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Ramandeeps Struggle: Actor Gets Big Break After Mumbai Woes

Ramandeeps Struggle: Actor Gets Big Break After Mumbai Woes

10 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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वेब सीरीज ‘राख’ में रज्जो के किरदार से चर्चा बटोर रहे अभिनेता रमनदीप यादव का यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। कभी उनका सपना भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना था, लेकिन किस्मत उन्हें थिएटर और फिर एक्टिंग में ले आई। उन्होंने मुंबई में चार साल तक ऑडिशन दिए, आर्थिक तंगी झेली और कई बार शहर छोड़ने का मन भी बनाया, लेकिन हार नहीं मानी।

आखिरकार ‘राख’ ने उन्हें वह पहचान दिलाई, जिसका वह लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने संघर्ष, रिजेक्शन, थिएटर, ‘राख’ और रज्जो की तैयारी पर बात करते हुए बताया कि कई लोग कहते हैं कि अगर हमारे आस पास होते तो पक्का मार देते।

रमनदीप यादव का सपना भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना था।

रमनदीप यादव का सपना भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना था।

सवाल: आपने क्रिकेट भी खेला है। फिर अचानक एक्टिंग की तरफ कैसे रुख हुआ?

जवाब: सच कहूं तो आज भी मैं पूरी तरह नहीं समझ पाया कि ऐसा क्यों हुआ। मेरा सपना भारत के लिए क्रिकेट खेलना था। कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टिंग करूंगा। ऐसा कोई एक दिन या घटना नहीं हुई, जिसके बाद मैंने क्रिकेट छोड़ने का फैसला लिया हो। धीरे-धीरे लगा कि चीजें वैसी नहीं हो रही थीं जैसी मैं चाहता था। मेहनत के बावजूद मन नहीं लग रहा था। शायद भगवान ने मेरे लिए कुछ और सोच रखा था।

कॉलेज के आखिरी साल में एक दोस्त ने कहा कि यूथ फेस्टिवल के लिए ऑडिशन हो रहे हैं, चलो ट्राई करते हैं। मैंने बिना ज्यादा सोचे ऑडिशन दिया और पहली बार में ही चयन हो गया। पहली बार स्टेज पर परफॉर्म किया और वहीं एहसास हुआ कि मुझे इसमें बहुत मजा आ रहा है। उस अनुभव ने मेरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

सवाल: थिएटर तक पहुंचने का सफर कैसे शुरू हुआ?

जवाब: यूथ फेस्टिवल में मेरी परफॉर्मेंस देखकर थिएटर टीचर ने कहा कि मुझे उनके थिएटर ग्रुप से जुड़ जाना चाहिए। मैंने कहा कि फीस देने की मेरी हैसियत नहीं है। उस समय 1500-2000 रुपए फीस थी और मैं घरवालों से थिएटर सीखने के लिए पैसे नहीं मांग सकता था। उन्होंने कहा कि तुम आ जाओ, फीस की चिंता मत करो।

शुरुआत में मैंने नुक्कड़ नाटक किए। जागरूकता अभियान के तहत कई स्ट्रीट प्ले किए। मुझे पता नहीं था कि इसके पैसे मिलेंगे। पहला चेक 2500 रुपए का मिला। उसी पैसे से थिएटर की फीस भरी और 500 रुपए बच गए। तब लगा कि एक्टिंग से कमाई भी हो सकती है।

सवाल: क्या उस समय तय कर लिया था कि अब एक्टिंग ही करनी है?

जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। उस समय मैं सुबह क्रिकेट की प्रैक्टिस करता था और शाम को थिएटर करता था। दोनों साथ लेकर चलना चाहता था, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि थिएटर भी उतनी ही मेहनत और समर्पण मांगता है जितना क्रिकेट।

क्रिकेट में अनुशासन तय होता है, लेकिन एक्टिंग में खुद अपना अनुशासन बनाना पड़ता है। किताबें पढ़नी होती हैं, लोगों को ऑब्जर्व करना होता है, कविताएं पढ़नी होती हैं, संगीत सुनना होता है, पेंटिंग देखनी होती है और इंसानी व्यवहार को समझना पड़ता है।

करीब डेढ़-दो साल बाद मुझे यकीन हुआ कि अब एक्टिंग में ही आगे बढ़ना है।

सवाल: क्या आपने किसी एक्टिंग स्कूल में जाने की भी कोशिश की?

