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Gangaram Hospital| Delhi news| गंगाराम अस्पताल में महिला को डोनर के दोनों हाथ, 12 घंटे की सर्जरी

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Gangaram Hospital News: दिल्ली के एक व्यस्त मोहल्ले में रहने वाली 42 वर्षीय रीना शर्मा (बदला हुआ नाम) के जीवन में कुछ हफ्ते पहले तक अंधेरा छाया हुआ था. एक भयानक दुर्घटना में उन्होंने दोनों हाथ खो दिए थे. ट्रेन में सफर करते समय एक अनियंत्रित भीड़ और असंतुलन की वजह से वे प्लेटफॉर्म से नीचे गिर गईं और दोनों हाथ कुचल गए. यह घटना इतनी भयावह थी कि डॉक्टरों को हाथों को काटकर अलग करना पड़ा.

हालांकि रीना, जो पहले एक कुशल गृहिणी और पार्ट-टाइम हैंडीक्राफ्ट आर्टिस्ट थीं, अब रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी नहीं कर पाती थीं. चम्मच उठाना, कपड़े पहनना, बच्चों को गले लगाना, सब कुछ दूसरों पर निर्भर हो गया था. उनकी आंखों में हमेशा उदासी और निराशा छाई रहती थी. हालांकि एक दिन फिर उनके जीवन में उजाला आ गया.

एक अन्य परिवार का गम रीना के लिए खुशी बनकर आया. उस परिवार में 38 वर्षीय एक युवक की ब्रेन डेड होने की घोषणा हो चुकी थी. दुर्घटना में उनकी जान चली गई, लेकिन परिवार ने एक नेक फैसला लिया. उन्होंने अंगदान का फैसला किया. उस युवक के स्वस्थ दोनों हाथ अब किसी दूसरे जीवन को सहारा दे सकते थे. परिवार ने कहा, ‘उनकी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी. उनका हिस्सा किसी की जिंदगी बनाएगा.’ यही इंसानियत की असली मिसाल थी.

और फिर सर गंगा राम अस्पताल के प्लास्टिक, कॉस्मेटिक और हैंड माइक्रोसर्जरी विभाग में शुरू हुआ दूसरा द्विपक्षीय हाथ प्रत्यारोपण, जो अपने आप में करिश्मा था. विभाग के चेयरमैन डॉ. महेश मंगल के नेतृत्व में डॉ. अनुभव गुप्ता, डॉ. भीम नंदा, डॉ. निखिल झुनझुनवाला और सभी रेजिडेंट डॉक्टर्स की टीम ने बेहद जटिल सर्जरी को अंजाम दिया. लगभग 12 घंटे की इस सर्जरी में नसों, धमनियों, टेंडन्स, मांसपेशियों और हड्डियों को जोड़ना था. माइक्रोसर्जरी की सूक्ष्मता ऐसी कि एक छोटी सी गलती भी सब बर्बाद कर सकती थी.

ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थीसिया टीम में डॉ. जया सूद, डॉ. राकेश सक्सेना और डॉ. अजय सिरोही ने रीना को पूरे समय सुरक्षित रखा. ऑर्थोपेडिक्स से डॉ. ब्रजेश नंदन, नेफ्रोलॉजी से डॉ. विनंत भार्गव, न्यूरोलॉजी से डॉ. सी.एस. अग्रवाल, साइकियाट्री से डॉ. सौम्या तंडन, जेनेटिक्स से डॉ. मोनिका जैन और पैथोलॉजी से डॉ. पल्लव गुप्ता तक हर विभाग ने अपनी भूमिका निभाई.

आखिरकार सर्जरी शुरू हुई. डॉ. मंगल की टीम ने पहले डोनर के हाथों को सावधानी से तैयार किया. फिर रीना के स्टंप्स पर सूक्ष्म कट लगाकर नई शुरुआत की. घंटों तक माइक्रोस्कोप के नीचे नस-नस जोड़ी गई. हड्डियां प्लेट्स से फिक्स की गईं. स्किन को खूबसूरती से सिल दिया गया. हर कदम पर टीम का समन्वय अद्भुत था. 12 घंटे बाद सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हुई.

पोस्ट-ऑपरेटिव केयर में रीना को इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं दी गईं ताकि नए हाथों को शरीर अस्वीकार न करे. फिजियोथेरेपी शुरू हुई. धीरे-धीरे रीना ने महसूस किया कि उनके नए हाथ हिल रहे हैं. पहले तो सिर्फ उंगलियों का हल्का कंपन, फिर धीरे-धीरे पकड़ बनने लगी.

कुछ हफ्तों बाद रीना अस्पताल के बेड पर बैठी मुस्कुरा रही थीं. उन्होंने पहली बार खुद का गिलास उठाया. आंखों में आंसू थे, लेकिन ये खुशी के आंसू थे. उन्होंने कहा, ‘मुझे लगा था जीवन खत्म हो गया. लेकिन आज मुझे नई जिंदगी मिली है. मैं फिर से अपने बच्चों के लिए खाना बना सकूंगी, उनका हाथ थाम सकूंगी.’

