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Mini Brazil Shahdol Dreams FIFA World Cup 2026 Win for Brazil

Mini Brazil Shahdol Dreams FIFA World Cup 2026 Win for Brazil

फीफा विश्व कप 2026 की शुरुआत 11 जून से हो गई है, जिसे लेकर दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह है। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में होने वाले इस महाकुंभ पर करोड़ों निगाहें टिकी हैं।

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इस वैश्विक रोमांच के बीच मध्य प्रदेश के शहडोल जिले का ‘मिनी ब्राजील’ गांव विचारपुर भी फुटबॉल के रंग में रंग चुका है। विश्व कप शुरू होने से पहले ही विचारपुर के मैदानों में रौनक बढ़ गई है।

गांव के बच्चे और युवा खिलाड़ी अपने पसंदीदा खिलाड़ियों और टीमों पर चर्चा करते नजर आ रहे हैं। यहां के अधिकांश खिलाड़ी ब्राजील का समर्थन करते हैं और उन्हें ही फीफा का विश्वविजेता देखना चाहते हैं।

वहीं टीम इंडिया का फीफा तक नहीं पहुंच पाना भी उनके लिए निराशा का विषय है। मिनी ब्राजील के मैदान में फुटबॉल खेल रहे बच्चों का कहना है कि हम आने वाले समय में टीम इंडिया को फीफा तक पहुंचाएंगे।

मैदान में खेल रहे कुछ युवा अर्जेंटीना और लियोनेल मेसी के प्रशंसक भी हैं। लेकिन इस उत्साह के बीच एक सवाल भी बार-बार उठता है जब दुनिया फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर उतर रही है, तब भारत अब तक वहां क्यों नहीं पहुंच पाया?

दैनिक भास्कर की टीम ने गांव के युवा खिलाड़ियों से बात की। पढ़िए यह रिपोर्ट…

क्यों कहा जाता है विचारपुर को मिनी ब्राजील?

शहडोल मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित विचारपुर गांव में फुटबॉल केवल खेल नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा है। गांव के अधिकांश घरों में कोई न कोई खिलाड़ी फुटबॉल से जुड़ा हुआ है। यहां बच्चे चलना सीखने के साथ फुटबॉल को भी अपनाने लगते हैं।

वर्षों पहले गांव के युवाओं ने फुटबॉल को अपनी पहचान बनाया। धीरे-धीरे यहां से कई खिलाड़ी जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। महिला खिलाड़ियों ने भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। गांव में फुटबॉल के प्रति इसी जुनून ने इसे “मिनी ब्राजील” की पहचान दिलाई।

पीएम मोदी ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान

विचारपुर को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 में अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में गांव का उल्लेख किया था। पीएम ने गांव की फुटबॉल संस्कृति और यहां के खिलाड़ियों की सराहना की थी। इसके बाद विचारपुर अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया।

प्रधानमंत्री के उल्लेख के बाद कई प्रशासनिक और खेल विभाग के अधिकारी गांव पहुंचे। गांव की पहचान एक फुटबॉल हब के रूप में बनी और यहां के खिलाड़ियों को राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर बढ़े। देशभर के मीडिया संस्थानों ने भी गांव की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बोलीं- फीफा से सीखने का अवसर

जर्मनी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी खिलाड़ी सानिया कुंडे कहती हैं कि फीफा विश्व कप उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए सीखने का सबसे बड़ा मंच है।

सानिया कहती हैं, “हम लोग सभी मैच देखेंगे। जो खिलाड़ी हमारी पोजीशन पर खेलते हैं, उन्हें देखकर नई तकनीक सीखने को मिलती है। ऐसे कई शॉट्स और मूवमेंट देखने को मिलते हैं जिन्हें सीखने के लिए बहुत उच्च स्तरीय अभ्यास की जरूरत होती है। हम सब ब्राजील को सपोर्ट करेंगे। हमारी कोशिश है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में खेले।”

उनका कहना है कि विश्व कप केवल मनोरंजन नहीं बल्कि प्रशिक्षण का भी माध्यम है। यहां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी और कोच अपनी रणनीतियों का प्रदर्शन करते हैं, जिससे युवा खिलाड़ियों को खेल की बारीकियां समझने में मदद मिलती है।

फीफा हमारे लिए खुली किताब

वहीं महिला फुटबॉल टीम की कोच लक्ष्मी सहीश खिलाड़ियों को हर विश्व कप मैच देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। वह कहतीं हैं-

