सोनिया ने कहा- वर्तमान में जारी कूटनीतिक चर्चा के बीच किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर टूट है।
कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- दिल्ली की चुप्पी हैरान करने वाली है, यह तटस्थता (न्यूट्रल) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश आर्टिकल में उन्होंने लिखा- 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड अटैक में हत्या कर दी गई। जब दो देशों की डिप्लोमैट लेवल की बातचीत चल रही हो, तब एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार को दिखाती है।
सोनिया ने लिखा कि भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। मोदी ने अमेरिका-इजराइल के हमले को अनदेखा किया, केवल यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की। बाद में पीएम ने ‘गहरी चिंता’ और ‘बातचीत व कूटनीति’ की बात कही। जबकि हमला उस समय हुआ, जब दो देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया जारी थी।
सोनिया गांधी के आर्टिकल की 5 बड़ी बातें…
1. बिना युद्ध घोषणा के हत्या
यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा और उस समय की गई, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की सीमाओं या उसकी राजनीतिक आजादी के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना गलत है। किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेट किलिंग इन नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर आवाज नहीं उठाता तो अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ सकते हैं।
2. प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा
हत्या से सिर्फ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई। यह उस समय हुआ, जब गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिक, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, मारे जाने पर दुनियाभर में नाराजगी है।
3. ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स देशों का रुख
ग्लोबल साउथ के कई देशों और ब्रिक्स के साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे समय में भारत का खुला समर्थन, बिना साफ नैतिक रुख के, गलत संदेश दे सकता है। सोनिया गांधी के अनुसार, इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में दिखेगा।
4. बमबारी और टारगेट किलिंग की निंदा
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान की जमीन पर हुई बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा करती है। ये क्षेत्र और दुनिया के लिए खतरनाक कदम है। पार्टी की ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदनाएं हैं।
5. संविधान का हवाला
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि देशों के बीच विवाद बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए, सभी देशों की बराबरी का सम्मान होना चाहिए और किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। ये सिद्धांत लंबे समय से भारत की विदेश नीति का आधार रहे हैं। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।
सोनिया ने किया- भारत और ईरान के संबंधों का जिक्र
सोनिया गांधी ने कहा कि 1994 में OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया, जिससे कश्मीर मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच सका।
ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत को कूटनीतिक मौजूदगी की अनुमति दी, जो ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान दौरे में दोनों देशों के गहरे संबंधों को दोहराया था।
सोनिया का इजराइल-भारत के संबंध और विश्वसनीयता का सवाल
सोनिया ने लिखा कि हाल के सालों भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़े हैं। भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध हैं, इसलिए वह संयम की अपील कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।
सोनिया गांधी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। गल्फ वॉर यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर सका, क्योंकि उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष देश माना जाता था, न कि किसी शक्ति का प्रतिनिधि।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही जो निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता थी। मौजूदा स्थिति उस रुख के कमजोर पड़ने का संकेत देती है। यदि ईरान के मामले में संप्रभुता की अनदेखी पर भारत स्पष्ट नहीं बोलता, तो छोटे देश भविष्य में उस पर कैसे भरोसा करेंगे?
सोनिया ने संसद में बहस की मांग की
सोनिया गांधी ने कहा कि संसद की अगली बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेट किलिंग, उस पर भारत सरकार की चुप्पी और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता के सिद्धांतों का कमजोर होने के मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का विनाश और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक और नैतिक हितों से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करता रहा है, जो केवल औपचारिक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब नियम-आधारित व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
………………………….