जवाब: हां। मैंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) का ऑडिशन दिया, लेकिन चयन नहीं हुआ। इसके बाद दूसरे ड्रामा स्कूलों में भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि मैंने हार नहीं मानी। थिएटर करता रहा और साथ-साथ ऑडिशन भी देता रहा।

सवाल: पहला ब्रेक कैसे मिला?

जवाब: मेरा पहला प्रोजेक्ट अनुराग कश्यप सर की फिल्म ‘मनमर्जियां’ थी। इसके बाद एमएक्स प्लेयर की सीरीज ‘कैंपस डायरीज’ मिली, जिसमें मैंने पृथ्वीराज का किरदार निभाया। इस सीरीज के बाद इंडस्ट्री में लोग मुझे पहचानने लगे और ऑडिशन मिलने शुरू हो गए।

सवाल: नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘कैट’आपको कैसे मिली?

जवाब: उस समय मैं ‘कैंपस डायरीज’ की शूटिंग कर रहा था। तभी मुझे ‘कैट‘ का ऑडिशन मिला। इसमें मुझे सरदार का किरदार निभाना था, लेकिन पगड़ी बांधनी तक नहीं आती थी। मैं शूट खत्म करके सीधे दोस्त के घर गया। उसने रातभर मेरी मदद की, पगड़ी बांधी और हमने ऑडिशन रिकॉर्ड किया।

बाद में मुझे डायरेक्टर से मिलने के लिए अमृतसर बुलाया गया। मैं पहली बार पगड़ी बांधकर ट्रेन से गया। पूरी यात्रा में गर्दन तक नहीं हिलाई, क्योंकि डर था कि पगड़ी खराब न हो जाए। आज सोचता हूं कि पगड़ी पहनकर जाना सही फैसला था। शायद उसी वजह से डायरेक्टर को मेरे लुक पर दोबारा सोचने की जरूरत नहीं पड़ी।

सवाल: ‘कैट’ के बाद आपने चंडीगढ़ से मुंबई आने का फैसला कैसे लिया?

जवाब: ‘कैट’ में काम करने के बाद मुझे थोड़ा आर्थिक सहारा मिला। तब लगा कि अब मुंबई जाकर किस्मत आजमानी चाहिए। मैं कास्टिंग डायरेक्टर्स से मिलकर उन्हें बताना चाहता था कि मैंने ‘CAT’ में काम किया है। मैं शो रिलीज होने से करीब तीन महीने पहले ही मुंबई आ गया था।

‘कैट’ रिलीज होने के बाद लोगों ने मेरा काम पसंद किया। जिन कास्टिंग डायरेक्टर्स से मैं पहले मिल चुका था, उन्हें मेरा चेहरा याद आ गया। इसके बाद ऑडिशन मिलने लगे। पहले मुझे खुद जाकर बताना पड़ता था कि मैं एक्टर हूं, लेकिन अब लोग मेरे काम से परिचित थे।

हालांकि ऑडिशन मिल रहे थे, लेकिन कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं मिल रहा था। कई बार मैं आखिरी दौर तक पहुंचा, लेकिन रोल किसी और को मिल गया। देखते-देखते चार साल निकल गए।

सवाल: इन चार सालों का संघर्ष कितना मुश्किल था?