“फीफा देखने से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का खेल समझने का मौका मिलता है। उनके गेम प्लान, पासिंग, गोल मूवमेंट और रणनीतियों का अध्ययन करके बच्चे बहुत कुछ सीख सकते हैं। मैं खिलाड़ियों से कहती हूं कि सिर्फ मैच मत देखो, उसे समझो और विश्लेषण करो। जो चीज अच्छी लगे, उसे अपने खेल में उतारने की कोशिश करो।”

लक्ष्मी स्वयं लियोनेल मेसी की प्रशंसक हैं। उनका कहना है कि पिछली बार अर्जेंटीना ने खिताब जीता था और इस बार भी वे मेसी की टीम को समर्थन देंगी।

वर्ल्ड कप में भारत के नहीं पहुंचने का अफसोस

विचारपुर के खिलाड़ियों के बीच फीफा को लेकर जितना उत्साह है, उतना ही अफसोस इस बात का भी है कि भारत की टीम इस टूर्नामेंट का हिस्सा नहीं है। वर्तमान में भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम विश्व फुटबॉल की शीर्ष टीमों से काफी पीछे है।

जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, ऑस्ट्रेलिया और सऊदी अरब जैसी एशियाई टीमें लगातार विश्व कप में पहुंच रही हैं, जबकि भारत 2026 विश्व कप क्वालिफायर के दूसरे चरण से आगे नहीं बढ़ सका। खिलाड़ियों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं।

देश में फुटबॉल का आधारभूत ढांचा अभी भी सीमित है। गांवों और छोटे शहरों में गुणवत्तापूर्ण मैदान, प्रशिक्षित कोच, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं और स्पोर्ट्स साइंस का अभाव है। क्रिकेट की तुलना में फुटबॉल को कम आर्थिक सहायता और कम प्रायोजन मिलता है। परिणामस्वरूप अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी शुरुआती स्तर पर ही खेल छोड़ देते हैं।

कोच लक्ष्मी ने बताया कि भारत 1950 के फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कर चुका था, लेकिन विभिन्न कारणों से टीम टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी। इसके बाद भारत कभी भी विश्व कप के मुख्य दौर तक नहीं पहुंच पाया।

सानिया कुंडे कहती हैं-

“हम लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं। आज हम फीफा देखकर सीख रहे हैं, लेकिन हमारा सपना है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में उतरे और दुनिया हमारे खिलाड़ियों को भी उसी तरह देखे, जैसे हम आज बड़े खिलाड़ियों को देखते हैं।”

पहचान मिली, सुविधाएं अब भी अधूरी

विचारपुर को राष्ट्रीय पहचान तो मिल गई, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी चुनौतियों से भरी है। गांव के खिलाड़ियों का कहना है कि आज भी उन्हें समतल और विकसित खेल मैदान उपलब्ध नहीं है।

बरसात के दौरान मैदान की स्थिति और खराब हो जाती है। कई बार खिलाड़ियों को निजी संसाधनों के सहारे अभ्यास करना पड़ता है। खिलाड़ियों और ग्रामीणों ने बताया कि गांव में भी कई मूलभूत सुविधाओं की कमी है।

नियमित रूप से फुटबॉल उपलब्ध नहीं हो पाती। खिलाड़ियों को पर्याप्त संख्या में जूते और खेल ड्रेस नहीं मिलती। मैदान की बाउंड्रीवाल का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव है। खिलाड़ियों के लिए नियमित फिटनेस और तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इन सुविधाओं का विकास हो जाए तो विचारपुर देश को और अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दे सकता है। विश्व कप का इंतजार, सपनों की उड़ान

शाम ढलते ही विचारपुर के मैदान में बच्चों की आवाजें गूंजने लगती हैं। कोई नेमार की तरह खेलने का सपना देखता है, कोई मेसी जैसा बनना चाहता है और कोई भारत की जर्सी पहनकर विश्व कप खेलने का सपना संजोए हुए है।

विश्व कप शुरू होने के साथ गांव में मैच देखने की विशेष तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। खिलाड़ी और ग्रामीण सामूहिक रूप से मैच देखने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है कि हर मैच उन्हें कुछ नया सिखाएगा।

यह खबर भी पढ़ें…

मिनी ब्राजील में 4 पीढ़ियां फुटबॉलर, 5 बच्चे जाएंगे जर्मनी:शहडोल के प्लेयर्स को विदेशी कोच देंगे ट्रेनिंग; मां बोलीं- हम खुश, बेटा हवाईजहाज में बैठेगा