यह उपलब्धि सिर्फ एक सर्जरी नहीं थी बल्कि यह टीमवर्क, विज्ञान, इंसानियत और उम्मीद की जीत थी. डोनर परिवार की उदारता ने रीना को नई राह दिखाई. डॉक्टरों की मेहनत ने उस राह को हकीकत बना दिया.सर गंगा राम अस्पताल ने एक बार फिर साबित किया कि जब इंसानियत और विशेषज्ञता साथ चलें, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है.

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हालांकि रीना, जो पहले एक कुशल गृहिणी और पार्ट-टाइम हैंडीक्राफ्ट आर्टिस्ट थीं, अब रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी नहीं कर पाती थीं. चम्मच उठाना, कपड़े पहनना, बच्चों को गले लगाना, सब कुछ दूसरों पर निर्भर हो गया था. उनकी आंखों में हमेशा उदासी और निराशा छाई रहती थी. हालांकि एक दिन फिर उनके जीवन में उजाला आ गया.

एक अन्य परिवार का गम रीना के लिए खुशी बनकर आया. उस परिवार में 38 वर्षीय एक युवक की ब्रेन डेड होने की घोषणा हो चुकी थी. दुर्घटना में उनकी जान चली गई, लेकिन परिवार ने एक नेक फैसला लिया. उन्होंने अंगदान का फैसला किया. उस युवक के स्वस्थ दोनों हाथ अब किसी दूसरे जीवन को सहारा दे सकते थे. परिवार ने कहा, ‘उनकी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी. उनका हिस्सा किसी की जिंदगी बनाएगा.’ यही इंसानियत की असली मिसाल थी.

और फिर सर गंगा राम अस्पताल के प्लास्टिक, कॉस्मेटिक और हैंड माइक्रोसर्जरी विभाग में शुरू हुआ दूसरा द्विपक्षीय हाथ प्रत्यारोपण, जो अपने आप में करिश्मा था. विभाग के चेयरमैन डॉ. महेश मंगल के नेतृत्व में डॉ. अनुभव गुप्ता, डॉ. भीम नंदा, डॉ. निखिल झुनझुनवाला और सभी रेजिडेंट डॉक्टर्स की टीम ने बेहद जटिल सर्जरी को अंजाम दिया. लगभग 12 घंटे की इस सर्जरी में नसों, धमनियों, टेंडन्स, मांसपेशियों और हड्डियों को जोड़ना था. माइक्रोसर्जरी की सूक्ष्मता ऐसी कि एक छोटी सी गलती भी सब बर्बाद कर सकती थी.

ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थीसिया टीम में डॉ. जया सूद, डॉ. राकेश सक्सेना और डॉ. अजय सिरोही ने रीना को पूरे समय सुरक्षित रखा. ऑर्थोपेडिक्स से डॉ. ब्रजेश नंदन, नेफ्रोलॉजी से डॉ. विनंत भार्गव, न्यूरोलॉजी से डॉ. सी.एस. अग्रवाल, साइकियाट्री से डॉ. सौम्या तंडन, जेनेटिक्स से डॉ. मोनिका जैन और पैथोलॉजी से डॉ. पल्लव गुप्ता तक हर विभाग ने अपनी भूमिका निभाई.

आखिरकार सर्जरी शुरू हुई. डॉ. मंगल की टीम ने पहले डोनर के हाथों को सावधानी से तैयार किया. फिर रीना के स्टंप्स पर सूक्ष्म कट लगाकर नई शुरुआत की. घंटों तक माइक्रोस्कोप के नीचे नस-नस जोड़ी गई. हड्डियां प्लेट्स से फिक्स की गईं. स्किन को खूबसूरती से सिल दिया गया. हर कदम पर टीम का समन्वय अद्भुत था. 12 घंटे बाद सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हुई.

पोस्ट-ऑपरेटिव केयर में रीना को इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं दी गईं ताकि नए हाथों को शरीर अस्वीकार न करे. फिजियोथेरेपी शुरू हुई. धीरे-धीरे रीना ने महसूस किया कि उनके नए हाथ हिल रहे हैं. पहले तो सिर्फ उंगलियों का हल्का कंपन, फिर धीरे-धीरे पकड़ बनने लगी.

कुछ हफ्तों बाद रीना अस्पताल के बेड पर बैठी मुस्कुरा रही थीं. उन्होंने पहली बार खुद का गिलास उठाया. आंखों में आंसू थे, लेकिन ये खुशी के आंसू थे. उन्होंने कहा, ‘मुझे लगा था जीवन खत्म हो गया. लेकिन आज मुझे नई जिंदगी मिली है. मैं फिर से अपने बच्चों के लिए खाना बना सकूंगी, उनका हाथ थाम सकूंगी.’

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