जवाब: बहुत मुश्किल था। जो पैसे लेकर मुंबई आया था, वे करीब छह महीने में खत्म हो गए। इसके बाद मैंने थिएटर किया, वर्कशॉप्स लीं और जितना काम मिला, करता रहा। कमाई नहीं होती थी, तो खर्च कम कर दिए। मैंने सादा जीवन जीना शुरू कर दिया। कोशिश यही थी कि किसी तरह मुंबई में टिके रहूं।

मैं वर्सोवा में रहता था। कई बार लगा कि यह शहर छोड़ना पड़े। एक्टिंग छोड़ने का कभी मन नहीं हुआ, लेकिन लगा कि कुछ समय के लिए चंडीगढ़ जाकर पैसे जुटा लूं और फिर लौटूं।

'राख' अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। इसमें रमनदीप यादव ने रज्जो का किरदार निभाया है।

‘राख’ अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। इसमें रमनदीप यादव ने रज्जो का किरदार निभाया है।

सवाल: फिर ‘राख’ कैसे मिली?

जवाब: मैं कुछ दिनों के लिए चंडीगढ़ गया था। तभी ‘राख’ के ऑडिशन का कॉल आया। खास बात यह थी कि ऑडिशन उसी कास्टिंग टीम ने भेजा था, जिसने मुझे चार साल पहले ‘CAT’ के लिए चुना था। मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि इतने साल बाद भी उन्हें मैं याद था और उन्होंने लीड किरदार के लिए मेरा टेस्ट किया।

उस वक्त लगा कि शायद भगवान मुझे एक और मौका दे रहे हैं। मैंने खुद से कहा कि अब बीच का रास्ता नहीं अपनाना है। इस मौके के लिए पूरी ताकत लगा दूंगा। पूरी ईमानदारी से तैयारी की और आखिरकार यह रोल मिल गया।

सवाल: ‘रज्जो’ जैसा खतरनाक किरदार निभाने की तैयारी कैसे की?

जवाब: जब मैंने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मैं भावुक हो गया। कहानी इतनी गहरी और क्रूर थी कि पढ़ते-पढ़ते ही उसका असर महसूस होने लगा। इसके बाद मैंने रमनदीप को अलग रख दिया और सिर्फ रज्जो के बारे में सोचना शुरू किया। मैं चाहता था कि रज्जो की चाल, आवाज, सोच, आदतें और व्यवहार अलग हो।

थिएटर की वजह से मुझे किरदार तैयार करने की आदत है। मैं सिर्फ डायलॉग याद नहीं करता, बल्कि यह भी सोचता हूं कि वह क्या खाता होगा, कैसे चलता होगा, किस तरह बात करता होगा और दुनिया को किस नजर से देखता होगा। खुशकिस्मती से इस शो के लिए 12 दिन की एक्टिंग वर्कशॉप मिली। उससे किरदार को समझने में काफी मदद मिली।

सवाल: शूटिंग के दौरान सबसे मुश्किल सीन कौन-सा था?

जवाब: दो सीन मेरे लिए सबसे मुश्किल थे। पहला वह, जिसमें रज्जो साहिल को पहली बार मारता है। उस दिन मैं पूरी तरह किरदार में डूब चुका था। कई टेक देने के बाद सच में ऐसा लग रहा था जैसे मैंने किसी को मार दिया हो। आधे दिन तक सेट पर होकर भी खुद में नहीं था।

दूसरा सीन वह था, जब रज्जो साहिल की बॉडी ठिकाने लगाने जाता है। वहां भी मैं पूरी तरह किरदार की मानसिक स्थिति में था। मेरी कोशिश थी कि रज्जो सिर्फ खलनायक न लगे। मैं चाहता था कि दर्शक उसके अंदर का इंसान भी देखें। वह गलत इंसान है, लेकिन उसके फैसलों के पीछे भी एक मानसिकता है। मैंने उसी सोच के साथ यह किरदार निभाया।

सवाल: ‘राख’ रिलीज होने के बाद दर्शकों से किस तरह का रिस्पॉन्स मिल रहा है?

