कचरे की समस्या नहीं है, बल्कि एक प्लैनेटरी हेल्थ क्राइसिस है. हजारों की संख्या में मौजूद ये रसायनों वाले प्लास्टिक हमारे अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं. जब ये केमिकल्स लैब से बाहर निकलकर पर्यावरण में एक-दूसरे से मिलते हैं, तो इनका असर और भी भयानक हो जाता है. रिसर्च में साफ कहा गया है कि अगर हमने अभी सख्त कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में फर्टिलिटी का यह संकट पूरी दुनिया की आबादी को खतरे में डाल सकता है. (File Photo : Reuters)

इस संकट से बचने के लिए सबसे पहले हमें उन केमिकल्स के बारे में जानना होगा जो हमारे आसपास मौजूद हैं. रोजमर्रा की चीजों में प्लास्टिक का कम इस्तेमाल और सर्टिफाइड प्रोडक्ट्स का चुनाव करना एक शुरुआत हो सकती है. हालांकि यह लड़ाई व्यक्तिगत स्तर से ज्यादा सिस्टम के स्तर पर लड़ने वाली है. सरकारों को उन केमिकल्स पर तुरंत रोक लगानी होगी जिनकी सुरक्षा जांच नहीं हुई है. जब तक हम अपनी धरती और पर्यावरण को केमिकल फ्री बनाने की दिशा में काम नहीं करेंगे, तब तक प्रजनन क्षमता पर मंडरा रहा यह ‘साइलेंट’ खतरा टलने वाला नहीं है. भविष्य की पीढ़ी को बचाने के लिए हमें आज ही अपनी केमिकल निर्भरता को कम करना होगा. (Photo : Generative AI)

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