सोनिया गांधी का यह आर्टिकल भी पढ़ें…
सोनिया बोलीं-ईरान पुराना दोस्त, भारत की चुप्पी परेशान कर रही: इजराइल के हमलों पर सरकार को मजबूती से बोलना चाहिए, अभी देर नहीं हुई
कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने ईरान पर इजराइली हमले की निंदा की थी। उन्होंने द हिंदू में एक आर्टिकल में लिखा थआ इजराइल खुद परमाणु शक्ति है, लेकिन ईरान को परमाणु हथियार न होने पर भी टारगेट किया जा रहा है। ये इजराइल का दोहरा मापदंड है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान भारत का पुराना दोस्त रहा है और ऐसे हालात में भारत की चुप्पी परेशान करने वाली है। पूरी खबर पढ़ें…
सोनिया ने कहा- वर्तमान में जारी कूटनीतिक चर्चा के बीच किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर टूट है।
कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- दिल्ली की चुप्पी हैरान करने वाली है, यह तटस्थता (न्यूट्रल) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश आर्टिकल में उन्होंने लिखा- 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड अटैक में हत्या कर दी गई। जब दो देशों की डिप्लोमैट लेवल की बातचीत चल रही हो, तब एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार को दिखाती है।
सोनिया ने लिखा कि भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। मोदी ने अमेरिका-इजराइल के हमले को अनदेखा किया, केवल यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की। बाद में पीएम ने ‘गहरी चिंता’ और ‘बातचीत व कूटनीति’ की बात कही। जबकि हमला उस समय हुआ, जब दो देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया जारी थी।
सोनिया गांधी के आर्टिकल की 5 बड़ी बातें…
1. बिना युद्ध घोषणा के हत्या
यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा और उस समय की गई, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की सीमाओं या उसकी राजनीतिक आजादी के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना गलत है। किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेट किलिंग इन नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर आवाज नहीं उठाता तो अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ सकते हैं।
2. प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा
हत्या से सिर्फ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई। यह उस समय हुआ, जब गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिक, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, मारे जाने पर दुनियाभर में नाराजगी है।
3. ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स देशों का रुख
ग्लोबल साउथ के कई देशों और ब्रिक्स के साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे समय में भारत का खुला समर्थन, बिना साफ नैतिक रुख के, गलत संदेश दे सकता है। सोनिया गांधी के अनुसार, इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में दिखेगा।
4. बमबारी और टारगेट किलिंग की निंदा
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान की जमीन पर हुई बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा करती है। ये क्षेत्र और दुनिया के लिए खतरनाक कदम है। पार्टी की ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदनाएं हैं।
5. संविधान का हवाला
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि देशों के बीच विवाद बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए, सभी देशों की बराबरी का सम्मान होना चाहिए और किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। ये सिद्धांत लंबे समय से भारत की विदेश नीति का आधार रहे हैं। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।
सोनिया ने किया- भारत और ईरान के संबंधों का जिक्र
सोनिया गांधी ने कहा कि 1994 में OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया, जिससे कश्मीर मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच सका।
ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत को कूटनीतिक मौजूदगी की अनुमति दी, जो ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान दौरे में दोनों देशों के गहरे संबंधों को दोहराया था।
सोनिया का इजराइल-भारत के संबंध और विश्वसनीयता का सवाल
सोनिया ने लिखा कि हाल के सालों भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़े हैं। भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध हैं, इसलिए वह संयम की अपील कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।
सोनिया गांधी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। गल्फ वॉर यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर सका, क्योंकि उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष देश माना जाता था, न कि किसी शक्ति का प्रतिनिधि।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही जो निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता थी। मौजूदा स्थिति उस रुख के कमजोर पड़ने का संकेत देती है। यदि ईरान के मामले में संप्रभुता की अनदेखी पर भारत स्पष्ट नहीं बोलता, तो छोटे देश भविष्य में उस पर कैसे भरोसा करेंगे?