जवाब: दर्शकों का रिस्पॉन्स उम्मीद से बेहतर मिला है। लोग कहते हैं कि मैंने किरदार बहुत अच्छी तरह निभाया है। कई लोग यह भी कहते हैं कि अगर हमारे आस पास होते तो पक्का मार देते। मेरे लिए यह सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट है, क्योंकि इसका मतलब है कि लोग मेरे किरदार से नफरत कर रहे हैं। यानी मैंने अपना काम ईमानदारी से किया है।

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आखिरकार ‘राख’ ने उन्हें वह पहचान दिलाई, जिसका वह लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने संघर्ष, रिजेक्शन, थिएटर, ‘राख’ और रज्जो की तैयारी पर बात करते हुए बताया कि कई लोग कहते हैं कि अगर हमारे आस पास होते तो पक्का मार देते।

रमनदीप यादव का सपना भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना था।

रमनदीप यादव का सपना भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना था।

सवाल: आपने क्रिकेट भी खेला है। फिर अचानक एक्टिंग की तरफ कैसे रुख हुआ?

जवाब: सच कहूं तो आज भी मैं पूरी तरह नहीं समझ पाया कि ऐसा क्यों हुआ। मेरा सपना भारत के लिए क्रिकेट खेलना था। कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टिंग करूंगा। ऐसा कोई एक दिन या घटना नहीं हुई, जिसके बाद मैंने क्रिकेट छोड़ने का फैसला लिया हो। धीरे-धीरे लगा कि चीजें वैसी नहीं हो रही थीं जैसी मैं चाहता था। मेहनत के बावजूद मन नहीं लग रहा था। शायद भगवान ने मेरे लिए कुछ और सोच रखा था।

कॉलेज के आखिरी साल में एक दोस्त ने कहा कि यूथ फेस्टिवल के लिए ऑडिशन हो रहे हैं, चलो ट्राई करते हैं। मैंने बिना ज्यादा सोचे ऑडिशन दिया और पहली बार में ही चयन हो गया। पहली बार स्टेज पर परफॉर्म किया और वहीं एहसास हुआ कि मुझे इसमें बहुत मजा आ रहा है। उस अनुभव ने मेरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

सवाल: थिएटर तक पहुंचने का सफर कैसे शुरू हुआ?

जवाब: यूथ फेस्टिवल में मेरी परफॉर्मेंस देखकर थिएटर टीचर ने कहा कि मुझे उनके थिएटर ग्रुप से जुड़ जाना चाहिए। मैंने कहा कि फीस देने की मेरी हैसियत नहीं है। उस समय 1500-2000 रुपए फीस थी और मैं घरवालों से थिएटर सीखने के लिए पैसे नहीं मांग सकता था। उन्होंने कहा कि तुम आ जाओ, फीस की चिंता मत करो।

शुरुआत में मैंने नुक्कड़ नाटक किए। जागरूकता अभियान के तहत कई स्ट्रीट प्ले किए। मुझे पता नहीं था कि इसके पैसे मिलेंगे। पहला चेक 2500 रुपए का मिला। उसी पैसे से थिएटर की फीस भरी और 500 रुपए बच गए। तब लगा कि एक्टिंग से कमाई भी हो सकती है।

सवाल: क्या उस समय तय कर लिया था कि अब एक्टिंग ही करनी है?

जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। उस समय मैं सुबह क्रिकेट की प्रैक्टिस करता था और शाम को थिएटर करता था। दोनों साथ लेकर चलना चाहता था, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि थिएटर भी उतनी ही मेहनत और समर्पण मांगता है जितना क्रिकेट।

क्रिकेट में अनुशासन तय होता है, लेकिन एक्टिंग में खुद अपना अनुशासन बनाना पड़ता है। किताबें पढ़नी होती हैं, लोगों को ऑब्जर्व करना होता है, कविताएं पढ़नी होती हैं, संगीत सुनना होता है, पेंटिंग देखनी होती है और इंसानी व्यवहार को समझना पड़ता है।

करीब डेढ़-दो साल बाद मुझे यकीन हुआ कि अब एक्टिंग में ही आगे बढ़ना है।

सवाल: क्या आपने किसी एक्टिंग स्कूल में जाने की भी कोशिश की?