मध्य प्रदेश के ‘मिनी ब्राजील’ कहे जाने वाले विचारपुर गांव के 5 खिलाड़ी जर्मनी में फुटबॉल की ट्रेनिंग लेंगे। 2 अक्टूबर को ये सभी भोपाल से दिल्ली के लिए रवाना होंगे और वहां से जर्मनी जाएंगे। इनके साथ महिला कोच भी रहेंगी। जो खिलाड़ी सिलेक्ट हुए हैं, उनमें 3 लड़के और 2 लड़कियां शामिल हैं। पढ़ें पूरी खबर

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पीएम बोले- शहडोल का विचारपुर भारत का मिनी ब्राजील:मोदी ने अमेरिकन पॉडकास्टर से कहा-आदिवासी गांव में 4 पीढ़ियों से निकल रहे फुटबॉल प्लेयर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पॉडकास्टर लेक्स फ्रिडमैन के साथ बातचीत के दौरान मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की अपनी यात्रा को याद किया। उन्होंने बताया कि वहां उन्होंने करीब 80 से 100 बच्चों और युवाओं को स्पोर्ट्स कपड़ों में देखा। जब उन्होंने उनसे पूछा कि वे कहां से हैं, तो बच्चों ने जवाब दिया- ‘मिनी ब्राजील’ से हैं। पढ़ें पूरी खबर

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फीफा विश्व कप 2026 की शुरुआत 11 जून से हो गई है, जिसे लेकर दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह है। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में होने वाले इस महाकुंभ पर करोड़ों निगाहें टिकी हैं।

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इस वैश्विक रोमांच के बीच मध्य प्रदेश के शहडोल जिले का ‘मिनी ब्राजील’ गांव विचारपुर भी फुटबॉल के रंग में रंग चुका है। विश्व कप शुरू होने से पहले ही विचारपुर के मैदानों में रौनक बढ़ गई है।

गांव के बच्चे और युवा खिलाड़ी अपने पसंदीदा खिलाड़ियों और टीमों पर चर्चा करते नजर आ रहे हैं। यहां के अधिकांश खिलाड़ी ब्राजील का समर्थन करते हैं और उन्हें ही फीफा का विश्वविजेता देखना चाहते हैं।

वहीं टीम इंडिया का फीफा तक नहीं पहुंच पाना भी उनके लिए निराशा का विषय है। मिनी ब्राजील के मैदान में फुटबॉल खेल रहे बच्चों का कहना है कि हम आने वाले समय में टीम इंडिया को फीफा तक पहुंचाएंगे।

मैदान में खेल रहे कुछ युवा अर्जेंटीना और लियोनेल मेसी के प्रशंसक भी हैं। लेकिन इस उत्साह के बीच एक सवाल भी बार-बार उठता है जब दुनिया फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर उतर रही है, तब भारत अब तक वहां क्यों नहीं पहुंच पाया?

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क्यों कहा जाता है विचारपुर को मिनी ब्राजील?

शहडोल मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित विचारपुर गांव में फुटबॉल केवल खेल नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा है। गांव के अधिकांश घरों में कोई न कोई खिलाड़ी फुटबॉल से जुड़ा हुआ है। यहां बच्चे चलना सीखने के साथ फुटबॉल को भी अपनाने लगते हैं।

वर्षों पहले गांव के युवाओं ने फुटबॉल को अपनी पहचान बनाया। धीरे-धीरे यहां से कई खिलाड़ी जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। महिला खिलाड़ियों ने भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। गांव में फुटबॉल के प्रति इसी जुनून ने इसे “मिनी ब्राजील” की पहचान दिलाई।

पीएम मोदी ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान

विचारपुर को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 में अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में गांव का उल्लेख किया था। पीएम ने गांव की फुटबॉल संस्कृति और यहां के खिलाड़ियों की सराहना की थी। इसके बाद विचारपुर अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया।

प्रधानमंत्री के उल्लेख के बाद कई प्रशासनिक और खेल विभाग के अधिकारी गांव पहुंचे। गांव की पहचान एक फुटबॉल हब के रूप में बनी और यहां के खिलाड़ियों को राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर बढ़े। देशभर के मीडिया संस्थानों ने भी गांव की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बोलीं- फीफा से सीखने का अवसर