सोनिया ने संसद में बहस की मांग की
सोनिया गांधी ने कहा कि संसद की अगली बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेट किलिंग, उस पर भारत सरकार की चुप्पी और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता के सिद्धांतों का कमजोर होने के मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का विनाश और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक और नैतिक हितों से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करता रहा है, जो केवल औपचारिक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब नियम-आधारित व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
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सोनिया गांधी का यह आर्टिकल भी पढ़ें…
सोनिया बोलीं-ईरान पुराना दोस्त, भारत की चुप्पी परेशान कर रही: इजराइल के हमलों पर सरकार को मजबूती से बोलना चाहिए, अभी देर नहीं हुई
कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने ईरान पर इजराइली हमले की निंदा की थी। उन्होंने द हिंदू में एक आर्टिकल में लिखा थआ इजराइल खुद परमाणु शक्ति है, लेकिन ईरान को परमाणु हथियार न होने पर भी टारगेट किया जा रहा है। ये इजराइल का दोहरा मापदंड है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान भारत का पुराना दोस्त रहा है और ऐसे हालात में भारत की चुप्पी परेशान करने वाली है। पूरी खबर पढ़ें…
दैनिक पंचांग
Indias Silence on Khameneis Death Criticized by Sonia Gandhi
नई दिल्ली1 दिन पहले
सोनिया ने कहा- वर्तमान में जारी कूटनीतिक चर्चा के बीच किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर टूट है।
कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- दिल्ली की चुप्पी हैरान करने वाली है, यह तटस्थता (न्यूट्रल) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश आर्टिकल में उन्होंने लिखा- 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड अटैक में हत्या कर दी गई। जब दो देशों की डिप्लोमैट लेवल की बातचीत चल रही हो, तब एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार को दिखाती है।
सोनिया ने लिखा कि भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। मोदी ने अमेरिका-इजराइल के हमले को अनदेखा किया, केवल यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की। बाद में पीएम ने ‘गहरी चिंता’ और ‘बातचीत व कूटनीति’ की बात कही। जबकि हमला उस समय हुआ, जब दो देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया जारी थी।
सोनिया गांधी के आर्टिकल की 5 बड़ी बातें…
1. बिना युद्ध घोषणा के हत्या
यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा और उस समय की गई, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की सीमाओं या उसकी राजनीतिक आजादी के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना गलत है। किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेट किलिंग इन नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर आवाज नहीं उठाता तो अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ सकते हैं।
2. प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा
हत्या से सिर्फ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई। यह उस समय हुआ, जब गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिक, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, मारे जाने पर दुनियाभर में नाराजगी है।
3. ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स देशों का रुख
ग्लोबल साउथ के कई देशों और ब्रिक्स के साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे समय में भारत का खुला समर्थन, बिना साफ नैतिक रुख के, गलत संदेश दे सकता है। सोनिया गांधी के अनुसार, इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में दिखेगा।
4. बमबारी और टारगेट किलिंग की निंदा
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान की जमीन पर हुई बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा करती है। ये क्षेत्र और दुनिया के लिए खतरनाक कदम है। पार्टी की ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदनाएं हैं।
5. संविधान का हवाला
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि देशों के बीच विवाद बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए, सभी देशों की बराबरी का सम्मान होना चाहिए और किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। ये सिद्धांत लंबे समय से भारत की विदेश नीति का आधार रहे हैं। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।
सोनिया ने किया- भारत और ईरान के संबंधों का जिक्र
सोनिया गांधी ने कहा कि 1994 में OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया, जिससे कश्मीर मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच सका।
ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत को कूटनीतिक मौजूदगी की अनुमति दी, जो ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान दौरे में दोनों देशों के गहरे संबंधों को दोहराया था।
सोनिया का इजराइल-भारत के संबंध और विश्वसनीयता का सवाल
सोनिया ने लिखा कि हाल के सालों भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़े हैं। भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध हैं, इसलिए वह संयम की अपील कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।
सोनिया गांधी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। गल्फ वॉर यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर सका, क्योंकि उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष देश माना जाता था, न कि किसी शक्ति का प्रतिनिधि।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही जो निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता थी। मौजूदा स्थिति उस रुख के कमजोर पड़ने का संकेत देती है। यदि ईरान के मामले में संप्रभुता की अनदेखी पर भारत स्पष्ट नहीं बोलता, तो छोटे देश भविष्य में उस पर कैसे भरोसा करेंगे?
सोनिया ने संसद में बहस की मांग की
सोनिया गांधी ने कहा कि संसद की अगली बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेट किलिंग, उस पर भारत सरकार की चुप्पी और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता के सिद्धांतों का कमजोर होने के मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का विनाश और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक और नैतिक हितों से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करता रहा है, जो केवल औपचारिक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब नियम-आधारित व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
………………………….