जवाब: हां। मैंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) का ऑडिशन दिया, लेकिन चयन नहीं हुआ। इसके बाद दूसरे ड्रामा स्कूलों में भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि मैंने हार नहीं मानी। थिएटर करता रहा और साथ-साथ ऑडिशन भी देता रहा।

सवाल: पहला ब्रेक कैसे मिला?

जवाब: मेरा पहला प्रोजेक्ट अनुराग कश्यप सर की फिल्म ‘मनमर्जियां’ थी। इसके बाद एमएक्स प्लेयर की सीरीज ‘कैंपस डायरीज’ मिली, जिसमें मैंने पृथ्वीराज का किरदार निभाया। इस सीरीज के बाद इंडस्ट्री में लोग मुझे पहचानने लगे और ऑडिशन मिलने शुरू हो गए।

सवाल: नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘कैट’आपको कैसे मिली?

जवाब: उस समय मैं ‘कैंपस डायरीज’ की शूटिंग कर रहा था। तभी मुझे ‘कैट‘ का ऑडिशन मिला। इसमें मुझे सरदार का किरदार निभाना था, लेकिन पगड़ी बांधनी तक नहीं आती थी। मैं शूट खत्म करके सीधे दोस्त के घर गया। उसने रातभर मेरी मदद की, पगड़ी बांधी और हमने ऑडिशन रिकॉर्ड किया।

बाद में मुझे डायरेक्टर से मिलने के लिए अमृतसर बुलाया गया। मैं पहली बार पगड़ी बांधकर ट्रेन से गया। पूरी यात्रा में गर्दन तक नहीं हिलाई, क्योंकि डर था कि पगड़ी खराब न हो जाए। आज सोचता हूं कि पगड़ी पहनकर जाना सही फैसला था। शायद उसी वजह से डायरेक्टर को मेरे लुक पर दोबारा सोचने की जरूरत नहीं पड़ी।

सवाल: ‘कैट’ के बाद आपने चंडीगढ़ से मुंबई आने का फैसला कैसे लिया?

जवाब: ‘कैट’ में काम करने के बाद मुझे थोड़ा आर्थिक सहारा मिला। तब लगा कि अब मुंबई जाकर किस्मत आजमानी चाहिए। मैं कास्टिंग डायरेक्टर्स से मिलकर उन्हें बताना चाहता था कि मैंने ‘CAT’ में काम किया है। मैं शो रिलीज होने से करीब तीन महीने पहले ही मुंबई आ गया था।

‘कैट’ रिलीज होने के बाद लोगों ने मेरा काम पसंद किया। जिन कास्टिंग डायरेक्टर्स से मैं पहले मिल चुका था, उन्हें मेरा चेहरा याद आ गया। इसके बाद ऑडिशन मिलने लगे। पहले मुझे खुद जाकर बताना पड़ता था कि मैं एक्टर हूं, लेकिन अब लोग मेरे काम से परिचित थे।

हालांकि ऑडिशन मिल रहे थे, लेकिन कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं मिल रहा था। कई बार मैं आखिरी दौर तक पहुंचा, लेकिन रोल किसी और को मिल गया। देखते-देखते चार साल निकल गए।

सवाल: इन चार सालों का संघर्ष कितना मुश्किल था?

जवाब: बहुत मुश्किल था। जो पैसे लेकर मुंबई आया था, वे करीब छह महीने में खत्म हो गए। इसके बाद मैंने थिएटर किया, वर्कशॉप्स लीं और जितना काम मिला, करता रहा। कमाई नहीं होती थी, तो खर्च कम कर दिए। मैंने सादा जीवन जीना शुरू कर दिया। कोशिश यही थी कि किसी तरह मुंबई में टिके रहूं।

मैं वर्सोवा में रहता था। कई बार लगा कि यह शहर छोड़ना पड़े। एक्टिंग छोड़ने का कभी मन नहीं हुआ, लेकिन लगा कि कुछ समय के लिए चंडीगढ़ जाकर पैसे जुटा लूं और फिर लौटूं।

'राख' अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। इसमें रमनदीप यादव ने रज्जो का किरदार निभाया है।

‘राख’ अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। इसमें रमनदीप यादव ने रज्जो का किरदार निभाया है।

सवाल: फिर ‘राख’ कैसे मिली?