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सानिया कहती हैं, “हम लोग सभी मैच देखेंगे। जो खिलाड़ी हमारी पोजीशन पर खेलते हैं, उन्हें देखकर नई तकनीक सीखने को मिलती है। ऐसे कई शॉट्स और मूवमेंट देखने को मिलते हैं जिन्हें सीखने के लिए बहुत उच्च स्तरीय अभ्यास की जरूरत होती है। हम सब ब्राजील को सपोर्ट करेंगे। हमारी कोशिश है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में खेले।”

उनका कहना है कि विश्व कप केवल मनोरंजन नहीं बल्कि प्रशिक्षण का भी माध्यम है। यहां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी और कोच अपनी रणनीतियों का प्रदर्शन करते हैं, जिससे युवा खिलाड़ियों को खेल की बारीकियां समझने में मदद मिलती है।

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वहीं महिला फुटबॉल टीम की कोच लक्ष्मी सहीश खिलाड़ियों को हर विश्व कप मैच देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। वह कहतीं हैं-

“फीफा देखने से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का खेल समझने का मौका मिलता है। उनके गेम प्लान, पासिंग, गोल मूवमेंट और रणनीतियों का अध्ययन करके बच्चे बहुत कुछ सीख सकते हैं। मैं खिलाड़ियों से कहती हूं कि सिर्फ मैच मत देखो, उसे समझो और विश्लेषण करो। जो चीज अच्छी लगे, उसे अपने खेल में उतारने की कोशिश करो।”

लक्ष्मी स्वयं लियोनेल मेसी की प्रशंसक हैं। उनका कहना है कि पिछली बार अर्जेंटीना ने खिताब जीता था और इस बार भी वे मेसी की टीम को समर्थन देंगी।

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विचारपुर के खिलाड़ियों के बीच फीफा को लेकर जितना उत्साह है, उतना ही अफसोस इस बात का भी है कि भारत की टीम इस टूर्नामेंट का हिस्सा नहीं है। वर्तमान में भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम विश्व फुटबॉल की शीर्ष टीमों से काफी पीछे है।

जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, ऑस्ट्रेलिया और सऊदी अरब जैसी एशियाई टीमें लगातार विश्व कप में पहुंच रही हैं, जबकि भारत 2026 विश्व कप क्वालिफायर के दूसरे चरण से आगे नहीं बढ़ सका। खिलाड़ियों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं।

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कोच लक्ष्मी ने बताया कि भारत 1950 के फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कर चुका था, लेकिन विभिन्न कारणों से टीम टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी। इसके बाद भारत कभी भी विश्व कप के मुख्य दौर तक नहीं पहुंच पाया।

सानिया कुंडे कहती हैं-

“हम लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं। आज हम फीफा देखकर सीख रहे हैं, लेकिन हमारा सपना है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में उतरे और दुनिया हमारे खिलाड़ियों को भी उसी तरह देखे, जैसे हम आज बड़े खिलाड़ियों को देखते हैं।”

पहचान मिली, सुविधाएं अब भी अधूरी

विचारपुर को राष्ट्रीय पहचान तो मिल गई, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी चुनौतियों से भरी है। गांव के खिलाड़ियों का कहना है कि आज भी उन्हें समतल और विकसित खेल मैदान उपलब्ध नहीं है।

बरसात के दौरान मैदान की स्थिति और खराब हो जाती है। कई बार खिलाड़ियों को निजी संसाधनों के सहारे अभ्यास करना पड़ता है। खिलाड़ियों और ग्रामीणों ने बताया कि गांव में भी कई मूलभूत सुविधाओं की कमी है।

नियमित रूप से फुटबॉल उपलब्ध नहीं हो पाती। खिलाड़ियों को पर्याप्त संख्या में जूते और खेल ड्रेस नहीं मिलती। मैदान की बाउंड्रीवाल का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव है। खिलाड़ियों के लिए नियमित फिटनेस और तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इन सुविधाओं का विकास हो जाए तो विचारपुर देश को और अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दे सकता है। विश्व कप का इंतजार, सपनों की उड़ान

शाम ढलते ही विचारपुर के मैदान में बच्चों की आवाजें गूंजने लगती हैं। कोई नेमार की तरह खेलने का सपना देखता है, कोई मेसी जैसा बनना चाहता है और कोई भारत की जर्सी पहनकर विश्व कप खेलने का सपना संजोए हुए है।

विश्व कप शुरू होने के साथ गांव में मैच देखने की विशेष तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। खिलाड़ी और ग्रामीण सामूहिक रूप से मैच देखने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है कि हर मैच उन्हें कुछ नया सिखाएगा।

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