सोनिया गांधी का यह आर्टिकल भी पढ़ें…
सोनिया बोलीं-ईरान पुराना दोस्त, भारत की चुप्पी परेशान कर रही: इजराइल के हमलों पर सरकार को मजबूती से बोलना चाहिए, अभी देर नहीं हुई
कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने ईरान पर इजराइली हमले की निंदा की थी। उन्होंने द हिंदू में एक आर्टिकल में लिखा थआ इजराइल खुद परमाणु शक्ति है, लेकिन ईरान को परमाणु हथियार न होने पर भी टारगेट किया जा रहा है। ये इजराइल का दोहरा मापदंड है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान भारत का पुराना दोस्त रहा है और ऐसे हालात में भारत की चुप्पी परेशान करने वाली है। पूरी खबर पढ़ें…
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नई दिल्ली1 दिन पहले
सोनिया ने कहा- वर्तमान में जारी कूटनीतिक चर्चा के बीच किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर टूट है।
कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- दिल्ली की चुप्पी हैरान करने वाली है, यह तटस्थता (न्यूट्रल) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश आर्टिकल में उन्होंने लिखा- 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड अटैक में हत्या कर दी गई। जब दो देशों की डिप्लोमैट लेवल की बातचीत चल रही हो, तब एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार को दिखाती है।
सोनिया ने लिखा कि भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। मोदी ने अमेरिका-इजराइल के हमले को अनदेखा किया, केवल यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की। बाद में पीएम ने ‘गहरी चिंता’ और ‘बातचीत व कूटनीति’ की बात कही। जबकि हमला उस समय हुआ, जब दो देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया जारी थी।
सोनिया गांधी के आर्टिकल की 5 बड़ी बातें…
1. बिना युद्ध घोषणा के हत्या
यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा और उस समय की गई, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की सीमाओं या उसकी राजनीतिक आजादी के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना गलत है। किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेट किलिंग इन नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर आवाज नहीं उठाता तो अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ सकते हैं।
2. प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा
हत्या से सिर्फ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई। यह उस समय हुआ, जब गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिक, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, मारे जाने पर दुनियाभर में नाराजगी है।
3. ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स देशों का रुख
ग्लोबल साउथ के कई देशों और ब्रिक्स के साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे समय में भारत का खुला समर्थन, बिना साफ नैतिक रुख के, गलत संदेश दे सकता है। सोनिया गांधी के अनुसार, इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में दिखेगा।
4. बमबारी और टारगेट किलिंग की निंदा
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान की जमीन पर हुई बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा करती है। ये क्षेत्र और दुनिया के लिए खतरनाक कदम है। पार्टी की ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदनाएं हैं।
5. संविधान का हवाला
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि देशों के बीच विवाद बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए, सभी देशों की बराबरी का सम्मान होना चाहिए और किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। ये सिद्धांत लंबे समय से भारत की विदेश नीति का आधार रहे हैं। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।
सोनिया ने किया- भारत और ईरान के संबंधों का जिक्र
सोनिया गांधी ने कहा कि 1994 में OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया, जिससे कश्मीर मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच सका।
ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत को कूटनीतिक मौजूदगी की अनुमति दी, जो ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान दौरे में दोनों देशों के गहरे संबंधों को दोहराया था।
सोनिया का इजराइल-भारत के संबंध और विश्वसनीयता का सवाल
सोनिया ने लिखा कि हाल के सालों भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़े हैं। भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध हैं, इसलिए वह संयम की अपील कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।
सोनिया गांधी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। गल्फ वॉर यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर सका, क्योंकि उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष देश माना जाता था, न कि किसी शक्ति का प्रतिनिधि।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही जो निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता थी। मौजूदा स्थिति उस रुख के कमजोर पड़ने का संकेत देती है। यदि ईरान के मामले में संप्रभुता की अनदेखी पर भारत स्पष्ट नहीं बोलता, तो छोटे देश भविष्य में उस पर कैसे भरोसा करेंगे?
सोनिया ने संसद में बहस की मांग की
सोनिया गांधी ने कहा कि संसद की अगली बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेट किलिंग, उस पर भारत सरकार की चुप्पी और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता के सिद्धांतों का कमजोर होने के मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का विनाश और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक और नैतिक हितों से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करता रहा है, जो केवल औपचारिक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब नियम-आधारित व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
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