जवाब: मैं कुछ दिनों के लिए चंडीगढ़ गया था। तभी ‘राख’ के ऑडिशन का कॉल आया। खास बात यह थी कि ऑडिशन उसी कास्टिंग टीम ने भेजा था, जिसने मुझे चार साल पहले ‘CAT’ के लिए चुना था। मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि इतने साल बाद भी उन्हें मैं याद था और उन्होंने लीड किरदार के लिए मेरा टेस्ट किया।

उस वक्त लगा कि शायद भगवान मुझे एक और मौका दे रहे हैं। मैंने खुद से कहा कि अब बीच का रास्ता नहीं अपनाना है। इस मौके के लिए पूरी ताकत लगा दूंगा। पूरी ईमानदारी से तैयारी की और आखिरकार यह रोल मिल गया।

सवाल: ‘रज्जो’ जैसा खतरनाक किरदार निभाने की तैयारी कैसे की?

जवाब: जब मैंने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मैं भावुक हो गया। कहानी इतनी गहरी और क्रूर थी कि पढ़ते-पढ़ते ही उसका असर महसूस होने लगा। इसके बाद मैंने रमनदीप को अलग रख दिया और सिर्फ रज्जो के बारे में सोचना शुरू किया। मैं चाहता था कि रज्जो की चाल, आवाज, सोच, आदतें और व्यवहार अलग हो।

थिएटर की वजह से मुझे किरदार तैयार करने की आदत है। मैं सिर्फ डायलॉग याद नहीं करता, बल्कि यह भी सोचता हूं कि वह क्या खाता होगा, कैसे चलता होगा, किस तरह बात करता होगा और दुनिया को किस नजर से देखता होगा। खुशकिस्मती से इस शो के लिए 12 दिन की एक्टिंग वर्कशॉप मिली। उससे किरदार को समझने में काफी मदद मिली।

सवाल: शूटिंग के दौरान सबसे मुश्किल सीन कौन-सा था?

जवाब: दो सीन मेरे लिए सबसे मुश्किल थे। पहला वह, जिसमें रज्जो साहिल को पहली बार मारता है। उस दिन मैं पूरी तरह किरदार में डूब चुका था। कई टेक देने के बाद सच में ऐसा लग रहा था जैसे मैंने किसी को मार दिया हो। आधे दिन तक सेट पर होकर भी खुद में नहीं था।

दूसरा सीन वह था, जब रज्जो साहिल की बॉडी ठिकाने लगाने जाता है। वहां भी मैं पूरी तरह किरदार की मानसिक स्थिति में था। मेरी कोशिश थी कि रज्जो सिर्फ खलनायक न लगे। मैं चाहता था कि दर्शक उसके अंदर का इंसान भी देखें। वह गलत इंसान है, लेकिन उसके फैसलों के पीछे भी एक मानसिकता है। मैंने उसी सोच के साथ यह किरदार निभाया।

सवाल: ‘राख’ रिलीज होने के बाद दर्शकों से किस तरह का रिस्पॉन्स मिल रहा है?

जवाब: दर्शकों का रिस्पॉन्स उम्मीद से बेहतर मिला है। लोग कहते हैं कि मैंने किरदार बहुत अच्छी तरह निभाया है। कई लोग यह भी कहते हैं कि अगर हमारे आस पास होते तो पक्का मार देते। मेरे लिए यह सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट है, क्योंकि इसका मतलब है कि लोग मेरे किरदार से नफरत कर रहे हैं। यानी मैंने अपना काम ईमानदारी से किया है।

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